ऋग्वेदभाष्ये प्रथममण्डले १०१ सूक्तानि दयानन्दसरस्वतीस्वामिना विरचितम्

 


ऋग्वेदभाष्ये प्रथममण्डले १०१-११० सूक्तानि

दयानन्दसरस्वतीस्वामिना विरचितम् 

अथास्यैकाधिकशततमस्यैकादशर्चस्य सूक्तस्याङ्गिरसः कुत्स ऋषिः। इन्द्रो देवता। 1,4 निचृज्जगती। 2,5,7 विराड्जगती छन्दः। निषादः स्वरः। 3 भुरिक् त्रिष्टुप्। 6 स्वराट् त्रिष्टुप्। 8,10 निचृत् त्रिष्टुप्। 9,11 त्रिष्टुप् छन्दः। धैवतः स्वरः॥ 

अथ शालाध्यक्षः कीदृश इत्युपदिश्यते॥ 

अब एक सौ एकवें सूक्त का प्रारम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में शाला का अधीश कैसा होवे, यह विषय कहा है॥

 प्र म॒न्दिने॑ पितु॒मद॑र्चता॒ वचो॒ यः कृ॒ष्णग॑र्भा नि॒रह॑न्नृ॒जिश्व॑ना। अ॒व॒स्यवो॒ वृष॑णं॒ वज्र॑दक्षिणं म॒रुत्व॑न्तं स॒ख्याय॑ हवामहे॥1॥ 

प्र। म॒न्दिने॑। पि॒तु॒ऽमत्। अ॒र्च॒त॒। वचः॑। यः। कृ॒ष्णऽग॑र्भाः। निः॒ऽअह॑न्। ऋ॒जिश्व॑ना। अ॒व॒स्यवः॑। वृष॑णम्। वज्र॑ऽदक्षिणम्। म॒रुत्व॑न्तम्। स॒ख्याय॑। ह॒वा॒म॒हे॒॥1॥

 पदार्थः—(प्र) प्रकृष्टार्थे (मन्दिने) आनन्दित आनन्दप्रदाय (पितुमत्) सुसंस्कृतमन्नाद्यम् (अर्चत) प्रदत्तेन पूजयत। अत्रान्येषामपीति दीर्घः। (वचः) प्रियं वचनम् (यः) अनूचानोऽध्यापकः (कृष्णगर्भाः) कृष्णा विलिखिता रेखाविद्यादयो गर्भा यैस्ते (निरहन्) निरन्तरं हन्ति (ऋजिश्वना) ऋजवः सरलाः श्वानो वृद्धयो यस्मिन्नध्ययने तेन। अत्र श्वन्शब्दः श्विधातोः कनिन्प्रत्ययान्तो निपातित उणादौ। (अवस्यवः) आत्मनोऽवो रक्षणादिकमिच्छवः (वृषणम्) विद्यावृष्टिकर्त्तारम् (वज्रदक्षिणम्) वज्रा अविद्याछेदका दक्षिणा यस्मात्तम् (मरुत्वन्तम्) प्रशस्ता मरुतो विद्यावन्त ऋत्विजोऽध्यापका विद्यन्ते यस्मिँस्तम् (सख्याय) सख्युः कर्मणे भावाय वा (हवामहे) स्वीकुर्महे॥1॥ 

अन्वयः—यूयं य ऋजिश्वनाऽविद्यात्वं निरहंस्तस्मै मन्दिने पितुमद् वचः प्रार्चतावस्यवः कृष्णगर्भा वयं सख्याय यं वृषणं वज्रदक्षिणं मरुत्वन्तमध्यापकं हवामहे तं यूयमपि प्रार्चत॥1॥ 

भावार्थः—मनुष्यैर्यस्माद्विद्या ग्राह्या स मनोवचः कर्मधनैः सदा सत्कर्त्तव्यः। येऽध्याप्यास्ते प्रयत्नेन सुशिक्ष्य विद्वांसः सम्पादनीयाः सर्वदा श्रेष्ठैर्मैत्रीं संभाव्य सत्कर्मनिष्ठा रक्षणीया॥1॥ 

पदार्थः—तुम लोग (यः) जो उपदेश करने वा पढ़ानेवाला (ऋजिश्वना) ऐसे पाठ से कि जिसमें उत्तम वाणियों की धारणाशक्ति की अनेक प्रकार से वृद्धि हो, उससे मूर्खपन को (नि, अहन्) निरन्तर हनें, उस (मन्दिने) आनन्दी पुरुष और आनन्द देनेवाले के लिये (पितुमत्) अच्छा बनाया हुआ अन्न अर्थात् पूरी, कचौरी, लड्डू, बालूशाही, जलेबी, इमरती, आदि अच्छे-अच्छे पदार्थोंवाले भोजन और (वचः) पियारी वाणी को (प्रार्चत) अच्छे प्रकार निवेदन कर उसका सत्कार करो। और (अवस्यवः) अपने को रक्षा आदि व्यवहारों को चाहते हुए (कृष्णगर्भाः) जिन्होंने रेखागणित आदि विद्याओं के मर्म खोले हैं, वे हम लोग (सख्याय) मित्र के काम वा मित्रपनके लिये (वृषणम्) विद्या की वृद्धि करनेवाले (वज्रदक्षिणम्) जिससे अविद्या का विनाश करनेवाली वा विद्यादि धन देनवाली दक्षिणा मिले (मरुत्वन्तम्) जिसके समीप प्रशंसित विद्या वाले ऋत्विज् अर्थात् आप यज्ञ करें दूसरे को करावें, ऐसे पढ़ानेवाले हों उस अध्यापक अर्थात् उत्तम पढ़ानेवाले को (हवामहे) स्वीकार करते हैं, उनको तुम लोग भी अच्छे प्रकार सत्कार के साथ स्वीकार करो॥1॥ 

भावार्थः—मनुष्यों को चाहिये कि जिससे विद्या लेवें, उसका सत्कार मन, वचन, कर्म और धन से सदा करें और पढ़ानेवालों को चाहिये कि जो पढ़ाने योग्य हों, उन्हें अच्छे यत्न के साथ उत्तम-उत्तम शिक्षा देकर विद्वान् करें और सब दिन श्रेष्ठों के साथ मित्रभाव रख उत्तम-उत्तम काम में चित्तवृत्ति की स्थिरता रक्खें॥1॥ 

