मुनि का विवेक



मुनि का विवेक

    एक व्याध देविका नदी के तट पर तपस्या कर रहा था । दुर्वासा ऋषि भ्रमण करते हुए वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने देविका में स्नान किया तथा तट पर बैठकर पूजा-अर्चना की। दुर्वासाजी को भूख बहुत सताती थी। उन्होंने व्याध से कहा, 'मुझे जौ, गेहूं व चावल से बना भोजन उपलब्ध कराओ।'

    व्याध के पास कुछ नहीं था वह दुर्वासाजी के क्रोध से परिचित था । वह चिंतित हो उठा कि भोजन कैसे उपलब्ध कराए। वह उठा और वन में जाकर वनदेवियों से शुद्ध आहार तैयार कराकर ले आया। उसने श्रद्धा भाव से दुर्वासाजी को भोजन कराया।

    दुर्वासा ऋषि ने तृप्त होकर वर दिया, 'तुम 'सत्यतपा ऋषि' के नाम से ख्याति प्राप्त करोगे। इंद्र व विष्णु भी तुम्हारी परीक्षा लें, तब भी तुम सत्य पर अडिग रहोगे।'

    एक दिन सत्यतपा ऋषि वन में बैठे थे। अचानक एक वराह सामने से गुजरा और ओझल हो गया। पीछे-पीछे शिकारी पहुँच गया। उसने मुनि से पूछा, 'क्या तुमने वराह को जाते देखा है?'

    मुनि ने सोचा कि यदि वह सच बताता है, तो शिकारी वराह को मार देगा। यदि नहीं बताता, तो शिकारी का परिवार भूखा रह जाएगा। मुनि ने कहा, 'वराह को आँखों ने देखा है, पर वे बोल नहीं सकतीं। जिह्वा बोल सकती है, किंतु उसने वराह को देखा नहीं।'

    तभी मुनि ने देखा कि सामने शिकारी की जगह विष्णु और इंद्र खड़े हैं। उन्होंने कहा, 'मुनिवर, वास्तव में तुम सत्य-असत्य के रहस्य व उसके परिणाम को समझते हो। सत्य बोलते समय उसका परिणाम क्या होगा, यह विवेक ही उचित निर्णय ले सकता है।' सत्यतपा मुनि को वर देकर दोनों लौट गए।


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