क्या श्री राम मांस खाते थे या नहीं?



श्रीराम मांस खाते थे अथवा नहीं ?

यह विषय अत्यन्त विवादास्पद है । कुछ लोगों की धारणा है कि वे क्षत्रिय वे अत: मांस खाते थे, परन्तु हमारे विचार में यह धारणा अशुद्ध है । यहां हम रामायण के कुछ स्थलों पर विचार करेंगे । जब श्रीराम को वन-गमन की आज्ञा हुई तब वे अपनी माता कौसल्या से आज्ञा लेने के लिए राजप्रासाद मे आये । माता ने उन्हें बैठने के लिए आसन और खाने के लिए कुछ वस्तुएँ दीं, उस समय श्रीराम ने कहा -

चतुर्दश हि वर्षाणि वत्स्यामि विजले वने । 
मधुमूलफलैर्जीवन् हित्वा युनिवदामिषम् ॥ 
- अयो. 20.29-30

माता अब तो मुझे चौदह वर्ष तक घोर वन में वास करना पड़ेगा । अत: मैं आमिष भोजन को छोड़कर मुनिजन-कथित कन्द-मूल, फल आदि खाकर ही अपना जीवन-निर्वाह करूंगा ।

इस श्लोक में 'आामिष' शब्द को देखकर मांस-भक्षण करने वाले कहते हैं कि श्रीराम मांस-भक्षण करते थे तभी तो उन्होंने कहा - "मैं आमिष को छोड़कर कन्दमूल-फलों से निर्वाह करूंगा।" यदि इस श्लोक का ऐसा ही अर्थ माना जाय तो रामायण में आगे चलकर मांस-भक्षण के जितने प्रसंग आते हैं वे सब प्रक्षिप्त सिद्ध हो जाते हैं । फिर महलों में मांस खाने का प्रसंग सम्पूर्ण रामायण में कहीं भी नहीं है, अतः इस श्लोक से ही श्रीराम के मांसाहार का निषेध हो जाता है ।

कोश में आमिष का एक अर्थ 'प्रिय वा मनोहर वस्तु' भी है, अत: उपर्युक्त श्लोक का ठीक अर्थ यह होगा कि मैं मिष्ठान्न आदि प्रिय वा मनोहर वस्तुओं को छोड़कर मुनियों जैसा आहार करूंगा । यही अर्थ ठीक एवं श्रीराम की भावना के अनुकूल है । इसके लिए एक अकाट्य प्रमाण प्रस्तुत है । पंडित भगवद्दत्त जी द्वारा सम्पादित रामायण के पश्चिमोत्तरीय संस्करण में यह श्लोक इस प्रकार है -

स्वादूनि हित्सा भोज्यानि फलमूलकृताशनः ॥
- अयो. 20.21

यहाँ स्पष्ट ही स्वादु पदार्थों को छोड़कर फल-मूल खाने का वर्णन है। “छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्रम् ।" मूल के कट जाने पर वृक्ष में न शाखा ही उग सकती है और न पत्ते ही आ सकते हैं । इस श्लोक से तो श्रीराम के मांस-भक्षण की जड़ ही कट गई है ।

रामायण में सीताजी द्वारा गंगा पर सुरा के घड़े और मांस-युक्त भात चढ़ाने का वर्णन आता है, परन्तु यह प्रकरण वाममार्गियों द्वारा मिलाया गया है । सीताजी द्वारा गंगा पर शराब और मांस-युक्त भात की बलि देना सीताजी की भावनाओं के सर्वथा प्रतिकूल है । सीताजी वन जाने के लिए श्रीराम से प्रार्थना करते हुए कहती हैं -

फलमूलाशना नित्यं भविष्यामि न संशयः।
- अयो. 27.15

मैं वन में उत्पन्न फलों और मूलों को खाकर अपना निर्वाह कर लूंगी इसमें तनिक भी संशय नहीं है ।

पित्रा नियुक्ता भगवन् प्रवेक्ष्यामस्तपोवनम् ।
धर्ममेव चरिष्यामस्तत्र मूलफलाशना:।
- अयो. 54.16

