Badi Didi : Sarat Chandra Chattopadhyay (Bangla Novel) बड़ी दीदी : शरतचंद्र चट्टोपाध्याय (बांग्ला उपन्यास)

Badi Didi : Sarat Chandra Chattopadhyay (Bangla Novel)  बड़ी दीदी : शरतचंद्र चट्टोपाध्याय (बांग्ला उपन्यास)


भूमिका: 'बड़ी दीदी' — वात्सल्य, स्वाभिमान और मूक प्रेम की अमर गाथा

शरतचंद्र चट्टोपाध्याय बांग्ला साहित्य के एक ऐसे स्तंभ हैं, जिन्होंने मनुष्य के अंतर्मन की गहराइयों और सामाजिक रूढ़ियों के बीच पिसते किरदारों को बेहद सजीवता से उकेरा है। वर्ष 1907 में प्रकाशित उपन्यास **'बड़ी दीदी'** शरतबाबू की एक ऐसी ही कालजयी रचना है, जो सहज मानवीय संवेदनाओं, निश्छल वात्सल्य और समाज के कठोर नियमों के द्वंद्व को अत्यंत मार्मिकता के साथ प्रस्तुत करती है।

यह कहानी केवल दो मुख्य किरदारों—माधवी (बड़ी दीदी) और सुरेंद्रनाथ—के इर्द-गिर्द नहीं घूमती, बल्कि यह तत्कालीन बंगाली समाज में नारी की स्थिति, उसकी मूक वेदना और स्वाभिमान का एक जीवंत दस्तावेज़ है।

कथानक की अंतर्वस्तु और चरित्र-चित्रण

उपन्यास का मूल ढांचा दो विपरीत प्रकृति के मनुष्यों के मिलन और एक-दूसरे पर उनकी अचेतन निर्भरता पर टिका है:

 सुरेंद्रनाथ (मास्टर साहब): एक उच्च शिक्षित (एम.ए. उत्तीर्ण) युवक, जो अपनी तीक्ष्ण बुद्धि के बावजूद व्यावहारिक संसार से पूरी तरह कटा हुआ है। वह बच्चों जैसा भोला, लापरवाह और अपने दैनिक जीवन की आवश्यकताओं के प्रति पूरी तरह उदासीन है। वह एक ऐसा 'फूस की आग' जैसा चरित्र है, जिसे प्रज्वलित रखने के लिए हर समय किसी के सहारे की आवश्यकता होती है।

 माधवी (बड़ी दीदी): एक संपन्न जमींदार की अभागी, बाल-विधवा पुत्री। वह शांत, स्वाभिमानी, कर्तव्यनिष्ठ और पूरे परिवार के लिए एक 'कल्पवृक्ष' के समान है, जिससे हर कोई स्नेह और आश्रय पाता है।

जब घर से भागा हुआ, भूखा-प्यासा सुरेंद्रनाथ माधवी के घर उसकी छोटी बहन प्रमिला का मास्टर बनकर आता है, तब माधवी अनायास ही उसके एकाकी जीवन की पतवार बन जाती है। सुरेंद्र के प्रति उसका यह भाव पहले एक माँ और बड़ी बहन जैसा वात्सल्य होता है, जो धीरे-धीरे एक ऐसे मूक और पवित्र अनुराग में बदल जाता है, जिसकी समाज में कोई स्वीकृति नहीं थी।

 सामाजिक यथार्थ और मनोवैज्ञानिक द्वंद्व

शरतबाबू ने इस उपन्यास में विधवा जीवन की त्रासदी को बिना किसी शोर-शराबे के, बेहद सूक्ष्मता से दिखाया है। पिता की मृत्यु के बाद भाई के राज में माधवी का घटता अधिकार, समाज द्वारा एक विधवा के रूप और यौवन को शंका की दृष्टि से देखना और सुरेंद्र के प्रति उसकी भावनाओं पर उसकी सहेली मनोरमा का यह कहना कि "उसने वह किया है जो एक विधवा को नहीं करना चाहिए था", यह सब तत्कालीन समाज की संकीर्णता को दर्शाता है।

उपन्यास का उत्तरार्ध सुरेंद्रनाथ के जमींदार बनने, माधवी की संपत्ति की नीलामी और अंततः सुरेंद्र की मृत्युशैया पर दोनों के पुनर्मिलन की एक अत्यंत कारुणिक परिणति है, जहाँ वर्षों पुराना 'बदला' और मूक प्रेम अश्रुओं के रूप में बह निकलता है।

 निष्कर्ष

'बड़ी दीदी' महज़ एक विरह-गाथा नहीं है, बल्कि यह प्रेम के उस उदात्त (Noble) स्वरूप की अभिव्यक्ति है, जो शारीरिक आकर्षण से परे, एक-दूसरे के प्रति समर्पण और आत्मिक शांति में निहित है। शरतचंद्र की सहज शैली, संवादों की तरलता और किरदारों का मनोवैज्ञानिक उतार-चढ़ाव पाठक को आदि से अंत तक बाँधे रखता है और अंत में एक गहरी कसक छोड़ जाता है।

आइए, मानवीय भावनाओं के इसी ताने-बाने को समझने के लिए इस अमर कृति के पन्नों में प्रवेश करें।


बड़ी दीदी : शरतचंद्र चट्टोपाध्याय (बांग्ला उपन्यास)

 प्रकरण 1

इस धरती पर एक विशिष्ट प्रकार के लोग भी बसते हैं। ये फूस की आग की तरह होते हैं; झट से जल उठते हैं और फिर चटपट बुझ जाते हैं। ऐसे व्यक्तियों के पीछे हर समय एक ऐसा व्यक्ति रहना चाहिए, जो उनकी आवश्यकता के अनुसार उनके लिए फूस जुटा सके।

जब गृहस्थ की कन्याएँ मिट्टी का दीपक जलाते समय उसमें तेल और बाती डालती हैं, तो दीपक के साथ एक सलाई भी रख देती हैं। जब दीपक की लौ मद्धिम होने लगती है, तब उस सलाई की बहुत आवश्यकता होती है; उससे बाती उकसानी पड़ती है। यदि वह छोटी सी सलाई न हो, तो तेल और बाती के रहते हुए भी दीपक का जलते रहना असंभव हो जाता है।

सुरेंद्रनाथ का स्वभाव बहुत कुछ इसी प्रकार का है। उसमें बल, बुद्धि और आत्मविश्वास सभी कुछ है, लेकिन वह अकेला कोई काम पूरा नहीं कर सकता। जिस प्रकार वह उत्साह के साथ थोड़ा सा काम कर सकता है, उसी तरह अलसाकर बाकी का सारा काम अधूरा छोड़कर चुपचाप बैठ भी सकता है। उस समय उसे किसी ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता होती है, जो अधूरे काम को पूरा करने की प्रेरणा दे।

सुरेंद्र के पिता सुदूर पश्चिम में वकालत करते हैं; बंगाल के साथ उनका कोई अधिक संबंध नहीं है। वहीं पर सुरेंद्र ने बीस वर्ष की उम्र में एम.ए. पास किया था—कुछ तो अपने गुणों से और कुछ अपनी विमाता के प्रताप से। सुरेंद्र की विमाता ऐसे परिश्रम और लगन से उसके पीछे लगी रहती थीं कि अनेक अवसरों पर वह यह समझ ही नहीं पाता था कि स्वयं उसका भी कोई स्वतंत्र व्यक्तित्व है या नहीं; सुरेंद्र नाम का कोई स्वतंत्र प्राणी इस संसार में रहता है या नहीं। विमाता की इच्छा ही मानव रूप धारण करके उससे सोना, जागना, पढ़ना, लिखना और परीक्षाएँ पास करना आदि सभी काम करा लेती थी। यह विमाता अपनी सगी संतान के प्रति बहुत कुछ उदासीन रहने पर भी सुरेंद्र के प्रति जितनी सतर्क रहती थीं, उसकी कोई सीमा नहीं थी। उसका थूकना-खखारना तक उनकी आँखों से नहीं छिप सकता था। इस कर्तव्यपरायण नारी के शासन में रहकर सुरेंद्र ने पढ़ना-लिखना तो सीख लिया, लेकिन आत्मनिर्भरता बिल्कुल नहीं सीखी। उसे अपने ऊपर रत्ती भर भी विश्वास नहीं था; उसे यह भरोसा नहीं था कि वह किसी भी काम को कुशलता से पूरा कर सकता है।

मुझे कब किस चीज़ की आवश्यकता होगी और कब मुझे क्या काम करना होगा, यह वह स्वयं भी निश्चित नहीं कर पाता था—यहाँ तक कि उसे नींद आ रही है या भूख लग रही है, यह भी वह खुद नहीं समझता था। जब से उसने होश सँभाला था, तब से अब तक के पंद्रह वर्ष उसने विमाता पर निर्भर रहकर ही बिताए थे; इसलिए विमाता को उसके लिए ढेर सारे काम करने पड़ते थे। रात-दिन के चौबीस घंटों में से बाईस घंटे तिरस्कार, उलाहने, डाँट-फटकार और मुँह बिगाड़ने के साथ-साथ परीक्षा में पास होने के लिए उसे अपनी निद्रा और सुख से हाथ धोना पड़ता था। भला अपनी सौत के लड़के के लिए कौन कब इतना करता है! मोहल्ले-टोले के लोग एक मुख से राय-गृहिणी की प्रशंसा करते हुए अघाते नहीं थे।

सुरेंद्र के प्रति उनके आंतरिक प्रयास में नाम के लिए भी कभी कमी नहीं होती थी। यदि तिरस्कार और लांछना सुनने के बाद सुरेंद्र की आँखें और चेहरा लाल हो जाता, तो राय-गृहिणी उसे ज्वर (बुखार) आने का लक्षण समझकर तीन दिन तक साबूदाना खाने की व्यवस्था कर देती थीं। मानसिक विकास और शिक्षा-दीक्षा की प्रगति के प्रति उनकी दृष्टि और भी अधिक पैनी थी। सुरेंद्र के शरीर पर साफ़-सुथरे या आधुनिक फ़ैशन के कपड़े देखते ही वे साफ़ समझ लेती थीं कि लड़का शौकीन बनने लगा है, बाबू बनकर रहना चाहता है; और उसी समय दो-तीन सप्ताह के लिए सुरेंद्र के कपड़ों के धोबी के घर जाने पर रोक लगा देती थीं।

बस इसी तरह सुरेंद्र के दिन बीतते थे। इस प्रकार की स्नेहपूर्ण सतर्कता के बीच कभी-कभी वह सोचने लगता कि शायद सभी लोगों के जीवन का प्रभात इसी प्रकार व्यतीत होता होगा; लेकिन बीच-बीच में कभी-कभी आस-पास के लोग उसके पीछे पड़कर उसके दिमाग़ में कुछ और ही प्रकार के विचार भर देते थे।

एक दिन यही हुआ; उसके एक मित्र ने आकर उसे परामर्श दिया कि अगर तुम्हारे जैसा बुद्धिमान लड़का इंग्लैंड चला जाए, तो भविष्य में उसकी उन्नति की बहुत आशाएँ हो सकती हैं और स्वदेश लौटकर वह अनेक लोगों पर उपकार कर सकता है। यह बात सुरेंद्र को कुछ बुरी नहीं लगी। वन में रहने वाले पक्षी की अपेक्षा पिंजरे में रहने वाला पक्षी अधिक फड़फड़ाता है। सुरेंद्र की कल्पना की आँखों के आगे स्वाधीनता के प्रकाश से भरा स्वच्छंद वातावरण झिलमिलाने लगा और उसके पराधीन प्राण पागलों की तरह पिंजरे के चारों ओर फड़फड़ाने लगे।

उसने पिता के पास पहुँचकर निवेदन किया कि चाहे जिस तरह हो, मेरे इंग्लैंड जाने की व्यवस्था कर दी जाए; साथ ही उसने यह भी कह दिया कि इंग्लैंड जाने पर सभी प्रकार की उन्नति की आशा है। पिता ने उत्तर दिया, "अच्छा, सोचूँगा।" लेकिन घर की मालकिन की इच्छा इसके बिल्कुल विरुद्ध थी। वह पिता और पुत्र के बीच आँधी की तरह पहुँच गई और इस तरह ठहाका मारकर हँस पड़ी कि वे दोनों सन्नाटे में आ गए।

गृहिणी ने कहा, "तो फिर मुझे भी विलायत भेज दो, वरना वहाँ सुरेंद्र को सँभालेगा कौन? जो यही नहीं जानता कि कब क्या खाना होता है और कब क्या पहनना होता है, उसे अकेले विलायत भेज रहे हो? जिस तरह घर के घोड़े को विलायत भेजना है, उसी तरह इसे भेजना है। घोड़े और बैल कम से कम इतना तो समझते हैं कि उन्हें भूख लगी है या नींद आ रही है, लेकिन तुम्हारा सुरेंद्र तो इतना भी नहीं समझता।" और इतना कहकर वह फिर हँस पड़ी।

हास्य की अधिकता देखकर राय महाशय बहुत शर्मिंदा हुए। सुरेंद्र ने समझ लिया कि इस अकाट्य तर्क के विरुद्ध किसी भी प्रकार का प्रतिवाद नहीं किया जा सकता। उसने विलायत जाने की आशा छोड़ दी। यह सुनकर उसके मित्र को बहुत दुःख हुआ, लेकिन वह विलायत जाने का कोई अन्य उपाय नहीं बता सका। हाँ, यह ज़रूर कहा कि ऐसा पराधीन जीवन जीने की अपेक्षा भीख माँगकर जीना कहीं बेहतर है; और यह निश्चित है कि जो व्यक्ति इस तरह सम्मानपूर्वक एम.ए. पास कर सकता है, उसे अपना पेट पालने में कोई कठिनाई नहीं होगी।

घर आकर सुरेंद्र इसी बात को सोचने लगा। उसने जितना ही सोचा, उतना ही अपने मित्र के कथन की सच्चाई पर उसका विश्वास बढ़ता गया। उसने निश्चय कर लिया कि भीख माँगकर ही जिया जाए। सभी लोग तो विलायत जा नहीं सकते, लेकिन इस तरह ज़िंदगी और मौत के बीच घिसटते हुए भी उन्हें जीना नहीं पड़ेगा।

एक दिन अंधेरी रात में वह घर से निकला और स्टेशन पहुँच गया; वहाँ से कलकत्ता का टिकट खरीदकर ट्रेन पर सवार हो गया। चलते समय उसने डाक द्वारा पिता के पास पत्र भेज दिया कि—'मैं कुछ दिनों के लिए घर छोड़ रहा हूँ। खोजने से कोई विशेष लाभ नहीं होगा; और यदि मेरा पता चल भी गया, तो मेरे लौटने की कोई संभावना नहीं है।'

राय महाशय ने गृहिणी को पत्र दिखाया और बोले, "सुरेंद्र अब बड़ा हो गया है, पढ़-लिख चुका है; अब उसके पंख निकल आए हैं। अगर वह अब भी उड़कर न भागेगा तो और कब भागेगा?" फिर भी उन्होंने उसे तलाश किया। कलकत्ता में उनके जो भी परिचित थे उन्हें पत्र लिखे, लेकिन परिणाम कुछ न निकला; सुरेंद्र का कोई पता नहीं चला।

## प्रकरण 2

कलकत्ता की भीड़ और कोलाहल भरी सड़कों पर पहुँचकर सुरेंद्रनाथ घबरा गया। वहाँ न तो कोई डाँटने-फटकारने वाला था और न कोई रात-दिन शासन करने वाला। मुँह सूख जाता तो कोई देखने वाला न था और मुँह भारी हो जाता तो कोई ध्यान नहीं देता था। यहाँ अपने आप को स्वयं ही देखना पड़ता था। यहाँ भिक्षा भी मिल जाती है और करुणा के लिए स्थान भी है, आश्रय भी मिल जाता है; लेकिन इसके लिए स्वयं प्रयत्न करने की आवश्यकता होती है। यहाँ अपनी इच्छा से तुम्हारे पास कोई नहीं आएगा।

यहाँ आने पर उसे पहली शिक्षा यह मिली कि खाने की चेष्टा स्वयं करनी पड़ती है, आश्रय के लिए स्वयं ही स्थान खोजना पड़ता है और नींद तथा भूख में कुछ भेद होता है।

उसे घर छोड़े कई दिन बीत गए थे। गली-गली घूमते रहने के कारण शरीर एकदम कमज़ोर पड़ गया था। पास के रुपये भी खत्म हो चले थे, कपड़े मैले होकर फटने लगे थे और रात को सोने तक के लिए कहीं ठिकाना नहीं था। सुरेंद्र की आँखों में आँसू आ गए। घर को पत्र लिखने की इच्छा नहीं होती थी, लज्जा आती थी; और सबसे बढ़कर जब उसे अपनी विमाता के स्नेहहीन कठोर चेहरे की याद आ जाती, तो घर जाने की इच्छा एकदम आकाश-कुसुम (असंभव) बन जाती थी। उसे इस बात को सोचते हुए भी डर लगता था कि वह कभी वहाँ रहता था।

एक दिन उसने अपने जैसे ही एक दरिद्र आदमी की ओर देखकर पूछा, "क्यों भाई, तुम यहाँ खाते किस तरह हो?" वह आदमी भी कुछ दयालु था, वरना सुरेंद्र की हँसी उड़ा देता। उसने कहा, "नौकरी करके कमाते-खाते हैं। कलकत्ता में रोज़गार की क्या कमी है!"

सुरेंद्र ने पूछा, "मुझे भी कोई नौकरी दिलवा सकते हो?"

उसने पूछा, "तुम क्या जानते हो?"

सुरेंद्रनाथ कोई भी व्यावहारिक काम नहीं जानता था, इसलिए चुप रहकर कुछ सोचने लगा।

"तुम भले घर के लड़के हो?"

सुरेंद्रनाथ ने सिर हिला दिया।

"तो लिखना-पढ़ना क्यों नहीं सीखा?"

"सीखा है।"

उस आदमी ने कुछ सोचकर कहा, "तो फिर उस बड़े मकान में चले जाओ। इसमें एक बहुत बड़े जमींदार रहते हैं, वे कुछ न कुछ इंतज़ाम कर देंगे।" यह कहकर वह चला गया।

सुरेंद्रनाथ फाटक के पास गया और कुछ देर वहीं खड़ा रहा। फिर ज़रा पीछे हटा, एक बार फिर आगे बढ़ा और फिर पीछे हट आया। उस दिन कुछ भी न हुआ; दूसरा दिन भी इसी तरह बीत गया।

दो दिन में साहस संजोकर उसने किसी तरह फाटक के अंदर कदम रखा। सामने एक नौकर खड़ा था, उसने पूछा, "क्या चाहते हो?"

