पराये धन की तृष्णा सब स्वाहा कर जाती है

मृत्युलोक: जीवन और मृत्यु का चक्र

मृत्युलोक का मूल सिद्धांत

"साहब! यह मृत्युलोक है, यहाँ लोग मर रहे हैं और मार रहे हैं। यहाँ जीवित रहना है तो इस चक्र को समझना होगा।"

इस संसार का सबसे कठोर सत्य यही है कि यहाँ हर जीवन दूसरे जीवन की कीमत पर टिका है। जिसे हम Survival of the Fittest कहते हैं, वह इस मृत्युलोक का भौतिक नियम है। लेकिन क्या यह 'मारना' केवल शारीरिक है?

  • अहंकार का वध: वास्तविक योद्धा वह है जो दूसरों को मारने के बजाय अपने भीतर के 'तम' और 'लोभ' को मारता है।
  • ऊर्जा का नियम: प्रकृति में कुछ भी नष्ट नहीं होता। जिसे हम मृत्यु कहते हैं, वह केवल परमाणु का पुनर्गठन है।
  • सफलता बनाम बोध: जो इस तंत्र को केवल दूसरों को कुचलने के लिए इस्तेमाल करता है, वह नाई के 'सातवें घड़े' की तरह अंतहीन तृष्णा में भटकता है।

निष्कर्ष: यहाँ लोग मरते नहीं, केवल वस्त्र बदलते हैं। असली 'सफलता' इस चक्र को जानकर इससे मुक्त होने में है, न कि इसमें उलझकर शिकारी बनने में।

ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान अनुसंधान | मृत्युलोक दर्शन श्रृंखला
तृष्णा का सातवाँ घड़ा: पराये धन का मनोविज्ञान

पराये धन की तृष्णा: सब स्वाहा कर जाती है

नाई और सात घड़ों की यह प्राचीन कथा मनुष्य के भीतर बैठी उस भूख का विश्लेषण करती है, जो कभी शांत नहीं होती। वह 'सातवाँ घड़ा' जो थोड़ा सा खाली था, वास्तव में हमारी अतृप्त इच्छाओं का प्रतीक है।

"पराया धन मिल तो जाता है, किन्तु उसके साथ जो 'लोभ' रूपी सातवाँ घड़ा आता है, वह जीवन के आनन्द, शान्ति और प्रसन्नता को काफूर कर देता है।"

ब्रह्मज्ञान और विज्ञान का संगम:

  • ऊर्जा का सिद्धांत: पराया धन उस 'अंधकार' (तम) की तरह है जो हमारे स्वयं के पुरुषार्थ की 'अग्नि' को बुझा देता है।
  • शून्य का आकर्षण: जैसे अंतरिक्ष में 'ब्लैक होल' सब कुछ निगल लेता है, वैसे ही मुफ्त का लोभ हमारे संचित पुण्य और श्रम की कमाई को भी शून्य कर देता है।
  • मानसिक दरिद्रता: आय बढ़ने पर भी दरिद्र बने रहना यह दर्शाता है कि सुख 'पदार्थ' (Matter) में नहीं, बल्कि 'संतोष' (State of Mind) में है।

बोध वाक्य:

अपने श्रम से जो 'रूखा-सूखा' मिले, वही अमृत है। पराया धन वह 'यक्ष का मायाजाल' है जो आपको राजा से रंक बना सकता है। स्मरण रहे, ब्रह्मांड की शक्ति (अग्नि) केवल 'सत्य' और 'श्रम' के साथ प्रवाहित होती है, लोभ के साथ नहीं।

प्रस्तुति: ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान (GVB) जीवन श्रृंखला

 

👉 पराये धन की तृष्णा सब स्वाहा कर जाती है

एक नाई जंगल में होकर जा रहा था अचानक उसे आवाज सुनाई दी “सात घड़ा धन लोगे?” उसने चारों तरफ देखा किन्तु कुछ भी दिखाई नहीं दिया। उसे लालच हो गया और कहा “लूँगा”। तुरन्त आवाज आई “सातों घड़ा धन तुम्हारे घर पहुँच जायेगा जाकर सम्हाल लो”। नाई ने घर आकर देखा तो सात घड़े धन रखा था। उनमें 6 घड़े तो भरे थे किन्तु सातवाँ थोड़ा खाली था। लोभ, लालच बढ़ा। नाई ने सोचा सातवाँ घड़ा भरने पर मैं सात घड़ा धन का मालिक बन जाऊँगा। यह सोचकर उसने घर का सारा धन जेवर उसमें डाल दिया किन्तु वह भरा नहीं। वह दिन रात मेहनत मजदूरी करने लगा, घर का खर्चा कम करके धन बचाता और उसमें भरता किन्तु घड़ा नहीं भरा। वह राजा की नौकरी करता था तो राजा से कहा “महाराज मेरी तनख्वाह बढ़ाओ खर्च नहीं चलता।” तनख्वाह दूनी कर दी गई फिर भी नाई कंगाल की तरह रहता। भीख माँगकर घर का काम चलाने लगा और धन कमाकर उस घड़े में भरने लगा। एक दिन राजा ने उसे देखकर पूछा “क्यों भाई तू जब कम तनख्वाह पाता था तो मजे में रहता था अब तो तेरी तनख्वाह भी दूनी हो गई, और भी आमदनी होती है फिर भी इस तरह दरिद्री क्यों? क्या तुझे सात घड़ा धन तो नहीं मिला।” नाई ने आश्चर्य से राजा की बात सुनकर उनको सारा हाल कहा। तब राजा ने कहा “वह यक्ष का धन है। उसने एक रात मुझसे भी कहा था किन्तु मैंने इन्कार कर दिया। अब तू उसे लौटा दे।” नाई उसी स्थान पर गया और कहा “अपना सात घड़ा धन ले जाओ।” तो घर से सातों घड़ा धन गायब। नाई का जो कुछ कमाया हुआ था वह भी चला गया।

पराये धन के प्रति लोभ तृष्णा पैदा करना अपनी हानि करना है। पराया धन मिल तो जाता है किन्तु उसके साथ जो लोभ, तृष्णा रूपी सातवाँ घड़ा और आ जाता है तो वह जीवन के लक्ष्य, जीवन के आनन्द शान्ति प्रसन्नता सब को काफूर कर देता है। मनुष्य दरिद्री की तरह जीवन बिताने लगता है और अन्त में वह मुफ्त में आया धन घर के कमाये कजाये धन के साथ यक्ष के सातों घड़ों की तरह कुछ ही दिनों में नष्ट हो जाता है चला जाता है। भूलकर भी पराये धन में तृष्णा, लोभ, पैदा नहीं करना चाहिए। अपने श्रम से जो रूखा−सूखा मिले उसे खाकर प्रसन्न रहते हुए भगवान का स्मरण करते रहना चाहिए।