"ह्वयाम्यग्निं प्रथमं स्वस्तये ह्वयामि मित्रावरुणाविहावसे। ह्वयामि रात्रीं जगतो निवेशनीं ह्वयामि देवं सवितारमूतये।।" (ऋग्वेद १.३५.१)
यहाँ ऋषि सर्वप्रथम कल्याण के स्रोत और हवियों को रूपांतरित करने वाली अग्नि का आह्वान करते हैं। अग्नि तीन प्रकार की होती है: एक तो भौतिक अग्नि है, जिसका उपयोग यज्ञ-हवन में प्रातःकाल जागृत करने के लिए किया जाता है; दूसरी वैज्ञानिक अग्नि है, जैसे कार्यालय में कंप्यूटर को बूट किया जाता है या प्रयोगशाला के यंत्रों को सक्रिय किया जाता है; और तीसरी आध्यात्मिक अग्नि है, जिसे ध्यान, योग, प्राणायाम और मंत्र-जाप के द्वारा आत्मा में जागृत किया जाता है।
यह तीनों ही मानव कल्याण के लिए अनादिकाल से विशेष क्रियाओं द्वारा आह्वान या जागृत करने की प्रक्रियाएँ हैं। ऋषि आगे कहते हैं कि इस जागृत अग्नि को 'इह' (इस भौतिक संसार में) 'अवसे' (रक्षा और सहायता) के लिए स्थापित किया गया है। इसके जागृत होने से ही 'मित्रावरुणौ' (मित्र और वरुण) दोहरी शक्तियों के रूप में दो दिशाओं में एक साथ गति करते हैं। एक ओर 'मित्रा' मृत्यु से पार होने के मार्ग का द्वार खोलती है (म-इ-मइ यानी मरी हुई वस्तु या भौतिक जड़ वस्तु से 'त्रा' यानी त्राण या मुक्ति दिलाने वाली है); दूसरी ओर 'वरुण' वह है जो स्वयं से दूर है—रूप, आकार और शून्य की जड़ता का वह मूल दलदल है, जिसमें गिरकर लोग मार्ग भटक जाते और खो जाते हैं।
जो इस जगत और संसार का मूल केंद्र 'निवेशनी' है, जहाँ जीव अपने जीवन का निवेश और व्यय करते हैं तथा अपनी जीवन-ऊर्जा का अपव्यय करते हैं, वह निश्चित रूप से 'रात्रीं' (रात्रि) यानी महाअंधकार के समान है। इससे पार पाने के लिए 'मित्रा' नामक अग्नि का आह्वान किया जाता है, क्योंकि यह अंधकार और अज्ञान के सीमित बंधनों से मुक्त करने वाली है। इसलिए हम सब 'ऊतये' (इसका अनुसरण और रक्षा करके) दुःख के मूल तथा मृत्यु से ऊपर उठकर 'देवम्' (देवता जैसे दिव्य गुणों) के साथ तथा उनके सैद्धांतिक बल से प्रबल होकर 'सवितारम्' (जो सभी को तारने और पार कराने वाला परमात्मा है) की शरण में जाते हैं।
Here, the Rishi first invokes Agni (the fire), the source of well-being and the transformer of oblations. There are three kinds of fire: first is the physical fire used in ritualistic yajnas and sacrifices, awakened in the morning; second is the scientific fire, just like booting a computer in an office or activating laboratory instruments; and third is the spiritual fire, awakened within the soul through meditation, yoga, pranayama, and mantra chanting.
All three are ancient processes of invoking or awakening through special actions for human welfare. The Rishi further states that this awakened fire is established Iha (in this material world) for Avase (protection and sustenance). Upon its awakening, Mitravarunau (Mitra and Varuna) function as dual forces, moving simultaneously in two directions. On one side, 'Mitra' opens the path to transcend death (freeing one from dead or inert matter); on the other side, 'Varuna' represents that which is far from the true self—the root inertia of form, shape, and voidness into which people lose their way and become lost.
The core center of this world is Niveshani, where living beings invest and expend their life energy, which is certainly like Ratrim (night/profound darkness). To overcome this, the fire named 'Mitra' is invoked, because it liberates one from the limited bonds of darkness and ignorance. Therefore, by following this (Utaye), rising above the root of sorrow and death, and becoming strengthened by the principled power of Devam (divine forces/deities), we attain Svitaram—the Supreme Creator who liberates and ferries everyone across.