"बाबू साहब से...!"

"बाबू साहब घर पर नहीं हैं।"

सुरेंद्रनाथ का चेहरा खुशी से चमक उठा। एक बहुत ही मुश्किल काम से छुट्टी मिल गई थी—बाबू साहब घर पर नहीं हैं, नौकरी की बात और दुःख की कहानी कहनी नहीं पड़ी; यही उसकी खुशी का कारण था। दूने उत्साह से लौटकर उसने एक दुकान पर बैठकर भरपेट भोजन किया। थोड़ी देर तक बड़ी प्रसन्नता से वह इधर-उधर घूमता रहा और मन ही मन वह सोचता रहा कि कल किस प्रकार बातचीत करने पर मेरा कुछ ठिकाना बन जाएगा।

लेकिन दूसरे दिन वह उत्साह नहीं रहा। जैसे-जैसे वह उस मकान के निकट पहुँचता गया, वैसे-वैसे उसकी लौट चलने की इच्छा बढ़ती गई। फिर जब वह फाटक के पास पहुँचा, तो पूरी तरह हतोत्साहित हो गया। उसके पैर अब किसी भी तरह अंदर की ओर बढ़ने के लिए तैयार नहीं थे। किसी भी तरह वह यह नहीं सोच पा रहा था कि आज वह स्वयं अपने लिए ही यहाँ आया है; ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने ठेल-ठालकर उसे यहाँ भेज दिया हो। लेकिन आज वह दरवाज़े पर खड़ा रहकर और अधिक प्रतीक्षा नहीं करना चाहता था, इसलिए अंदर चला गया।

फिर उसी नौकर से भेंट हुई। उसने कहा, "बाबू साहब घर पर हैं। क्या आप उनसे भेंट करेंगे?"

"हाँ।"

"अच्छा तो चलिए।"

लेकिन यहाँ और भी कठिनाई हुई। जमींदार साहब का मकान बहुत बड़ा था। बड़े सलीके से, साहबी ढंग से सारे साज़-सामान सजे हुए थे। कमरे-पर-कमरे, संगमरमर की सीढ़ियाँ, हर कमरे में झाड़-फानूस और उन पर सुर्ख (लाल) कपड़े के गिलाफ़ शोभा पा रहे थे। दीवारों पर बड़े-बड़े शीशे लगे थे और न जाने कितने चित्र और फ़ोटोग्राफ़ टँगे थे। दूसरों के लिए ये सब चीज़ें चाहे जैसी हों, लेकिन सुरेंद्र के लिए नई नहीं थीं; क्योंकि उसके पिता का घर भी कोई निर्धन की कुटिया नहीं था और वह किसी दरिद्र पिता के आश्रय में पलकर इतना बड़ा नहीं हुआ था। सुरेंद्र सोच रहा था कि जिस आदमी से भेंट करने के लिए और जिससे प्रार्थना करने के लिए वह जा रहा है, वे क्या प्रश्न करेंगे और मैं क्या उत्तर दूँगा।

लेकिन इतनी बात सोचने का समय नहीं मिला; मालिक सामने ही बैठे थे। वे सुरेंद्रनाथ से बोले, "क्या काम है?"

आज तीन दिन से सुरेंद्र यही बात सोच रहा था, लेकिन इस समय वह सारी बातें भूल गया। बोला, "मैं... मैं...।"

ब्रजनाथ लाहिड़ी पूर्वी बंगाल के जमींदार थे। उनके सिर के दो-चार बाल भी पक गए थे और वे बाल समय से पहले नहीं, बल्कि ठीक उम्र में ही पके थे। बड़े आदमी थे, इसलिए उन्होंने फ़ौरन सुरेंद्रनाथ के आने का उद्देश्य समझ लिया और पूछा, "क्या चाहते हो?"

"मुझे कोई एक...!"

"क्या?"

"नौकरी।"

ब्रजराज बाबू ने कुछ मुस्कुराकर कहा, "यह तुमसे किसने कहा कि मैं नौकरी दे सकता हूँ?"

"रास्ते में एक आदमी से भेंट हुई थी। मैंने उससे पूछा था और उसने आपके बारे में...।"

"अच्छी बात है, तुम्हारा मकान कहाँ है?"

"पश्चिम में।"

"वहाँ तुम्हारे कौन हैं?"

सुरेंद्र ने सब कुछ बता दिया। वर्तमान स्थिति से सुरेंद्र ने एक नया ढंग सीख लिया था; वह अटकते-अटकते बोला, "पिताजी मामूली नौकरी करते हैं।"

"लेकिन क्योंकि उससे काम नहीं चलता, इसलिए तुम भी कुछ कमाना चाहते हो?"

"जी हाँ।"

"यहाँ कहाँ रहते हो?"

"कोई जगह निश्चित नहीं है... जहाँ-तहाँ।"

ब्रज बाबू को दया आ गई। सुरेंद्र को बैठाकर उन्होंने कहा, "तुम अभी बच्चे हो। इस उम्र में तुम घर छोड़ने को विवश हुए, तो यह जानकर दुःख होता है। हालाँकि मैं तो तुम्हें कोई नौकरी नहीं दे सकता, लेकिन कुछ ऐसा उपाय कर सकता हूँ जिससे तुम्हारी व्यवस्था हो जाए।"

"अच्छा।" सुरेंद्र जाने लगा।

उसे जाते देख ब्रज बाबू ने उसे फिर बुलाकर पूछा, "तुम्हें और कुछ नहीं पूछना है? बस इतने से ही तुम्हारा काम हो गया? तुमने यह तक जानने-समझने की ज़रूरत नहीं समझी कि मैं तुम्हारे लिए क्या उपाय कर सकता हूँ?"

सुरेंद्र सकपकाया सा लौटकर खड़ा हो गया। ब्रज बाबू ने हँसते हुए पूछा, "अब कहाँ जाओगे?"

"किसी दुकान पर।"

"वहीं भोजन करोगे?"

"हाँ, रोज़ाना ऐसा ही करता हूँ।"

"तुम्हने लिखना-पढ़ना कहाँ तक सीखा है?"

"यों ही, थोड़ा सा सीखा है।"

"मेरे लड़के को पढ़ा सकते हो?"

सुरेंद्र ने प्रसन्न होकर कहा, "हाँ, पढ़ा सकता हूँ।"

ब्रज बाबू फिर हँस पड़े। उन्होंने समझ लिया कि दुःख और गरीबी के कारण इसका दिमाग़ ठिकाने नहीं है; क्योंकि बिना यह जाने-समझे ही कि किसे पढ़ाना होगा और क्या पढ़ाना होगा, इस प्रकार प्रसन्न हो उठना उन्हें कोरा पागलपन ही जान पड़ा। उन्होंने कहा, "अगर मैं कहूँ कि वह बी.ए. में पढ़ता है, तो तुम किस तरह पढ़ा सकोगे?"

सुरेंद्र कुछ गंभीर हो गया और सोचकर बोला, "किसी तरह काम चला ही लूँगा।"

ब्रज बाबू ने कुछ और नहीं कहा। नौकर को बुलाकर बोले, "बिंदु, इनके रहने के लिए जगह का इंतज़ाम कर दो और भोजन आदि की व्यवस्था भी कर दो।" फिर वे सुरेंद्र की ओर देखकर बोले, "संध्या के बाद मैं तुम्हें बुलवा लूँगा। तुम मेरे मकान में ही रहो। जब तक किसी नौकरी का इंतज़ाम न हो, तब तक तुम मजे में यहाँ रह सकते हो।"

दोपहर को जब ब्रज बाबू भोजन करने गए, तो उन्होंने अपनी बड़ी लड़की माधवी को बुलाकर कहा, "बेटी, एक गरीब आदमी को घर में रहने के लिए जगह दी है।"

"वह कौन है बाबूजी?"

"गरीब आदमी है, इसके अलावा और कुछ नहीं जानता। लिखना-पढ़ना शायद कुछ जानता है; क्योंकि जब तुम्हारे बड़े भाई को पढ़ाने के लिए कहा तो वह राज़ी हो गया। जो बी.ए. क्लास को पढ़ाने का साहस कर सकता है, वह कम से कम तुम्हारी छोटी बहन को तो ज़रूर ही पढ़ा सकेगा। मैं सोचता हूँ प्रमिला को वही पढ़ाया करे।"

माधवी ने इस पर कोई आपत्ति नहीं की।

संध्या के बाद ब्रज बाबू ने उसे बुलाकर यही बात कह दी। दूसरे दिन से सुरेंद्रनाथ प्रमिला को पढ़ाने लगा।

प्रमिला की उम्र सात वर्ष की थी। वह 'बोधोदय' पढ़ती थी; अपनी बड़ी दीदी माधवी से उसने अंग्रेज़ी की पहली पुस्तक 'मेढक की कहानी' तक पढ़ी थी। वह कॉपी, पुस्तक, स्लेट, पेंसिल, तस्वीरें और लॉजेंजेस (टॉफियां) लेकर बैठ गई।

"Do not move," सुरेंद्रनाथ ने कहा, "Do not move, यानी हिलो मत।"

प्रमिला पढ़ने लगी, "Do not move - हिलो मत।"

इसके बाद सुरेंद्रनाथ ने उसकी ओर से ध्यान हटाकर स्लेट खींच ली और पेंसिल लेकर उस पर कुछ अंक लिखने लगा—प्रॉब्लम पर प्रॉब्लम सॉल्व (समस्याएँ हल) होने लगीं और घड़ी में सात के बाद आठ और आठ के बाद नौ बजने लगे। प्रमिला कभी इस करवट और कभी उस करवट होकर किताब के तस्वीरों वाले पन्ने उलटती, कभी लेट जाती, तो कभी उठकर बैठ जाती। कभी मुँह में लॉजेंजेस रखकर चूसने लगती, तो कभी बेचारे मेढक के सारे शरीर पर स्याही पोतती हुई पढ़ती, "Do not move - हिलो मत।"

"मास्टर साहब, हम अंदर जाएँ?"

"जाओ।"

उसका सुबह का समय इसी प्रकार बीत जाता; लेकिन दोपहर का काम कुछ और ही तरह का था। ब्रज बाबू ने दया करके सुरेंद्रनाथ की नौकरी का प्रबंध करने के लिए कुछ भले लोगों के नाम पत्र लिख दिए थे। सुरेंद्रनाथ उन पत्रों को जेब में रखकर घर से निकल पड़ता। पता लगाकर वह उन लोगों के मकानों के सामने पहुँच जाता और देखता कि मकान कितना बड़ा है; उसमें कितने दरवाज़े और खिड़कियाँ हैं; बाहर की ओर कितने कमरे हैं; मकान दो मंजिला है या तीन मंजिला; सामने कोई रोशनी का खंभा है या नहीं, आदि। इसके बाद संध्या होने से पहले ही वह घर लौट आता।

कलकत्ता आने पर सुरेंद्रनाथ ने कुछ पुस्तकें खरीदी थीं, उनके अलावा कुछ पुस्तकें वह घर से भी ले आया था। गैस की रोशनी में बैठकर वह उन्हीं पुस्तकों को पढ़ता रहता। ब्रज बाबू अगर कभी उससे काम-धंधे की बात पूछते, तो या तो वह चुप रह जाता या कह दिया करता कि—'उन सज्जन से भेंट नहीं हो सकी।'

समाप्त

 

प्रकरण 3

लगभग चार वर्ष हुए, ब्रजराज बाबू की पत्नी का स्वर्गवास हो गया था। बुढ़ापे में पत्नी वियोग का दुःख बूढ़े ही समझ सकते हैं, लेकिन इस बात को जाने दीजिए। उनकी लाडली बेटी माधवी इस सोलह वर्ष की उम्र में अपना पति गँवा बैठी थी। इससे ब्रजराज बाबू के बदन का आधा लहू सूख गया था। उन्होंने बड़े शौक और धूमधाम से अपनी कन्या का विवाह किया था। वे स्वयं धन-संपन्न थे, इसलिए उन्होंने धन की ओर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया। लड़के के पास धन-संपत्ति है या नहीं, इसकी खोज नहीं की; केवल यह देखा कि लड़का लिख-पढ़ रहा है, सुंदर है, सुशील है और सीधा-साधा है। बस यही देखकर उन्होंने माधवी का विवाह कर दिया था।

ग्यारह वर्ष की उम्र में माधवी का विवाह हुआ था। तीन वर्ष तक वह अपने पति के यहाँ रही। प्यार-दुलार सब कुछ उसे मिला था, लेकिन उसके पति योगेंद्रनाथ जीवित नहीं रहे। माधवी के इस जीवन के सारे अरमानों पर पानी फेरकर और ब्रजराज बाबू के कलेजे में बर्छी भोंककर वे स्वर्ग सिधार गए। मरने के समय जब माधवी फूट-फूटकर रोने लगी, तब उन्होंने बहुत ही कोमल स्वर में कहा था, "माधवी! मुझे इस बात का सबसे अधिक दुःख नहीं है; दुःख है तो इस बात का कि तुम्हें जीवनभर कष्ट भोगने पड़ेंगे। मैं तुम्हें आदर-सम्मान कुछ भी तो नहीं दे सका...।"

इसके बाद योगेंद्रनाथ के सीने पर आँसू की धारा बह चली थी। माधवी ने उनके आँसू पोंछते हुए कहा था, "जब मैं फिर तुम्हारे चरणों में आकर मिलूँ, तब आदर-मान देना...।"

योगेंद्रनाथ ने कहा था, "माधवी, जो जीवन तुम मेरे सुख के लिए समर्पित करतीं, वह जीवन अब सभी के सुख के लिए समर्पित कर देना। जिनके चेहरे पर दुःख और उदासी दिखाई दे, उसी चेहरे को प्रफुल्लित करने का प्रयत्न करना। और क्या कहूँ माधवी...।" इसके बाद फिर आँसू मचलकर बहने लगे। माधवी ने उन्हें फिर पोंछ दिया। "तुम सत्य पर रहना। तुम्हारे पुण्य-प्रताप से ही मैं तुम्हें फिर पा सकूँगा।"

तभी से माधवी बिल्कुल बदल गई थी। क्रोध, द्वेष, हिंसा आदि जो भी उसके स्वभाव में शामिल थे, उन सबको उसने अपने स्वामी की चिता की भस्म के साथ सदा-सदा के लिए गंगा जल में प्रवाहित कर दिया था। जीवन में जो भी साध और आकांक्षाएँ होती हैं, विधवा हो जाने पर कहीं चली नहीं जातीं। जब मन में कोई साध सिर उठाती, तो वह अपने स्वामी की बात सोचने लगती—'जब वे नहीं हैं, तब फिर यह सब क्यों? किसके लिए दूसरों से डाह करूँ? किसके लिए दूसरों की आँखों से आँसू बहाऊँ?' और वे सब हीन प्रवृत्तियाँ उसमें कभी थीं भी नहीं, वह बड़े आदमी की बेटी थी; ईर्ष्या-द्वेष उसने कभी सीखा ही नहीं था।

उसके बगीचे में बहुत से फूल खिलते थे। पहले वह उन फूलों की माला गूँथकर अपने स्वामी के गले में पहनाती थी, लेकिन अब स्वामी नहीं थे, इसलिए उसने फूलों के पेड़-पौधे कटवाए नहीं। अब भी उन पर उसी प्रकार फूल खिलते थे, लेकिन वे धरती पर गिरकर मुरझा जाते थे। अब वह उन फूलों की माला नहीं पिरोती थी। उन सबको इकट्ठा करके, अंजलि भर-भरकर दीन-दुखियों में बाँट देती थी। जिनके पास नहीं था, उन्हीं को देती थी। इसमें वह ज़रा भी कंजूसी नहीं करती थी और न ही ज़रा सा मुँह भारी करती थी।

जिस दिन ब्रज बाबू की पत्नी परलोक सिधारीं, उसी दिन से इस घर में कोई व्यवस्था नहीं रह गई थी। सभी लोग अपनी-अपनी चिंता में रहते, कोई किसी की ओर ध्यान न देता। सभी के लिए एक-एक नौकर मुकर्रर था। हर नौकर केवल अपने मालिक का काम करता था। रसोईघर में रसोइया भोजन बनाता और एक बड़े अन्न-सत्र की तरह सब अपनी-अपनी पत्तल बिछाकर बैठ जाते। किसी को खाना मिल पाता, किसी को न मिल पाता; कोई इस बात को जानने का प्रयत्न भी न करता था।

लेकिन जिस दिन माधवी भादों मास की गंगा की तरह अपना रूप, स्नेह और ममता लेकर अपने पिता के घर लौट आई, उसी दिन से घर में एक नया वसंत लौट आया। सभी लोग उसे 'बड़ी बहन' कहकर पुकारते हैं। घर का पालतू कुत्ता तक शाम को एक बार बड़ी बहन को अवश्य देखना चाहता है; मानो इतने आदमियों में से उसने भी एक को स्नेहमयी और दयामयी मानकर चुन लिया हो। घर के मालिक से लेकर नायब, गुमाश्ते और दास-दासियाँ, सभी बड़ी दीदी पर ही निर्भर रहते हैं। कारण कुछ भी हो, लेकिन सभी के मन में यह धारणा बैठ गई है कि बड़ी दीदी पर हमारा कुछ विशेष अधिकार है।

स्वर्ग का कल्पतरु हममें से किसी ने कभी नहीं देखा; यह भी नहीं जानते कि कभी देख पाएँगे या नहीं, इसलिए उसके बारे में कुछ कह नहीं सकते। लेकिन ब्रज बाबू की गृहस्थी के सभी लोगों ने एक कल्पवृक्ष पा लिया था। उसी कल्पवृक्ष के नीचे आकर वे हाथ फैलाते और मनचाही वस्तु पाकर हँसते हुए लौट जाते।

इस प्रकार के परिवार के बीच सुरेंद्रनाथ ने एक नए ढंग का जीवन व्यतीत करने का मार्ग देखा। जब सभी लोगों ने सारा भार एक ही व्यक्ति पर डाल रखा था, तो उसने भी वैसा ही किया; लेकिन अन्य लोगों की अपेक्षा उसकी धारणा कुछ और ही प्रकार की थी। वह सोचता था कि 'बड़ी दीदी' नाम का एक जीवित पदार्थ इस घर में रहता है, वही सबको देखता-सुनता है, सबके नाज़-नखरे बर्दाश्त करता है और जिस-जिस चीज़ की आवश्यकता होती है, वह उसे मिल जाती है। कलकत्ता की सड़कों पर घूम-घूमकर उसने अपनी चिंता करने की आवश्यकता थोड़ी सी जानी-समझी थी, लेकिन इस घर में आने पर वह इस बात को एकदम भूल गया कि कोई ऐसा दिन भी था जब उसे स्वयं अपनी चिंता करनी पड़ी थी या भविष्य में फिर कभी करनी पड़ेगी।