जब श्रीराम महर्षि भरद्वाज के आश्रम में पहुँचे तो उन्होंने अपना परिचय देकर और वनवास की बात बताकर कहा -
भगवन् ! हम लोग पिता के आदेशानुसार तपोवन में प्रवेश करेंगे और वहां फलमूल खाकर धर्माचरण करेंगे ।
श्रीराम ने अपने मित्र गुह से भी कहा था -

कुशचीराजिनधरं फलमूलाशिनं च माम् ।
विद्धि प्राणिहितं धर्मे तापसं वनगोचरम् ।
- अयो. 50.44-45

मैं तो कुश, चीर और मृगचर्म धारण करता हूं और फल तथा कन्दमूल खाता हूं । आप मुझे पिता की आज्ञा से धर्म-पालन में सावधान एवं वन में विचरनेवाला तपस्वी समझें ।

श्रीराम की दो प्रतिज्ञाएँ प्रसिद्ध हैं। एक तो उन्होंने अपनी माता कैकेयी के समक्ष प्रकट की थी -

रामो द्विर्नाभिभाषते ।
- अयो. 18.30

राम दो प्रकार की बात नहीं करता, जो कहता है वही करता है ।

दूसरी प्रतिज्ञा उन्होंने सीताजी के समक्ष इस रूप में रक्खी थी -

अप्यहं जीवितं जह्यां त्वां वा सीते सलक्ष्मणम् ।
न तु प्रतिज्ञां संश्रृत्य ब्राह्मणेभ्यो विशेषत: ॥
- अर. 10.19

मुझे भले ही अपने प्राण त्यागने पड़ें अथवा लक्ष्मण सहित तुम्हें ही क्यों न छोड़ना पड़े, किन्तु मैं अपनी प्रतिज्ञा नहीं त्याग सकता, विशेषकर उस प्रतिज्ञा को जो ब्राह्मणों के सामने की जाये ।

श्रीराम ने फलमूल आदि खाने की प्रतिज्ञा न केवल अपनी माता और गुह के समक्ष की है अपितु महर्षि भरद्वाज के समक्ष भी अपनी प्रतिज्ञा को दोहराया है जो ब्राह्मण ही नहीं, ऋषि हैं, अतः स्पष्ट सिद्ध है कि श्रीराम मांस नहीं खाते थे ।

वन को चलते समय श्रीलक्ष्मण जी ने भी अपनी उपयोगिता बताते हुए कहा था -

आहरिष्यामि ते नित्यं मूलानि च फलानि च ।
वन्यानि यानि स्वाहार्हाणि तपस्विनाम् ॥
- अयो. 31.26

मैं आपके लिए कन्दमूल-फल और तपस्वियों के भोजन करने योग्य वन में उत्पन्न होनेवाले शाक-पात आदि वस्तुएँ नित्य ला दिया करूँगा ।

इस प्रकार श्रीराम आदि की प्रतिज्ञाओं को देखते हुए हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि वे मांस नहीं खाते थे । जहां उनके मांस खाने का उल्लेख है वह स्थल निश्चितरूप से प्रक्षेप है ।

(संदर्भ पुस्तक : मर्यादापुरुषोत्तम राम लेखक स्वामी जगदीश्वरानंद जी, पृ. 128-131)

प्रामाणिक आध्यात्मिक एवं प्रज्ञा कथाएं (भाग-4)

वेदांत, इतिहास, पुराण और संतों के प्रामाणिक प्रसंगों से संकलित २० दिव्य कथाएं।

बालक नचिकेता ने जब पिता के गलत दान का विरोध किया, तो पिता ने क्रोध में आकर कहा, "मैं तुम्हें मृत्यु को दान देता हूँ।" पिता के वचनों को सत्य करने के लिए नचिकेता सीधे यमराज के द्वार पर पहुँचे। यमराज वहां नहीं थे, इसलिए नचिकेता तीन दिनों तक भूखे-प्यासे द्वार पर बैठे रहे। लौटने पर यमराज ने उनकी निष्ठा देखकर तीन वरदान मांगने को कहा। नचिकेता ने तीसरे वरदान में मृत्यु के बाद आत्मा के रहस्य को जानने की इच्छा प्रकट की।

श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः।
श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद्वृणीते॥ 