ऋग्वेद के प्रथम मण्डल का 35वां सूक्त सविता देवता (सूर्य के प्रेरक रूप) को समर्पित है। इसके ऋषि हिरण्यस्तूप आङ्गिरस हैं और इस पहले मंत्र का छंद त्रिष्टुप् है।
यह मंत्र सृष्टि के आदि-स्रोत, ऊर्जा के रूपांतरण और ब्रह्मांडीय संतुलन (Cosmic Balance) को समझने के लिए एक बेहतरीन वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रदान करता है। आइए, इसका शब्द-दर-शब्द भौतिक और वैज्ञानिक संदर्भों में विश्लेषण करते हैं।
मंत्र और उसका अन्वय (Word Order)
ह्वयाम्यग्निं प्रथमं स्वस्तये ह्वयामि मित्रावरुणाविहावसे । ह्वयामि रात्रीं जगतो निवेशनीं ह्वयामि देवं सवितारमूतये ॥१॥
अन्वय: (अहम्) स्वस्तये प्रथमम् अग्निं ह्वयामि, इह अवसे मित्रावरुणौ ह्वयामि, जगतः निवेशनीं रात्रीं ह्वयामि, ऊतये देवं सवितारं ह्वयामि।
शब्द-दर-शब्द वैज्ञानिक व्याख्या
यहाँ 'ह्वयामि' (मैं आह्वान करता हूँ) का वैज्ञानिक अर्थ है — "मैं उस तत्त्व/ऊर्जा को संज्ञान में लेता हूँ या उसे क्रियाशील (Activate) करता हूँ।"
१. प्रथमं अग्निं स्वस्तये ह्वयामि
प्रथमम् (First/Primordial): सृष्टि के प्रारंभ में सबसे पहले उत्पन्न होने वाला।
अग्निम् (Fire/Plasma/Thermal Energy): केवल भौतिक आग नहीं, बल्कि ब्रह्मांड की अदृश्य तापीय और विद्युत ऊर्जा (Thermodynamic & Electromagnetic Energy)।
स्वस्तये (For well-being/Stability): सु-अस्ति अर्थात कल्याण, संतुलन या स्थिरता के लिए।
वैज्ञानिक विश्लेषण: आधुनिक विज्ञान (Big Bang Theory) के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में सबसे पहले तीव्र ऊर्जा (Thermonuclear Energy/ Plasma State) प्रकट हुई थी। किसी भी जीवन या पदार्थ के अस्तित्व (स्वस्ति) के लिए ऊर्जा का पहला रूप 'अग्नि' ही है। जब तक ऊर्जा क्रियाशील नहीं होगी, पदार्थ (Matter) का निर्माण नहीं हो सकता।
२. इह अवसे मित्रावरुणौ ह्वयामि
इह (Here): इस भौतिक धरातल या स्थानीय तंत्र (Local System/Earth) पर।
अवसे (For protection/Sustenance): रक्षा, पोषण या व्यवस्था को बनाए रखने के लिए।
मित्रावरुणौ (Mitra and Varuna - Dual principles): यह दो शक्तियों का युग्म (Binary/Complementary forces) है।
मित्र: जो जोड़ने वाला, अनुकूल, और प्रकाशवान है (Day/Hydrogen/Cohesive Force)।
वरुण: जो बांधने वाला, अंधकारमय, या आवरण (Atmosphere/Oxygen/Centripetal Force) है।
वैज्ञानिक विश्लेषण: विज्ञान में ब्रह्मांड और जीवन को चलाने के लिए द्वैध सिद्धांत (Dual Forces) आवश्यक हैं। जैसे — धनात्मक और ऋणात्मक आवेश (Positive & Negative Charges), उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव (Magnetic Poles), या दिन और रात का चक्र। 'मित्रावरुण' उसी आणविक और वैश्विक संतुलन (Attraction and Repulsion) के प्रतीक हैं जो पूरी व्यवस्था को बिखरने से बचाते हैं (अवसे)।
३. जगतो निवेशनीं रात्रीं ह्वयामि
जगतः (Of the moving/dynamic world): इस गतिशील संसार का। 'जगत्' का अर्थ ही है जो निरंतर गतिमान (Dynamic) है।
निवेशनीम् (Rest-inducing/Dissolving): सबको अपने भीतर विश्राम देने वाली या ऊर्जा को शांत करने वाली।
रात्रीम् (Night/Dark Matter/State of Rest): केवल पृथ्वी की रात नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय अंधकार या विश्राम की अवस्था (Kinetic Energy का Potential Energy में बदलना)।
वैज्ञानिक विश्लेषण: यदि ब्रह्मांड में केवल गति (Kinetic Energy) होगी, तो सब कुछ जलकर नष्ट हो जाएगा। गति के बाद विश्राम (Rest/Entropy Dynamic) अनिवार्य है। 'रात्री' उस कॉस्मिक रेस्ट को दर्शाती है जहाँ सभी गतिमान पिंड (जगतो) विश्राम पाते हैं, ताकि उनकी ऊर्जा का क्षय न हो। यह थर्माडायनामिक्स के संतुलन को दिखाता है।
४. ऊतये देवं सवितारं ह्वयामि
ऊतये (For growth/Progression/Protection): प्रगति, आत्म-रक्षा और विकास के लिए।
देवम् (Effulgent/Divine Source): जो स्वयं प्रकाशमान है और दूसरों को शक्ति देता है।
सवितारम् (The Stimulator/Savitar): 'सूते इति सविता' — जो सबको उत्पन्न करता है, गति देता है और प्रेरित (Trigger/Stimulate) करता है।
वैज्ञानिक विश्लेषण: 'सविता' सूर्य के उस अदृश्य प्रेरक रूप को कहते हैं जो सुबह होने से ठीक पहले पूरी प्रकृति को जगाता है। विज्ञान की भाषा में यह "Activation Energy" या "Universal Catalyst" है। पेड़-पौधों में फोटोसिंथेसिस (प्रकाश-संश्लेषण) शुरू करना हो या मनुष्यों के भीतर सर्केडियन रिदम (Biological Clock) को एक्टिवेट करना हो — यह सब सविता देव की प्रेरक ऊर्जा से ही संभव है।
निष्कर्ष (The Scientific Core)
ऋग्वेद १.३५.१ केवल एक धार्मिक प्रार्थना नहीं है, बल्कि यह सृष्टि के ऊर्जा-चक्र (Energy Cycle) का सूत्र है:
1. अग्नि (Primordial Energy): जिससे सब कुछ शुरू हुआ।
2. मित्रावरुण (Binary Forces): जो ब्रह्मांड के ताने-बाने को बांधकर रखते हैं।
3. रात्री (Rest State): जो ऊर्जा को रीचार्ज होने का समय देती है।
4. सविता (The Stimulator): जो पुनः उस शांत पड़ी ऊर्जा को गति देकर जीवन का चक्र आगे बढ़ाता है।
ऋग्वेद १.३४.१२ शुभस्पति' नामक एक अंतर-आयामी काल-यान Interdimensional Time-Travel Vessel