कुर्ता, धोती, जूता, छाता, घड़ी—जो कुछ भी चाहिए था, सभी उसके लिए हाज़िर रहता था। रुमाल तक कोई उसके लिए अच्छी तरह सजाकर रख जाता था। पहले कौतूहल होता था और वह पूछता था, "ये सब चीज़ें कहाँ से आईं?" उत्तर मिलता, "बड़ी दीदी ने भेजी हैं।" आजकल जलपान की प्लेट तक देखकर वह समझ लेता था कि इसे बड़ी दीदी ने ही बड़े प्रयत्न से सजाया है।

गणित के प्रश्न हल करने बैठा, तो एक दिन उसे कंपास का खयाल आया। उसने प्रमिला से कहा, "प्रमिला, बड़ी दीदी के यहाँ से कंपास लाओ।" बड़ी दीदी को कंपास से कोई काम नहीं पड़ता था, इसलिए उनके पास वह नहीं था; लेकिन उन्होंने तत्काल ही आदमी को बाज़ार भेज दिया। संध्या को सुरेंद्रनाथ टहलकर लौटा, तो उसने देखा कि मेज़ पर वांछित वस्तु रखी है। दूसरे दिन सवेरे प्रमिला ने कहा, "मास्टर साहब, बड़ी बहन ने वह भेज दिया है।"

इसके बाद बीच-बीच में वह एकाध ऐसी चीज़ माँग बैठता जिसके लिए माधवी बड़े संकट में पड़ जाती। वह बहुत खोज करती, तब कहीं जाकर उसकी प्रार्थना पूरी कर पाती। फिर भी वह यह कभी न कहती कि मैं यह चीज़ नहीं दे सकूँगी।

कभी वह अचानक ही प्रमिला से कह बैठता, "बड़ी दीदी से पाँच पुरानी धोतियाँ ले आओ, भिखारियों को देनी हैं।" नई और पुरानी धोतियाँ छाँटने की फ़ुर्सत माधवी को हर समय नहीं रहती थी, इसलिए वह पहनने की ही पाँच धोतियाँ भेज देती और फिर ऊपर की खिड़की से देखती कि चार-पाँच गरीब जय-जयकार करते चले जा रहे हैं, क्योंकि उन लोगों को कपड़े मिल गए हैं।

सुरेंद्रनाथ के इस प्रकार के छोटे-मोटे आवेदन रूपी अत्याचार नित्य ही माधवी को सहने पड़ते; लेकिन धीरे-धीरे माधवी को इन सब बातों का ऐसा अभ्यास हो गया कि अब उसे कभी खयाल ही नहीं आता था कि उसके घर में कोई नया आदमी आकर नित्य प्रति के कामों में नई तरह के छोटे-मोटे उपद्रव मचा रहा है।

केवल यही नहीं, इस नए व्यक्ति के लिए आजकल माधवी को बहुत ही सतर्क रहना पड़ता था और काफी खोज-खबर लेनी पड़ती थी। यदि वह अपनी ज़रूरत की सभी चीज़ें स्वयं माँग लिया करता, तो माधवी की मेहनत आधी कम हो जाती; लेकिन सबसे बड़ी चिंता की बात यह थी कि वह अपने लिए कभी कोई चीज़ माँगता ही नहीं था। पहले माधवी यह नहीं जान सकी थी कि सुरेंद्रनाथ उदासीन प्रकृति का आदमी है। सुबह की चाय ठंडी हो जाती और वह पीता ही नहीं; जलपान को छूने तक का उसे ध्यान न रहता, कभी-कभी वह उसे कुत्ते को खिला देता। खाने बैठता तो खाने की चीज़ों का रत्ती भर भी सम्मान न करता; उन्हें एक ओर हटाकर, नीचे डालकर या छिपाकर रख जाता, जैसे उसे कोई भी चीज़ न रुचती हो। नौकर-चाकर कहते, "मास्टर साहब तो पागल हैं; न कुछ देखते हैं, न कुछ जानते हैं, बस किताब लिए बैठे रहते हैं।"

ब्रज बाबू बीच-बीच में पूछते कि नौकरी की कोई व्यवस्था हुई या नहीं। सुरेंद्र इस प्रश्न का कुछ यों ही सा उत्तर दे दिया करता था। माधवी ये सब बातें अपने पिता से सुनती और समझ जाती कि मास्टर साहब नौकरी पाने का रत्ती भर प्रयत्न नहीं करते, उनकी इच्छा भी नहीं है; जो कुछ मिल गया है, उसी से संतुष्ट हैं।

सवेरे दस बजे ही बड़ी बहन की ओर से स्नान और भोजन का तकाज़ा आ जाता। अच्छी तरह भोजन न करने पर बड़ी दीदी की ओर से प्रमिला आकर शिकायत कर जाती। अधिक रात तक किताब लिए बैठे रहने पर नौकर आकर गैस की चाबी बंद कर देता; मना करने पर भी अनसुना कर देता और कहता, "बड़ी बहन का हुक्म है।"

एक दिन माधवी ने अपने पिता से हँसते हुए कहा, "बाबूजी, जैसी प्रमिला है, ठीक वैसे ही उसके मास्टर साहब हैं।"

"क्यों बेटी?"

"दोनों ही बच्चे हैं। जिस तरह प्रमिला नहीं समझती कि उसे कब किस चीज़ की आवश्यकता है, कब खाना चाहिए और कब क्या काम करना उचित है; उसके मास्टर भी वैसे ही हैं, वे अपनी आवश्यकताओं को नहीं जानते। फिर भी असमय ऐसी चीज़ माँग बैठते हैं कि होश-हवास ठीक रहने की हालत में कोई सामान्य व्यक्ति उसे नहीं माँग सकता।"

ब्रज बाबू कुछ समझ नहीं सके और माधवी के मुँह की ओर देखते रहे।

माधवी ने हँसते हुए पूछा, "आपकी बेटी प्रमिला समझती है कि उसे कब किस चीज़ की ज़रूरत है?"

"नहीं समझती।"

"और असमय उत्पात करती है।"

"हाँ, सो तो करती है।"

"मास्टर साहब भी ऐसा ही करते हैं।"

ब्रज बाबू ने हँसते हुए कहा, "मालूम होता है कि लड़का कुछ पागल है।"

"पागल नहीं हैं; जान पड़ता है किसी बड़े आदमी के लड़के हैं।"

ब्रज बाबू ने चकित होकर पूछा, "कैसे जाना?"

माधवी जानती नहीं थी, केवल समझती थी। सुरेंद्र अपना एक भी काम स्वयं नहीं कर सकता था, वह हमेशा दूसरों पर निर्भर रहता था। अगर कोई दूसरा कर देता तो काम हो जाता, और अगर नहीं करता तो नहीं होता। कार्य करने की क्षमता न होने के कारण ही माधवी उसे जान गई थी। वह सोचती थी कि आरंभ से ही उसमें काम करने की आदत नहीं है। विशेष रूप से उसके नए ढंग से खाना खाने के तरीकों ने माधवी को और भी अधिक चकित कर दिया था। खाने की कोई भी चीज़ उसे अपनी ओर पूरी तरह आकर्षित नहीं कर पाती थी। कोई भी चीज़ वह भरपेट नहीं खाता था और किसी चीज़ को खाने की विशेष रुचि नहीं होती थी। उसका यह बूढ़ों जैसा वैराग्य, बच्चों जैसी सरलता और पागलों जैसी उपेक्षा... कोई खाने को दे देता तो खा लेता, नहीं देता तो नहीं खाता। यह सब माधवी को बहुत ही रहस्यपूर्ण जान पड़ता था, और इसीलिए उसके मन में उसके प्रति दया और करुणा जाग उठी थी। वह किसी की ओर देखता नहीं था; इसका कारण लज्जा नहीं था, बल्कि उसे आवश्यकता ही नहीं होती थी, इसलिए वह किसी की भी ओर नहीं देखता था। लेकिन जब उसे आवश्यकता होती, तो उसे समय और असमय का ध्यान ही नहीं रहता था; एकदम बड़ी दीदी के पास उसका निवेदन आ पहुँचता था। उसे सुनकर माधवी मुस्कुराती और सोचती कि यह आदमी बिल्कुल बालकों जैसा सरल और सीधा-साधा है।

समाप्त

 प्रकरण 4

मनोरमा माधवी की सहेली थी। बहुत दिनों से माधवी ने मनोरमा को कोई पत्र नहीं लिखा था। अपने पत्र का उत्तर न पाकर मनोरमा रूठ गई थी। आज दोपहर को कुछ समय निकालकर माधवी उसे पत्र लिखने बैठी थी।

तभी प्रमिला ने आकर पुकारा, "बड़ी दीदी!"

माधवी ने सिर उठाकर पूछा, "क्या है री?"

"मास्टर साहब का चश्मा कहीं खो गया है, एक चश्मा दे दो।"

माधवी हँस पड़ी और बोली, "जाकर अपने मास्टर साहब से कह दे कि क्या मैंने चश्मों की कोई दुकान खोल रखी है?"

प्रमिला दौड़कर जाने लगी तो माधवी ने उसे पुकारा, "कहाँ जा रही है?"

"उनसे कहने।"

"इसके बजाय तुम गुमाश्ता जी को बुला लाओ।"

प्रमिला जाकर गुमाश्ता जी को बुला लाई। माधवी ने उनसे कहा, "मास्टर साहब का चश्मा खो गया है। उन्हें एक अच्छा सा चश्मा दिलवा दीजिए।"

गुमाश्ता जी के चले जाने के बाद वह फिर मनोरमा को पत्र लिखने लगी। पत्र के अंत में उसने लिखा:

> "प्रमिला के लिए बाबूजी ने एक शिक्षक रखा है, उन्हें आदमी भी कह सकते हैं और छोटा बालक भी। ऐसा जान पड़ता है कि इससे पहले वे घर से बाहर कभी नहीं रहे। संसार का उन्हें कुछ भी ज्ञान नहीं है। अगर उनका ध्यान न रखा जाए, उनकी देख-रेख न की जाए तो पलभर भी उनका काम नहीं चल सकता। मेरा लगभग आधा समय उन्होंने छीन रखा है, तुम्हें पत्र कब लिखूँ? अगर तुम जल्दी आईं तो मैं तुम्हें इस अकर्मण्य आदमी को दिखा दूँगी। ऐसा निकम्मा और नकारा आदमी तुमने अपने जीवन में कभी नहीं देखा होगा। खाना दिया जाता है तो खा लेते हैं, वरना चुपचाप उपवास करके रह जाते हैं; शायद दिनभर भी उन्हें इस बात का ध्यान नहीं आता कि उन्होंने खाना खाया है या नहीं। एक दिन भी वे अपना काम आप नहीं चला सकते, इसलिए सोचती हूँ कि ऐसे लोग घर से बाहर निकलते ही क्यों हैं? सुना है, उनके माता-पिता हैं; लेकिन मुझे तो ऐसा लगता है कि उनके माता-पिता इंसान नहीं, पत्थर हैं। मैं तो शायद ऐसे आदमी को कभी आँख की ओट भी नहीं कर सकती।"

मनोरमा ने मज़ाक करते हुए उत्तर दिया:

"तुम्हारे पत्र से अन्य समाचारों के साथ यह भी मालूम हुआ कि तुमने अपने घर में एक बंदर पाल लिया है और तुम उसकी सीता देवी बन बैठी हो। फिर भी सावधान किए देती हूँ—तुम्हारी मनोरमा।"

पत्र पढ़कर माधवी उदास हो गई। उसने उत्तर में लिख दिया, "तुम मुँहजली हो, इसीलिए तुम यह नहीं जानतीं कि किसके साथ कैसा मज़ाक करना चाहिए।"

माधवी ने प्रमिला से पूछा, "तुम्हारे मास्टर साहब का चश्मा कैसा रहा?"

प्रमिला ने कहा, "ठीक रहा।"

"मास्टर साहब उस चश्मे को लगाकर खूब मजे से पढ़ते हैं, इसी से मालूम हुआ।"

"उन्होंने खुद कुछ नहीं कहा?" माधवी ने पूछा।

"नहीं, कुछ नहीं।"

"कुछ भी नहीं कहा? अच्छा है या बुरा है?"

"नहीं, कुछ नहीं कहा।"

माधवी का हर समय प्रफुल्लित रहने वाला चेहरा पलभर के लिए उदास हो गया, लेकिन फिर तुरंत ही हँसते हुए बोली, "अपने मास्टर साहब से कह देना कि अपना चश्मा फिर कहीं न खो दें।"

"अच्छा, कह दूँगी।"

"धत् पगली! भला ऐसी बातें भी कहीं कही जाती हैं? शायद वे अपने मन में कुछ खयाल करने लगें।"

"तो फिर कुछ भी न कहूँ?"

"हाँ, कुछ मत कहना।"

शिवचंद्र माधवी का भाई था। एक दिन माधवी ने उससे पूछा, "जानते हो, प्रमिला के मास्टर रात-दिन क्या पढ़ते रहते हैं?"

शिवचंद्र बी.ए. में पढ़ता था। प्रमिला के तुच्छ मास्टर जैसों को वह कुछ समझता ही नहीं था। उपेक्षा से बोला, "कुछ नाटक-उपन्यास पढ़ते रहते होंगे, और क्या पढ़ेंगे?"

लेकिन माधवी को इस बात पर विश्वास नहीं हुआ। उसने प्रमिला के द्वारा सुरेंद्र की एक पुस्तक चोरी से मँगवा ली और अपने भाई के हाथ में देकर बोली, "मुझे तो यह नाटक या उपन्यास नहीं दिखाई देता।"

शिवचंद्र ने सारी पुस्तक उलट-पुलट कर देखी, लेकिन उसकी समझ में कुछ नहीं आया। वह बस इतना ही समझ पाया कि वह इस पुस्तक का एक भी अक्षर नहीं जानता और यह कोई गणित की पुस्तक है। लेकिन बहन के सामने अपना सम्मान नष्ट करने की उसकी इच्छा नहीं हुई। उसने कहा, "यह गणित की पुस्तक है, स्कूल में छोटी कक्षाओं में पढ़ाई जाती है।"

दुँखी होकर माधवी ने पूछा, "क्या यह किसी ऊँची कक्षा की पुस्तक नहीं है? क्या कॉलेज में पढ़ाई जाने वाली पुस्तक नहीं है?"

शिवचंद्र ने रूखे स्वर में उत्तर दिया, "नहीं, बिल्कुल नहीं।"

लेकिन उस दिन से शिवचंद्र कभी सुरेंद्रनाथ के सामने नहीं पड़ता था। उसके मन में यह डर बैठ गया था कि कहीं ऐसा न हो कि वह कोई बात पूछ बैठे, जिससे सारी बातें खुल जाएँ और फिर पिता की आज्ञा से उसे भी सवेरे प्रमिला के साथ मास्टर साहब के पास कॉपी-पेंसिल लेकर बैठना पड़े।

कुछ दिन बाद माधवी ने पिता से कहा, "बाबूजी, मैं कुछ दिनों के लिए काशी जाऊँगी।"

ब्रज बाबू चिंतित हो उठे, "क्यों बेटी, तुम काशी चली जाओगी तो इस गृहस्थी का क्या होगा?"

माधवी हँसकर बोली, "मैं लौट आऊँगी। हमेशा के लिए थोड़े ही जा रही हूँ।"

माधवी तो हँस पड़ी, लेकिन पिता की आँखें छलक आईं। माधवी ने समझ लिया कि ऐसा कहना उचित नहीं हुआ। बात सँभालने के लिए वह बोली, "सिर्फ कुछ दिन घूम आऊँगी।"

"तो चली जाओ बेटी, लेकिन तुम्हारे बिना यह गृहस्थी नहीं चलेगी।"

"मेरे बिना गृहस्थी नहीं चलेगी?"

"चलेगी क्यों नहीं बेटी! ज़रूर चलेगी, लेकिन उसी तरह, जिस तरह पतवार के टूट जाने पर नाव बहाव की ओर चलने लगती है।"

लेकिन काशी जाना बहुत ही आवश्यक था। वहाँ उसकी विधवा ननद अपने इकलौते बेटे के साथ रहती थी, उसे एक बार देखना ज़रूरी था।

काशी जाने के दिन उसने हर एक को बुलाकर गृहस्थी का भार सौंप दिया। किसी दासी को बुलाकर पिता, भाई और प्रमिला की विशेष रूप से देखभाल करने की हिदायत दी; लेकिन मास्टर साहब के बारे में किसी से कुछ नहीं कहा। ऐसा उसने भूलकर नहीं, बल्कि जान-बूझकर किया था। इस समय उस पर उसे गुस्सा भी आ रहा था। माधवी ने उसके लिए बहुत कुछ किया था, लेकिन उसने मुँह से एक शब्द भी कहकर कृतज्ञता प्रकट नहीं की थी। इसलिए माधवी विदेश जाकर इस निकम्मे, संसार से अनजान और उदासीन मास्टर को जताना चाहती थी कि वह भी कोई चीज़ है। ज़रा सा मज़ाक करने में हर्ज ही क्या है? यह देख लेने में हानि ही क्या है कि उसके यहाँ न होने पर मास्टर के दिन किस तरह कटते हैं? इसलिए वह काशी जाते समय किसी से सुरेंद्र के संबंध में कुछ भी नहीं कह गई।

सुरेंद्रनाथ उस समय कोई प्रॉब्लम सॉल्व (समस्या हल) कर रहे थे। प्रमिला ने कहा, "रात को बड़ी बहन काशी चली गईं।"

प्रमिला की बात उनके कानों तक नहीं पहुँची। उन्होंने इस बात पर कोई ध्यान नहीं दिया।

लेकिन तीन दिन के बाद जब उन्होंने देखा कि दस बजे भोजन के लिए कोई आग्रह नहीं करता; किसी-किसी दिन एक और दो बज जाते हैं; नहाने के बाद धोती पहनते समय पता चलता है कि धोती पहले की तरह साफ़ नहीं है; जलपान की प्लेट पहले की तरह सजाई हुई नहीं है; रात को गैस की चाबी बंद करने के लिए अब कोई नहीं आता; पढ़ने की झोंक में रात के दो और तीन-तीन बज जाते हैं, सुबह जल्दी नींद नहीं खुलती और उठने में देर हो जाती है; दिनभर नींद आँखों की पलकें छोड़कर जाना ही नहीं चाहती और शरीर मानो बहुत ही शिथिल हो गया है—तब उन्हें पता चला कि इस गृहस्थी में कुछ परिवर्तन हो गया है। जब इंसान को गर्मी महसूस होती है, तभी वह पंखे की तलाश करता है।

सुरेंद्रनाथ ने पुस्तक पर से नज़र हटाकर पूछा, "क्यों प्रमिला, क्या बड़ी बहन यहाँ नहीं हैं?"