अर्थ: संसार में श्रेय (कल्याणकारी मार्ग) और प्रेय (सांसारिक सुख) दोनों मनुष्य के पास आते हैं। बुद्धिमान व्यक्ति दोनों को परखकर श्रेय का चुनाव करता है, जबकि मंद बुद्धि वाला अपनी इंद्रियों के सुख के लिए प्रेय मार्ग चुनता है।

यमराज ने नचिकेता को सांसारिक प्रलोभन दिए, परंतु नचिकेता अडिग रहे। तब यमराज ने उन्हें आत्मज्ञान का सर्वोच्च उपदेश दिया।

📖 संदर्भ: कठोपनिषद (प्रथम अध्याय, द्वितीय वल्ली)

राजा ययाति को शुक्राचार्य के श्राप से असमय ही बुढ़ापा मिल गया था। भोगों की इच्छा अभी शांत नहीं हुई थी, इसलिए उन्होंने अपने पुत्र पुरु से उसकी युवावस्था उधार मांग ली। ययाति ने हजारों वर्षों तक युवा रहकर हर प्रकार के भौतिक और इंद्रिय सुखों को भोगा। परंतु अंत में उन्हें बोध हुआ कि भोगों को भोगने से वासना शांत नहीं होती, बल्कि आग में घी की तरह और भड़कती है।

न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति।
हविषा कृष्णवर्त्मव भूय एव अभिवर्धते॥

अर्थ: कामनाएं कभी भी भोगों को भोगने से शांत नहीं होती हैं। जैसे अग्नि में घी डालने से वह और अधिक धधकती है, वैसे ही कामनाएं भी भोगों से बढ़ती जाती हैं।

ययाति ने अपने पुत्र की जवानी वापस की और परम वैराग्य को धारण कर वन में तपस्या करने चले गए।

📖 संदर्भ: श्रीमद्भागवत पुराण (नवम स्कन्ध) / महाभारत

वृत्रासुर के आतंक से त्रस्त होकर जब देवता ब्रह्मा जी के पास गए, तो उन्होंने बताया कि नैमिषारण्य में तपस्या कर रहे महर्षि दधीचि की अस्थियों से यदि वज्र बनाया जाए, तभी उस असुर का वध संभव है। इंद्र संकोचवश दधीचि के पास पहुँचे। महर्षि दधीचि ने हंसते हुए कहा, "यह शरीर तो नश्वर है, यदि यह किसी के कल्याण के काम आ सके, तो इससे बड़ा सौभाग्य क्या होगा।" उन्होंने तुरंत समाधि लगाकर प्राण त्याग दिए।

परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः।
परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदं शरीरम्॥ 

अर्थ: परोपकार के लिए वृक्ष फल देते हैं, परोपकार के लिए नदियाँ बहती हैं, और परोपकार के लिए गायें दूध देती हैं। यह मानव शरीर भी केवल परोपकार के लिए ही है।

दधीचि के इस अद्वितीय त्याग के कारण ही देवराज इंद्र सृष्टि की रक्षा करने में सफल हो सके।

📖 संदर्भ: महाभारत (वन पर्व) / शिव पुराण

देवर्षि नारद को एक बार अभिमान हो गया कि उन्होंने कामदेव को जीत लिया है और उन पर माया का कोई असर नहीं हो सकता। भगवान विष्णु ने उनकी इस सूक्ष्म आसक्ति को दूर करने के लिए एक मायावी नगर का निर्माण किया। वहाँ की राजकुमारी के स्वयंवर में जाने के लिए नारद ने भगवान से उनका सुंदर रूप मांगा। भगवान ने उन्हें 'हरि' रूप दे दिया (हरि का एक अर्थ वानर भी होता है)। स्वयंवर में अपना उपहास देखकर नारद को अत्यंत क्रोध आया।

यावानयं विधातुश्च सर्गो मायात्मकः प्रभो।
तत्र कस्याप्यहंकारो न कर्तव्यो विपश्चिता॥ 

अर्थ: हे प्रभु! इस विधाता की जितनी भी यह सृष्टि है, वह सब माया से ओतप्रोत है। इसलिए यहाँ किसी भी बुद्धिमान व्यक्ति को अपने ज्ञान या वैराग्य का अहंकार नहीं करना चाहिए।

