ओ३म् ही वह परमाणु है ऋग्वेद १.१.१

 

ओ३म् ही वह परमाणु है ऋग्वेद १.१.१

मैं कल्याणकारक अग्नि हूं

ओ३म् ही वह परमाणु है जिसमें तीन कणों के रूप में क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और महेश कहे गए हैं।

 ओ३म् अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्। होतारं रत्नधातमनम्॥ (ऋग्वेद 1.1)

यह ऋग्वेद का प्रथम मंत्र है। इसमें जो मुख्य उपदेश परमेश्वर कर रहा है, वह यह है कि मैं स्वयं अग्नि के समान हूँ या फिर जितने प्रकार की भी अग्नियां हैं, उन सबका मूल मैं ही हूँ। मुझे तुम जानो; मैंने इस जगत में सब कुछ अग्नि से ही बनाया है जो मेरे गुणों से ओत-प्रोत है और जो भयंकर ज्वलनशील है। यह सारा दृश्यमय जगत साक्षात अग्निकुंड है, जिसमें मैं तुम सब प्राणियों की आहुति दे रहा हूँ। तुम्हारा जन्म और मृत्यु का उद्देश्य केवल एक ही है—भस्म होना। मैंने तुम्हारा निर्वाण भस्मों से ही किया है और तुम्हें भस्म में ही मिल जाना है।

यही शाश्वत सत्य और कालजयी ज्ञान है। इसको तुम्हें धारण करना है। तुम्हें भी इस यज्ञ को करते हुए अपने जीवन को व्यतीत करना है। अपने जीवन की परवाह न करके इस यज्ञ की अग्नि को हमेशा प्रज्वलित रखना ही तुम्हारा परम कर्तव्य है। मेरे अनंत रूप हैं—एक भौतिक अग्नि, एक दैविक अग्नि और एक आध्यात्मिक अग्नि। इन तीनों प्रकार की मुख्य अग्नियों को जानो। मैं तुममें हूँ, तुम मुझमें हो, हम-तुम एक हैं।

यह संसार ही तुम्हारा शरीर है, यह शरीर ही यह पृथ्वी है, और यह शरीर ही ज्वलनशील ब्रह्मांड के समान है। तुम मेरी कामना करो, मुझे ही चाहो, मुझमें ही तुम्हारा ध्यान हो। मेरे अतिरिक्त तुम्हारा ध्यान हमेशा तुम्हें केवल अतृप्त करने वाला और जलाने वाला ही होगा। मैं ही सब प्रकार के श्रेष्ठ और सभी ऐश्वर्यों का मुख्य केंद्रबिंदु ईश्वर हूँ।

यदि तुमने सब कुछ प्राप्त कर लिया लेकिन मुझको प्राप्त नहीं किया, तो तुम्हारा सब कुछ पाना ऐसा ही है जैसे तुमने अपनी आत्मा का त्याग कर दिया और अपने शरीर रूपी राख की भस्म को एकत्रित करके संजोकर रख लिया। जागो, होश में आओ, मैं तुम्हें पुकार रहा हूँ। मुझे तुम्हारी ज़रूरत है और तुम्हें हमारी ज़रूरत है; हम-तुम एक-दूसरे के पूरक हैं।

इस संसार रूपी अग्नि कुंड में भस्म होने से पहले तुम मुझसे आ मिलो, जिससे तुम्हारे नगर रूपी देश और शरीर रूपी पुर का कल्याण होना निश्चित है। यह सब यज्ञ के समान कृत्य हमारे द्वारा किया जा रहा है। इस कृत्य से तुम भाग नहीं सकते हो; इसमें तुमको मेरा सहयोग और साथ देना है। इसके लिए ही मैंने तुमको अग्निमय बनाया है और इस ज्वलनशील संसार में झोंक दिया है।

जिस प्रकार सोने को तपाकर शुद्ध करने के लिए आग में डाल देते हैं, उसी प्रकार तुम्हारा शुद्ध रूप मैं ही हूँ। इस विश्व-ब्रह्मांड को धारण करने वाला सबसे बड़ा तपस्वी मैं ही हूँ। केवल तुम मेरे सहारे और मेरी उंगली पकड़कर ही इस आग के समुद्र के समान भवसागर को तर सकते हो।