अथ सभासेनाध्यक्षः किं कुर्यादित्युपदिश्यते॥ अब सभा और सेना का अध्यक्ष क्या करें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

 यो व्यं॑सं जाहृषा॒णेन॑ म॒न्युना॒ यः शम्ब॑रं॒ यो अह॒न् पिप्रु॑मव्र॒तम्। इन्द्रो॒ यः शुष्ण॑म॒शुषं॒ न्यावृ॑णङ् म॒रुत्व॑न्तं स॒ख्याय॑ हवामहे॥2॥ 

यः। विऽअं॑सम्। ज॒हृ॒षा॒णेन॑। म॒न्युना॑। यः। शम्ब॑रम्। यः। अह॑न्। पिप्रु॑म्। अ॒व्र॒तम्। इन्द्रः॑। यः। शुष्ण॑म्। अ॒शुष॑म्। नि। अवृ॑णक्। म॒रुत्व॑न्तम्। स॒ख्याय॑। ह॒वा॒म॒हे॒॥2॥ 

पदार्थः—(यः) सभासेनाध्यक्षः (व्यंसम्) विगता अंसाः स्कन्धा यस्य तत् (जाहृषाणेन) सज्जनानां सन्तोषकेन। अत्र हृष तुष्टावित्स्माल्लिटः कानच्। तुजादित्वाद्दीर्घश्च (मन्युना) क्रोधेन (यः) शौर्यादिगुणोपेतो वीरः (शम्बरम्) अधर्मसम्बन्धिनम्। अत्र शम्बधातोरौणादिकोऽरन् प्रत्ययः। (यः) धर्मात्मा (अहन्) हन्यात् (पिप्रुम्) उदरम्भरम्। अत्र पृधातोर्बाहुलकादौणादिकः कुः प्रत्ययः सन्वद्भावश्च। (अव्रतम्) ब्रह्मचर्यरीत्याचरणादिनियमपालनरहितम् (इन्द्रः) सकलैश्वर्ययुक्तः (यः) अतिबलवान् (शुष्णम्) बलवन्तम् (अशुषम्) शोकरहितं हर्षितम् (नि) (अवृणक्) वर्जयेत्। अत्रान्तर्गतो ण्यर्थः। (मरुत्वन्तं॰) इति पूर्ववत्॥2॥ 

 ‌ अन्वयः—य इन्द्रो जाहृषाणेन मन्युना दुष्टं शत्रुं व्यंसं न्यहन्, यः शम्बरं न्यहन्, यः पिप्रुं न्यहन्, योऽव्रतमवृणक् शुष्णमशुषं मरुत्वन्तमिन्द्रं सख्याय वयं हवामहे स्वीकुर्मः॥2॥

 भावार्थः—मनुष्यैर्यः प्रदीप्तेन क्रोधेन दुष्टान् हत्वा विद्योन्नतये ब्रह्मचर्यादि व्रतानि प्रचार्याविद्याकुशिक्षा निषिध्य सर्वेषां सुखाय सततं प्रयतते, स एव सुहृन्मन्तव्यः॥2॥

 पदार्थः—(यः) जो सभा सेना आदि का अधिपति (इन्द्रः) समस्त ऐश्वर्य को प्राप्त (जाहृषाणेन) सज्जनों को सन्तोष देनेवाले (मन्युना) अपने क्रोधों से दुष्ट और शत्रुजनों को (व्यंसम्, नि, अहन्) ऐसा मारे कि जिससे कन्धा अलग हो जाये वा (यः) जो शूरता आदि गुणों से युक्त वीर (शम्बरम्) अधर्म से सम्बन्ध करनेवाले को अत्यन्त मारे वा (यः) धर्मात्मा सज्जन पुरुष (पिप्रुम्) जो कि अधर्मी अपना पेट भरता उसको निरन्तर मारे और (यः) जो अति बलवान् (अव्रतम्) जिसके कोई नियम नहीं अर्थात् ब्रह्मचर्य, सत्यपालन आदि व्रतों को नहीं करता उसको (अवृणक्) अपने से अलग करे, उस (शुष्णम्) बलवान् (अशुषम्) शोकरहित हर्षयुक्त (मरुत्वन्तम्) अच्छे प्रशंसित पढ़नेवालों को रखनेहारे सकल ऐश्वर्ययुक्त सभापति को (सख्याय) मित्रों के काम वा मित्रपन के लिये हम लोग (हवामहे) स्वीकार करते हैं॥2॥

 भावार्थः—मनुष्यों को चाहिये कि जो चमकते हुए क्रोध से दुष्टों को मारकर विद्या की उन्नति के लिये ब्रह्मचर्यादि नियमों को प्रचारित और मूर्खपन और खोटी सिखावटों को रोक के सबके सुखके लिये निरन्तर अच्छा यत्न करे, वही मित्र मानने योग्य है॥2॥

 अथेश्वरसभाध्यक्षौ कीदृशगुणावित्युपदिश्यते॥ 

अब ईश्वर और सभाध्यक्ष कैसे-कैसे गुणवाले होते हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

 यस्य॒ द्यावा॑पृथि॒वी पौंस्यं॑ म॒॒हद् यस्य॑ व्र॒ते वरु॑णो॒ यस्य॒ सूर्यः॑। यस्येन्द्र॑स्य॒ सिन्ध॑वः॒ सश्च॑ति व्र॒तं म॒रुत्व॑न्तं स॒ख्याय॑ हवामहे॥3॥

 यस्य॑। द्यावा॑पृथि॒वी इति॑। पौंस्य॑म्। म॒हत्। यस्य॑। व्र॒ते। वरु॑णः। यस्य॑। सूर्यः॑। यस्य॑। इन्द्र॑स्य। सिन्धवः॑। सश्च॑ति। व्र॒तम्। म॒रुत्व॑न्तम्। स॒ख्याय॑। ह॒वा॒म॒हे॒॥3॥ 

