मानव अस्तित्व लुप्त होने की कगार पर उपस्थित हो चुकी है।

मानव अस्तित्व: लुप्त होने की कगार पर

मानव अस्तित्व: लुप्त होने की कगार पर

मानव अस्तित्व खत्म होने की कगार पर आ चुका है। यह सुन कर किसी भी प्रकार से आश्चर्यचितित होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह हमारी इस पृथ्वी के सबसे खतरनाक सत्यों में से एक है। यह अलग बात है कि यह संकट सभी को दिखाई नहीं दे रहा है, क्योंकि लोगों को यह समझने में सबसे बड़ी बाधा हमारी खुद की मानव प्रकृति ही खड़ी करती है। उदाहरण के लिए, मानव हर पल अपने जीवन की लीला का समापन कर रहा है, और वह ऐसा विचार करता है कि वह स्वयं को विकसित कर रहा है। जबकि यथार्थ यह है कि मानव विकसित होने के स्थान पर स्वयं के अस्तित्व को समाप्त करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है।

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि हमारे रक्त की लाखों कोशिकाएं हर पल नवीन होती हैं और लाखों नष्ट हो जाती हैं। यह बहुत सूक्ष्म स्तर पर हो रहा है। यदि इसी प्रक्रिया को थोड़े बड़े स्तर पर देखें, तो हम साफ-साफ देख सकते हैं कि जो वस्तु उत्पन्न होती है, वह साथ ही समाप्त होना भी शुरू कर देती है। जिस समय वह पूर्ण होती है, उसी समय उसका अवसान भी निश्चित हो जाता है। उदाहरण के लिए, एक आम का फल जब पूर्ण रूप से पक कर तैयार होता है, उसी समय वह अपनी डाली से टूट कर जमीन पर गिर जाता है; अर्थात वह पूर्ण रूप से अपने वृक्ष-जीवन को समाप्त कर देता है। यह अलग बात है कि उसके बाद भी मानव अपनी भूख मिटाने के लिए या मीठे आम का स्वाद लेने के लिए उसका सेवन करता है। इस तरह आम का जीवन तो समाप्त हो गया, लेकिन उसके जीवन का समापन भी किसी दूसरे मनुष्य या पक्षी के लिए जीवन रक्षा का कारण बन जाता है।

"वास्तव में जन्म और मृत्यु दो अलग-अलग वस्तुएं नहीं हैं, बल्कि एक ही सत्य को हम दो नामों से जानते हैं। यह मृत्यु सिर्फ उनको दिखाई देती है जो इस जीवन के उद्भव को जानते हैं, अर्थात जो ज्ञानी पुरुष हैं।"

हम सब साधारणतः जानते हैं कि स्त्री-पुरुष के संयोग से गर्भधारण होता है और स्त्री के गर्भ में मानव का पदार्पण होता है, जिसके कुछ महीनों के बाद शिशु का जन्म होता है। लेकिन मृत्यु के लिए किसी प्रकार के संयोग की आवश्यकता क्यों नहीं पड़ती? इसके बारे में शायद आपने कभी विचार नहीं किया होगा। इसका कारण यह है कि हम जीवन और मृत्यु को अलग-अलग करके देखते हैं। वास्तव में जन्म और मृत्यु दो वस्तुएं नहीं, बल्कि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जिस प्रकार जब तक प्राणी मां के गर्भ में रहता है, वह सभी को दिखाई नहीं देता (यद्यपि उसकी मां को इसका अहसास होता है), उसी प्रकार यह मृत्यु भी सिर्फ उन्हें दिखाई देती है जो जीवन के मूल उद्भव को जानते हैं। केवल ज्ञानी पुरुष ही यह जानता है कि जिसे संसार 'जीवन' समझता है, वास्तव में वह साक्षात मृत्यु का जीवंत दर्शन है।

पुरुष (या मनुष्य) का अर्थ केवल कोई शरीरधारी प्राणी या आदमी नहीं है, जैसा कि हमें समझाया गया है। पुरुष वह चेतन तत्व है जो न औरत है और न ही आदमी; वह दोनों में एक समान रूप से विद्यमान रहता है। उसकी कभी मृत्यु नहीं होती और न ही उसका जन्म होता है; वह जन्म और मृत्यु दोनों का साक्षी है। वास्तव में 'ज्ञान' शब्द की उत्पत्ति ही 'जान' (चेतना) से होती है, अर्थात जो मूल जीव है। जो प्राणी आत्मिक रूप से जितना अधिक जागृत है, वह उतना ही अधिक ज्ञानवान है। ज्ञानवान होने का मतलब यह नहीं है कि हमारे पास संसार की भौतिक वस्तुओं की जानकारी का बहुत बड़ा भंडार है और हम स्वयं के बारे में कुछ भी नहीं जानते। यथार्थ तो यह है कि मानव जितना अधिक सांसारिक जानकारियों का संग्रह करता जा रहा है, उतना ही अधिक स्वयं के अस्तित्व से दूर होता जा रहा है। इसी कारण मैं यह कह रहा हूँ कि मानव अस्तित्व लुप्त होने की कगार पर पहुंच चुका है।

