वेदों का महत्त्व
- स्वामी जयदीश्वरानन्द सरस्वती
जैसे दही में मक्खन, मनुष्यों में विद्वान, ओषधियों में अमृत, नदियों में गंगा और पशुओं में गौ श्रेष्ठ है, ठीक इसी प्रकार समस्त साहित्य में वेद सर्वश्रेष्ठ एवं सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं।
वेद ईश्वरीय ज्ञान हैं। यह ज्ञान सृष्टि के आरम्भ में मानवमात्र के कल्याण के लिए दिया गया था। वेद वैदिक-संस्कृति के मूलाधार हैं। वे शिक्षाओं के आगार और ज्ञान के भण्डार हैं। वेद संसाररूपी सागर से पार उतरने के लिए नौकारूप हैं। वेद में मनुष्य जीवन की सभी प्रमुख समस्याओं का समाधान है। वेद सांसारिक तापों से सन्तप्त लोगों के लिए शीतल प्रलेप हैं, अज्ञानान्धकार में पड़े हुए मनुष्यों के लिए वे प्रकाश स्तम्भ हैं, भूले-भटके लोगों को वे सन्मार्ग दिखाते हैं, निराशा के सागर में डूबनेवालों के लिए वे आशा की किरण हैं, शोक से पीड़ित लोगों को वे आनन्द एवं उल्लास का सन्देश प्रदान करते हैं, पथभ्रष्टों को कर्तव्य का ज्ञान प्रदान करते हैं, अध्यात्मपथ के पथिकों को प्रभु-प्राप्ति के साधनों का उपदेश देते हैं। संक्षेप में वेद अमूल्य रत्नों के भण्डार हैं।
वेद धर्म की मूल पुस्तक है। वेद वैदिक विज्ञान, राष्ट्रधर्म, समाज-व्यवस्था, पारिवारिक-जीवन, कर्तव्य-पालन, सत्य, प्रेम, अहिंसा, त्याग आदि को दर्पण की भाँति दिखाता है।
महर्षि मनु के विचार (मनुस्मृति के अनुसार)
वेद के मर्मज्ञ और रहस्यवेत्ता महर्षि मनु ने अपने ग्रन्थ में स्थान-स्थान पर वेद की गौरव-गरिमा का गान किया है। वे लिखते हैं— ‘सर्वज्ञानमयो हि सः’ अर्थात् वेद सब विद्याओं के भण्डार हैं। मनुस्मृति के अनुसार, जो व्यक्ति मूल ज्ञान और वेदों के मार्ग को छोड़कर अन्य निरर्थक कार्यों में समय नष्ट करता है, वह अपने जीवन के मुख्य उद्देश्य से भटक जाता है।
वेद पितर, देव और मनुष्य सबके लिए सनातन मार्गदर्शक नेत्र के समान हैं। वेद की महिमा का पूर्णरूपेण प्रतिपादन करना अथवा उसे पूर्णतया समझना अत्यन्त कठिन है। जीवन की व्यवस्था, काल (भूत, भविष्य, वर्तमान) और तीनों लोकों का ज्ञान वेदों से ही प्रसिद्ध होता है। यह सनातन वेदशास्त्र ही सब प्राणियों का धारण और पोषण करता है, इसलिए इसे मनुष्यों के लिए भवसागर से पार होने का परम साधन माना गया है।
महर्षि मनु ने यह भी लिखा है कि ज्ञान की साधना के लिए सदा ज्ञान और सत्य मार्ग का अभ्यास करना चाहिए, यही परम तप है। जो व्यक्ति सत्कर्म और ज्ञानार्जन किए बिना केवल मुक्ति की इच्छा करता है, वह कष्ट को प्राप्त होता है। इसलिए ज्ञान का क्रमबद्ध अध्ययन करके, अखंड संयम रखते हुए जीवन के अगले चरणों (गृहस्थाश्रम) में प्रवेश करना चाहिए। महर्षि मनु के अनुसार जो सत्य मार्ग या वेद की निंदा करता है, वही वास्तव में नास्तिक है।
दर्शन ग्रंथों में वेद की महिमा
वैशेषिक दर्शन (10/1/3) में कहा गया है:
तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम्।।*
अर्थात् ईश्वर द्वारा उपदिष्ट होने से वेद स्वतः प्रमाण हैं।
एक अन्य स्थान पर वैशेषिक दर्शन (6/1/1) में वर्णन है:
बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे।
अर्थात् वेद की वाक्य-रचना बुद्धिपूर्वक और वैज्ञानिक है। उसमें सृष्टिक्रम के विरुद्ध कोई काल्पनिक या असम्भव बातें नहीं हैं, अतः वह ईश्वरीय ज्ञान है।
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सांख्यकार महर्षि कपिल ने भी वेद को स्वतः प्रमाण माना है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि वेद किसी साधारण पुरुष की रचना नहीं हैं, क्योंकि अल्पज्ञ जीव समस्त विद्याओं के भण्डार वेदों की रचना करने में समर्थ नहीं है। वेद सृष्टि की आदि शक्ति और जगदीश्वर की निज शक्ति से अभिव्यक्त होने के कारण स्वतः प्रमाण हैं (सांख्य दर्शन 5/46, 5/59)।
वेदान्त दर्शन (1/1/3) में भी कहा गया है कि वेदज्ञान ईश्वर-प्रदत्त है। इस पर आचार्य शंकराचार्य का भाष्य है कि ऋग्वेदादि चारों वेद अनेक विद्याओं से युक्त हैं और सूर्य के समान सभी सत्यों का प्रकाश करने वाले हैं।
मीमांसा शास्त्र के कर्त्ता महर्षि जैमिनि ने धर्म का लक्षण करते हुए लिखा है:
चोदनालक्षणोर्थो धर्मः।।*
अर्थात् जिसके लिए वेदों या सत्य की आज्ञा हो, वह धर्म है और जो इसके विपरीत हो वह अधर्म है (मीमांसा 1/1/3)।
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इस प्रकार समस्त शास्त्र एक स्वर से वेद के गौरव, नित्यता और प्रामाणिकता का वर्णन करते हैं।
**ऐतिहासिक और पौराणिक आख्यान**
तैत्तिरीय ब्राह्मण (3/10/11/3) की एक सुंदर कथा आती है:
महर्षि भरद्वाज ने ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए 300 वर्षों तक वेदों का गहन अध्ययन किया। जब वे वृद्ध हो गए, तब इन्द्र ने आकर उनसे पूछा कि यदि आपको 100 वर्ष की आयु और मिले, तो आप क्या करेंगे? भरद्वाज ने उत्तर दिया— मैं उस आयु को भी ज्ञानार्जन और वेदाध्ययन में ही लगाऊँगा। तब इन्द्र ने पर्वत के समान तीन विशाल ज्ञान-राशियाँ दिखाकर कहा— "वेद तो अनन्त हैं (अनन्ता वै वेदाः)। आपने 300 वर्षों में जो सीखा, वह इस अनंत ज्ञान-राशि में से केवल तीन मुट्ठी के बराबर है।"
रामायण में भी महर्षि वाल्मीकि ने वेद के गौरव को व्यक्त किया है। जब श्रीराम वन को प्रस्थान कर रहे थे, तब विद्वानों ने कहा था कि हमारा मन जो अब तक स्वाध्याय में लगा रहता था, वह आपकी वन-यात्रा की ओर लगा है। हमारा परम धन वेद तो हमारे हृदय में सुरक्षित है।
महाभारत के शांति पर्व (232/24) में महर्षि व्यास लिखते हैं कि सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा ने वेदरूप नित्य दिव्यवाणी का प्रकाश किया, जिससे मनुष्यों को कर्तव्य की प्रेरणा मिलती है। अर्थ सहित अध्ययन पर बल देते हुए वे लिखते हैं कि जो केवल शब्दों को रटता है और उसके अर्थ को नहीं समझता, वह केवल भार ढोता है। परन्तु जो अर्थ-ज्ञानपूर्वक पढ़ता है, उसका पढ़ना ही सार्थक है।
इसी तथ्य को महर्षि यास्क ने निरुक्त (1/18) में कहा है कि जो मनुष्य पढ़कर ज्ञान के अर्थ को नहीं समझता, वह ठूँठ के समान है। परन्तु अर्थ को जानने वाला पवित्र ज्ञान के द्वारा कल्याण का भागी होता है।