पदार्थः—(यस्य) (द्यावापृथिवी) प्रकाशभूमी इव क्षमान्यायप्रकाशो (पौंस्यम्) पुरुषार्थयुक्तं बलम् (महत्) महोत्तमगुणविशिष्टम् (यस्य) (व्रते) सामर्थ्ये शीले वा (वरुणः) चन्द्र एतद्गुणो वा (यस्य) (सूर्य्यः) सवितृलोकः। एतद्गुणो वा (यस्य) (इन्द्रस्य) परमैश्वर्यवतो जगदीश्वरस्य सभाध्यक्षस्य वा (सिन्धवः) समुद्राः (सश्चति) प्राप्नोति। सश्चति गतिकर्म्मा। (निघं॰2.14) (व्रतम्) सामर्थ्यं शीलं वा (मरुत्वन्तम्) सर्वप्राणियुक्तमृत्विग्युक्तं वा। अन्यत्पूर्ववत्॥3॥ अन्वयः—वयं यस्येन्द्रस्य व्रते महत्पौंस्यमस्ति यस्य द्यावापृथिवी यस्य व्रतं वरुणो यस्य व्रतं सूर्य्यः सिन्धवश्च सश्चति, तं मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे॥3॥

 भावार्थः—अत्र श्लेषालङ्कारः। मनुष्या यस्य सामर्थ्येन विना पृथिव्यादीनां स्थितिर्न संभवतीति, यस्य सभाद्यध्यक्षस्य प्रकाशवद्विद्या पृथिवीवत् क्षमा चन्द्रवच्छान्तिः सूर्य्यवन्नीतिप्रदीप्तिः समुद्रवद् गाम्भीर्यं वर्त्तते तं विहायाऽन्यं सुहृदं नैव कुर्य्युः॥3॥

 पदार्थः—हम लोग (यस्य) जिस (इन्द्रस्य) परमैश्वर्य्यवान् जगदीश्वर वा सभाध्यक्ष राजा के (व्रते) सामर्थ्य वा शील में (महत्) अत्यन्त उत्तम गुण और (पौंस्यम्) पुरुषार्थयुक्त बल है (यस्य) जिसका (द्यावापृथिवी) सूर्य्य और भूमि के सदृश सहनशीलता और नीति का प्रकाश वर्त्तमान है (यस्य) जिसके (व्रतम्) सामर्थ्य वा शील को (वरुणः) चन्द्रमा वा चन्द्रमा का शान्ति आदि गुण (यस्य) जिसके सामर्थ्य वा शील को (सूर्यः) सूर्यमण्डल वा उसका गुण (सश्चति) प्राप्त होता और (सिन्धवः) समुद्र प्राप्त होते हैं, उस (मरुत्वन्तम्) समस्त प्राणियों से और समय-समय पर यज्ञादि करनेहारों से युक्त सभाध्यक्ष को (सख्याय) मित्र के काम वा मित्रपन के लिये (हवामहे) स्वीकार करते हैं॥3॥

 भावार्थः—इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जिस परमेश्वर के सामर्थ्य के विना पृथिवी आदि लोकों की स्थिति अच्छे प्रकार नहीं होती तथा जिस सभाध्यक्ष के स्वभाव और वर्त्ताव की प्रकाश के समान विद्या, पृथिवी के समान सहनशीलता, चन्द्रमा के तुल्य शान्ति, सूर्य्य के तुल्य नीति का प्रकाश और समुद्र के समान गम्भीरता है, उसको छोड़के और को अपना मित्र न करें॥3॥

 अथ सभाध्यक्षः कीदृश इत्युपदिश्यते॥ अब सभाध्यक्ष कैसा होता, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

 यो अश्वा॑नां॒ यो गवां॒ गोप॑तिर्व॒शी य आ॑रि॒तः कर्म॑णिकर्मणि स्थि॒रः। वी॒ळोश्चि॒दिन्द्रो॒ यो असु॑न्वतो व॒धो म॒रुत्व॑न्तं स॒ख्याय॑ हवामहे॥4॥

 यः। अश्वा॑नाम्। यः। गवा॑म्। गोऽप॑तिः। व॒शी। यः। आ॒रि॒तः। कर्म॑णिऽकर्मणि। स्थि॒रः। वी॒ळोः। चि॒त्। इन्द्रः॑। यः। असु॑न्वतः। व॒धः। म॒रुत्व॑न्तम्। स॒ख्याय॑। ह॒वा॒म॒हे॒॥4॥ 

पदार्थः— (यः) सभाद्यध्यक्षः (अश्वानाम्) तुरङ्गानाम् (यः) (गवाम्) गवां पृथिव्यादीनां वा (गोपतिः) गवां स्वेषामिन्द्रियाणां स्वामी (वशी) वशं कर्त्तुं शीलः (यः) (आरितः) सभया विज्ञापितः (कर्मणिकर्मणि) क्रियायां क्रियायाम् (स्थिरः) निश्चलप्रवृत्तिः (वीळोः) बलवतः (चित्) इव (इन्द्रः) दुष्टानां विदारयिता (यः) (असुन्वतः) यज्ञकर्त्तुं विरोधिनः (वधः) वज्र इव। वध इति वज्रनामसु पठितम्। (निघं॰ 2.20) (मरुत्वन्तं॰) इति पूर्ववत्॥4॥ 

अन्वयः—य इन्द्रः सभाद्यध्यक्षोऽश्वानामधिष्ठाता यो गवां रक्षकः यो गोपतिर्वश्यारितः सन् कर्मणिकर्मणि स्थितो भवेद्योऽसुन्वतो वीळोर्वधश्चिद्धन्ता स्यात् तं मरुत्वन्तं सख्याय वयं हवामहे॥4॥

 भावार्थः—अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। मनुष्यैर्यः सर्वपालको जितेन्द्रियः शान्तो यत्र यत्र सभयाऽऽज्ञापितस्तस्मिँस्तस्मिन्नेव कर्मणि स्थिरबुद्ध्या प्रवर्त्तमानो दुष्टानां बलवतां शत्रूणां विजयकर्त्ता वर्त्तते तेन सह सततं मित्रतां संभाव्य सुखानि सदा भोक्तव्यानि॥4॥