उसने कहा, "वे काशी गई हैं।"

"ओह, तभी तो!"

दो दिन के बाद उन्होंने अचानक प्रमिला की ओर देखकर पूछा, "बड़ी बहन कब आएँगी?"

सुरेंद्रनाथ ने फिर पुस्तक की ओर ध्यान लगा दिया। और भी पाँच दिन बीत गए। सुरेंद्रनाथ ने पेंसिल पुस्तक के ऊपर रखकर पूछा, "प्रमिला, एक महीने में और कितने दिन बाकी हैं?"

"बहुत दिन।"

पंसिलों को उठाकर सुरेंद्रनाथ ने चश्मा उतारा, उसके दोनों शीशे साफ़ किए और फिर खाली आँखों से पुस्तक की ओर देखने लगे।

दूसरे दिन उन्होंने पूछा, "प्रमिला, तुम बड़ी बहन को चिट्ठी नहीं लिखतीं?"

"लिखती क्यों नहीं?"

"जल्दी आने के लिए नहीं लिखा?"

"नहीं।"

सुरेंद्रनाथ ने गहरी साँस लेकर कहा, "तभी तो!"

प्रमिला बोली, "मास्टर साहब, अगर बड़ी बहन आ जाएँ तो अच्छा होगा?"

"हाँ, अच्छा होगा।"

"आने के लिए लिख दूँ?"

"हाँ, लिख दो," सुरेंद्रनाथ ने खुश होकर कहा।

"आपके बारे में भी लिख दूँ?"

"लिख दो।"

उन्हें "लिख दो" कहने में किसी प्रकार की दुविधा महसूस नहीं हुई, क्योंकि वे कोई लोक-व्यवहार नहीं जानते थे। उनकी समझ में यह बात बिल्कुल नहीं आई कि बड़ी बहन से आने के लिए अनुरोध करना उनके लिए उचित नहीं है और यह सुनने में भी अच्छा नहीं लगता। लेकिन जिसके न रहने से उन्हें बहुत कष्ट होता था और जिसके बिना उनका काम नहीं चलता था, उसे आने के लिए कहना उन्हें ज़रा भी अनुचित प्रतीत नहीं हुआ।

इस संसार में जिन लोगों में कौतूहल कम होता है, वे साधारण मानव समाज से कुछ बाहर होते हैं। जिस दल में साधारण लोग रहते हैं, उस दल के साथ उन लोगों का मेल नहीं बैठता। साधारण लोगों के विचारों से उनके विचार नहीं मिलते। सुरेंद्रनाथ के स्वभाव में कौतूहल शामिल नहीं था। उन्हें जितना जानना आवश्यक होता था, वे बस उतना ही जानने की चेष्टा करते थे। इससे बाहर अपनी इच्छा से एक कदम भी नहीं रखना चाहते थे। इसके लिए उन्हें समय भी नहीं मिल पाता था, इसलिए उन्हें बड़ी बहन के बारे में कुछ भी मालूम नहीं था।

इस परिवार में उनके इतने दिन बीत गए। इन तीन महीनों तक अपना सारा भार बड़ी दीदी पर छोड़कर उन्होंने अपने दिन बड़े सुख से बिता दिए, लेकिन उनके मन में यह जानने की रत्ती भर भी जिज्ञासा नहीं हुई कि बड़ी दीदी नाम का प्राणी कैसा है? कितना बड़ा है? उसकी उम्र क्या है? देखने में कैसी है? उसमें क्या-क्या गुण हैं? वे कुछ भी नहीं जानते थे। जानने की इच्छा भी नहीं हुई और न कभी ध्यान ही आया।

सब लोग उसे 'बड़ी दीदी' कहते हैं, सो वे भी 'बड़ी दीदी' कहते हैं। सभी उससे स्नेह करते हैं, उसका सम्मान करते हैं; वे भी करते हैं। उनके पास संसार की हर वस्तु का भंडार भरा पड़ा है; जो भी माँगता है, उसे मिल जाता है। और यदि उस भंडार में से सुरेंद्र ने भी कुछ लिया है, तो इसमें अचंभे की बात कौन सी है? बादलों का काम जिस तरह पानी बरसाना है, उसी तरह बड़ी दीदी का काम सबसे स्नेह करना और सबकी खोज-खबर रखना है। जिस समय वर्षा होती है, उस समय जो भी हाथ बढ़ाता है उसी को जल मिल जाता है। बड़ी दीदी के सामने हाथ फैलाने पर जो माँगो, मिल जाता है। जैसे वह भी बादलों की तरह नेत्रों, कामनाओं और आकांक्षाओं से रहित हैं। अच्छी तरह विचार करके उन्होंने अपने मन में इसी प्रकार की धारणा बना रखी थी। आज भी वे जान गए थे कि उनके बिना उनका काम एक पल भी नहीं चल सकता।

वे जब अपने घर थे, तब या तो अपने पिता को जानते थे या विमाता को। वे यह भी समझते थे कि उन दोनों के कर्तव्य क्या हैं। किसी 'बड़ी दीदी' के साथ उनका कभी परिचय नहीं हुआ था और जब से परिचय हुआ था, तब से उन्होंने उसे ऐसा ही समझा था। लेकिन बड़ी दीदी नाम के व्यक्ति को न तो वे जानते थे और न पहचानते थे। वे केवल उनके नाम को जानते थे और नाम को ही पहचानता थे। व्यक्ति का जैसे कोई महत्त्व ही नहीं था, नाम ही सब कुछ था।

लोग जिस प्रकार अपने इष्ट देवता को नहीं देख पाते, केवल नाम से ही परिचित होते हैं, और उसी नाम के आगे दुःख और कष्ट के समय अपना संपूर्ण हृदय खोलकर रख देते हैं; नाम के आगे घुटने टेककर दया की भिक्षा माँगते हैं; आँखों में आँसू आते हैं तो पोंछ डालते हैं और फिर सूनी नजरों से किसी को देखना चाहते हैं लेकिन दिखाई नहीं देता; अस्पष्ट जिह्वा केवल दो-एक अस्फुट शब्दों का उच्चारण करके ही रुक जाती है—ठीक इसी प्रकार दुःख पाने पर सुरेंद्रनाथ अस्फुट शब्दों में पुकार उठे, "बड़ी दीदी!"

तब तक सूर्य उदय नहीं हुआ था, केवल आकाश के पूर्वी छोर पर उषा की लालिमा फैली थी। प्रमिला ने आकर सोए हुए सुरेंद्रनाथ का कंधा पकड़कर पुकारा, "मास्टर साहब?"

सुरेंद्रनाथ की नींद से बोझिल पलकें खुल गईं, "क्या है प्रमिला?"

"बड़ी दीदी आ गईं।"

सुरेंद्रनाथ उठकर बैठ गए। प्रमिला का हाथ पकड़कर बोले, "चलो, देख आएँ।"

बड़ी दीदी को देखने की इच्छा उनके मन में किस तरह पैदा हुई, कहा नहीं जा सकता; और यह भी समझ में नहीं आता कि इतने दिनों बाद यह इच्छा क्यों पैदा हुई। प्रमिला का हाथ थामकर, आँखें मलते हुए वे अंदर चले गए। माधवी के कमरे के सामने पहुँचकर प्रमिला ने पुकारा, "बड़ी दीदी!"

बड़ी दीदी किसी काम में लगी थीं। बोलीं, "क्या है प्रमिला?"

"मास्टर साहब...।"

वे दोनों कमरे में पहुँच चुके थे। माधवी हड़बड़ाकर खड़ी हो गई और सिर पर एक हाथ लंबा घूँघट खींचकर जल्दी से एक कोने में खिसक गई।

सुरेंद्रनाथ ने कहा, "बड़ी दीदी, तुम्हारे चले जाने पर मुझे बहुत कष्ट हुआ...।"

माधवी ने घूँघट की आड़ में अत्यंत लज्जा के कारण अपनी जीभ काटकर मन ही मन कहा, "छी! छी!"

"तुम्हारे चले जाने पर...।"

माधवी मन ही मन कह उठी, "कितनी लज्जा की बात है!" फिर धीरे से, बड़ी नर्मी से बोली, "प्रमिला, मास्टर साहब से बाहर जाने के लिए कह दे।"

प्रमिला छोटी होने पर भी अपनी बड़ी दीदी के व्यवहार को देखकर समझ गई कि यह काम अच्छा नहीं हुआ। बोली, "चलिए मास्टर साहब।"

सुरेंद्र कुछ देर हक्का-बक्का खड़ा रहा, फिर बोला, "चलो।"

वे अधिक बातें करना नहीं जानते थे, और अधिक बातें करना भी नहीं चाहते थे। लेकिन दिनभर बादल छाए रहने के बाद जब सूर्य निकलता है, तो जिस तरह बरबस सब लोग उसकी ओर देखने लगते हैं और पलभर के लिए उन्हें इस बात का ध्यान नहीं रहता कि सूर्य को देखना उचित नहीं है या उसकी ओर देखने से उनकी आँखों में पीड़ा होगी; ठीक उसी प्रकार एक महीने तक बादलों से घिरे आकाश के नीचे रहने के बाद जब पहली बार सूर्य चमका, तो सुरेंद्रनाथ बड़ी उत्सुकता और प्रसन्नता से उसे देखने के लिए चले गए थे; लेकिन वे यह नहीं जानते थे कि इसका परिणाम ऐसा होगा।

उसी दिन से उनकी देख-रेख में कुछ कमी होने लगी। माधवी कुछ लजाने लगी थी, क्योंकि इस बात को लेकर बिंदुमती मौसी कुछ हँसी थीं। सुरेंद्रनाथ भी कुछ संकुचित सा हो गया था। वह महसूस करने लगा था कि बड़ी दीदी का असीमित भंडार अब सीमित हो गया है। बहन की देख-रेख और माता का स्नेह अब उसे उस रूप में नहीं मिल पा रहा था, वह कुछ दूर-दूर होकर सिमट गया था।

एक दिन उन्होंने प्रमिला से पूछा, "बड़ी दीदी मुझसे कुछ नाराज़ हैं?"

"हाँ।"

"क्यों भला?"

"आप उस दिन घर के अंदर इस तरह क्यों चले गए थे?"

"जाना नहीं चाहिए था क्या?"

"इस तरह जाना होता है कहीं? दीदी बहुत नाराज़ हुई थीं।"

सुरेंद्रनाथ ने पुस्तक बंद करके कहा, "यही तो!"

एक दिन दोपहर को बादल घिर आए और खूब ज़ोरों की वर्षा हुई। ब्रजराज बाबू आज दो दिन से मकान पर नहीं थे, अपनी जमींदारी देखने गए थे। माधवी के पास कोई काम नहीं था। प्रमिला बहुत शरारतें कर रही थी। माधवी ने कहा, "प्रमिला, अपनी किताब ला, देखूँ तो कहाँ तक पढ़ी है?"

प्रमिला एकदम काठ (शांत) हो गई।

माधवी ने कहा, "जा, किताब ले आ।"

"रात को लाऊँगी।"

"नहीं, अभी ला।"

बहुत ही दुःखी मन से प्रमिला किताब लेने चली गई और किताब लाकर बोली, "मास्टर साहब कुछ नहीं पढ़ाते, खुद ही पढ़ते रहते हैं।"

माधवी उससे पूछने लगी। आरंभ से अंत तक सब कुछ पूछने पर वह समझ गई कि सचमुच मास्टर साहब ने कुछ नहीं पढ़ाया है; बल्कि पहले जो कुछ पढ़ा था, मास्टर लगाने के बाद इधर तीन-चार महीने में प्रमिला उसे भी भूल गई थी। माधवी ने नाराज़ होकर बिंदु को बुलाया, "बिंदु, मास्टर साहब से पूछकर आ कि इतने दिनों तक प्रमिला को कुछ भी क्यों नहीं पढ़ाया?"

बिंदु जिस समय पूछने गई, उस समय मास्टर साहब किसी प्रॉब्लम (सवाल) पर विचार कर रहे थे।

बिंदु ने कहा, "मास्टर साहब, बड़ी दीदी पूछ रही हैं कि आपने प्रमिला को कुछ पढ़ाया क्यों नहीं?"

लेकिन मास्टर साहब को कुछ सुनाई नहीं दिया। बिंदु ने फिर ज़ोर से पुकारा, "मास्टर साहब...!"

"क्या है?"

"बड़ी दीदी कहती हैं...।"

"क्या कहती हैं?"

"प्रमिला को पढ़ाया क्यों नहीं?"

अनमने भाव से उन्होंने उत्तर दिया, "अच्छा नहीं लगता।"

बिंदु ने सोचा कि यह तो कोई बुरी बात नहीं है, इसलिए उसने यही बात जाकर माधवी को बता दी। माधवी का गुस्सा और भी बढ़ गया। उसने नीचे जाकर और दरवाज़े की आड़ में खड़े होकर बिंदु से पूछवाया, "प्रमिला को बिल्कुल ही क्यों नहीं पढ़ाया?"

दो-तीन बार पूछे जाने पर सुरेंद्रनाथ ने कहा, "मैं नहीं पढ़ा सकूँगा।"

माधवी सोचने लगी, 'यह क्या कह रहे हैं?'

बिंदु ने कहा, "तो फिर आप यहाँ किसलिए रहते हैं?"

"यहाँ न रहूँ तो और कहाँ जाऊँ?"

"तो फिर पढ़ाया क्यों नहीं?"

सुरेंद्रनाथ को अब होश आया। वे घूमकर बैठ गए और बोले, "क्या कहती हो?"

बिंदु ने जो कुछ कहा था, उसे दोहरा दिया। "वह पढ़ती तो है, लेकिन आप भी कुछ देखते हैं?"

"नहीं, मुझे समय नहीं मिलता।"

"तो फिर किसलिए इस घर में रहते हैं?"

सुरेंद्रनाथ चुप होकर इस बात पर विचार करने लगे।

"तो फिर आप उसे नहीं पढ़ा सकेंगे?"

"नहीं, मुझे पढ़ाना अच्छा नहीं लगता।"

माधवी ने अंदर से कहा, "अच्छा, तो बिंदु पूछो कि फिर वे इतने दिनों से यहाँ क्यों रह रहे हैं?"

बिंदु ने कह दिया।

सुनते ही सुरेंद्रनाथ का प्रॉब्लम वाला जाल एकदम छिन्न-भिन्न हो गया। वे दुःखी हो उठे। कुछ सोचकर बोले, "यह तो मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई।"

"इस तरह लगातार चार महीने तक भूल?"

"हाँ, वही तो देख रहा हूँ, लेकिन मुझे इस बात का इतना खयाल नहीं था।"

दूसरे दिन प्रमिला पढ़ने नहीं आई। सुरेंद्रनाथ ने भी कोई ध्यान नहीं दिया। प्रमिला तीसरे दिन भी नहीं आई, वह दिन भी यों ही बीत गया। जब चौथे दिन भी सुरेंद्रनाथ ने प्रमिला को नहीं देखा, तो एक नौकर से कहा, "प्रमिला को बुला लाओ।"

नौकर ने अंदर से वापस आकर उत्तर दिया, "अब वे आपसे नहीं पढ़ेंगी।"

"तो फिर किससे पढ़ेंगी?"

नौकर ने अपनी समझ लगाकर कहा, "दूसरा मास्टर आएगा।"

उस समय लगभग नौ बजे थे। सुरेंद्रनाथ ने कुछ देर सोचा और फिर दो-तीन किताबें बगल में दबाकर उठ खड़े हुए। चश्मा केस में बंद करके मेज़ पर रख दिया और धीरे-धीरे वहाँ से चल दिए।

नौकर ने पूछा, "मास्टर साहब, इस समय कहाँ जा रहे हैं?"

"बड़ी दीदी से कह देना, मैं जा रहा हूँ।"

"क्या आप नहीं आएँगे?"

लेकिन सुरेंद्रनाथ यह बात नहीं सुन पाए। बिना कोई उत्तर दिए वे फाटक से निकल गए।

दो बज गए, लेकिन सुरेंद्रनाथ लौटकर नहीं आए। उस समय नौकर ने जाकर माधवी को बताया कि मास्टर साहब चले गए।

"कहाँ गए हैं?"

"यह तो मैं नहीं जानता। नौ बजे ही चले गए थे। चलते समय मुझसे कह गए थे कि—'बड़ी दीदी से कह देना कि मैं जा रहा हूँ।'"

"यह क्या रे? बिना खाए-पिए चले गए?" माधवी बेचैन हो उठी। उसने सुरेंद्रनाथ के कमरे में जाकर देखा, सारी चीज़ें ज्यों की त्यों रखी थीं। मेज़ के ऊपर केस में बंद किया हुआ चश्मा रखा था, केवल कुछ किताबें नहीं थीं।

शाम हो गई, फिर रात हो गई, लेकिन सुरेंद्र नहीं लौटे।

दूसरे दिन माधवी ने नौकरों को बुलाकर कहा, "अगर मास्टर साहब का पता लगाकर ले आओगे, तो दस-दस रुपये इनाम मिलेंगे।"

इनाम के लालच में वे लोग चारों ओर दौड़ पड़े, लेकिन शाम को लौटकर बोले, "कहीं पता नहीं चला।"

प्रमिला ने रोते हुए पूछा, "बड़ी दीदी, वे क्यों चले गए?"

माधवी झिड़ककर बोली, "बाहर जा, रो मत!"

दो दिन, तीन दिन करके जैसे-जैसे दिन बीतने लगे, माधवी की बेचैनी बढ़ने लगी।

बिंदु ने कहा, "बड़ी दीदी, भला उनके लिए इतनी खोज और तलाश क्यों! क्या कलकत्ता शहर में कोई और मास्टर नहीं मिलेगा?"

माधवी झल्लाकर बोली, "चल दूर हो! एक आदमी हाथ में बिना एक पैसा लिए चला गया है और तू कहती है कि तलाश क्यों हो रही है?"

"यह कैसे पता चला कि उसके पास एक भी पैसा नहीं है?"

