इन विचारों को वैदिक और संस्कृत प्रमाणों से अधिक प्रभावशाली एवं प्रमाणिक रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है—
प्रेम की भाषा मौन है
"हमारे पास शब्द नहीं हैं बोलने के लिए, इसका अर्थ यह नहीं कि शब्दों का सागर समाप्त हो गया है। बल्कि इसका अर्थ यह है कि हम उस अवस्था के निकट पहुँच गए हैं जहाँ शब्द अनावश्यक हो जाते हैं।"
मनुष्य सामान्यतः शब्दों के माध्यम से संवाद करता है, परन्तु जीवन के कुछ गहनतम अनुभव ऐसे होते हैं जिन्हें शब्द व्यक्त नहीं कर सकते। प्रेम, आत्मीयता, करुणा, ध्यान और आत्मानुभूति—ये सभी शब्दों की सीमा से परे हैं।
उपनिषद् कहता है—
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।
—
अर्थ: जहाँ से वाणी और मन भी उसे प्राप्त किए बिना लौट आते हैं।
यह मंत्र स्पष्ट करता है कि परम सत्य शब्दों और विचारों की पहुँच से परे है। उसे केवल अनुभव किया जा सकता है, व्यक्त नहीं।
इसी सत्य को वेदांत पुनः उद्घोषित करता है—
न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनः।
—
अर्थ: वहाँ न नेत्र पहुँच सकते हैं, न वाणी और न ही मन।
जब दो हृदयों के बीच प्रेम गहरा होता है, तब शब्द गौण हो जाते हैं। एक दृष्टि, एक स्पर्श, एक मौन उपस्थिति हजारों शब्दों से अधिक कह जाती है। यही कारण है कि ऋषियों ने मौन को ज्ञान का सर्वोच्च माध्यम माना।
मौनं सर्वार्थसाधनम्।
अर्थ: मौन सभी उद्देश्यों की सिद्धि का साधन है।
यही कारण है कि भारतीय परम्परा में "मुनि" शब्द का अर्थ केवल चिंतक नहीं, बल्कि वह है जो मौन के माध्यम से सत्य का अनुभव करता है। संस्कृत व्युत्पत्ति में कहा गया है—
मननशीलो मुनिः।
अर्थात् जो भीतर उतरकर सत्य का अनुभव करे, वही मुनि है।
मेरे जीवन का भी यह अनुभव रहा है कि कभी-कभी भाषा की भिन्नता के बावजूद मनुष्य एक-दूसरे की मनःस्थिति को समझ लेते हैं। वहाँ शब्द नहीं, चेतना संवाद करती है। यह अनुभव बताता है कि मनुष्य की चेतना शब्दों से कहीं अधिक व्यापक है।
प्रेम की चरम अवस्था का वर्णन करते हुए संतों ने कहा है—
गूंगे केरी सरकरा, बैठा मुसकाय।
अर्थात् जैसे गूँगा व्यक्ति शक्कर का स्वाद तो जानता है, पर उसे शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता; वैसे ही प्रेम और आत्मानुभूति का अनुभव होता है।
उपनिषद् का एक और महान वाक्य है—
द्वितीयाद्वै भयं भवति।
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जब तक द्वैत है, दूरी है; जहाँ आत्माओं का मिलन होता है, वहाँ एकत्व का अनुभव होता है। उसी एकत्व से प्रेम का जन्म होता है।
इसलिए कहा जा सकता है कि—
दो शरीरों का मिलन संबंध बना सकता है, पर दो आत्माओं का मिलन प्रेम को जन्म देता है।
मौन की भाषा में न कोई छल है, न प्रदर्शन, न शब्दों का आडम्बर। वहाँ केवल अनुभव है, केवल उपस्थिति है, केवल प्रेम है।
महर्षि दक्षिणामूर्ति की स्तुति में कहा गया है—
मौनव्याख्या प्रकटित परब्रह्मतत्त्वं युवानम्।
अर्थात् गुरु ने मौन द्वारा ही परब्रह्म के तत्त्व का उपदेश दिया।
अंततः जीवन का सत्य शब्दों में नहीं, अनुभव में है; वाणी में नहीं, मौन में है; विचार में नहीं, आत्मसाक्षात्कार में है।
निष्कर्ष
शब्द हमें एक सीमा तक ले जाते हैं, परंतु सत्य का अंतिम द्वार मौन से ही खुलता है। प्रेम का सर्वोच्च रूप भी मौन है, क्योंकि वहाँ दो हृदय बिना बोले एक-दूसरे को समझ लेते हैं।
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।
जहाँ वाणी लौट जाती है, वहीं से प्रेम, ध्यान और आत्मा की वास्तविक यात्रा प्रारम्भ होती है।

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