पदार्थः— (यः) जो (इन्द्रः) दुष्टों का विनाश करनेवाला सभा आदि का अधिपति (अश्वानाम्) घोड़ों का अध्यक्ष (यः) जो (गवाम्) गौ आदि पशु वा पृथिवी आदि की रक्षा करनेवाला (यः) जो (गोपतिः) अपनी इन्द्रियों का स्वामी अर्थात् जितेन्द्रिय होकर अपनी इच्छा के अनुकूल उन इन्द्रियों को चलाने (वशी) और मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार को यथायोग्य वश में रखनेवाला (आरितः) सभा से आज्ञा को प्राप्त हुआ (कर्मणिकर्मणि) कर्म-कर्म में (स्थिरः) निश्चित (यः) जो (असुन्वतः) यज्ञकर्त्ताओं से विरोध करनेवाले (वीळोः) बलवान् को (वधः चित्) वज्र के तुल्य मारनेवाला हो, उस (मरुत्वन्तम्) अच्छे प्रशंसित पढ़ानेवालों को राखनेहारे सभापति को (सख्याय) मित्रता वा मित्र के काम के लिये (हवामहे) हम स्वीकार करते हैं॥4॥

 भावार्थः—यहाँ वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जो सबकी पालना करनेवाला जितेन्द्रिय, शान्त और जिस-जिस कर्म में सभा की आज्ञा को पावे, उसी-उसी कर्म में स्थिरबुद्धि से प्रवर्त्तमान, बलवान्, दुष्ट शत्रुओं को जीतनेवाला हो, उसके साथ निरन्तर मित्रता की संभावना करके सुखों को सदा भोगें॥4॥ 

अथ सेनाध्यक्षः कीदृश इत्युपदिश्यते॥ अब सेनाध्यक्ष कैसा होता है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥ 

यो विश्व॑स्य॒ जग॑तः प्राण॒तस्पति॒र्यो ब्र॒ह्मणे॑ प्रथ॒मो गा अवि॑न्दत्। इन्द्रो॒ यो दस्यूँ॒रध॑राँ अ॒वाति॑रन्म॒रुत्व॑न्तं स॒ख्याय॑ हवामहे॥5॥

 यः। विश्व॑स्य। जग॑तः। प्रा॒ण॒तः। पतिः॑। यः। ब्र॒ह्मणे॑। प्र॒थ॒मः। गाः। अवि॑न्दत्। इन्द्रः॑। यः। दस्यू॑न्। अध॑रान्। अ॒व॒ऽअति॑रत्। म॒रुत्व॑न्तम्। स॒ख्याय॑। ह॒वा॒म॒हे॒॥5॥ पदार्थः— (यः) सेनापतिः (विश्वस्य) समग्रस्य (जगतः) जङ्गमस्य (प्राणतः) प्राणतो जीवतः। अत्र षष्ठ्याः पतिपुत्र॰। (अष्टा॰8.3.53) इति विसर्जनीयस्य सः। (पतिः) अधिष्ठाता (यः) प्रदाता (ब्रह्मणे) चतुर्वेदविदे (प्रथमः) सर्वस्य प्रथयिता। अत्र प्रथेरमच्। (उणा॰5.68) (गाः) पृथिवीरिन्द्रियाणि प्रकाशयुक्तान् लोकान् वा (अविन्दन्) प्राप्नोति (इन्द्रः) इन्द्रियवान् जीवः (यः) शौर्यादिगुणयुक्तः (दस्यून्) सहसा परपदार्थहर्त्तॄन् (अधरान्) नीचान् (अवातिरत्) अधः प्रापयति (मरुत्वन्त॰) इति पूर्ववत्॥5॥

 अन्वयः—यः प्रथम इन्द्रो ब्रह्मणे गा अविन्दत्। यो दस्यूनधरानवातिरत्। यो विश्वस्य जगतः प्राणतस्पतिर्वत्तते, तं मरुत्वन्तं सख्याय वयं हवामहे॥5॥ 

भावार्थः—पुरुषार्थेन विना विद्याऽन्नधनप्राप्तिर्न जायते शत्रुपराजयश्च। यो धार्मिकः सेनाध्यक्षः सुहृद्भावेन स्वप्राणवत् सर्वान् प्रीणयति, तस्य कदाचित्खलु दुःखं न जायते तस्मादेतत्सदाचरणीयम्॥5॥

 पदार्थः— (यः) जो उत्तमदानशील (प्रथमः) सबका विख्यात करनेवाला (इन्द्रः) इन्द्रियों से युक्त जीव (ब्रह्मणे) चारों वेदों के जाननेवाले के लिये (गाः) पृथिवी, इन्द्रियों और प्रकाशयुक्त लोकों को (अविन्दत्) प्राप्त होता वा (यः) जो शूरता आदि गुणवाला वीर (दस्यून्) हठ से औरों का धन हरनेवालों को (अधरान्) नीचता को प्राप्त कराता हुआ (अवातिरत्) अधोगति को पहुंचाता वा (यः) जो सेनाधिपति (विश्वस्य) समग्र (जगतः) जङ्गमरूप (प्राणतः) जीवसमूह का (पतिः) अधिपति अर्थात् स्वामी हो, उस (मरुत्वन्तम्) अपने समीप पढ़ानेवालों को रखनेवाले सभाध्यक्ष को हम लोग (सख्याय) मित्रपन के लिये (हवामहे) स्वीकार करते हैं॥5॥ 

भावार्थः—पुरुषार्थ के विना विद्या, अन्न और धन की प्राप्ति तथा शत्रुओं का पराजय नहीं हो सकता, जो धार्मिक सेनाध्यक्ष सुहृद्भाव से अपने प्राण के समान सबको प्रसन्न करता है, उस पुरुष को निश्चय है कि कभी दुःख नहीं होता, इससे उक्त विषय का आचरण सदा करना चाहिये॥5॥

 पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते॥ फिर वह कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

 यः शूरे॑भि॒र्हव्यो॒ यश्च॑ भी॒रुभि॒र्यो धाव॑द्भिर्हू॒यते॒ यश्च॑ जि॒ग्युभिः॑। इन्द्रं॒ यं विश्वा॒ भुव॑ना॒भि सं॑द॒धुर्म॒रुत्व॑न्तं स॒ख्याय॑ ह॒वामहे॥6॥12॥

 यः। शूरे॑भिः। हव्यः॑। यः। च॒। भी॒रुऽभिः॑। यः। धाव॑त्ऽभिः। हू॒यते॑। यः। च॒। जि॒ग्युऽभिः॑। इन्द्र॑म्। यम्। विश्वा॑। भुव॑ना। अ॒भि। स॒म्ऽद॒धुः। म॒रुत्व॑न्तम्। स॒ख्याय॑। ह॒वा॒म॒हे॒॥6॥