जब माया का पर्दा हटा, तो नारद जी को अपनी भूल का अहसास हुआ और वे भगवान के चरणों में गिर पड़े।

📖 संदर्भ: रामचरितमानस (बालकाण्ड)

एक बालक सत्यकाम अपनी माता जाबाला से अपना गोत्र पूछकर महर्षि गौतम के पास शिक्षा ग्रहण करने पहुँचा। गौतम ने पूछा, "पुत्र, तुम्हारा गोत्र क्या है?" सत्यकाम ने पूरी सरलता से कहा, "गुरुदेव, मेरी माता अनेक स्थानों पर सेविका का कार्य करती थीं, उन्हें मेरा गोत्र नहीं पता। मेरा नाम सत्यकाम है और मेरी माता का नाम जाबाला है, इसलिए मैं सत्यकाम जाबाल हूँ।"

नाब्राह्मणो विवक्तुमर्हति समिधं सौम्याहरोपत्वा नेष्ये न सत्यादगाः॥ 

अर्थ: (महर्षि गौतम ने कहा-) ऐसा स्पष्ट और कड़वा सत्य कोई गैर-ब्राह्मण नहीं बोल सकता। हे सौम्य! तुम सत्य से विचलित नहीं हुए, इसलिए मैं तुम्हें दीक्षा अवश्य दूंगा।

सत्यकाम की इस प्रामाणिकता ने उन्हें उपनिषद काल का सबसे महान ब्रह्मज्ञानी ऋषि बना दिया।

📖 संदर्भ: छान्दोग्य उपनिषद (चतुर्थ प्रपाठक, चतुर्थ खण्ड)

महाभारत युद्ध के अंत में भीष्म पितामह बाणों की शय्या पर लेटे हुए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहे थे। भगवान कृष्ण युधिष्ठिर को लेकर उनके पास पहुँचे ताकि वे राजनीति और अध्यात्म का अंतिम उपदेश ले सकें। युधिष्ठिर ने पूछा कि जब द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था, तब आपकी यह प्रज्ञा और धर्म कहाँ गए थे? भीष्म ने उत्तर दिया कि दुर्योधन का दूषित अन्न खाने से मेरी बुद्धि मलीन हो गई थी, परंतु बाणों के लगने से वह रक्त बह गया और अब मेरी चेतना शुद्ध है।

यादृशं भक्षयेदन्नं बुद्धिर्भवति तादृशी।
तादृशी जायते चिन्ता मनः शुद्धं च तादृशम्॥ 

अर्थ:** मनुष्य जैसा अन्न ग्रहण करता है, उसकी बुद्धि भी वैसी ही हो जाती है; वैसी ही उसकी सोच बनती है और मन भी वैसा ही शुद्ध या अशुद्ध होता है।

भीष्म पितामह का यह उपदेश जीवन में अन्न की शुद्धता और कर्म के प्रति पूरी तरह सतर्क रहने की प्रेरणा देता है।

📖 संदर्भ: महाभारत (शान्ति पर्व)

संत कबीरदास जी के पास कुछ कर्मकांडी पंडित आए और कहने लगे कि तुम नीची जाति के हो, तुम्हारे हाथ का पानी पीने से हमारा धर्म नष्ट हो जाएगा। कबीर जी ने एक मिट्टी के बर्तन में गंगाजल भरकर उनके सामने रख दिया और कहा, "पंडित जी, यह गंगाजल है, इसे ग्रहण करें।" पंडितों ने कहा कि अपवित्र बर्तन में रखने से गंगाजल भी अपवित्र हो गया। कबीर जी मुस्कुराए और बोले कि यदि मिट्टी का स्पर्श गंगा को अपवित्र कर सकता है, तो आपकी अंतरात्मा कैसे शुद्ध रह सकती है?