मानव का मूल अस्तित्व चेतन, ज्ञानवान और कालजयी है। इसके बावजूद जिसे हम स्त्री और पुरुष के रूप में देखते हैं, उनके शारीरिक गठन में प्रकृति ने स्पष्ट अंतर रखा है। स्त्री का शरीर इस प्रकार निर्मित किया गया है कि वह गर्भ धारण कर सके और शिशु को स्तनपान करा सके, जिससे एक नए जीव को इस पृथ्वी पर आने का अवसर मिले। वहीं, पुरुष के शरीर को रक्षा कवच के रूप में सुदृढ़ बनाया गया है, इसलिए उसका शरीर तुलनात्मक रूप से अधिक मजबूत होता है। स्त्री और पुरुष सिर्फ शारीरिक स्तर पर ही भिन्न नहीं हैं, बल्कि उनकी मानसिक स्थिति और प्रवृत्तियों में भी मौलिक अंतर होता है। परंतु, हमारी आधुनिक शिक्षा पद्धति ने इस प्राकृतिक और मानसिक भिन्नता को पूरी तरह से कुचलने का कार्य किया है। इसी का परिणाम है कि आज समाज में ऐसे स्त्री-पुरुष दिखाई देते हैं जिनके आचरण और स्वभाव में कोई मौलिक अंतर नहीं रह गया है। आधुनिक शिक्षा ने दोनों की मानसिक स्थिति को एक जैसा (यांत्रिक) बना दिया है।

इसके कारण आज इस भूमंडल पर एक पूर्ण पुरुष या पूर्ण स्त्री का मिलना दुर्लभ हो चुका है। और जब समाज में पूर्ण स्त्री या पूर्ण पुरुष ही नहीं रहेंगे, तो एक पूर्ण मानव अस्तित्व का जन्म लेना असंभव हो जाएगा। लगभग ऐसा समय आ चुका है। 'लगभग' मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि अभी भी एक बड़ा वर्ग ऐसा है जिसे आधुनिक शिक्षा ने पूरी तरह अपनी गिरफ्त में नहीं लिया है। जिन्होंने इस आधुनिक जीवनशैली और शिक्षा को पूर्णतः अपना लिया है, वे अपनी जड़ों से कट चुके हैं। जिस प्रकार आम का फल डाली से अलग होने के बाद कुछ समय के लिए ही उपयोगी रहता है, वैसे ही आज के आधुनिक समाजों की स्थिति हो चुकी है। यह विचार एक मानसिक महामारी की तरह फैलता जा रहा है। कोरोना जैसी महामारियों का इलाज तो वैक्सीन से खोज लिया गया, लेकिन जिस अस्तित्वगत बीमारी की चर्चा मैं यहाँ कर रहा हूँ, उसका इलाज खोजना इस शिक्षा पद्धति के वश में नहीं है।

क्योंकि यह शिक्षा का नहीं, बल्कि जीवन का विषय है, जिसे स्वयं प्रकृति हमें सिखाती है। लेकिन today प्रकृति को ही नष्ट किया जा रहा है और लोगों को एक कृत्रिम जीवन जीने के लिए मजबूर किया जा रहा है। जब मनुष्य प्रकृति से कटकर पूरी तरह भौतिक और आर्थिक प्रधान समाज की अवधारणा में डूब जाता है, तो वह ऐसे इंसानों को जन्म देता है जो मशीन के समान होते हैं। आज के समाज में सामान्य और प्राकृतिक जीवन जीना अत्यंत कठिन हो चुका है, जिसके कारण अवसाद बढ़ रहा है और लोग नशीली दवाओं व जहरीले खाद्य पदार्थों का सेवन कर रहे हैं। यह स्थिति इंगित करती है कि आने वाले समय में सामूहिक आत्मिक मृत्यु और आत्महत्याओं की प्रवृत्ति बढ़ेगी, जैसा कि कुछ अत्यधिक विकसित देशों के आंकड़े दर्शाते हैं।

प्रकृति से विमुख होकर जब मनुष्य केवल भौतिकता में ही सुख ढूंढेगा, तो वह अपने अस्तित्व के विनाश को ही आमंत्रण देगा। यदि यही ढर्रा रहा, तो आने वाले दशकों में मानव जाति को गंभीर जनसांख्यिकीय, प्राकृतिक और स्वास्थ्य संबंधी संकटों का सामना करना पड़ेगा। प्राकृतिक स्रोतों के समाप्त होने पर जीवन पूरी तरह यांत्रिक हो जाएगा, जहाँ Micro-chips और कृत्रिम तकनीकों के माध्यम से मानवीय स्वतंत्रता को नियंत्रित किया जाएगा। अतः आज आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्य इस कृत्रिमता को छोड़कर पुनः अपनी जड़ों, अपनी चेतना और प्रकृति की ओर लौटे, ताकि मानव अस्तित्व को विलुप्त होने से बचाया जा सके।

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आधुनिक कोशिकीय जीव विज्ञान (Cell Biology), शरीर विज्ञान (Anatomy) और क्वांटम चेतना

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