"मैं जानती हूँ, लेकिन तुझे इन सब बातों से क्या मतलब?" बिंदु चुप हो गई।

धीरे-धीरे एक सप्ताह बीत गया। सुरेंद्र लौटकर नहीं आए तो माधवी ने एक तरह से अन्न-जल का त्याग ही कर दिया। उसे ऐसा लगता था जैसे सुरेंद्र भूखा है। जो घर में चीज़ माँगकर नहीं खा सकता, वह बाहर दूसरे से क्या कभी कुछ माँग सकता है? उसे पूरा विश्वास था कि सुरेंद्र के पास खरीदकर कुछ खाने के लिए पैसे नहीं हैं, भीख माँगने का उसमें सामर्थ्य नहीं है; इसलिए या तो छोटे बालकों जैसी असहाय अवस्था में फुटपाथ पर बैठा रो रहा होगा या किसी पेड़ के नीचे किताबों पर सिर रखे सो रहा होगा।

जब ब्रज बाबू लौटकर आए और उन्होंने सारा हाल सुना, तो माधवी से बोले, "बेटी, यह काम अच्छा नहीं हुआ।"

कष्ट के मारे माधवी अपने आँसू नहीं रोक पाई।

उधर सुरेंद्रनाथ सड़कों पर घूमते रहे। तीन दिन तो उन्होंने बिना कुछ खाए ही बिता दिए। नल के पानी में पैसे नहीं लगते, इसलिए जब भूख लगती तो पेटभर नल से पानी पी लेते।

एक दिन रात को भूख और थकान से निढाल होकर वे कालीघाट की ओर जा रहे थे; कहीं सुन लिया था कि वहाँ खाने को मिलता है। अंधेरी रात थी और आकाश में बादल घिरे हुए थे। चौरंगी मोड़ पर एक गाड़ी उनके ऊपर आ गई। गाड़ीवान ने किसी तरह घोड़े की रफ्तार रोक ली थी, इसलिए सुरेंद्र के प्राण तो नहीं गए, लेकिन सीने और बगल में बहुत गहरी चोट लग जाने से वे बेहोश होकर गिर पड़े। पुलिस उन्हें गाड़ी में बैठाकर अस्पताल ले गई।

चार-पूँच दिन बेहोशी की हालत में बीतने के बाद, एक दिन रात को उन्होंने आँखें खोलकर पुकारा, "बड़ी दीदी...!"

उस समय मेडिकल कॉलेज का एक छात्र ड्यूटी पर था, वह सुनकर पास आ खड़ा हुआ।

सुरेंद्र ने पूछा, "बड़ी दीदी आई हैं?"

"कल सवेरे आएँगी।"

दूसरे दिन सुरेंद्र को होश तो आ गया, लेकिन उन्होंने बड़ी दीदी की बात नहीं की। बहुत तेज़ बुखार होने के कारण दिनभर छटपटाते रहने के बाद उन्होंने एक आदमी से पूछा, "क्या मैं अस्पताल में हूँ?"

"हाँ।"

"क्यों?"

"आप गाड़ी के नीचे दब गए थे।"

"बचने की आशा तो है?"

"क्यों नहीं?"

दूसरे दिन उसी छात्र ने पास आकर पूछा, "यहाँ आपका कोई परिचित या रिश्तेदार है?"

"कोई नहीं।"

"तब उस दिन रात को आप 'बड़ी दीदी' कहकर किसे पुकार रहे थे? क्या वे यहाँ हैं?"

"हैं, लेकिन वे आ नहीं सकेंगी। मेरे पिताजी को समाचार भेज सकते हैं?"

"हाँ, भेज सकता हूँ।"

सुरेंद्रनाथ ने अपने पिता का पता बता दिया। उस छात्र ने उसी दिन उन्हें पत्र लिख दिया। इसके बाद उसने बड़ी दीदी का पता लगाने के लिए पूछा। "अगर स्त्रियाँ आना चाहें तो बड़े आराम से आ सकती हैं, हम लोग उनकी व्यवस्था कर सकते हैं। आपकी बड़ी दीदी का पता मालूम हो जाए तो उनके पास भी समाचार भेज सकते हैं," उसने कहा।

सुरेंद्रनाथ ने कुछ देर तक सोचने के बाद ब्रज बाबू का पता बता दिया। "मेरा मकान ब्रज बाबू के मकान के पास ही है। आज मैं उन्हें आपके बारे में बता दूँगा। अगर वे चाहेंगे तो देखने के लिए आ जाएँगे।"

सुरेंद्र ने कुछ नहीं कहा। उसने मन ही मन समझ लिया था कि बड़ी दीदी का आना असंभव है।

लेकिन छात्र ने दया करके ब्रज बाबू के पास समाचार पहुँचा दिया। ब्रज बाबू ने चौंककर पूछा, "बच तो जाएगा न?"

"हाँ, पूरी आशा है।"

ब्रज बाबू ने घर के अंदर आकर अपनी बेटी से कहा, "माधवी, जो सोचा था वही हुआ। सुरेंद्र गाड़ी के नीचे दब जाने के कारण अस्पताल में है।"

माधवी का समूचा अस्तित्व काँप उठा।

"उसने तुम्हारा नाम लेकर 'बड़ी दीदी' कहकर पुकारा था। उसे देखने चलोगी?"

उसी समय पास वाले कमरे में प्रमिला ने न जाने क्या गिरा दिया, जिससे खूब ज़ोर से झनझनाहट की आवाज़ हुई। माधवी दौड़कर उस कमरे में चली गई। कुछ देर बाद लौटकर बोली, "आप देख आइए, मैं नहीं जा सकूँगी।"

ब्रज बाबू दुःखित भाव से कुछ मुस्कुराते हुए बोले, "अरे वह जंगल का जानवर है, उसके ऊपर क्या गुस्सा करना चाहिए?"

माधवी ने कोई उत्तर नहीं दिया, तो ब्रज बाबू अकेले ही सुरेंद्र को देखने चले गए। देखकर वे बहुत दुःखी हुए और बोले, "अगर तुम्हारे माता-पिता के पास खबर भेज दी जाए तो कैसा रहे?"

"खबर भेज दी है।"

"कोई डर की बात नहीं, उनके आते ही मैं सारा इंतज़ाम कर दूँगा।" रुपये-पैसे की बात सोचकर ब्रज बाबू ने कहा, "मुझे उनका पता बता दो, जिससे मैं ऐसा इंतज़ाम कर दूँ कि उन्हें यहाँ आने में कोई असुविधा न हो।"

लेकिन सुरेंद्र इन बातों को अच्छी तरह न समझ सका और बोला, "बाबूजी आ जाएँगे, उन्हें कोई असुविधा नहीं होगी।"

ब्रज बाबू ने घर लौटकर माधवी को सारा हाल सुना दिया। तब से ब्रज बाबू रोज़ाना सुरेंद्र को देखने के लिए अस्पताल जाने लगे। उनके मन में उसके लिए स्नेह पैदा हो गया था।

एक दिन लौटकर बोले, "माधवी, तुमने ठीक समझा था। सुरेंद्र के पिता बहुत धनवान हैं।"

"कैसे मालूम हुआ?" माधवी ने उत्सुकता से पूछा।

"उसके पिता बहुत बड़े वकील हैं, वे कल रात आए हैं।"

माधवी चुप रही।

"सुरेंद्र घर से भाग आया था," ब्रज बाबू ने बताया।

"क्यों?"

"उसके पिता के साथ आज बातचीत हुई थी, उन्होंने सारी बातें बताईं। इसी वर्ष उसने पश्चिम के एक विश्वविद्यालय से सर्वोच्च सम्मान के साथ एम.ए. पास किया है। वह विलायत जाना चाहता था, लेकिन लापरवाह और उदासीन प्रकृति का लड़का है। पिता को उसे विलायत भेजने का साहस नहीं हुआ, इसलिए वह नाराज़ होकर घर से भाग आया था। अच्छा हो जाने पर वे उसे घर ले जाएँगे।"

निःश्वास रोककर और उमड़ते हुए आँसू पीकर माधवी ने कहा, "यही अच्छा है।"

## प्रकरण 5

सुरेंद्र को अपने घर गए हुए छह महीने बीत चुके हैं। इस बीच माधवी ने केवल एक ही बार मनोरमा को पत्र लिखा था, उसके बाद नहीं लिखा।

दुर्गा पूजा के समय मनोरमा अपने मायके आई और माधवी के पीछे पड़ गई, "तू अपना बंदर दिखा।"

माधवी ने हँसकर कहा, "भला मेरे पास बंदर कहाँ है?"

मनोरमा उसकी ठोड़ी पर हाथ रखकर कोमल कंठ से, बड़े सुर-ताल से गाने लगी:

"सखि, अपना बंदर दिखला दे, मेरा मन ललचाता है।

तेरे इन सुंदर चरणों में कैसी शोभा पाता है?"

"कौन सा बंदर?"

"वही जो तुमने पाला था।"

"कब?"

मनोरमा ने मुस्कुराते हुए कहा, "याद नहीं? जो तेरे अतिरिक्त और किसी को जानता ही नहीं।"

माधवी समझ तो पहले ही गई थी और इसीलिए उसके चेहरे का रंग बिगड़ता जा रहा था। तो भी अपने को संयत करते हुए बोली, "ओह, उनकी चर्चा करती हो? वे तो चले गए।"

"ऐसे सुंदर कमल जैसे उसे पसंद नहीं आए?"

माधवी ने मुँह फेर लिया और कोई उत्तर नहीं दिया। मनोरमा ने बड़े प्यार से उसका मुँह हाथ से पकड़कर अपनी ओर घुमा लिया। वह तो मज़ाक कर रही थी, लेकिन माधवी की आँखों में मचलते आँसू देखकर हैरान रह गई। उसने चकित होकर पूछा, "माधवी, यह क्या?"

माधवी अपने आप को सँभाल न सकी और आँखों पर आंचल रखकर रोने लगी। मनोरमा के आश्चर्य की सीमा न रही। कहने के लिए वह कोई उपयुक्त बात भी न खोज सकी। कुछ देर माधवी को रोने दिया, फिर ज़बरदस्ती उसके मुँह पर से आंचल हटाकर उसने दुःखी स्वर में पूछा, "क्यों बहन, एक मामूली सा मज़ाक भी बर्दाश्त नहीं हुआ?"

माधवी ने आँसू पोंछते हुए कहा, "बहन, मैं विधवा जो हूँ।"

इसके बाद दोनों काफी देर तक चुपचाप बैठी रहीं और फिर चुपके-चुपके रोने लगीं। माधवी विधवा थी, उसके दुःख से दुःखी होकर मनोरमा रोने लगी थी; लेकिन माधवी के रोने का कारण कुछ और ही था। मनोरमा ने बिना सोचे-समझे जो मज़ाक किया था कि 'वह तेरे अतिरिक्त और किसी को नहीं जानता,' माधवी इसी के बारे में सोच रही थी। वह जानती थी कि यह बात बिल्कुल सच है।

बहुत देर के बाद मनोरमा ने कहा, "लेकिन यह काम अच्छा नहीं हुआ।"

"कौन सा काम?"

"बहन, क्या यह भी बताना होगा? मैं सब कुछ समझ गई हूँ।"

पिछले छह महीने से माधवी जिस बात को बड़ी चेष्टा से छिपाती चली आ रही थी, मनोरमा से उसे छिपा नहीं सकी। जब वह पकड़ी गई, तो मुँह छिपाकर रोने लगी—बिल्कुल एक बच्चे की तरह।

अंत में मनोरमा ने पूछा, "लेकिन वे चले क्यों गए?"

"मैंने ही जाने के लिए कहा था।"

"अच्छा किया था—बुद्धिमानी का काम किया था।"

माधवी समझ गई कि मनोरमा कुछ भी नहीं समझ पाई है, इसलिए उसने धीरे-धीरे सारी बातें समझाकर बता दीं। फिर बोली, "मनोरमा, अगर उनकी मृत्यु हो जाती तो शायद मैं पागल हो जाती।"

मनोरमा ने मन ही मन कहा, 'और अब भी पागल होने में क्या कसर रह गई है?'

मनोरमा उस दिन बहुत दुःखी होकर घर लौटी और उसी रात अपने पति को पत्र लिखने लगी:

> "तुम सच कहते हो—स्त्रियों का कोई विश्वास नहीं। मैं भी अब यही कहती हूँ, क्योंकि माधवी ने आज मुझे यह शिक्षा दी है। मैं उसे बचपन से जानती हूँ, इसलिए उसे दोष देने को जी नहीं चाहता; साहस ही नहीं हो रहा। समूची नारी जाति को दोष दे रही हूँ। विधाता को दोष दे रही हूँ कि उन्होंने इतने कोमल और जल जैसे तरल पदार्थ से नारी के हृदय का निर्माण क्यों किया? उनके चरणों में मेरी विनम्र प्रार्थना है कि वे नारी हृदय को कठोर बनाया करें। और मैं तुम्हारे चरणों पर सिर रखकर, तुम्हारे मुँह की ओर देखती हुई मरूँ। माधवी को देखकर बहुत ही डर लगता है; उसने मेरी जन्म-जन्मांतर की धारणाएँ उलट-पुलट दी हैं। मेरा भी अधिक विश्वास न करना और जल्दी आकर मुझे ले जाना।"

उसके पति ने उत्तर में लिखा:

"जिसके पास सौंदर्य है, गुण है, वह उसका प्रदर्शन करेगा ही। जिसके हृदय में प्रेम है, जो प्रेम करना जानता है, वह प्रेम करेगा ही। माधवी की लता आम के वृक्ष का सहारा लेती है, संसार की यही रीति है। इसमें हम-तुम क्या कर सकते हैं। मैं तुम पर अत्यधिक विश्वास करता हूँ, इसके लिए तुम चिंतित मत होना।"

मनोरमा ने अपने पति के पत्र को माथे से लगाकर और उनके चरणों में प्रणाम करके लिखा:

"मुँहजली माधवी—उसने वह किया है जो एक विधवा को नहीं करना चाहिए था। उसने मन ही मन एक और आदमी से प्रेम किया है।"

पत्र पाकर मनोरमा के पति मन ही मन हँसे। फिर उन्होंने मज़ाक करते हुए लिखा:

"इसमें कोई संदेह नहीं कि माधवी मुँहजली है, क्योंकि उसने विधवा होकर मन ही मन एक और आदमी से प्रेम किया है। यह तुम लोगों के नाराज़ होने की बात है कि विधवा होकर उसने सधवाओं के अधिकार में हाथ क्यों डाला? मैं जब तक जीता रहूँगा, तब तक तुम्हारे लिए चिंता की कोई बात नहीं है। यदि ऐसी सुविधा तुम्हें मिले तो कभी मत छोड़ना, खूब मजे से किसी आदमी के साथ प्रेम कर लेना! लेकिन मनोरमा, तुम मुझे चकित नहीं कर सकी हो। मैंने एक बार एक लता देखी थी, जो लगभग आधा कोस ज़मीन पर रेंगती-रेंगती अंत में एक वृक्ष पर चढ़ गई थी। अब उसमें न जाने कितने पत्ते और कितनी पुष्प-मंजरियाँ निकल आई हैं। जब तुम यहाँ आओगी, तब हम दोनों उसे देखने चलेंगे।"

मनोरमा ने नाराज़ होकर इस पत्र का कोई उत्तर नहीं दिया।

लेकिन माधवी की आँखों के कोनों में लालिमा छा गई थी। उसका हर समय फूल की तरह खिला रहने वाला चेहरा कुछ गंभीर हो गया था। काम-धंधे में अब उतना जी नहीं लगता था, एक प्रकार की कमजोरी सी आ गई थी। आज भी उसमें उसी प्रकार सबकी देखभाल करने और सबके प्रति आत्मीयतापूर्ण व्यवहार करने की इच्छा पहले जितनी ही थी, बल्कि पहले की अपेक्षा बढ़ गई थी; लेकिन अब सारी बातें पहले की तरह याद नहीं रहती थीं, बीच-बीच में भूल हो जाती थी।

अब भी सब लोग उसे 'बड़ी दीदी' कहते हैं। अब भी सब लोग उसी कल्पतरु की ओर देखते हैं, उसी के सामने हाथ फैलाते हैं और इच्छित फल प्राप्त कर लेते हैं। लेकिन अब वह कल्पवृक्ष उतना सरल नहीं रहा। पुराने लोगों को बीच-बीच में आशंका होने लगती है कि कहीं आगे चलकर यह सूख न जाए।

मनोरमा रोज़ाना आती है और दुनिया भर की बातें तो होती हैं, लेकिन यही बात नहीं होती। मनोरमा समझती है कि माधवी को इससे दुःख होता है; अब इन बातों की आलोचना जितनी न हो, उतना ही अच्छा है। मनोरमा यह भी सोचती है कि किसी तरह यह अभागी सब कुछ भूल जाए।

सुरेंद्र अच्छा होकर अपने पिता के घर चला गया है। विमाता ने उस पर नियंत्रण रखना कुछ कम कर दिया है, इसी से सुरेंद्र का शरीर कुछ ठीक होने लगा है; लेकिन वह पूरी तरह ठीक नहीं हो पाया है। उसके अंतर में एक व्यथा है। सौंदर्य और यौवन की आकांक्षा और प्यास अभी तक उसके मन में पैदा नहीं हुई है; ये सब बातें वह नहीं सोचता। अब भी वह पहले की तरह लापरवाह है। आत्म-निर्भरता उसमें नहीं है, लेकिन किस पर निर्भर रहना चाहिए, वह यह नहीं खोज पाता। खोज इसलिए नहीं पाता क्योंकि वह अपना काम आप कर ही नहीं पाता। अब भी अपने काम के लिए वह दूसरों के मुँह की ओर देखता रहता है, लेकिन अब पहले की तरह किसी भी काम में उसका मन नहीं लगता। सभी कामों में उसे कुछ न कुछ कमी दिखाई देती है और वह थोड़ा-बहुत असंतोष प्रकट करता है। उसकी विमाता यह सब देख-सुनकर कहती हैं, "सुरेंद्र अब बदल गया है।"

बीच में उसे ज्वर (बुखार) हो गया था, बहुत कष्ट हुआ। आँखों से आँसू बहने लगे। विमाता पास ही बैठी थीं; उन्होंने यह नई बात देखी तो उनकी आँखों से भी आँसू बहने लगे। बड़े प्यार से उसके आँसू पोंछकर उन्होंने पूछा, "क्या हुआ सुरेंद्र बेटा?"