जब तुम तपस्वी बनोगे—क्योंकि यहाँ सब कुछ तप से ही आच्छादित किया गया है—तभी उद्धार संभव है। इसके अतिरिक्त इस संसार रूपी शरीर से निकलने का कोई दूसरा मार्ग मैंने बनाया ही नहीं है। इसी मार्ग का अनुसरण करके तुमसे पहले जितने भी ज्ञानी, विद्वान, योगी, रहस्यदर्शी, साधु, संत, महात्मा और महापुरुष हुए हैं, तथा जो तुम्हारे बाद और आगे भी इस भूमंडल पर होंगे, वे सब भी मेरे द्वारा नियत मार्ग पर चलकर ही मुझ तक पहुँच सकते हैं।

ऐसा ही सभी देवताओं ने भी किया और इसी प्रकार यज्ञ के कार्य को करते हुए उन्होंने अपनी मृत्यु और काल को भी जीत लिया। वे सब अमर हो चुके हैं, जिसका प्रमाण आज भी यह सूर्य और पृथ्वी दे रहे हैं। यह सब उन देवताओं का ही प्रताप है, जिसके कारण जगत आज सत्य के अलौकिक आनंद से भावविभोर हो रहा है। जिसकी कुछ बूंदें ओस की तरह तुम्हारे जीवन में भी टपक रही हैं।

उनके द्वारा उपार्जित पुरुषार्थ के बल पर ही तुम सब आज रत्नों को धारण कर रहे हो। इन सारे रत्नों में सर्वश्रेष्ठ रत्न तो मैं ही हूँ! मुझको छोड़कर यदि तुम कंकड़-पत्थर प्राप्त करते हो, तो वह तुम्हारे लिए सिवाय भार के और क्या है?

मैं ही सब ब्रह्मांडों को गति देने वाला अग्निस्वरूप, सभी प्राणियों की उन्नति का साधक, सबसे अग्रणी और सारे ऐश्वर्यों का उत्पादक ईश्वर हूँ। तुम अपने कृत्यों के द्वारा जाने-अनजाने हर प्रकार से मेरे ही संरक्षण में रहते हो। मुझसे ही कामना करते हो और मुझसे ही सब कुछ प्राप्त करते हो। मेरी ही उपासना के द्वारा तुम धारणा, ध्यान और समाधि में लीन होते हो और अपने जीवन की सारी समस्याओं का समाधान प्राप्त करते हो।

मैं ही तुम्हारी सभी मंजिलों का आधारभूत केंद्र हूँ, जो इस सृष्टि के बनने से पहले ही विद्यमान है। मैं न कभी बनता हूँ और न ही बिगड़ता हूँ; मैं स्वयंभू हूँ। मैं तुम सब जीवों का परम आदर्श और तुम सब में अंतर्यामी रूप से विद्यमान हूँ।

तुम्हारा परम जीवन उद्देश्य यह है कि तुम सब हमारे अनुकूल बनो। यद्यपि सत्य तो यह है कि जब तुम जीव प्रकृति के संपर्क में आते हो, तो तुम्हारा साक्षात्कार प्राकृतिक तत्वों से अधिक होता है, जिसके कारण तुम्हारा झुकाव प्रकृति की तरफ अधिक हो जाता है।

मैं तुम्हारे कर्तव्य कर्मों का निर्धारण करने वाला तुम्हारा अग्रणी नेता हूँ। मेरे द्वारा बताए गए मार्ग से चलकर और इन वेद-वाणियों के साक्षात्कार से ही तुम मुझ तक पहुँच सकते हो। अपने कर्मों का निर्धारण करके ही तुम शुभ और अशुभ कर्मों के फलों के भोक्ता बनते हो।

इसी के फलस्वरूप जीव आत्मा के लिए बहुउपयोगी मानव शरीर, या फिर पीड़ा और दुःख का कारण बनने वाली पशु आदि की योनियों तथा कीड़े-मकोड़ों के शरीर को धारण करता है, क्योंकि तुम कर्म करने में स्वतंत्र हो किंतु फल में तुम्हारी स्वतंत्रता नहीं है।

### जीवन में अग्नि का आभास

इस आग का आभास तुम अपने जीवन के प्रत्येक दिन में कर सकते हो। यहाँ संसार में हर आदमी जल रहा है; आदमी चलता-फिरता ज्वालामुखी के समान है। कोई काम की अग्नि से जल रहा है, कोई क्रोध की अग्नि से, कोई ईर्ष्या और द्रोह की अग्नि में जल रहा है, कोई पाप की अग्नि में तो कोई पुण्य की अग्नि में जल रहा है।

