संस्कृत नाटक की उत्पत्तिः उद्भव और विकास

संस्कृत नाटक की उत्पत्ति: उद्भव और विकास का प्रामाणिक इतिहास

संस्कृत नाटक की उत्पत्ति: उद्भव और विकास की ऐतिहासिक यात्रा

भारतीय साहित्य में संस्कृत नाटक (Drishya Kavya) कला और चेतना की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति है। महाकवि कालिदास, भास और भवभूति जैसे मनीषियों की कृतियों ने न केवल भारत बल्कि वैश्विक रंगमंच को समृद्ध किया है। आइए जानते हैं कि इस महान नाट्य परंपरा की उत्पत्ति कैसे हुई और इसका विकास किन चरणों में हुआ।

१. संस्कृत नाटक की उत्पत्ति के सिद्धांत

संस्कृत नाटकों की उत्पत्ति को लेकर विद्वानों के बीच अलग-अलग मत हैं। इसमें धार्मिक, ऐतिहासिक और वैज्ञानिक तीनों दृष्टिकोण शामिल हैं:

🔱 दैवीय या धार्मिक सिद्धांत (नाट्यवेद की उत्पत्ति)

भरतमुनि कृत 'नाट्यशास्त्र' के अनुसार, देवताओं की प्रार्थना पर ब्रह्मा जी ने चारों वेदों के तत्वों को मिलाकर पांचवें वेद यानी 'नाट्यवेद' की रचना की। उन्होंने:

  • ऋग्वेद से पाठ्य (संवाद या कथोपकथन) लिया।
  • सामवेद से गीत (संगीत) लिया।
  • यजुर्वेद से अभिनय (भाव-भंगिमा) लिया।
  • अथर्ववेद से रस (आनंद और अनुभूति) को ग्रहण किया।

अन्य प्रमुख सिद्धांत:

  • ऋग्वेद के संवाद सूक्त: आधुनिक भाषाविद् (जैसे मैक्समूलर और कीथ) का मानना है कि ऋग्वेद के यम-यमी, पुरुरवा-उर्वशी और अगस्त्य-लोपामुद्रा जैसे संवाद सूक्तों से ही आगे चलकर नाटकों के संवादों का विकास हुआ।
  • पुत्तलिका नृत्य सिद्धांत: डॉ. पिशेल के अनुसार, भारत में प्राचीन काल से प्रचलित कठपुतली (Puppet Show) के खेल से नाटकों का जन्म हुआ। इसीलिए नाटक के मुख्य सूत्रधार को आज भी 'सूत्रधार' (धागा पकड़ने वाला) कहा जाता है।
  • वीरपूजा सिद्धांत: प्रोफेसर रिज़वे का मत है कि मृत वीरों के प्रति आदर व्यक्त करने और उनके जीवन की घटनाओं को जीवंत करने की परंपरा से रंगमंच का उदय हुआ।

२. संस्कृत नाटक के विकास के प्रमुख चरण

संस्कृत नाटक का विकास किसी एक कालखंड में नहीं हुआ, बल्कि यह सदियों की निरंतर साहित्यिक साधना का परिणाम है। इसके विकास क्रम को मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा जा सकता है:

अ. प्रारंभिक काल (भास और पूर्ववर्ती काल)

संस्कृत नाटक के इतिहास में सबसे पहला प्रामाणिक और संपूर्ण नाम महाकवि भास का आता है। कालिदास से भी पूर्व हुए भास ने १३ नाटकों की रचना की, जिनमें 'स्वप्नवासवदत्तम' और 'प्रतिज्ञायौगंधरायण' प्रमुख हैं। इनके नाटक सरल, गतिशील और रंगमंच के सर्वथा अनुकूल हैं। इसी काल में अश्वघोष के भी कुछ खंडित नाटक प्राप्त होते हैं।

ब. स्वर्ण काल (कालिदास से भवभूति तक)

यह संस्कृत नाट्य परंपरा का चरमोत्कर्ष था। इस काल में ऐसे कालजयी नाटकों की रचना हुई जिन्होंने वैश्विक स्तर पर भारत का मस्तक ऊँचा किया:

  • महाकवि कालिदास: इनके द्वारा रचित 'अभिज्ञानशाकुंतलम्' को संसार के सर्वश्रेष्ठ नाटकों में गिना जाता है। इसके अतिरिक्त 'विक्रमोर्वशीयम्' और 'मालविकाग्निमित्रम्' इनकी अमर कृतियाँ हैं।
  • शूद्रक: इनका नाटक 'मृच्छकटिकम्' (माटी की गाड़ी) उस समय के समाज के यथार्थ, प्रेम और राजनीति का अद्भुत दस्तावेज़ है।
  • विशाखदत्त: इनका 'मुद्राराक्षस' संस्कृत साहित्य का एकमात्र ऐसा नाटक है जिसमें न कोई नायिका है और न ही श्रृंगार रस; यह पूरी तरह से कूटनीति पर आधारित ऐतिहासिक नाटक है।
  • महाकवि भवभूति: करुण रस के स्वामी भवभूति ने 'उत्तररामचरितम्' की रचना की, जिसके बारे में कहा जाता है कि "कारुण्यं भवभूतिरेव तनुते" (करुण रस तो केवल भवभूति ही व्यक्त कर सकते हैं)।

स. परवर्ती या ह्रास काल

११वीं शताब्दी के बाद, राजनीतिक उथल-पुथल और विदेशी आक्रमणों के कारण संस्कृत रंगमंच को राजाश्रय मिलना कम हो गया। इस काल में भट्टनारायण का 'वेणीसंहार' और जयदेव का 'प्रसन्नराघव' जैसे नाटक लिखे गए, लेकिन इनमें मौलिकता से अधिक व्याकरण और शास्त्रीय नियमों का बोझ अधिक था।

३. संस्कृत नाटक की विलक्षण विशेषताएँ

पश्चिमी देशों (जैसे ग्रीक नाटक) की तुलना में संस्कृत नाटकों का अपना एक विशिष्ट प्रामाणिक स्वरूप है:

  1. सुखांत परंपरा: संस्कृत साहित्य में दुखांत (Tragedy) नाटकों की परंपरा नहीं है। न्याय और धर्म की विजय के साथ नाटक हमेशा 'भरतवाक्य' (कल्याणकारी वचन) के साथ सुखांत समाप्त होता है।
  2. मिश्रित भाषा: यह संस्कृत नाटकों की सबसे बड़ी विशेषता है। इसमें राजा, ऋषि और उच्च वर्ग के पात्र 'संस्कृत' बोलते हैं, जबकि महिलाएं, सेवक और सामान्य समाज के पात्र 'प्राकृत' भाषा का प्रयोग करते हैं, जो उस समय की सामाजिक वास्तविकता को दर्शाता है।
  3. विदूषक की उपस्थिति: गंभीर प्रसंगों के बीच दर्शकों के मनोरंजन और हास्य रस के लिए 'विदूषक' (Jester) का एक विशिष्ट पात्र होता है, जो राजा का परम मित्र भी होता है।

निष्कर्ष

संस्कृत नाटक की उत्पत्ति ऋषियों की ध्यान-साधना, लोक-मनोरंजन और जीवन के शाश्वत सत्यों को समाज तक पहुँचाने के उद्देश्य से हुई थी। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र से शुरू होकर कालिदास की कलात्मकता तक पहुँचा यह सफर प्रमाणित करता है कि भारतीय रंगमंच दुनिया का सबसे प्राचीन, वैज्ञानिक और व्यवस्थित रंगमंच है। आज इसके संरक्षण और पुनरुत्थान की अत्यधिक आवश्यकता है।

 संस्कृत नाटक की उत्पत्ति: उद्भव और विकास

नाटक की उत्पत्ति: नाटक की उत्पत्ति के विषय में सर्वाधिक प्राचीन मत हमें भरतमुनि के नाट्य –शास्त्र के प्रथम अध्याय में उपलब्ध होता है। इस अध्याय का नाम ’नाट्ययोत्पत्ति’ है। इसके अनुसार नाटक पंचम वेद है, जिसकी सृष्टि ब्रह्मा ने महेन्द्र सहित देवसमूह की प्रार्थना पर की:                                

महेन्द्रप्रमुखैर्देवैरुक्त: किल पितामह:।                      

क्रीडनीयकमिच्छामो दृश्यं श्रव्य्चयद्भवेत ॥ १।११

अर्थात इन्द्र जिनका मुखिया था ऐसे देवताओं द्वारा पितामह ब्रह्माजी से कहा गया कि ’हम ऐसा खेल अथवा खिलौना चाहते हैं जो देखने तथा सुनने दोनों के योग्य हो। यह सुनकर ब्रह्मा ने चारों वेदों का ध्यानकर ऋग्वेद से पाठ्यसामग्री, सामवेद से गीत, यजुर्वेद से अभिनय और अथर्ववेद से रसों को ग्रहण करके ’नाट्यवेद’ नामक पंचमवेद की सृष्टि की:-