सुरेंद्र ने कुछ बताया नहीं। उसने एक पोस्टकार्ड मँगाया और उस पर टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा:

"बड़ी दीदी, मुझे बुखार चढ़ा है, बहुत कष्ट हो रहा है।"

लेकिन वह पत्र लेटर बॉक्स तक नहीं पहुँचा। पहले वह उसके पलंग से ज़मीन पर गिर पड़ा, उसके बाद जो नौकर उस कमरे में झाड़ू देने आया, उसने अनार के छिलकों, बिस्कुट के टुकड़ों और अंगूर के डंठलों के साथ वह पत्र भी बुहारकर फेंक दिया। सुरेंद्र के हृदय की आकांक्षा धूल में मिलकर, हवा में उड़कर, ओस में भीगकर और अंत में धूप खाकर एक बबूल के पेड़ के नीचे पड़ी रह गई।

पहले तो वह अपने पत्र के उत्तर की मूर्तिमती आशा में टकटकी लगाए रहा, उसके बाद हस्ताक्षरों की; लेकिन बहुत दिन बीत गए, उत्तर नहीं आया।

इसके बाद उसके जीवन में एक नई घटना हुई। यद्यपि यह नई थी, लेकिन बिल्कुल स्वाभाविक थी। सुरेंद्र के पिता राय महाशय बहुत पहले से इसे जानते थे और इसकी आशा कर रहे थे।

सुरेंद्र के नाना पवना ज़िले के मध्यम दर्जे के जमींदार थे। बीस-पच्चीस गाँवों में उनकी जमींदारी थी और लगभग पचास हज़ार रुपये सालाना की आमदनी थी। उनके पास कोई लड़का-बच्चा नहीं था, इसलिए खर्च बहुत कम था। उस पर वे एक प्रसिद्ध कंजूस थे, इसीलिए वे अपने लंबे जीवन में ढेर सारा धन इकट्ठा कर सके थे। राय महाशय यह बात निश्चित रूप से जानते थे कि उनकी मृत्यु के बाद उनकी सारी धन-संपत्ति उनके एकमात्र दोहित्र (नाती) सुरेंद्रनाथ को ही मिलेगी; ऐसा ही हुआ भी। राय महाशय को समाचार मिला कि उनके ससुर मृत्युशैया पर पड़े हैं, तो वे लड़के को लेकर तत्काल पवना चले गए; लेकिन उनके पहुँचने से पहले ही उनका स्वर्गवास हो चुका था।

बड़ी धूमधाम से उनका श्राद्ध हुआ। व्यवस्थित जमींदारी और अधिक व्यवस्थित हो गई। अनुभवी और बुद्धिमान पुराने वकील राय महाशय की कठोर व्यवस्था में प्रजा और भी अधिक परेशान हो उठी। अब सुरेंद्र का विवाह होना भी आवश्यक हो गया था। विवाह कराने वाले नाइयों के आने-जाने से गाँव भर में एक तूफान सा आ गया। पचास कोस के दायरे में जिस घर में भी सुंदर कन्या थी, उस घर में नाइयों के दल बार-बार अपनी चरणधूल पहुँचाकर कन्या के माता-पिता को सम्मानित और आशान्वित करने लगे।

इसी प्रकार छह महीने बीत गए। अंत में विमाता आईं और उनके रिश्ते-नाते के जितने भी लोग थे, सभी आ गए। बंधु-बांधवों से घर भर गया।

इसके बाद एक दिन सवेरे तुरही बजाकर, ढोल-नगाड़ों की भीषण आवाज़ों और करतालों की खनखनाहट से सारे गाँव को गुंजायमान करते हुए सुरेंद्रनाथ अपना विवाह कर घर ले आया।

समाप्त

 प्रकरण 6

लगभग पाँच वर्ष बीत चुके हैं। राय महाशय अब इस संसार में नहीं हैं और ब्रजराज लाहिड़ी भी स्वर्ग सिधार चुके हैं। सुरेंद्र की विमाता अपने पति की छोड़ी हुई सारी धन-संपत्ति लेकर अपने पिता के घर रहने लगी है।

आजकल सुरेंद्रनाथ की लोग जितनी प्रशंसा करते हैं, उतनी ही बदनामी भी करते हैं। कुछ लोगों का कहना है कि ऐसा उदार, सहृदय, दयालु और कोमल स्वभाव का जमींदार और कोई नहीं है; वहीं कुछ लोगों का कहना है कि ऐसा अत्याचारी, अन्यायी और उत्पीड़क जमींदार आज तक इस इलाके में कोई पैदा ही नहीं हुआ।

ये दोनों ही बातें सच हैं। पहली बात सुरेंद्रनाथ के लिए सच है और दूसरी उनके मैनेजर मथुरानाथ के लिए सच है।

सुरेंद्रनाथ की बैठक में आजकल दोस्तों की खूब भीड़ लगी रहती है। वे लोग बड़े सुख से संसार के शौक पूरे करते हैं। पान, तंबाकू, शराब-कबाब, किसी भी चीज़ की उन्हें चिंता नहीं करनी पड़ती। सब चीज़ें स्वतः ही उनके सामने आ जाती हैं। इन बातों के प्रति मथुरा बाबू का विशेष उत्साह है, क्योंकि इसके लिए खर्च का रुपया उन्हें ही बर्दाश्त करना पड़ता है। मथुरा बाबू का किसी के भी पास एक पैसा भी बाकी नहीं रह सकता। घर जलाने, किसी को उजाड़कर गाँव से निकाल देने या कचहरी की छोटी सी तंग कोठरी में बंद कर देने आदि में उनके साहस और उत्साह की कोई सीमा नहीं है।

प्रजा के रोने की दर्द भरी आवाज़ कभी-कभी शांति देवी के कानों तक भी पहुँच जाती है। वह पति को उलाहना देती हुई कहती हैं, "तुम खुद अपनी जमींदारी नहीं देखोगे तो सब कुछ जलकर भस्म हो जाएगा।"

यह सुनकर सुरेंद्रनाथ चौंक पड़ते हैं और कहते हैं, "यही तो! क्या ये सब बातें सच हैं?"

"सच नहीं हैं? सारा देश निंदा कर रहा है। केवल तुम्हारे ही कानों तक ये बातें नहीं पहुँचतीं। चौबीस घंटे दोस्तों को लेकर बैठे रहने से कहीं ये बातें सुनाई देती हैं? ऐसे मैनेजर की ज़रूरत नहीं है, उसे निकाल बाहर करो।"

सुरेंद्रनाथ दुःखी होकर कहते हैं, "ठीक है। अब कल से मैं खुद ही सब देखा करूँगा।"

इसके बाद कुछ दिनों तक जमींदारी देखने की धूम मच जाती। कभी-कभी मथुरानाथ घबरा उठते और गंभीर होकर कह बैठते, "सुरेंद्र बाबू, क्या इस तरह जमींदारी रखी जा सकती है?"

सुरेंद्रनाथ सूखी हँसी हँसकर रह जाते, "मथुरा बाबू, दुखियों का लहू चूसकर जमींदारी रखने की ज़रूरत ही क्या है?"

"अच्छा, तो फिर आप मुझे छुट्टी दीजिए, मैं चला जाऊँ?"

सुरेंद्र तुरंत नरम पड़ जाते। इसके बाद जो कुछ पहले होता था, फिर वही होने लग जाता। सुरेंद्रनाथ फिर अपनी बैठक तक ही सीमित होकर रह जाते।

इधर हाल ही में एक नई बात और जुड़ गई थी। एक बाग बनकर तैयार हुआ था, जिसमें एक बंगला भी था। वहाँ कलकत्ता से एलोकेशी नाम की एक वेश्या आकर ठहरी थी। वह बहुत अच्छा नाचती-गाती थी और देखने-सुनने में भी बुरी नहीं थी। टूटे छत्ते की मधुमक्खियों की तरह मित्र लोग सुरेंद्र की बैठक छोड़कर उसी ओर दौड़ पड़े थे। उन लोगों के आनंद और उत्साह की कोई सीमा नहीं थी। वे सुरेंद्र को भी उसी ओर खींच ले गए थे। आज तीन दिन हो गए थे, शांति को अपने पतिदेव के दर्शन नहीं हुए थे।

चौथे दिन अपने पति को पाकर वह दरवाज़े पर पीठ लगाकर बैठ गई और बोली, "इतने दिन कहाँ थे?"

"बाग में था।"

"वहाँ कौन है जिसके लिए तीन दिन तक वहीं पड़े रहे?"

"यही तो...!"

"हर बात में 'यही तो'... मैंने सब सुन लिया है।" इतना कहते-कहते शांति रो पड़ी। "मैंने ऐसा कौन सा अपराध किया है जिसके लिए तुम इस तरह मुझे ठुकरा रहे हो?"

"कहाँ? मैं तो...।"

"और किस तरह पैरों से ठुकराना होता है? हम लोगों के लिए इससे बढ़कर और कौन सा अपमान हो सकता है?"

"यही तो... वे सब लोग...?"

जैसे शांति ने यह बात सुनी ही नहीं, उसने और भी ज़ोर से रोते हुए कहा, "तुम मेरे स्वामी हो, मेरे देवता हो, मेरा यह लोक और परलोक तुम्हीं हो। मैं क्या तुम्हें नहीं पहचानती? मैं जानती हूँ कि मैं तुम्हारी कोई नहीं हूँ। एक दिन के लिए भी मैंने तुम्हारा मन नहीं पाया। मेरी यह पीड़ा तुम्हें कौन बताए? तुम्हें शर्मिंदगी होगी और दुःख होगा, इसीलिए मैं कोई बात नहीं कहती।"

"तुम रोती क्यों हो, शांति?"

"क्यों रोती हूँ, यह तो अंतर्यामी ही जानते हैं। यह भी समझती हूँ कि तुम लापरवाही नहीं करते, तुम्हारे मन में भी दुःख है। तुम और क्या करोगे," शांति ने कहा और फिर अपनी आँखें पोंछकर बोली, "यदि मैं जन्मभर यातना भोगूँ तब भी कोई हर्ज नहीं, लेकिन तुम्हें क्या कष्ट है, अगर मैं यह जान सकूँ...।"

सुरेंद्रनाथ ने उसे अपने पास खींचकर और अपने हाथ से उसकी आँखें पोंछकर बड़े प्यार से पूछा, "तो फिर क्या करोगी, शांति?"

भला इस बात का उत्तर शांति क्या देती? वह और भी ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी।

कुछ देर के बाद बोली, "तुम्हारा शरीर भी आजकल अच्छा नहीं है।"

"आजकल की क्यों? पिछले पाँच वर्ष से अच्छा नहीं है। जिस दिन कलकत्ता में गाड़ी के नीचे दबा था, छाती और पीठ में चोट लगने के कारण एक महीने तक बिस्तर पर पड़ा रहा था, तभी से शरीर अच्छा नहीं है। वह दर्द आज तक किसी तरह नहीं गया। मुझे स्वयं आश्चर्य होता है कि मैं किस तरह जी रहा हूँ।"

शांति ने जल्दी से स्वामी के सीने पर हाथ रखकर कहा, "चलो, हम लोग यह देश छोड़कर कलकत्ता चलें। वहाँ अच्छे-अच्छे डॉक्टर हैं।"

सुरेंद्र ने सहसा प्रसन्न होकर कहा, "अच्छी बात है, चलो। वहाँ बड़ी दीदी भी हैं।"

"तुम्हारी बड़ी दीदी को देखने का मेरा भी जी बहुत चाहता है। उन्हें लाओगे न?" शांति ने पूछा।

"लाऊँगा क्यों नहीं," इसके बाद कुछ सोचकर बोले, "वे ज़रूर आएँगी, जब सुनेंगी कि मैं मर रहा हूँ।"

शांति ने सुरेंद्र का मुँह बंद करते हुए कहा, "मैं तुम्हारे पैर पड़ती हूँ, इस तरह की बातें मत करो।"

"वे आ जाएँ तो मुझे कोई दुःख ही नहीं रह जाएगा।"

अभिमान से शांति का हृदय भर आया। अभी-अभी उसने कहा था कि स्वामी उसके लिए सब कुछ हैं, लेकिन सुरेंद्र ने इतना नहीं समझा, इतना नहीं देखा। वे तो अपनी ही धुन में कुछ कह रहे थे और उन्हें बहुत आनंद आ रहा था।

"तुम स्वयं ही जाकर बड़ी दीदी को बुला लाना, क्यों, ठीक होगा न?"

शांति ने सिर हिलाकर अपनी सहमति प्रकट की।

"वे जब आएँगी, तब तुम खुद ही देख लोगी कि मुझे कोई कष्ट ही नहीं रह जाएगा।"

शांति की आँखों से आँसू बहने लगे।

दूसरे दिन उसने दासी के द्वारा मथुरा बाबू से कहलवा दिया कि—'बाग में जिसे लाकर रखा है, अगर उसे इसी समय न निकाला गया, तो उन्हें भी मैनेजरी करने की ज़रूरत नहीं रह जाएगी।' अपने स्वामी से भी उसने बिगड़कर कहा, "और जो भी हो, अगर आपने घर से बाहर पाँव रखा, तो मैं अपना सिर पटककर और खून की नदी बहाकर मर जाऊँगी।"

"ठीक है, लेकिन वे लोग...!"

"मैं उन लोगों की व्यवस्था कर देती हूँ।" इतना कहकर शांति ने दासी को बुलाकर आज्ञा दी, "दरबान से कह दो कि वे सब लोग अब इस मकान में घुसने न पाएँ।"

और कोई उपाय न देखकर मथुरा बाबू ने एलोकेशी को विदा कर दिया। यार-दोस्त लोग भी चम्पत हो गए।

सुरेंद्रनाथ कलकत्ता न जा सके। छाती का दर्द अब कुछ कम मालूम होता था। शांति में भी अब कलकत्ता जाने का वैसा उत्साह नहीं रहा। यहीं रहकर वह यथासंभव अपने पति की सेवा-सुश्रूषा का प्रबंध करने लगी। कलकत्ता से एक अच्छे डॉक्टर को बुलाकर दिखाया गया। विशेषज्ञ डॉक्टर ने सब कुछ देख-सुनकर एक दवा की व्यवस्था कर दी और विशेष रूप से सावधान कर दिया कि छाती की इस समय जो हालत है, उसे देखते हुए किसी भी प्रकार का शारीरिक या मानसिक श्रम करना उचित नहीं है।

इस सुअवसर को देखकर मैनेजर साहब जिस तरह काम संभाल रहे थे, उससे गाँव-गाँव में दुगुना हाहाकार मच गया। शांति भी बीच-बीच में यह सब सुनती, लेकिन अपने स्वामी को बताने का साहस न कर पाती।

समाप्त

 प्रकरण 7

कलकत्ता के मकान में अब ब्रजबाबू के स्थान पर शिवचंद्र मालिक हैं और माधवी के स्थान पर अब नई बहू घर की मालकिन है। माधवी अब भी वहीं है। भाई शिवचंद्र उसका स्नेह और आदर करता है, लेकिन अब माधवी का वहाँ रहने को जी नहीं चाहता। घर के दास-दासी, मुंशी और गुमाश्ते अब भी उसे 'बड़ी दीदी' कहते हैं, लेकिन सभी जानते हैं कि संदूक की चाबी अब किसी और के हाथ में चली गई है। ऐसा भी नहीं है कि शिवचंद्र की पत्नी किसी बात में माधवी का निरादर या अवज्ञा करती हो, फिर भी वह ऐसा भाव प्रकट करने लगती है जिससे माधवी अच्छी तरह समझ ले कि अब इस नई स्त्री की अनुमति और परामर्श के बिना उसे कोई काम नहीं करना चाहिए।

उस समय पिता का राज था, अब भाई का राज है; इसलिए कुछ अंतर तो पड़ ही गया है। पहले उसका सम्मान भी होता था और वह जो चाहती थी वही होता था, लेकिन अब केवल आदर है, उसकी ज़िद का कोई स्थान नहीं है। पहले पिता के कारण सब कुछ वही थी, लेकिन अब वह केवल आत्मीयों और कुटुंबियों की श्रेणी में आदरणीय बनकर रह गई है।

इस पर यदि कोई यह कहे कि हम शिवचंद्र अथवा उसकी पत्नी को दोषी ठहरा रहे हैं और सीधे-सीधे न कहकर घुमा-फिराकर उनकी निंदा कर रहे हैं, तो वह हमारे अभिप्राय को ठीक-ठीक नहीं समझ पा रहा है। संसार का जो नियम है और आज तक जो रीति-नीति बराबर चली आ रही है, हम केवल उसी की चर्चा कर रहे हैं। माधवी का भाग्य फूट गया है; अब उसके लिए कोई ऐसा स्थान नहीं रह गया है जिसे वह अपना कह सके। केवल इसी वजह से कोई अपना अधिकार क्यों छोड़ने लगा? यह बात कौन नहीं जानता कि पति की संपत्ति पर स्त्री का अधिकार होता है, लेकिन वह माधवी की कौन होती है? दूसरे के लिए वह अपना अधिकार क्यों छोड़ने लगी।

माधवी सब कुछ समझती है। बहू जिस समय छोटी थी और ब्रजबाबू जीवित थे, उस समय माधवी की नज़र में प्रमिला और बहू में कोई अंतर नहीं था; लेकिन अब सब बातों में अंतर आ गया है। वह सदा से स्वाभिमानी रही है, इसलिए वह सबसे नीचे है। उसमें कटु बातें सहने का सामर्थ्य नहीं है, इसलिए वह कुछ कहती भी नहीं। जहाँ उसका कोई ज़ोर नहीं है, वहाँ सिर ऊँचा करके खड़े होने से उसका स्वाभिमान आहत होता है। जब उसके मन में दुःख होता है, तब वह चुपचाप सह लेती है। शिवचंद्र से भी कुछ नहीं कहती। स्नेह की दुहाई देना उसकी आदत नहीं है। केवल इसी आत्मीयता के भरोसे अपना अधिकार जताने में उसे लज्जा आती है। साधारण स्त्रियों की तरह लड़ाई-झगड़ा करने से उसे कितनी घृणा है, यह केवल वही जानती है।

एक दिन उसने शिवचंद्र को बुलाकर कहा, "भैया, मैं ससुराल जाऊँगी।"

शिवचंद्र चकित हो गया, "यह क्या माधवी! वहाँ तो कोई नहीं है।"

माधवी ने अपने मृत स्वामी का उल्लेख करके कहा, "उनका छोटा भानजा काशी में ननद के पास है। उसी के साथ गोला गाँव में मजे से रह लूँगी।"

पावना ज़िले के गोला गाँव में माधवी की ससुराल थी। शिवचंद्र ने थोड़ा हँसकर कहा, "भला यह भी कहीं हो सकता है! वहाँ तुम्हें बहुत कष्ट होगा।"

"कष्ट क्यों होने लगा? वहाँ का मकान तो अभी तक गिरा नहीं है और दस-पाँच बीघा ज़मीन भी है। क्या इतने में एक विधवा का गुज़ारा नहीं हो सकता?"

