सच्चा विवेकी शिष्य

 सच्चा विवेकी शिष्य

बोधिसत्व वाराणसी में ब्राह्मण कुल में पैदा हुए थे। बड़े हुए तो शिक्षा व शास्त्रों में पारंगत एक आचार्य के आश्रम में अध्ययन करने लगे । आचार्य विरक्त किस्म के तपस्वी थे। छात्रों को सदाचारी बनने, कभी झूठ न बोलने, सत्य पर दृढ़ रहने के संस्कार भी देते थे । आचार्य की पुत्री विवाह योग्य हुई, तो उन्होंने सोचा कि आश्रम के विद्यार्थियों के शील की परीक्षा करके जो विवेकी होगा, उसी से पुत्री का विवाह करूँगा। आचार्य ने कुछ मेधावी विद्यार्थियों को पास बुलाया । उनसे कहा, मैं अपनी पुत्री के विवाह के लिए सुयोग्य वर का चयन करना चाहता हूँ । शर्त यह है कि जो अपने संबंधियों की आँख बचाकर वस्त्र व अलंकार लाएगा , उसी से मैं अपनी पुत्री का विवाह करूँगा ।

छात्र अपने - अपने घर चले गए । आचार्य की सुंदर और बुद्धिमान पुत्री के प्रति सभी आकर्षित थे। नियत समय तक सभी अपने - अपने घरों से आभूषण आदि चुराकर ले आए, लेकिन बोधिसत्व खाली हाथ लौटे ।

आचार्य ने पूछा, बोधिसत्व, तुम कुछ क्यों नहीं ला पाए ?

बोधिसत्व ने उत्तर दिया, आचार्यश्री, आपने कहा था कि चोरी-छिपे लाना, ताकि कोई देख न पाए और जब मैं पापमय कार्य करने को प्रवृत्त होता , तो लगता कि कोई-न - कोई देख रहा है । जहाँ कोई नहीं दिखता, वहाँ मैं स्वयं तो होता ही हूँ ।

आचार्य समझ गए कि बोधिसत्व ही सच्चा विवेकी है, जो हर जगह किसी का अस्तित्व देखता है । उन्होंने अपनी पुत्री का उसी से विवाह कर दिया और अन्य छात्रों द्वारा लाए गए वस्त्र- आभूषण उन्हें वापस कर दिए । 

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