जग्राह पाठ्यं ऋग्वेदात्सामभ्यो गीतमेव च।   

 यजुर्वेदादभिनयांरसानाथर्वणादपि ॥१।१७               

 वेदापवेदै: संबद्धो नाव्यवेदो महात्मना ।

एवं भगवता सृष्टो ब्रह्मणा सर्ववेदिना ॥१।१८

इस प्रकार सब वेदों के ज्ञाता महात्मा भगवान श्री ब्रह्मा जी के द्वारा वेदों और उपवेदों से सम्बन्ध रखने वाला यह नाट्यवेद रचा गया। उपवेद चार हैं—आयुर्वेद, धनुर्वेद, गंधर्ववेद तथा स्थापत्यवेद। नाट्यवेद को उत्पन्न करके ब्रह्मा जी ने देवराज इन्द्र से कहा कि इसका अभिनय देवताओं से कराओ। जो देवता कार्यकुशल, पण्डित, वाक्पटु, तथा थकान को जीते हुए हों, उनको अभिनय का कार्य सोंपो। अर्थात अभिनेता के ये चार गुण हैं—- कार्य कुशलता, पाण्डित्य, वाक्पटुता तथा थकान को जीतने की शक्ति। इन्द्र द्वारा देवताओं को अभिनय में असमर्थ बताने पर ब्रह्मा ने भरतमुनि के पुत्रों को इसकी शिक्षा देने के लिए कहा। ब्रह्माजी के कथानुसार इन्द्र के ध्वजोत्सव में नाट्यवेद सर्वप्रथम प्रयुक्त हुआ। इस अभिनय में देवों की विजय तथा दैत्यों का अपकर्ष प्रदर्शित हुआ, अत: उन्होंने विघ्न उपस्थित किया। इन विघ्नों से बचे रहने के लिए इन्द्र ने विश्वकर्मा से नाट्यगृह की रचना कराई। इसके उपरान्त ब्रह्मा ने दैत्यों को शान्त करने के लिए कहा कि नाट्यवेद देव और दैत्यों दोनों के लिए हैं तथा इसमें धर्म, क्रीड़ा, हास्य और युद्ध आदि सभी विषय ग्रहीत किये जा सकते हैं।

श्रंगारहास्यकरुणा रौद्रवीरभयानका: ।                     

वीभत्साद्भुतसंज्ञौ चेत्यष्टौ नाट्य रसा: स्मृता:।

नाट्य का प्रयोजन:

दु:खार्त्तानां श्रमार्त्तानां शोकार्त्तानां तपस्विनाम।        

विश्रांतिजननं काले नाट्यमेतन्मयाकृतम ॥१।११४

अर्थात ब्रह्मा जी कहते हैं कि मेरे द्वारा रचा हुआ यह नाट्य दु:ख से पीड़ित, थके–माँदे, शोक संतप्त बेचारे लोगों के लिए उचित समय पर विश्राम देने वाला है।

धम्यं यशस्यमायुष्यं हितं बुद्धि विवर्द्धनम ।

लोकोपदेश जननं नाट्यमेतद्भविष्यति ॥ १।११५

यह नाटक धर्म, यश और आयु बढ़ानेवाला, हितकारी, बुद्धिवर्धक तथा लोकोपदेश का जन्मदाता होगा। इस नाटक में समस्त शास्त्र, शिल्प एवं विविध प्रकार के कर्म एकत्र एवं सन्निविष्ट रहते हैं।

अहो नाट्यमिंद सम्यक त्वया सृष्टं महामते।

यशस्यं च शुभार्थं च पुण्यं बुद्धि विवर्द्धनम ॥

भरतमुनि, नाट्यशास्त्र ४।१२

आचार्य भरतमुनि के अनुरोध पर पितामह ब्रह्म के आदेश से विश्वकर्मा द्वरा निर्मित नाट्यशाला में जब अमृतमन्थन नामक समवकार और त्रिपुरदाह नामक डिम का अभिनय हुआ (नगपति हिमालय, कैलाश पर नाट्यशाला थी) तो उसमें देवता तथा दानवों ने अपने–अपने भावों एवं कर्मों का स्वाभाविक एवं सजीव प्रदर्शन देखकर हार्दिक उल्लास प्रकट करते हुए कहा—’हे महामते, आपके द्वारा विरचित यह नाट्य–रचना अत्यन्त सुन्दरं है। यह यश, कल्याण, पुण्य तथा बुद्धि का विवर्द्धन करने वाली है।’

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