"गुज़ारे की बात नहीं है और रुपये की भी कोई चिंता नहीं है, लेकिन माधवी, तुम्हें वहाँ बहुत ही कष्ट होगा।"

"नहीं भैया, कुछ कष्ट नहीं होगा।"

शिवचंद्र ने कुछ सोचकर कहा, "बहन, आखिर तुम क्यों जा रही हो? मुझे सारी बात साफ़-साफ़ बता दो। मैं सारा झगड़ा मिटाए देता हूँ।"

शायद शिवचंद्र ने अपनी पत्नी से अपनी बहन के विरुद्ध कुछ बातें सुनी होंगी, वही बातें शायद इस समय उसे याद आ गई थीं। लज्जा से माधवी का मुख लाल हो गया। वह बोली, "भैया, क्या तुम यह समझ रहे हो कि मैं लड़ाई-झगड़ा करके तुम्हारे घर से जा रही हूँ?"

शिवचंद्र स्वयं भी लज्जित हो गया और जल्दी से बोला, "नहीं-नहीं, यह बात नहीं है, लेकिन यह घर सदा ही तुम्हारा है; फिर आज क्यों जाना चाहती हो?"

एक साथ उन दोनों को अपने स्नेहमय पिता की याद आ गई और दोनों की आँखें भर आईं। आँखें पोंछकर माधवी ने कहा, "मैं फिर आऊँगी। जब तुम्हारे बेटे का यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार हो, तब मुझे ले आना। इस समय मैं जाती हूँ।"

"वह तो आठ-दस बरस बाद की बात है।"

"अगर तब तक ज़िंदा रही तो अवश्य आऊँगी।"

माधवी किसी भी तरह वहाँ रहने के लिए राज़ी नहीं हुई और जाने की तैयारी करने लगी। उसने नई बहू को घर-गृहस्थी की सारी बातें समझा दीं। दास-दासियों को बुलाकर आशीर्वाद दिया। चलने के दिन आँखों में आँसू भरकर शिवचंद्र ने कहा, "माधवी, तुम्हारे भैया ने तो तुमसे कभी कुछ नहीं कहा...।"

"कैसी बातें करते हो भैया!" माधवी बोली।

"सो नहीं, यदि किसी अशुभ क्षण में, किसी दिन असावधानी से कोई बात...।"

"नहीं भैया, ऐसी कोई बात नहीं है।"

"सच कहती हो?"

"हाँ, सच कहती हूँ।"

"तो फिर जाओ। तुम्हें अपने घर जाने से मना नहीं करूँगा। जहाँ तुम्हें अच्छा लगे, वहीं रहो; लेकिन समाचार भेजती रहना।"

माधवी ने पहले काशी जाकर अपने भानजे को साथ लिया और फिर उसका हाथ थामे गोला गाँव पहुँचकर, लंबे सात वर्षों के बाद अपने पति के मकान में प्रवेश किया।

गोला गाँव के चटर्जी महाशय घोर विपत्ति में पड़ गए। उनमें और योगेंद्रनाथ के पिता में बहुत ही घनिष्ठ मित्रता थी, इसलिए वे योगेंद्रनाथ के जीवनकाल में ही वहाँ की ज़मीन की देख-रेख करते थे। योगेंद्र उसकी कुछ अधिक खोज-खबर नहीं लेते थे। उनके ससुर के पास ढेरों रुपया था, इसलिए पिता की छोड़ी हुई इस मामूली संपत्ति पर उनकी नज़र ही नहीं पड़ती थी। उनकी मृत्यु के बाद चटर्जी महाशय बहुत ही न्यायपूर्ण अधिकार के साथ बिना किसी बाधा के उस संपत्ति का उपयोग कर रहे थे।

अब इतने वर्षों के बाद विधवा माधवी ने आकर उनकी व्यवस्थित और बनी-बनाई गृहस्थी में भारी बखेड़ा खड़ा कर दिया था। चटर्जी महाशय को माधवी का यह हस्तक्षेप बहुत अखरा और यह बात भी स्पष्ट रूप से उनकी समझ में आ गई कि माधवी ने केवल ईर्ष्या और द्वेष के कारण ऐसा किया है। वे बहुत नाराज़ होकर आए और बोले, "देखो बहू, तुम्हारी जो दो बीघा ज़मीन थी, उसकी दस साल की मालगुज़ारी ब्याज समेत सौ रुपये बाकी है। उसके न देने से तुम्हारी ज़मीन के नीलाम होने की नौबत आ गई है।"

माधवी ने अपने भानजे संतोष कुमार के द्वारा कहला दिया कि रुपये की चिंता नहीं है और साथ ही उसने सौ रुपये भी तत्काल भेज दिए। वे रुपये चटर्जी महाशय ने अपने निजी काम में खर्च कर लिए।

लेकिन माधवी इस तरह सहज में छोड़ने वाली नहीं थी। उसने संतोष को भेजकर कहलवाया कि—'केवल दो बीघा ज़मीन पर ही निर्भर रहकर मेरे स्वर्गीय ससुर का जीवन निर्वाह नहीं होता था, इसलिए बाकी की जो ज़मीन-जायदाद है, वह कहाँ और किसके पास है?'

चटर्जी महाशय के क्रोध की सीमा न रही। वे स्वयं आकर बोले, "वह सारी ज़मीन बिक-बिका गई, कुछ बंदोबस्त में चली गई। आठ-आठ, दस-दस साल तक जमींदार की मालगुज़ारी न चुकाने पर ज़मीन भला किस तरह रह सकती थी!"

माधवी ने कहा, "क्या ज़मीन से कोई आमदनी नहीं होती थी जो मालगुज़ारी के थोड़े से रुपये नहीं दिए जा सके? और अगर ज़मीन सचमुच ही बिक गई है, तो यह बताइए कि उसे किसने बेचा और अब वह किसके पास है? यह सब मालूम होने पर उसे वापस निकालने का इंतज़ाम किया जाए। और उसके कागज़-पत्र कहाँ हैं?"

चटर्जी महाशय ने जो उत्तर दिया, माधवी उसे समझ नहीं सकी। पहले तो ब्राह्मण देवता न जाने बहुत देर तक क्या-क्या बकते रहे और फिर सिर पर छाता लगाकर, कमर में रामनामी दुपट्टा बाँधकर और अंगोछे में एक धोती लपेटकर जमींदार साहब की लालता गाँव वाली कचहरी की ओर चल दिए। इसी लालता गाँव में सुरेंद्रनाथ का मकान और मैनेजर मथुरा बाबू का दफ़्तर है। ब्राह्मण देवता आठ-दस कोस पैदल चलकर सीधे मथुरा बाबू के पास पहुंचे और रोते हुए कहने लगे, "दुहाई सरकार की! गरीब ब्राह्मण को अब गली-गली भीख माँगकर खाना पड़ेगा।"

"ऐसे तो बहुत से आया करते हैं," मथुरा बाबू ने मुँह फेरकर पूछा, "क्या हुआ?"

"भैया, मेरी रक्षा करो।"

"आखिर हुआ क्या है?"

विधु चटर्जी ने माधवी के दिए सौ रुपये दक्षिणा के रूप में मथुरा बाबू के हाथ पर रख दिए और कहा, "आप धर्मावतार हैं। अगर आपने मेरी रक्षा न की तो मेरा सर्वस्व चला जाएगा।"

"अच्छा साफ़-साफ़ बताओ, क्या हुआ है?"

"गोला गाँव के रामतनु सान्याल की विधवा पुत्रवधू न जाने कहाँ से इतने दिनों बाद आकर मेरी सारी ज़मीन पर दखल करना चाहती है।" फिर उन्होंने हाथ में जनेऊ लेकर मैनेजर साहब का हाथ ज़ोर से पकड़कर कहा, "मैं तो दस बरस से बराबर सरकारी मालगुज़ारी देता चला आ रहा हूँ।"

"तुम ज़मीन जोतते-बोते हो तो मालगुज़ारी नहीं दोगे?" मथुरा बाबू ने उनका अभिप्राय अच्छी तरह समझ लिया और बोले, "विधवा को ठगना चाहते हो न?"

ब्राह्मण चुपचाप देखता रहा।

"कितने बीघा ज़मीन है?"

"पच्चीस बीघा।"

मथुरा बाबू ने हिसाब लगाकर कहा, "कम से कम तीन हज़ार रुपये की ज़मीन हुई। जमींदार कचहरी में कितनी सलामी दोगे?"

"जो हुक्म होगा वही दूँगा—तीन सौ रुपये।"

"तीन सौ देकर तीन हजार का माल लोगे? जाओ, हमसे कुछ नहीं होगा।"

ब्राह्मण ने रूखी आँखों से आँसू बहाकर कहा, "कितने रुपये का हुक्म होता है?"

"एक हज़ार रुपये दे सकोगे?"

इसके बाद देर तक दोनों आदमियों में गुपचुप सलाह-मशविरा होता रहा। परिणाम यह हुआ कि योगेंद्रनाथ की विधवा पर मालगुज़ारी और ब्याज मिलाकर डेढ़ हज़ार रुपये की नालिश कर दी गई। सम्मन निकला तो सही, लेकिन वह माधवी के पास नहीं पहुँचा। इसके बाद एकतरफा डिग्री हो गई और डेढ़ महीने के बाद माधवी को पता चला कि बाकी मालगुज़ारी के लिए जमींदार के यहाँ से नीलाम का इश्तेहार निकला है और उसकी सारी ज़मीन-जायदाद नीलाम हो गई है।

माधवी ने अपनी पड़ोसिन को बुलाकर कहा, "यह क्या? यह बिल्कुल लुटेरों का देश है?"

"क्यों, क्या हुआ?"

"एक आदमी धोखा देकर मेरा सब कुछ हड़प लेना चाहता है और तुम लोगों में से कोई देखता तक नहीं?"

उसने कहा, "भला हम लोग क्या कर सकते हैं। अगर जमींदार नीलाम कराए तो हम गरीब लोग उसमें क्या कर सकते हैं।"

"खैर, वह तो जो हुआ सो हुआ, लेकिन मेरा घर नीलाम हो जाए और मुझे खबर तक न हो? कैसे हैं तुम लोगों के जमींदार?"

तब उस स्त्री ने विस्तार से सारी बातें बताकर कहा, "ऐसा अन्यायी और अत्याचारी जमींदार इस देश में पहले कोई नहीं हुआ।" इसके बाद उसने न जाने और कितनी ही बातें बताईं। अब तक जितनी भी बातें उसे लोगों के मुँह से मालूम हुई थीं, एक-एक करके सब खोल दीं।

माधवी ने डरते-डरते पूछा, "क्या जमींदार साहब से भेंट करने से काम नहीं निकल सकता?"

अपने भानजे संतोष कुमार के लिए माधवी यह भी करने को तैयार थी। वह स्त्री उस समय तो कुछ न कह सकी, लेकिन वचन दे गई कि कल अपने लड़के से सारी बातें अच्छी तरह पूछने के बाद बताऊँगी।

उसका भांजा दो-तीन बार लालता गाँव गया था और जमींदार की बहुत सी बातें जानता था; यहाँ तक कि वह बाग में रहने वाली एलोकेशी तक की कहानी सुन आया था। जब मौसी ने जमींदार के साथ रामतनु बाबू की विधवा पुत्रवधू की भेंट के बारे में पूछा, तो उसने यथाशक्ति अपने चेहरे को गंभीर बनाकर पूछा, "इस विधवा पुत्रवधू की उम्र कितनी है?"

मौसी ने पूछा, "देखने में कैसी है?"

"बिल्कुल परी जैसी।"

इस पर उसने एक विशेष प्रकार का भाव अपने चेहरे पर लाकर कहा, "हाँ, उनसे भेंट करने से काम तो हो सकता है, लेकिन मैं तो कहता हूँ कि वह आज रात को ही नाव किराए पर लेकर अपने पिता के घर चली जाएँ।"

"यह क्यों?"

"इसलिए कि तुम कह रही हो कि वह देखने में परी जैसी हैं।"

"तो इससे क्या?"

"इसी से तो सब कुछ होता है। परी जैसी हैं, इसीलिए जमींदार सुरेंद्रनाथ के यहाँ उनकी कुशल नहीं।"

मौसी ने अपने गाल पर हाथ रखकर कहा, "तू कैसी बातें करता है?"

भांजे ने मुस्कुराकर कहा, "हाँ, यही बात है। देशभर के लोग इस बात को जानते हैं।"

"तब तो उनसे भेंट करना उचित नहीं है।"

"नहीं, किसी भी तरह नहीं।"

"लेकिन उसकी सारी संपत्ति तो चली जाएगी।"

"जब चटर्जी महाशय इस मामले में हैं, तब संपत्ति मिलने की कोई आशा नहीं है; और फिर वह भले घर की लड़की ठहरीं। संपत्ति के साथ क्या उनका धर्म भी चला जाए?"

दूसरे दिन उस स्त्री ने सारी बातें माधवी को बता दीं। सुनकर वह हैरान रह गई। दिनभर वह जमींदार सुरेंद्रनाथ के बारे में सोचती रही। उसने सोचा, यह नाम तो बहुत ही परिचित है, लेकिन उस व्यक्ति के चरित्र के साथ मेल नहीं खाता। यह नाम तो उसने मन ही मन कितने ही दिनों तक याद किया है। उसे आज पूरे पाँच वर्ष हो गए। भूल गई थी उसे, लेकिन आज बहुत दिनों बाद वह फिर याद आ गया।

स्वप्न और निद्रा में माधवी ने बड़े कष्ट से वह रात बिताई। अनेक बार उसे पुरानी बातें याद आ जाती थीं और उसकी आँखों में आँसू उमड़ आते थे।

संतोष कुमार ने उसके मुख की ओर डरते-डरते देखकर कहा, "मामी, मैं अपनी माँ के पास जाऊँगा।"

स्वयं माधवी ने भी यह बात कई बार सोची थी, क्योंकि जब यहाँ ठिकाना ही नहीं रहा, तब काशी वास करने के सिवा और कोई उपाय नहीं है। उसने संतोष के लिए ही जमींदार से भेंट करने के बारे में सोचा था, लेकिन वह हो नहीं सकता; मोहल्ले-टोले के और अड़ोसी-पड़ोसी मना कर रहे हैं। इसके सिवा वह चाहे जहाँ जाकर रहे।

अब एक नया बखेड़ा और खड़ा हो गया था, वह था उसका रूप और यौवन। माधवी सोचने लगी, 'मेरा भाग्य भी कैसा फूटा है। यह सारे उपद्रव अभी तक उसके शरीर के साथ जुड़े हुए हैं।' आज सात वर्ष हो गए, ये सब बातें उसके ध्यान में ही नहीं आईं और इन बातों का स्मरण करा देने वाला भी कोई नहीं था। पति की मृत्यु के बाद जब वह अपने पिता के घर चली गई थी, तब सभी ने उसे 'बड़ी दीदी' और 'माँ' कहकर पुकारा था। इन सम्मानपूर्ण संबोधनों ने उसके मन को उम्र से पहले ही वृद्ध बना डाला था। कहाँ का रूप और कहाँ का यौवन? जहाँ उसे बड़ी बहन का काम करना पड़ता था और माँ जैसा स्नेह लुटाना पड़ता था, वहाँ क्या यह सब बातें याद रह सकती थीं? याद नहीं थीं, लेकिन अब याद आ गई थीं। उसने लज्जा से सूखी हँसी हँसकर कहा, "यहाँ के लोग अंधे हैं या जानवर?" लेकिन यह माधवी की भूल थी। सभी का मन उसकी तरह इक्कीस-बाईस वर्ष की उम्र में बूढ़ा नहीं हो जाता।

तीन दिन बाद जमींदार का एक प्यादा उसके दरवाज़े के ठीक सामने आसन जमाकर बैठ गया और पुकार-पुकारकर लोगों को जमींदार सुरेंद्रनाथ की नई कीर्ति के बारे में बताने लगा। तब माधवी, संतोष का हाथ पकड़कर दासी के साथ नाव पर जा बैठी।

गोला गाँव से पंद्रह कोस दूर सोमरापुर में प्रमिला का विवाह हुआ था। आज एक वर्ष से वह ससुराल में ही थी। शायद फिर वह कलकत्ता जाएगी, लेकिन माधवी उस समय वहाँ कहाँ रहेगी? इसलिए उससे मिल लेना आवश्यक था।

सवेरे सूर्य उदय होते ही माँझियों ने नाव खोल दी। धारा के साथ नाव तेज़ी से बह चली। हवा अनुकूल नहीं थी, इसलिए नाव धीरे-धीरे बाँसों के बीच से गुज़रती, कटीले वृक्षों और झाड़ियों को बचाती, घास-पात को ठेलती हुई चलने लगी। संतोष कुमार के आनंद की सीमा नहीं रही। वह नाव की छत पर से हाथ बढ़ाकर वृक्षों की पत्तियाँ तोड़ने के लिए आतुर हो उठा। माँझियों ने कहा, "अगर हवा नहीं रुकी तो नाव कल दोपहर तक सोमरापुर नहीं पहुँच सकेगी।"

आज माधवी का तो एकादशी का व्रत था, लेकिन संतोष कुमार के लिए कहीं नाव बाँधकर खाना बनाकर खिलाना होगा। माँझियों ने कहा, "दिस्तेपाड़ा के बाज़ार में अगर नाव बाँधी जाए तो बहुत सुविधाजनक रहेगा। वहाँ सब चीजें मिल जाती हैं।"

दासी ने कहा, "अच्छा भैया, ऐसा ही करो। जिससे दस-ग्यारह बजे तक लड़के को खाना मिल जाए।"

समाप्त

 प्रकरण 8

कार्तिक का महीना समाप्त होने पर था और थोड़ी-थोड़ी सर्दी पड़ने लगी थी। सुरेंद्रनाथ के ऊपर वाले कमरे में खिड़की के रास्ते प्रातःकाल के सूर्य का प्रकाश बिखर रहा था, जिसमें सुरेंद्र दिखाई दे रहे थे। खिड़की के पास ही ढेर सारे बही-खाते और कागज़-पत्र लेकर मेज़ पर एक ओर सुरेंद्रनाथ बैठे थे। अदायगी-वसूली, बाकी-बकाया, जमा-खर्च, बंदोबस्त, मामले-मुकदमे और फाइलें आदि वे एक-एक करके उलटते और देखते जा रहे थे। इन सब बातों को देखना-सुनना उनके लिए एक तरह से आवश्यक भी हो गया था; इसके बिना उनका समय भी नहीं कटता था।

शांति के साथ इसके लिए उन्हें बहुत झगड़ा करना पड़ा था। बड़ी कठिनाई से वह उसे समझा सके थे कि अक्षरों की ओर देखने मात्र से ही मनुष्य के कलेजे का दर्द नहीं बढ़ जाता या उसे तुरंत ही धर-पकड़कर बाहर ले जाने की आवश्यकता नहीं होती। लाचार होकर शांति ने इस बात को स्वीकार कर लिया था और अब वह आवश्यकतानुसार उनकी सहायता भी करती थी।

आजकल पति पर शांति का पूरा-पूरा अधिकार था। उसकी एक भी बात टाली नहीं जाती थी। केवल दस-पांच कम्बख्त यार-दोस्त मिलकर कुछ दिनों से शांति को बहुत क्लेश पहुँचा रहे थे, लेकिन पत्नी की आज्ञा से अब सुरेंद्रनाथ का घर से बाहर निकलना तक बंद था। शांति ने डॉक्टर के परामर्श और निर्देशों को जी-जान से पूरा करने की ठान ली थी।

अभी-अभी वह पास ही बैठी लाल फीते से कागज़ों के बंडल बाँध रही थी। सुरेंद्रनाथ ने एक कागज़ पर से सिर उठाकर पुकारा, "शांति?"