**महर्षि दयानन्द और स्वामी विवेकानन्द के विचार**
इस विषय में महर्षि दयानन्द के विचार 'ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका' में आते हैं कि अर्थज्ञान सहित पढ़ने से ही परमोत्तम फल की प्राप्ति होती है। जो वेदों का अध्ययन कर उनके अर्थों को जानकर उत्तम कर्मों का आचरण करते हुए सर्वोपकारी होते हैं, वे सर्वश्रेष्ठ हैं।
पुराण भी वेद की महिमा स्वीकार करते हैं। श्रीमद्भागवत (6/1/40) में आता है कि जो वेद में कहा है वही धर्म है, वेद साक्षात् नारायणस्वरूप हैं। कूर्मपुराण और देवीभागवत में भी धर्म के विषय में वेद को ही परम प्रमाण माना गया है। गरुड़पुराण (101/55) में कहा गया है कि वेद से बढ़कर कोई शास्त्र नहीं है और परमात्मा से बढ़कर कोई देव नहीं है।
**पाश्चात्य विद्वानों की सम्मतियाँ
वेद की सर्वांगीणता पर न केवल भारतीय विद्वान, अपितु पाश्चात्य जगत भी मुग्ध रहा है:
* **प्रो. हीरेन (Historical Researches):** "वेद अपनी अनुपम आभा में अकेले खड़े हैं, जो मानवता के आगे बढ़ने के लिए ईश्वरीय प्रकाश-स्तम्भ का कार्य करते हैं।"
* **लार्ड मोर्ले:** "जो कुछ वेदों में मिलता है, वह अन्यत्र कहीं नहीं है।"
* **लेओ देल्बो (Mons. Leon Delbos):** "ऋग्वेद मानवता के महान मार्ग की सबसे उदात्त परिकल्पना है।"
* **प्रो. पाल थीमा:** "वेद पवित्र ग्रन्थ हैं जो न केवल भारत के लिए, अपितु समस्त संसार के लिए मूल्यवान हैं।"
* **डा. जेम्स क्युजन (Path to Peace):** "वैदिक आदर्शों पर चलकर ही इस पृथ्वी को पुनः स्वर्ग के समान सुंदर बनाया जा सकता है।"
* **थ्योरो (अमेरिकन विद्वान):** "वेदों के उपदेश सरल, सार्वभौम और सार्वकालिक हैं। उनमें ईश्वर-विषयक युक्तियुक्त विचार हैं।"
* **श्री डब्ल्यू. डी. ब्राऊन:** "वैदिक धर्म एक पूर्णतया वैज्ञानिक धर्म है, जहाँ धर्म और विज्ञान साथ-साथ चलते हैं।"
* **ह्रीलर विलौक्स:** "वेदों में न केवल जीवनोपयोगी धार्मिक तत्त्व हैं, बल्कि ऐसे वैज्ञानिक तथ्य भी हैं जिन्हें आधुनिक विज्ञान आज सच साबित कर रहा है।"
* **फर्दून दादा चान जी (Philosophy of Zoroastrianism):** "वेद शब्द का अर्थ ही ज्ञान और बुद्धिमत्ता है। यह प्रकृति, सदाचार और ज्ञान से ओत-प्रोत है।"
* **जैकालियट (The Bible in India):** "आश्चर्यजनक सच्चाई है कि केवल वेदों के विचार ही आधुनिक विज्ञान के साथ पूर्ण सामंजस्य रखते हैं।"
**निष्कर्ष**
यद्यपि इतिहास में मैक्समूलर, मोनियर विलियम्स और ग्रिफ़िथ जैसे कुछ पाश्चात्य अनुवादकों ने वेदों के अर्थों को सीमित या विकृत करने का प्रयास किया, ताकि वे अपने दृष्टिकोण को श्रेष्ठ सिद्ध कर सकें, लेकिन महर्षि दयानन्द सरस्वती ने 'वेदों की ओर लौटो' का सिंहनाद करके संसार को वेदों का सही और वैज्ञानिक स्वरूप दिखाया।
योगी अरविन्द घोष ने भी माना कि दयानन्द ने वेदों के बंद द्वारों की चाबियां ढूंढ निकालीं। स्वामी विवेकानन्द ने स्पष्ट कहा कि वेद किसी व्यक्तिविशेष की रचना नहीं हैं, बल्कि ईश्वर की अनन्त ज्ञानराशि हैं। वेदों का संदेश सार्वभौमिक है और यह संपूर्ण मानवता के कल्याण के लिए है।
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