प्रेम की भाषा मौन है, मननशीलो मुनिः।



हमारे पास शब्द ही नहीं है बोलने के लिए, 

   हमारे पास शब्द ही नहीं हैं, बोलने के लिए, इसका मतलब यह नहीं है, कि शब्द का सागर समाप्त हो गया, यद्यपि शब्द के सागर का थाह हमने लगा लिया है, शब्द की गहराई समाप्त होगई अब हमे शब्दों की जरूरत नहीं पड़ती है, एक दूसरे को समझने के लिए हमने एक नई नीःशब्द की भाषा का निर्वाण कर लिया है।

     और यह सिर्फ मेरे व्यक्तिगत अनुभव नहीं है, यह मेरे द्वारा किसी दूसरे को भी समझाया गया है, और उसने भी मान लिया है की शब्द की सीमा है, और एक समय हमारे जीवन में ऐसा आता है जब शब्द हमारे लिए किसी काम के नहीं होते हैं, हम शब्दों के माध्यम से जिस जगत की यात्रा करते हैं, वह बहुत उथला जगत है, एक जगत ऐसे है जो इससे बहुत अंदर और गहरा है, जहां पर हमे किसी भी स्त्री पुरुष से अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए किसी शब्द का सहारा नहीं लेना पड़ता है। 

       यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है, मैं पहले लोगों से ज्यादा बात चीत नहीं करता था, मेरा एक बार कुछ ऐसे लोगों से संबंध हुआ जिनकी भाषा को मैं नहीं जानता था लेकिन मैं उनकी मन स्थिति को अच्छी तरह से समझता था, इस पर उन लोगों को संदेह हुआ, और उन्होंने यह समझा की मैं उनकी भाषा को नहीं समझता हूं, इसलिए उन्होंनें मुझसे बात चीत करना बंद कर दिया और बीना बात चीत किए ही हम अपना कार्य करने लगे और ऐसा लग- भग 20 साल तक चलता रहा जिसके बाद हमने अनुभव किया की वास्तव में हम जो शब्दों का प्रयोग करते हैं वह अपनी चेतना के पूर्ण आयाम से परिचीत नहीं है, हमारी चेतना बहुआयामी है, सत्य तो यह है कि हमारा जीवन बीना शब्दों के भी बहुत अच्छी तरह से व्यतीत हो सकता है, और यह एक प्रेमी का दूसरे प्रेमी के साथ बहुत अधिक सफल होता है, एक पती पत्नी के बीच में भी संभव है, प्रेम जितना अधिक होगा उतना ही हम शब्दों के आडंबर से उपर उट जाएंगे। 

  जीवन का वास्तविक सत्य शब्दातीत है, और उस शब्दातीत को हम शब्द के माध्यम से व्यक्त नहीं कर सकते हैं, यद्यपि उसको हम जी सकते हैं, यह मानव जाती का भविष्य है, भविष्य का मानव शब्दों माया जाल से उपर उठ सकता है, यह मानव भविष्य की संभावना है, वास्तव में मुनी शब्द का यहीं सार है। 

    हमारा सच्चा वास्तवीक स्वभाव मुनी होना है, और हम उस स्तर को उपलब्ध हो गए इसलिए हम मौन और शांत होगए अब हमारे लिए शब्द बेकार हो गए हैं, क्योंकि हमने आत्मा की भाषा को निर्मित कर लिया, जो और वह भाषा मौन की भाषा है।

    और इसी  मौन की भाषा से सच्चे प्रेम का जन्म होता है, यह भाषा दो दिल को एक कर देती है, शरीर तो दो होते हैं, लेकिन दोनों हृदय की धड़कन एक जैसे होती हैं, मैंने यह सिद्ध भी किया है और अनुभव भी किया है कि दो आत्मा के मिलन से प्रेम का पुष्प सृजित होता है, और दो शरीर के मिलन से कांटे का सृजन होता है। जीवन में आनंद तभी होगा जब एक आत्मा दूसरी आत्मा में बीलिन होने में समर्थ होगी। और यह संभव तभी होगा जब हम मौन की भाषा को समझने में समर्थ हो सकेगे।

  इन विचारों को वैदिक और संस्कृत प्रमाणों से अधिक प्रभावशाली एवं प्रमाणिक रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है—

प्रेम की भाषा मौन है

"हमारे पास शब्द नहीं हैं बोलने के लिए, इसका अर्थ यह नहीं कि शब्दों का सागर समाप्त हो गया है। बल्कि इसका अर्थ यह है कि हम उस अवस्था के निकट पहुँच गए हैं जहाँ शब्द अनावश्यक हो जाते हैं।"