शांति कहीं चली गई थी, थोड़ी देर में लौटकर आई और बोली, "मुझे बुला रहे थे?"

"हाँ, मैं ज़रा दफ़्तर जाऊँगा।"

"नहीं, जो कुछ चाहिए बताइए, मैं ला देती हूँ।"

"कुछ चाहिए नहीं। सिर्फ मथुरा बाबू से कुछ बातें करना चाहता हूँ।"

"उन्हें यहीं बुलवा देती हूँ। तुम्हें जाने की ज़रूरत नहीं, लेकिन इस समय उनकी क्या ज़रूरत पड़ गई?"

"कह देना कि अगहन के महीने से उन्हें काम करने की ज़रूरत नहीं है।"

शांति और शंकित हो उठी, लेकिन स्वयं को संतुष्ट करते हुए पूछा, "आखिर उनका क्या अपराध है?"

"अपराध क्या है, यह तो अभी ठीक-ठीक नहीं बता सकता, लेकिन वे बहुत ज्यादती कर रहे हैं।" इसके बाद अदालत का एक हुक्मनामा और कई कागज़-पत्र दिखाकर उन्होंने कहा, "यह देखो, गोला गाँव की एक विधवा का सारा घर-बार नीलाम करके खरीद लिया है। मुझसे एक बार पूछा तक नहीं।"

शांति ने दुःखी होकर कहा, "हाय-हाय! विधवा का? तब तो यह काम अच्छा नहीं हुआ, लेकिन बिका कैसे?"

"उस पर दस साल की मालगुज़ारी बाकी थी। ब्याज और मूलधन मिलाकर डेढ़ हज़ार रुपये की नालिश हुई थी।"

रुपयों की बात सुनकर शांति, मथुरा बाबू के प्रति कुछ नर्म पड़ गई और मुस्कुराकर बोली, "इसमें मैनेजर का क्या दोष है? वह इतने रुपये कैसे छोड़ देते?"

सुरेंद्रनाथ गंभीर होकर सोचने लगे।

शांति ने पूछा, "क्या इतने रुपये छोड़ देने चाहिए थे?"

"छोड़ेंगे नहीं तो क्या एक असहाय विधवा को घर से निकालेंगे? तुम क्या यही राय देती हो?"

इस प्रश्न के अंदर जो आग छिपी थी, वह शांति के शरीर में समा गई। वह दुःखी होकर बोली, "नहीं! मैं घर से निकाल देने को नहीं कहती। अगर आप अपने रुपये दान करने लगें तो मैं उसमें बाधक क्यों बनने लगी?"

सुरेंद्रनाथ ने हँसते हुए कहा, "शांति, यह बात नहीं है। मेरे रुपये क्या तुम्हारे नहीं हैं? लेकिन यह बताओ, जब मैं न रहूँगा उस समय तुम...।"

"कैसी बातें करते हो?"

"मुझे जो अच्छा लगता है, वह तुम करोगी न?"

शांति की आँखों में आँसू आ गए, क्योंकि उसके पति की शारीरिक हालत अच्छी नहीं थी। वह बोली, "इस तरह की बातें क्यों करते हो?"

"अच्छी लगती हैं, इसलिए करता हूँ। शांति, तुम मेरी इच्छाओं और आकांक्षाओं को याद नहीं रखोगी?"

शांति ने आँखों पर आंचल रखकर सिर हिला दिया।

कुछ देर बाद सुरेंद्रनाथ ने कहा, "यह तो मेरी बड़ी दीदी का नाम है।"

शांति ने आँखों पर से आंचल हटाकर सुरेंद्रनाथ की ओर देखा।

सुरेंद्रनाथ ने एक कागज़ दिखाते हुए कहा, "यह देखो, मेरी बड़ी दीदी का नाम है।"

"कहाँ?"

"यह देखो, माधवी देवी—जिसका मकान नीलाम हुआ है।"

पल भर में शांति बिल्कुल बुझ सी गई। उसने कहा, "इसीलिए शायद आप इसे लौटा देना चाहते हैं।"

सुरेंद्रनाथ ने हँसते हुए उत्तर दिया, "हाँ, इसीलिए। मैं सब कुछ लौटा दूँगा।"

माधवी की बात सुनकर शांति कुछ दुःखी हो उठी। ऐसा लगा जैसे उसके अंदर ईर्ष्या की भावना जाग गई हो। उसने कहा, "हो सकता है कि वह आपकी दीदी न हों। केवल माधवी नाम है। सिर्फ नाम से ही क्या...?"

"क्या बड़ी दीदी के नाम का मैं कुछ सम्मान नहीं करूँगा?"

"भले ही करो, लेकिन वह स्वयं तो यह जान नहीं पाएँगी।"

"लेकिन मैं अनादर नहीं कर सकता, भले ही वह जान न पाएँ।"

"नाम तो ऐसे बहुत से लोगों के होते हैं।"

"क्या तुम दुर्गा का नाम लिखकर उस पर पाँव रख सकती हो?"

"छी! कैसी बातें करते हो देवी का नाम लेकर!"

सुरेंद्रनाथ हँस पड़े, "अच्छा, देवी का नाम न सही, लेकिन मैं तुम्हें पाँच हज़ार रुपये दे सकता हूँ, अगर तुम एक काम कर सको।"

"कौन-सा काम?" शांति ने प्रसन्न होकर पूछा।

दीवार पर सुरेंद्रनाथ का एक फ़ोटो टँगा था। उसकी ओर उँगली से इशारा करके वे बोले, "यह फ़ोटो अगर...।"

"क्या?"

"चार ब्राह्मणों के द्वारा यदि नदी के किनारे जला सको तो...।"

जैसे कहीं पास ही बिजली गिरने पर सारा खून पल भर में सूख जाता है या साँप के काटे हुए रोगी का शरीर बिल्कुल नीला पड़ जाता है, ठीक वही दशा शांति की हो गई। इसके बाद धीरे-धीरे उसके चेहरे का रंग लौटा। दुःख भरी नज़रों से पति की ओर देखती हुई वह चुपचाप नीचे उतर गई। पुरोहित को बुलाकर शांति ने सर्वस्व-वाचन की यथोचित व्यवस्था की और राजा के आधे राजस्व की मन्नतें मानकर मन-ही-मन प्रतिज्ञा की कि—'यह बड़ी दीदी चाहे कोई भी हों, इनके बारे में मैं कभी कुछ नहीं कहूँगी।' इसके बाद वह बहुत देर तक अपने कमरे का दरवाज़ा बंद करके आँसू बहाती रही। अपने जीवन में ऐसी कड़वी बात उसने पहले कभी नहीं सुनी थी।

सुरेंद्रनाथ पहले तो कुछ देर चुप बैठे रहे, फिर बाहर चले गए।

दफ़्तर में मथुरा बाबू से भेंट हुई। उन्होंने पूछा, "गोला गाँव में किसकी संपत्ति नीलाम हुई है?"

"मृत रामतनु सान्याल की विधवा पुत्रवधू की।"

"क्यों?"

"दस साल की मालगुज़ारी बाकी थी।"

"खाता कहाँ है? दिखाओ।"

मथुरानाथ पहले तो सन्नाटे में आ गए, फिर बोले, "खाता वगैरह तो अभी तक पवना से मँगाया ही नहीं गया है।"

"खाता लाने के लिए आदमी भेजो। क्या उस विधवा के रहने तक के लिए ज़रा सी जगह भी नहीं छोड़ी गई?"

"शायद नहीं।"

"तब वह रहेगी कहाँ?"

मथुरा बाबू ने साहस बटोरकर उत्तर दिया, "इतने दिनों तक जहाँ थी, वहीं रहेगी। ऐसा ही लगता है।"

"इतने दिनों तक कहाँ थी?"

"कलकत्ता में अपने पिता के घर।"

"पिता का नाम जानते हो?"

"हाँ जानता हूँ—ब्रजराज लाहिड़ी।"

"और उस विधवा का नाम?"

"माधवी देवी।"

सुरेंद्रनाथ सिर झुकाकर वहीं बैठ गए। मथुरा बाबू ने घबराकर पूछा, "क्या हुआ?"

सुरेंद्रनाथ ने इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया। उन्होंने एक नौकर को बुलाकर कहा, "एक अच्छे घोड़े पर ज़ीन कसने के लिए कहो। मैं इसी समय गोला गाँव जाऊँगा। यहाँ से गोला गाँव कितनी दूर है, जानते हो?"

"लगभग दस कोस। अभी नौ बजे हैं, एक बजते-बजते आप वहाँ पहुँच जाएँगे। उत्तर की ओर जाकर आगे से पश्चिम की ओर मुड़ना होगा।"

इसके बाद चाबुक पड़ते ही घोड़ा दौड़ता हुआ निकल गया।

शांति को जब यह समाचार मिला, तो उसने ठाकुर जी वाले कमरे में अपना सिर पटक-पटककर फोड़ लिया और बोली, "ठाकुर जी! क्या यही था तुम्हारे मन में? क्या अब मैं उन्हें फिर पा सकूँगी?"

इसके बाद दो प्यादे घोड़ों पर सवार होकर गोला गाँव की ओर तेज़ी से दौड़ पड़े। खिड़की से उन्हें देखकर शांति धीरे-धीरे अपने आँसू पोंछने लगी। उसने कहा, "माँ दुर्गे! एक जोड़ा भैंसा चढ़ाऊँगी—जो चाहोगी वही दूँगी। बस उन्हें लौटा लाओ। मैं अपना कलेजा चीरकर लहू चढ़ाऊँगी, जितना भी चाहो उतना ही—जब तक तुम्हारी प्यास न बुझे।"

गोला गाँव पहुँचने में अब भी दो कोस बाकी थे। घोड़े के टाप फेन (झाग) से भर गए थे। जी-जान से धूल उड़ाता, खेतों की मेड़ों को तोड़ता और नालों को फाँदता हुआ घोड़ा भागा चला जा रहा था। सिर के ऊपर प्रचंड सूर्य दहक रहा था।

घोड़े पर सवार रहने की हालत में ही सुरेंद्रनाथ का जी मिचलाने लगा था। ऐसा लग रहा था जैसे अंदर की सारी नसें कट-कटकर बाहर निकल पड़ेंगी। इसके बाद ही खाँसी के साथ खून की दो-तीन बूँदें टप से धूल से सने कुर्ते पर टपक पड़ीं। सुरेंद्रनाथ ने हाथ से अपना मुँह पोंछ लिया।

एक बजने से पहले ही वे गोला गाँव पहुँच गए। रास्ते में एक दुकानदार से पूछा, "क्या यह गोला गाँव है?"

"हाँ।"

"रामतनु सान्याल का मकान किधर है?"

"उस ओर है।"

घोड़ा फिर दौड़ने लगा और थोड़ी ही देर में उस मकान के सामने पहुँच गया। दरवाज़े पर ही एक सिपाही बैठा था। अपने मालिक को देखकर उसने प्रणाम किया।

"घर में कौन है?"

"कोई नहीं।"

"कोई नहीं? कहाँ गए?"

"सवेरे नाव लेकर चले गए।"

"कहाँ? किस रास्ते से?"

"दक्षिण की ओर।"

नदी के किनारे-किनारे रास्ता था, जहाँ घोड़ा चल नहीं सकता था। सुरेंद्रनाथ ने घोड़ा छोड़ दिया और पैदल ही चल पड़े। रास्ते में एक बार उन्होंने देखा कि कुर्ते पर कई जगह खून की बूँदें गिरकर धूल में जम गई थीं। इस समय भी उनके होठों से खून बह रहा था। नदी में उतरकर उन्होंने एक अंजलि जल पिया और फिर जी-जान से चलना शुरू कर दिया। पैरों में जूते तक नहीं थे। सारा शरीर कीचड़ से भर गया था। कुर्ते पर खून के ऐसे दाग थे, जैसे किसी ने छाती पर खून छिड़क दिया हो।

दिन ढलने लगा। पैर अब आगे नहीं बढ़ रहे थे। ऐसा लग रहा था कि अगर वे लेट गए तो हमेशा के लिए सो जाएँगे; इसलिए जैसे अंतिम शैया पर इस जीवन का महाविश्राम प्राप्त करने की आशा लिए वे पागलों की तरह दौड़ते चले जा रहे थे। शरीर में जितनी भी शक्ति थी, उसे बिना किसी कंजूसी के खर्च करके वे अंत में अनंत आश्रय पा लेना चाहते थे, जहाँ से फिर कभी नहीं उठना पड़े।

नदी के मोड़ के पास वह एक नाव दिखाई दी। वह करेमू के झुरमुट को हटाती हुई अपना रास्ता निकाल रही थी।

सुरेंद्रनाथ ने पुकारा, "बड़ी दीदी...!"

लेकिन सूखे गले से आवाज़ नहीं निकली। केवल दो बूँद खून निकलकर बह गया।

"बड़ी दीदी...!" फिर दो बूँद खून बाहर निकल आया।

"बड़ी दीदी...!" फिर दो बूँद खून।

करेमू के झुरमुट ने नाव की गति को रोक दिया था। सुरेंद्रनाथ पास पहुँच गए। उन्होंने फिर पुकारा, "बड़ी दीदी...!"

दिनभर के उपवास और मानसिक कष्ट के कारण माधवी बेजान सी संतोष कुमार के पास ही आँखें मूँदे लेटी थी। सहसा उसके कानों में आवाज़ पहुँची। कोई चिर-परिचित स्वर उसे पुकार रहा था। माधवी उठकर बैठ गई। उसने अंदर से मुँह निकालकर देखा—सारा बदन धूल और कीचड़ से भरा हुआ था। अरे, यह तो मास्टर साहब हैं!

"अरे नयनतारा की माँ, माँझी से जल्दी नाव लगाने के लिए कह!"

सुरेंद्रनाथ तब तक धीरे-धीरे किनारे पर गिर रहे थे। सब लोगों ने मिलकर उन्हें उठाया और किसी तरह नाव पर लाकर लिटा दिया। उनके मुँह और आँखों पर जल छिड़का गया।

एक माँझी ने उन्हें पहचानकर कहा, "ये तो लालता गाँव के जमींदार हैं।"

माधवी ने इष्ट-कवच के साथ अपने गले का सोने का हार उतारकर उसके हाथ में दे दिया और बोली, "एक रात में लालता गाँव पहुँचा दो। मैं तुम सभी को एक-एक हार इनाम में दूँगी।"

सोने का हार देखकर उनमें से तीन माँझी कंधे पर रस्सी लेकर नीचे उतर पड़े।

संध्या के समय सुरेंद्रनाथ को होश आया। वे आँखें खोलकर माधवी की ओर देखते रहे। उस समय माधवी के चेहरे पर घूँघट नहीं था, केवल माथे का कुछ भाग आंचल से ढका था। वह अपनी गोद में सुरेंद्रनाथ का सिर रखे बैठी थी।

कुछ देर तक देखते रहने के बाद सुरेंद्रनाथ ने पूछा, "तुम बड़ी दीदी हो न?"

माधवी ने पहले तो बड़ी सावधानी से सुरेंद्रनाथ के होठों पर लगी खून की बूँदें पोंछीं, फिर अपने आँसू पोंछने लगी।

"तुम बड़ी दीदी हो न?"

"मैं माधवी हूँ।"

सुरेंद्रनाथ ने आँखें मूँदकर कोमल स्वर में कहा, "हाँ, वही।"

मानो सारे संसार का सुख इसी गोद में छिपा हुआ था। इतने दिनों के बाद सुरेंद्रनाथ आज उस सुख को खोज पाए थे, इसलिए उनके होठों के कोनों पर एक मासूम सी मुस्कुराहट रेंग उठी—"बड़ी दीदी, बहुत कष्ट है।"

छल-छल करती हुई नाव लगातार दौड़ी जा रही थी। छप्पर के अंदर सुरेंद्र के चेहरे पर चंद्रमा की किरणें पड़ रही थीं। नयनतारा की माँ एक टूटा हुआ पंखा लेकर धीरे-धीरे हवा झल रही थी।

सुरेंद्रनाथ ने धीरे से पूछा, "कहाँ जा रही थी?"

माधवी ने रुँधे गले से कहा, "प्रमिला की ससुराल।"

"छिः! बड़ी दीदी, भला इस तरह समधी के घर जाना होता है?"

अपनी अट्टालिका के सोने के कमरे में, बड़ी दीदी की गोद में सिर रखकर सुरेंद्रनाथ मृत्युशैया पर पड़े हुए थे। उनके दोनों पैरों को शांति अपनी गोद में लिए आंसुओं से धो रही थी। पवना में जितने डॉक्टर और वैद्य थे, उन सबके सम्मिलित प्रयास से भी खून रुक नहीं रहा था। पाँच वर्ष पहले की चोट अब खून उगल रही थी।

माधवी के हृदय के भीतर की बात स्पष्ट रूप से नहीं कही जा सकती, क्योंकि हम उसे अच्छी तरह नहीं जानते। जान पड़ता है जैसे उसे पाँच वर्ष पहले की बातें याद आ रही हों—जब उसने सुरेंद्रनाथ को घर से निकाल दिया था और वह उसे लौटा नहीं सकी थी; और आज पाँच वर्ष के बाद सुरेंद्रनाथ लौट आया था।

शाम के बाद दीपक की उजली रोशनी में सुरेंद्रनाथ ने माधवी के चेहरे की ओर देखा। पैरों के पास शांति बैठी हुई थी। वह सुन न सके, इसलिए उन्होंने माधवी का मुख अपने मुख के पास खींचकर धीरे से कहा, "बड़ी दीदी! उस दिन की बात याद है जिस दिन तुमने मुझे घर से निकाल दिया था? आज मैंने तुमसे बदला ले लिया। तुम्हें भी निकाल दिया... क्यों, बदला चुक गया न?"

माधवी ने सब कुछ भूलकर अपना सिर सुरेंद्रनाथ के कंधे पर रख दिया।

इसके बाद जब उसे होश आया, तब घर में रोना-पीटना मचा हुआ था।

समाप्त