हर व्यक्ति यहाँ जल रहा है और तब तक जलता रहेगा जब तक उसका शरीर उस अग्नि को बर्दाश्त करने के अयोग्य नहीं हो जाता। जब यह अग्नि सार्थक दिशा में बहती है, तो तुम्हारा कल्याण करती है। जिस प्रकार घरों में जब तक आग नियंत्रित रहती है, तब तक वह सबसे श्रेष्ठ दास है और जब अनियंत्रित हो जाती है, तो बहुत खतरनाक स्वामी बन जाती है।

जिस प्रकार परमाणु से विद्युत प्राप्त कर ऊर्जा उत्पन्न की जा सकती है, किंतु वही परमाणु शक्ति जब अनियंत्रित हो जाती है तो भूमंडल को तहस-नहस कर सकती है, वैसे ही यह अग्नि है। इसलिए मैंने तुम्हें बुद्धि और समझ दी है। किसी भी कार्य को करने से पहले उसके परिणामों पर अवश्य विचार कर लो, अन्यथा यह अग्नि तुम्हें असहनीय पीड़ा, क्लेश और संताप की अनुभूति कराएगी।

इस अग्नि रूप सूक्ष्म ऊर्जा से ही यह परमाणु बना है, इन परमाणुओं से संपूर्ण विश्व-ब्रह्मांड बन रहा है, और इसी अग्नि से सभी जीवों के शरीर निर्मित हैं। यह अग्नि यज्ञ का रूप धारण कर अपने सद्गुणों की आहुतियों के माध्यम से संपूर्ण जगत के सभी प्राणियों का पालन-पोषण और संहार करके संसार को निरंतर गति दे रही है। यही अग्नि तुम्हारी आत्मा का स्वरूप है, जिसकी अनुकंपा से तुम सर्वगुणों और बहुमूल्य रत्नों को धारण करते हो।

### अग्नि रूप परमेश्वर की उपासना तथा देवयान और पितृयान मार्ग

इन खंडों में अग्नि रूप परमेश्वर की उपासना के महत्व और देवयान तथा पितृयान मार्ग के मर्म को समझाया गया है। ये दोनों मार्ग मृत्यु के पश्चात जीव (आत्मा) द्वारा ब्रह्मलोक जाने के मार्ग हैं। इनका उल्लेख कौषीतकि और बृहदारण्यक उपनिषदों में विस्तार से मिलता है।

एक बार आरुणि-पुत्र श्वेतकेतु पांचाल नरेश जीवल की राजसभा में पहुँचे। राजा प्रवाहण ने उनसे पूछा कि क्या उन्होंने अपने पिता से शिक्षा ग्रहण की है? श्वेतकेतु के 'हाँ' कहने पर प्रवाहण ने कुछ प्रश्न किए:

 * क्या तुम्हें पता है कि मृत्यु के बाद मनुष्य की आत्मा कहाँ जाती है?

 * क्या तुम्हें पता है कि वह आत्मा इस लोक में किस प्रकार वापस आती है?

 * क्या तुम्हें देवयान और पितृयान मार्गों के अलग होने का स्थान पता है?

 * क्या तुम्हें पता है कि पितृलोक क्यों नहीं भरता?

 * क्या तुम्हें पता है कि पाँचवीं आहुति दिए जाने पर सोम आदि रस 'पुरुष' संज्ञा को कैसे प्राप्त होते हैं?

इन प्रश्नों का उत्तर श्वेतकेतु नकारात्मक नहीं दे सका। तब वह त्रस्त होकर अपने पिता आरुणि के पास लौटा और सारा वार्तालाप सुनाया। आरुणि भी उन प्रश्नों के उत्तर नहीं जानते थे। तब दोनों पिता-पुत्र पुन: पांचाल नरेश के दरबार में पहुँचे।

राजा ने उनका स्वागत किया और कहा—"हे गौतम! प्राचीनकाल में यह अग्नि-विद्या ब्राह्मणों के पास नहीं थी, यह क्षत्रियों के पास रही।" राजा ने आगे बताया:

 1. **द्युलोक अग्नि:** यह प्रसिद्ध द्युलोक ही अग्नि है। आदित्य इसका ईंधन है, किरणें धुआँ हैं, दिन ज्वाला है, चंद्रमा अंगार है और नक्षत्र चिनगारियाँ हैं। इस अग्नि में देवगण श्रद्धा से आहुति डालते हैं, जिससे 'सोम' राजा का प्रादुर्भाव होता है।

 2. **पर्जन्य अग्नि:** इस अग्नि-विद्या में पर्जन्य (मेघ) ही अग्नि है। वायु समिधा है, बादल धूम्र हैं, विद्युत ज्वाला है, वज्र अंगार है और गर्जन चिनगारियाँ हैं। इसमें सोम की आहुति डालने से वर्षा प्रकट होती है।