 पदार्थः—(यः) सेनाध्यक्षः (शूरेभिः) शूरवीरैः (हव्यः) आहवनीयः (यः) (च) निर्भयैः (भीरुभिः) कातरैः (यः) (धावद्भिः) वेगवद्भिः (हूयते) स्पर्द्ध्यते (यः) (च) आसीनैर्गच्छद्भिर्वा (जिग्युभिः) विजेतृभिः (इन्द्रम्) परमैश्वर्य्यवन्तं सेनाध्यक्षम् (यम्) (विश्वा) अखिलानि (भुवना) लोकाः प्राणिनश्च (अभि) आभिमुख्ये (संदधुः) संदधति (मरुत्वन्तं॰) इति पूर्ववत्॥6॥ 

अन्वयः—य इन्द्रः शूरेभिर्हव्यो यो भीरुभिश्च यो धावद्भिर्हूयते यश्च जिग्युभिर्यमिन्द्रं विश्वा भुवनाभिसंदधुस्तं मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे॥6॥ भावार्थः—यः परमात्मा सेनाधीशश्च सर्वांल्लोकान् सर्वतो मेलयति स सर्वैः सेवनीयः सुहृद्भावेन मन्तव्यश्च॥6॥ 

पदार्थः—(यः) जो परमैश्वर्यवान् सेना आदि का अधिपति (शूरेभिः) शूरवीरों से (हव्यः) आह्वान करने अर्थात् चाहने योग्य (यः) जो (भीरुभिः) डरनेवालों (च) और निर्भयों से तथा (यः) जो (धावद्भिः) दौड़ते हुए मनुष्यों से वा (यः) जो (च) बैठे और चलते हुए उनसे (जिग्युभिः) वा जीतनेवालो लोगों से (हूयते) बुलाया जाता वा (यम्) जिस (इन्द्रम्) उक्त सेनाध्यक्ष को (विश्वा) समस्त (भुवना) लोकस्थ प्राणी (अभि) सम्मुखता से (संदधुः) अच्छे प्रकार धारण करते हैं, उस (मरुत्वन्तम्) अच्छे पढ़ानेवालों को रखनेहारे सेनाधीश को (सख्याय) मित्रपन के लिये हम लोग (हवामहे) स्वीकार करते हैं, उसको तुम भी स्वीकार करो॥6॥

 भावार्थः—जो परमात्मा और सेना का अधीश सब लोकों का सब प्रकार से मेल करता है, वह सबको सेवन करने और मित्रभाव से मानने के योग्य है॥6॥

 पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते॥ फिर वह कैसा है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

 रु॒द्राणा॑मेति प्र॒दिशा॑ विचक्ष॒णो रु॒द्रेभि॒र्योषा॑ तनुते पृ॒थु ज्रयः॑। इन्द्रं॑ मनी॒षा अ॒भ्य॑र्चति श्रु॒तं म॒रुत्व॑न्तं स॒ख्याय॑ हवामहे॥7॥

 रु॒द्राणा॑म्। ए॒ति॒। प्र॒ऽदिशा॑। वि॒ऽच॒क्ष॒णः। रु॒द्रेभिः। योषा॑। त॒नु॒ते॒। पृ॒थु। ज्रयः॑। इन्द्र॑म्। म॒नी॒षा। अ॒भि। अ॒र्च॒ति॒। श्रु॒तम्। म॒रुत्व॑न्तम्। स॒ख्याय॑। ह॒वा॒म॒हे॒॥7॥

 पदार्थः—(रुद्राणाम्) प्राणानामिव दुष्टान् श्रेष्ठांश्च रोदयिताम् (एति) प्राप्नोति (प्रदिशा) प्रदेशेन ज्ञानमार्गेण। अत्र घञर्थे कविधानमिति कः सुपां सुलुगित्यकारादेशश्च। (विचक्षणः) प्रशस्तचातुर्यादिगुणोपेतः (रुद्रेभिः) प्राणैर्विद्यार्थिभिः सह (योषा) विद्याभिर्मिश्रिताया अविद्याभिः पृथग्भूतायाः स्त्रियाः। अत्र युधातोर्बाहुलकात् कर्मणि सः प्रत्ययः। (तनुते) विस्तृणाति (पृथु) विस्तीर्णम्। प्रथिभ्रदिभ्रस्जां संप्रसारणं सलोपश्च। (उणा॰1.28) इति प्रथधातोः कुः प्रत्ययः संप्रासरणं च। (ज्रयः) तेजः (इन्द्रम्) शालाद्यधिपतिम् (मनीषा) मनीषया प्रशस्तबुद्ध्या। अत्र सुपां सुलुगिति तृतीयाया एकवचनस्याकारादेशः। (अभि) (अर्चति) सत्करोति (श्रुतम्) प्रख्यातम् (मरुत्वन्तं॰) इति पूर्ववत्॥7॥

 अन्वयः—विचक्षणो विद्वान् रुद्राणां प्रदिशा पृथु ज्रय एति रुद्रेभिर्योषा तत्तनुते चातो यो विचक्षणो मनीषा श्रुतमिन्द्रमभ्यर्चति तं मरुत्वन्तं सख्याय वयं हवामहे॥7॥ 

भावार्थः—यैर्मनुष्यैः प्राणायामैः प्राणान् सत्कारेण श्रेष्ठान् तिरस्कारेण दुष्टान् विजित्य सकला विद्या विस्तार्य्य परमेश्वरमध्यापकं वाभ्यर्च्योपकारेण सर्वे प्राणिनः सत्क्रियन्ते ते सुखिनो भवन्ति॥7॥

 पदार्थः—(विचक्षणः) प्रशंसित चतुराई आदि गुणों से युक्त विद्वान् (रुद्राणाम्) प्राणों के समान बुरे-भलों को रुलाते हुए विद्वानों के (प्रदिशा) ज्ञानमार्ग से (पृथु) विस्तृत (ज्रयः) प्रताप को (एति) प्राप्त होता है और (रुद्रेभिः) प्राण वा छोटे-छोटे विद्यार्थियों के साथ (योषा) विद्या से मिली और मूर्खपन से अलग हुई स्त्री उसको (तनुते) विस्तारती है, इससे जो विचक्षण विद्वान् (मनीषा) प्रशंसित बुद्धि से (श्रुतम्) प्रख्यात (इन्द्रम्) शाला आदि के अध्यक्ष का (अभ्यर्चति) सब ओर से सत्कार करता, उस (मरुत्वन्तम्) अपने समीप पढ़ानेवालों को रखनेवाले को (सख्याय) मित्रपन के लिये हम लोग (हवामहे) स्वीकार करते हैं॥7॥