मनुष्य सामान्यतः शब्दों के माध्यम से संवाद करता है, परन्तु जीवन के कुछ गहनतम अनुभव ऐसे होते हैं जिन्हें शब्द व्यक्त नहीं कर सकते। प्रेम, आत्मीयता, करुणा, ध्यान और आत्मानुभूति—ये सभी शब्दों की सीमा से परे हैं।

उपनिषद् कहता है—

यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।

अर्थ: जहाँ से वाणी और मन भी उसे प्राप्त किए बिना लौट आते हैं।

यह मंत्र स्पष्ट करता है कि परम सत्य शब्दों और विचारों की पहुँच से परे है। उसे केवल अनुभव किया जा सकता है, व्यक्त नहीं।

इसी सत्य को वेदांत पुनः उद्घोषित करता है—

न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनः।

अर्थ: वहाँ न नेत्र पहुँच सकते हैं, न वाणी और न ही मन।

जब दो हृदयों के बीच प्रेम गहरा होता है, तब शब्द गौण हो जाते हैं। एक दृष्टि, एक स्पर्श, एक मौन उपस्थिति हजारों शब्दों से अधिक कह जाती है। यही कारण है कि ऋषियों ने मौन को ज्ञान का सर्वोच्च माध्यम माना।

मौनं सर्वार्थसाधनम्।

अर्थ: मौन सभी उद्देश्यों की सिद्धि का साधन है।

यही कारण है कि भारतीय परम्परा में "मुनि" शब्द का अर्थ केवल चिंतक नहीं, बल्कि वह है जो मौन के माध्यम से सत्य का अनुभव करता है। संस्कृत व्युत्पत्ति में कहा गया है—

मननशीलो मुनिः।

अर्थात् जो भीतर उतरकर सत्य का अनुभव करे, वही मुनि है।

मेरे जीवन का भी यह अनुभव रहा है कि कभी-कभी भाषा की भिन्नता के बावजूद मनुष्य एक-दूसरे की मनःस्थिति को समझ लेते हैं। वहाँ शब्द नहीं, चेतना संवाद करती है। यह अनुभव बताता है कि मनुष्य की चेतना शब्दों से कहीं अधिक व्यापक है।

प्रेम की चरम अवस्था का वर्णन करते हुए संतों ने कहा है—

गूंगे केरी सरकरा, बैठा मुसकाय।

अर्थात् जैसे गूँगा व्यक्ति शक्कर का स्वाद तो जानता है, पर उसे शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता; वैसे ही प्रेम और आत्मानुभूति का अनुभव होता है।

उपनिषद् का एक और महान वाक्य है—

द्वितीयाद्वै भयं भवति।

जब तक द्वैत है, दूरी है; जहाँ आत्माओं का मिलन होता है, वहाँ एकत्व का अनुभव होता है। उसी एकत्व से प्रेम का जन्म होता है।

इसलिए कहा जा सकता है कि—

दो शरीरों का मिलन संबंध बना सकता है, पर दो आत्माओं का मिलन प्रेम को जन्म देता है।

मौन की भाषा में न कोई छल है, न प्रदर्शन, न शब्दों का आडम्बर। वहाँ केवल अनुभव है, केवल उपस्थिति है, केवल प्रेम है।

महर्षि दक्षिणामूर्ति की स्तुति में कहा गया है—

मौनव्याख्या प्रकटित परब्रह्मतत्त्वं युवानम्।

अर्थात् गुरु ने मौन द्वारा ही परब्रह्म के तत्त्व का उपदेश दिया।

अंततः जीवन का सत्य शब्दों में नहीं, अनुभव में है; वाणी में नहीं, मौन में है; विचार में नहीं, आत्मसाक्षात्कार में है।

निष्कर्ष

शब्द हमें एक सीमा तक ले जाते हैं, परंतु सत्य का अंतिम द्वार मौन से ही खुलता है। प्रेम का सर्वोच्च रूप भी मौन है, क्योंकि वहाँ दो हृदय बिना बोले एक-दूसरे को समझ लेते हैं।

यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।

जहाँ वाणी लौट जाती है, वहीं से प्रेम, ध्यान और आत्मा की वास्तविक यात्रा प्रारम्भ होती है।

प्रेम की भाषा मौन है।

मौन की भाषा आत्मा है।

और आत्मा की भाषा ही सच्चा प्रेम है। ✨🙏📖



                       प्रेम की भाषा मौन है
                              मनोज पाण्डेय  

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