 3. **पृथ्वी अग्नि:** पृथ्वी ही अग्नि है, संवत्सर समिधा है, आकाश धूम्र है, रात्रि ज्वाला है, दिशाएँ अंगारे हैं और उनके कोने चिनगारियाँ हैं। इसमें वर्षा की आहुति पड़ने से अन्न का प्रादुर्भाव होता है।

 4. **पुरुष अग्नि:** यह पुरुष ही दिव्याग्नि है, वाणी समिधा है, प्राण धुआँ है, जिह्वा ज्वाला है, नेत्र अंगारे हैं और कान चिनगारियाँ हैं। इसमें सभी देवता मिलकर जब अन्न की आहुति देते हैं, तो वीर्य (पुरुषार्थ) की उत्पत्ति होती है।

 5. स्त्री अग्नि: स्त्री ही दिव्याग्नि है, गर्भाशय समिधा है, विचारों का आवेग धुआँ है, योनि ज्वाला है, सहवास से उत्पन्न अग्नि अंगारे हैं और आनंदानुभूति चिनगारियाँ हैं। इसमें देवगण जब वीर्य की आहुति डालते हैं, तब श्रेष्ठ गर्भ का अवतरण होता है।

इस पाँचवीं आहुति के उपरांत जल (आप:) काया में स्थित 'जीव' या 'प्राणी' के रूप में विकसित हो जाता है। समय आने पर यही जीव नया जन्म लेता है। जो साधक इस पंचग्नि-विद्या को जानकर श्रद्धापूर्वक उपासना करते हैं, वे प्रयाण के उपरांत देवयान और पितृयान मार्ग से पुनः गमन करते हैं।

देवयान और पितृयान मार्ग का स्वरूप

 देवयान मार्ग: इसके अंतर्गत प्राणी मृत्यु के उपरांत अग्निलोक या प्रकाशपुंज के रूप में दिन के प्रकाश में समाहित हो जाते हैं। चंद्रमा के शुक्ल पक्ष से वे उत्तरायण सूर्य में आते हैं, और फिर आदित्य, चंद्रमा, विद्युत होते हुए ब्रह्म में समाहित हो जाते हैं। इस मार्ग से जाने वाले जीव का पुनर्जन्म नहीं होता।

 पितृयान मार्ग: जिन प्राणियों को ब्रह्मज्ञान का लेशमात्र भी ज्ञान नहीं होता, वे मृत्यु के उपरांत धुएँ, रात्रि, कृष्ण पक्ष और दक्षिणायन सूर्य में समाहित होते हैं। इसके पश्चात वे पितृलोक आकाश और चंद्रमा में चले जाते हैं। पुण्य क्षीण होने पर ये आत्माएँ वर्षा के रूप में पुन: मृत्युलोक में लौट आती हैं और अन्न-वनस्पति के माध्यम से माता के गर्भ से जन्म लेती हैं।

निष्कर्ष और त्रिमूर्ति का स्वरूप

यहाँ तक दो प्रकार की अग्नि की बात कही गई है—पहली सर्वप्रथम् परमेश्वर नामक अग्नि, और दूसरी जीवात्मा रूप अग्नि। जिसके कर्म श्रेष्ठ होते हैं, वह परमेश्वर के सद्गुणों को धारण कर देवता बनता है; और जिसके कर्म गिर जाते हैं, उसका पतन होता है। प्रायः देखा जाता है कि देवता किस्म के लोग बहुत कम होते हैं, जबकि दैत्यों की संख्या अधिक होती है।

इसे आधुनिक विज्ञान दो तत्वों के रूप में देखता है—एक जो विश्व-ब्रह्मांड के विकास और समर्थन का कारक है (जैसे लाभकारी बैक्टीरिया), और दूसरा जो ब्रह्मांड के विघटन का कारक है (जैसे फंफूद)। एक तीसरा नियामक परमेश्वर है, जो इन्हें इनके नियत कर्मों के लिए संचालित करता है, जिसे त्रिदेव कहा जाता है।

ज्ञान का अर्थ जीवाणु (विकास), विज्ञान का अर्थ फंफूद (संहार), और ब्रह्मज्ञान का अर्थ उस अदृश्य ब्रह्मा से है जो दोनों के कर्मों को निश्चित करता है। यही ओ३म् वह परमाणु है जिसमें तीन कणों के रूप में ब्रह्मा, विष्णु और महेश समाहित हैं।