 भावार्थः—जिन मनुष्यों से प्राणायामों से प्राणों को, सत्कार से श्रेष्ठों और तिरस्कार से दुष्टों को वश में कर समस्त विद्याओं को फैलाकर परमेश्वर वा अध्यापक का अच्छे प्रकार मान-सत्कार करके उपकार के साथ सब प्राणी सत्कारयुक्त किये जाते हैं, वे सुखी होते हैं॥7॥ 

अथ शालाध्यक्षः कीदृश इत्युपदिश्यते॥ अब शाला आदि का अधिपति कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

 यद्वा॑ मरुत्वः पर॒मे स॒धस्थे॒ यद्वा॑व॒मे वृ॒जने॑ मा॒दया॑से। अत॒ आ या॑ह्यध्व॒रं नो॒ अच्छा॑ त्वा॒या ह॒विश्च॑कृमा सत्यराधः॥8॥ 

यत्। वा॒। म॒रु॒त्वः॒। प॒र॒मे। स॒धऽस्थे॑। यत्। वा॒। अ॒व॒मे। वृ॒जने॑। मा॒दया॑से। अतः॑। आ। या॒हि॒। अ॒ध्व॒रम्। नः॒। अच्छ॑। त्वा॒ऽया। ह॒विः। च॒कृ॒म॒। स॒त्य॒ऽरा॒॒धः॒॥8॥ 

पदार्थः—(यत्) यतः (वा) उत्तमे (मरुत्वः) प्रशस्तविद्यायुक्त (परमे) अत्यन्तोत्कृष्टे (सधस्थे) स्थाने (यत्) यः (वा) मध्यमे व्यवहारे (अवमे) निकृष्टे (वृजने) वर्जन्ति दुःखानि जना यत्र तस्मिन् व्यवहारे (मादयासे) हर्षयसे। लेट्प्रयोगोऽयम्। (अतः) कारणात् (आ) (याहि) प्राप्नुयाः (अध्वरम्) अध्ययना- ध्यापनाख्यमहिंसनीयं यज्ञम् (नः) अस्माकम् (अच्छ) उत्तमरीत्या। अत्र निपातस्य चेति दीर्घः। (त्वाया) त्वया सुपां सुलुगिति तृतीयास्थानेऽयाजादेशः। (हविः) आदेयं विज्ञानम् (चकृम) कुर्याम। अत्रान्येषामपीति दीर्घः। (सत्यराधः) सत्यानि राधांसि विद्यादिधनानि यस्य तत्सम्बुद्धौ॥8॥ 

अन्वयः—हे मरुत्वः सत्यराधो विद्वान्! यद्यतस्त्वं परमे सधस्थे यद्यतो वाऽवमे वा वृजने व्यवहारे मादयासेऽतो नोऽस्माकमध्वरमच्छायाहि त्वया सह वर्त्तमाना वयं हविश्चकृम॥8॥

 भावार्थः—मनुष्यैर्यो विद्वान् सर्वत्रानन्दयिता विद्याप्रदाता सत्यगुणकर्मस्वभावोऽस्ति, तत्सङ्गेन सततं सर्वा विद्याः सुशिक्षाश्च प्राप्य सर्वदानन्दितव्यम्॥8॥

 पदार्थः—हे (मरुत्वः) प्रशंसित विद्यायुक्त (सत्यराधः) विद्या आदि सत्यधनों वाले विद्वान्! (यत्) जिस कारण आप (परमे) अत्यन्त उत्कृष्ट (सधस्थे) स्थान में और (यत्) जिस कारण (वा) उत्तम (अवमे) अधम (वा) वा मध्यम व्यवहार में (वृजने) कि जिसमें मनुष्य दुःखों को छोड़ें (मादयासे) आनन्द देते हैं, (अतः) इस कारण (नः) हम लोगों के (अध्वरम्) पढ़ने-पढ़ाने के अहिंसनीय अर्थान् न छोड़ने योग्य यज्ञ को (अच्छ) अच्छे प्रकार (आ, याहि) आओ प्राप्त होओ (त्वाया) आपके साथ हम लोग (हविः) ग्रहण करने योग्य विशेष ज्ञान को (चकृम) करें अर्थात् उस विद्या को प्राप्त होवें॥8॥ भावार्थः—मनुष्यों को चाहिये कि जो विद्वान् सर्वत्र आनन्दित कराने और विद्या का देनेहारा सत्यगुण, कर्म और स्वभावयुक्त है, उसके संग से निरन्तर समस्त विद्या और उत्तम शिक्षा को पाकर सर्वदा आनन्दित होवें॥8॥ पुनस्तत्सङ्गेन किं कार्य्यं स चास्माकं यज्ञे किं कुर्यादित्युपदिश्यते॥

 फिर उसके सङ्ग से क्या करना चाहिये और वह हम लोगों के यज्ञ में क्या करे, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

 त्वा॒येन्द्र॒ सोमं॑ सुषुमा सुदक्ष त्वा॒या ह॒विश्च॑कृमा ब्रह्मवाहः। अधा॑ नियुत्वः॒ सग॑णो म॒रुद्भि॑र॒स्मिन् य॒ज्ञे ब॒र्हिषि॑ मादयस्व॥9॥

 त्वा॒ऽया। इ॒न्द्र॒। सोम॑म्। सु॒सु॒म॒। सु॒ऽद॒क्ष॒। त्वा॒ऽया। ह॒विः। च॒कृ॒म॒। ब्र॒ह्म॒ऽवा॒हः॒। अध॑। नि॒यु॒त्वः॒। सऽग॑णः। म॒रुत्ऽभिः॑। अ॒स्मिन्। य॒ज्ञे। ब॒र्हिषि॑। मा॒द॒य॒स्व॒॥9॥

 पदार्थः—(त्वाया) त्वया सहिताः (इन्द्रः) परमविद्यैश्वर्ययुक्त (सोमम्) ऐश्वर्यकारकं वेदशास्त्रबोधम् (सुसुम) सुनुयाम प्राप्नुयाम। वाच्छन्दसि सर्वे विधयो भवन्तीतीडभावः। अन्येषामपीति दीर्घश्च। (सुदक्ष) शोभनं दक्षं चातुर्य्ययुक्तं बलं यस्य तत्सम्बुद्धौ। (त्वाया) त्वया सह संयुक्ताः (हविः) क्रियाकौशलयुक्तं कर्म (चकृम) विदध्याम। अत्राप्यन्येषामपि दृश्यत इति दीर्घः। (ब्रह्मवाहः) अनन्तधन वेदविद्याप्रापक (अध) अथ। अत्र वर्णव्यत्ययेन धकारो निपातस्य चेति दीर्घश्च। (नियुत्वः) समर्थ (सगणः) गणैर्विद्यार्थिनां समूहैः सह वर्त्तमानः (मरुद्भिः) ऋत्विग्भिः सहितः (अस्मिन्) प्रत्यक्षे (यज्ञे) अध्ययनाध्यापनसत्कारप्राप्ते व्यवहारे (बर्हिषि) अत्युत्तमे (मादयस्व) आनन्दय हर्षितो वा भव॥9॥

 अन्वयः—हे इन्द्र! त्वाया त्वया सह वर्त्तमाना वयं सोमं सुसुम। हे सुदक्ष! ब्रह्मवाहस्त्वाया त्वया सहिता वयं हविश्चकृम। हे नियुत्वोऽधाथा मरुद्भिः सहितः सगणस्त्वामस्मिन् बर्हिषि यज्ञेऽस्मान् मादयस्व॥9॥ भावार्थः—नहि विदुषां सङ्गेन विना कश्चित् खलु विद्यैश्वर्य्यमानन्दं च प्राप्तुं शक्नोति, तस्मात्सर्वे मनुष्या विदुषः सदा सत्कृत्यैतेभ्यो विद्यासुशिक्षाः प्राप्य सर्वथा सत्कृता भवन्तु॥9॥

 पदार्थः—हे (इन्द्र) परम विद्यारूपी ऐश्वर्य से युक्त विद्वान्! (त्वाया) आपके साथ हुए हम लोग (सोमम्) ऐश्वर्य करनेवाले वेदशास्त्र के बोध को (सुसुम) प्राप्त हों। हे (सुदक्ष) उत्तम चतुराईयुक्त बल और (ब्रह्मवाहः) अनन्तधन तथा वेदविद्या की प्राप्ति करानेहारे विद्वान्! (त्वाया) आपके सहित हम लोग (हविः) क्रियाकौशलयुक्त काम का (चकृम) विधान करें। हे (नियुत्वः) समर्थ! (अधा) इसके अनन्तर (मरुद्भिः) ऋत्विज् अर्थात् पढ़ानेवालों और (सगणः) अपने विद्यार्थियों के गोलों के साथ वर्त्तमान आप (अस्मिन्) इस (बर्हिषि) अत्यन्त उत्तम (यज्ञे) पढ़ने-पढ़ाने के सत्कार से पाये हुए व्यवहार में (मादयस्व) आनन्दित होओ और हम लोगों को आनन्दित करो॥9॥

 भावार्थः—विद्वानों के संग के विना निश्चय है कि कोई ऐश्वर्य्य और आनन्द को नहीं पा सकता है, इससे सब मनुष्यों विद्वानों का सदा सत्कार कर इनसे विद्या और अच्छी-अच्छी शिक्षाओं को प्राप्त होकर सब प्रकार से सत्कार युक्त होवें॥9॥

 पुनः सेनाध्यक्षः किं कुर्यादित्युपदिश्यते॥ फिर सेना आदि का अध्यक्ष क्या करें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

 मा॒दय॑स्व॒ हरि॑भि॒र्ये त॑ इन्द्र॒ वि ष्य॑स्व॒ शिप्रे॒ वि सृ॑जस्व॒ धेने॑। आ त्वा॑ सुशिप्र॒ हर॑यो वहन्तू॒शन्ह॒व्यानि॒ प्रति॑ नो जुषस्व॥10॥

 मा॒दय॑स्व। हरि॑ऽभिः। ये। ते॒। इ॒न्द्र॒। वि। स्य॒स्व॒। शिप्रे॒ इति॑। वि। सृ॒ज॒स्व॒। धेने॒ इति॑। आ। त्वा॒। सु॒ऽशि॒प्र॒। हर॑यः। व॒ह॒न्तु॒। उ॒शन्। ह॒व्यानि॑। प्रति॑। नः॒। जु॒ष॒स्व॒॥10॥ 

पदार्थः—(मादयस्व) हर्षयस्व (हरिभिः) प्रशस्तैर्युद्धकुशलैः सुशिक्षितैरश्वादिभिः (ये) (ते) तव (इन्द्र) परमैश्वर्ययुक्त सेनाधिपते (वि, ष्यस्व) स्वराज्येन विशेषतः प्राप्नुहि (शिप्रे) सर्वसुखप्रापिके द्यावापृथिव्यौ। शिप्रे इति पदनामसु पठितम्। (निघं॰4.1) (विसृजस्व) (धेने) धेनावत्सर्वानन्दरसप्रदे (आ) (त्वा) त्वाम् (सुशिप्र) सुष्ठु सुखप्रापक (हरयः) अश्वादयः (वहन्तु) प्रापयन्तु (उशन्) कामयमानः (हव्यानि) आदातुं योग्यानि युद्धादिकार्य्याणि (प्रति) (नः) अस्मान् (जुषस्व) प्रीणीहि॥10॥ अन्वयः—हे सुशिप्र इन्द्र! ये ते तव हरयः सन्ति तैर्हरिभिर्नोऽस्मान् मादयस्व। शिप्रे धेने विष्यस्व विसृजस्व च। ये हरयस्त्वा त्वामावहन्तु यैरुशन्कामयमानस्त्वं हव्यानि जुषसे तान् प्रति नोऽस्माञ्जुषस्व॥10॥ 

भावार्थः—सेनाधिपतिना सर्वाणि सेनाङ्गानि पूर्णबलानि सुशिक्षितानि साधयित्वा सर्वान् विघ्नान् निवार्य्य स्वराज्यं सुपाल्य सर्वाः प्रजाः सततं रञ्जयितव्याः॥10॥

 पदार्थः—हे (सुशिप्र) अच्छा सुख पहुंचानेवाले (इन्द्र) परमैश्वर्य्ययुक्त सेना के अधीश! (ये) जो (ते) आपके प्रशंसित युद्ध में अतिप्रवीण और उत्तमता से चालें सिखाये हुए घोड़े हैं, उन (हरिभिः) घोड़ों से (नः) हम लोगों को (मादयस्व) आनन्दित कीजिये (शिप्रे) और सर्व सुखप्राप्ति कराने तथा (धेने) वाणी के समान समस्त आनन्दरस को देनेहारे आकाश और भूमि लोक को (वि ष्यस्व) अपने राज्य से निरन्तर प्राप्त हो (विसृजस्व) और छोड़ अर्थात् वृद्धावस्था में तप करने के लिये उस राज्य को छोड़ दे, जो (हरयः) घोड़े (त्वाम्) आपको (आ, वहन्तु) ले चलते हैं वा जिनसे (उशन्) आप अनेक प्रकार की कामनाओं को करते हुए (हव्यानि) ग्रहण करने योग्य युद्ध आदि के कामों को सेवन करते हैं, उन कामों के प्रति (नः) हम लोगों को (जुषस्व) प्रसन्न कीजिये॥10॥ 

भावार्थः—सेनापति को चाहिये कि सेना के समस्त अङ्गों को पूर्ण बलयुक्त और अच्छी-अच्छी शिक्षा दे, उनके युद्ध के योग्य सिद्ध कर, समस्त विघ्नों की निवृत्ति कर और अपने राज्य की उत्तम रक्षा करके सब प्रजा को निरन्तर आनन्दित करे॥10॥

 पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते॥ फिर वह कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

 म॒रुत्स्तो॑त्रस्य वृ॒जन॑स्य गो॒पा व॒यमिन्द्रे॑ण सनुयाम॒ वाज॑म्। तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑तिः॒ सिन्धुः॑ पृथि॒वी उ॒त द्यौः॥11॥13॥

 म॒रुत्ऽस्तो॑त्रस्य। वृ॒जन॑स्य। गो॒पाः। व॒यम्। इन्द्रे॑ण। स॒नु॒या॒म॒। वाज॑म्। तत्। नः॒। मि॒त्रः। वरु॑णः। म॒म॒ह॒न्ता॒म्। अदि॑तिः। सिन्धुः॑। पृ॒थि॒वी। उ॒त। द्यौः॥11॥

 पदार्थः—(मरुत्स्तोत्रस्य) मरुतां वेगादिगुणैः स्तुतस्य (वृजनस्य) दुःखवर्जितस्य व्यवहारस्य (गोपाः) रक्षकः (वयम्) (इन्द्रेण) ऐश्वर्य्यप्रदेन सेनापतिना सह वर्त्तमानाः (सनुयाम) संभजेमहि। अत्र विकरणव्यत्ययः। (वाजम्) संग्रामम् (तत्) तस्मात् (नः) अस्मान् (मित्रो वरु॰) इति पूर्ववत्॥11॥

 अन्वयः—यो मरुत्स्तोत्रस्य वृजनस्य गोपा सेनाधिपतिरस्ति तेनेन्द्रेणैश्वर्यप्रदेन सह वर्त्तमाना वयं यतो वाजं सनुयाम तन्मित्रो वरुणोऽदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौर्नोऽस्मान् मामहन्तां सत्कारहेतवः स्युः॥11॥

 भावार्थः—न खलु संग्रामे केषांचित् पूर्णबलेन सेनाधिपतिना विना शत्रुपराजयो भवितुं शक्यः। नैव किल कश्चित् सेनाधिपतिः सुशिक्षितया पूर्णबलया साङ्गोपाङ्गया हृष्टपुष्टया सेनया विना शत्रून् विजेतुं राज्यं पालयितुं च शक्नोति। नैतावदन्तरेण मित्रादयः सुखकारका भवितुं योग्यास्तस्मादेतत्सर्वं सर्वैर्मनुष्यैर्यथावन्मन्तव्यमिति॥11॥

 अत्रेश्वरसभासेनाशालाद्यध्यक्षाणां गुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिरस्तीति बोद्धव्यम्॥ इत्येकाधिकशततमं 101 सूक्तं त्रयोदशो 13 वर्गश्च समाप्तः॥

 पदार्थः—जो (मरुस्तोत्रस्य) पवन आदि के वेगादि गुणों से प्रशंसा को प्राप्त (वृजनस्य) और दुःखवर्जित अर्थात् जिसमें दुःख नहीं होता, उस व्यवहार का (गोपाः) रखनेवाला सेनाधिपति है, उस (इन्द्रेण) ऐश्वर्य के देनेवाले सेनापति के साथ वर्त्तमान (वयम्) हम लोग जिस कारण (वाजम्) संग्राम का (सनुयाम) सेवन करें (तत्) इस कारण (मित्रः) मित्र (वरुणः) उत्तम गुणयुक्त जन (अदितिः) समस्त विद्वान् मण्डली (सिन्धुः) समुद्र (पृथिवी) पृथिवी (उत) और (द्यौः) सूर्यलोक (नः) हम लोगों के (मामहन्ताम्) सत्कार करने के हेतु हों॥11॥ 

भावार्थः—निश्चय है कि संग्राम में किसी पूर्णबली सेनाधिपति के विना शत्रुओं का पराजय नहीं हो सकता और न कोई सेनाधिपति अच्छी शिक्षा की हुई पूर्ण, बल, अङ्ग और उपाङ्ग सहित आनन्दित और पुष्ट सेना के विना शत्रुओं के जीतने वा राज्य की पालना करने को समर्थ हो सकता है। न उक्त व्यवहारों के विना मित्र आदि सुख करने के योग्य होते हैं, इससे उक्त समस्त व्यवहार सब मनुष्यों को यथावत् मानना चाहिये॥11॥

 इस सूक्त में ईश्वर, सभा, सेना और शाला आदि के अधिपतियों के गुणों का वर्णन है। इससे इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥ यह एकसौ एकवां 101 सूक्त और तेरहवां 13 वर्ग समाप्त हुआ॥





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