मनः पूतं समाचरेत् वाणीं पूतां वदेत्तथा।
सर्वं पूतं भवेत्तस्य यस्य भावो विशुद्ध्यति॥

अर्थ: मन को पवित्र करके आचरण करना चाहिए और पवित्र वाणी बोलनी चाहिए। जिसका आंतरिक भाव शुद्ध हो जाता है, उसके लिए संसार की हर वस्तु पवित्र हो जाती है।

यह कथा बाह्य आडंबरों पर चोट करती है और आंतरिक शुद्धता को ही अध्यात्म की मूल कसौटी बताती है।

संदर्भ: संत कबीर चरित्र / सुभाषित

महाभारत के वनवास काल में जब पांचों पांडव प्यास से व्याकुल होकर एक सरोवर के पास पहुँचे, तो वहां के स्वामी यक्ष ने शर्त रखी कि प्रश्नों का उत्तर दिए बिना कोई पानी नहीं पी सकता। चारों भाइयों ने अहंकारवश पानी पी लिया और मूर्छित हो गए। अंत में धर्मराज युधिष्ठिर आए। यक्ष ने पूछा, "इस संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है?" युधिष्ठिर ने उत्तर दिया कि रोज आँखों के सामने लोग मर रहे हैं, फिर भी जीने वाले सोचते हैं कि वे अमर रहेंगे, इससे बड़ा आश्चर्य क्या होगा।

अहन्यहनि भूतानि गच्छन्ति यममन्दिरम्।
शेषाः स्थिरत्वमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम्॥

अर्थ: प्रतिदिन अनगिनत प्राणी यमलोक (मृत्यु) को प्राप्त हो रहे हैं, फिर भी जो जीवित बचे हैं, वे यहाँ सदा रहने की इच्छा करते हैं। इससे बढ़कर संसार में और क्या आश्चर्य हो सकता है।

युधिष्ठिर के धर्मपूर्ण उत्तरों से प्रसन्न होकर यक्ष ने सभी पांडवों को पुनः जीवित कर दिया।

📖 संदर्भ: महाभारत (वन पर्व - यक्ष प्रश्न)

भगवान दत्तात्रेय ने जब एक मकड़ी को ध्यान से देखा, तो उन्होंने पाया कि मकड़ी अपने ही भीतर से लार निकालकर एक सुंदर जाले का निर्माण करती है, उसमें खेलती है और अंत में उस पूरे जाले को वापस अपने ही भीतर खींच लेती है। इस सामान्य घटना से दत्तात्रेय को ब्रह्मांड की उत्पत्ति और उसके प्रलय का महान सत्य समझ में आ गया।

यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति। तथाक्षरात् सम्भवतीह विश्वम्॥ 
  
अर्थ: जैसे मकड़ी जाले को स्वयं ही बनाती है और वापस निगल लेती है, और जैसे पृथ्वी से वनस्पतियां स्वतः उत्पन्न होती हैं, वैसे ही उस अविनाशी ब्रह्म से यह संपूर्ण विश्व प्रकट होता है और उसी में लीन हो जाता है।

यह प्रसंग अद्वैत वेदांत के इस सिद्धांत को प्रमाणित करता है कि ईश्वर इस जगत का निमित्त और उपादान दोनों ही कारण है।

📖 संदर्भ: मुण्डकोपनिषद (१.१.७) / श्रीमद्भागवत पुराण

एक रात राजा जनक ने सपना देखा कि उनका राज्य नष्ट हो गया है और वे भूख से तड़प रहे हैं। जैसे ही कोई उन्हें एक मुट्ठी चावल देता है, एक चील आकर उसे छीन लेती है। जनक भूख के मारे रोने लगे, तभी अचानक उनकी आँख खुल गई। उन्होंने देखा कि वे अपने भव्य महल में रेशमी बिस्तर पर लेटे हैं। वे असमंजस में पड़ गए कि वह सत्य था या यह सत्य है? अष्टावक्र ऋषि ने उत्तर दिया, "राजन! न वह सत्य था, न यह सत्य है; केवल तुम ही सत्य हो जो दोनों स्थितियों को देख रहे हो।"

जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु स्फुटतरा या संविदुज्जृम्भते।
सा साक्षित्वेन तिष्ठति सा एव अहमिति बोधः॥ 

अर्थ: जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति (गहरी नींद)—इन तीनों अवस्थाओं में जो चेतना स्पष्ट रूप से चमकती है और द्रष्टा रूप में स्थित रहती है, वही वास्तव में 'मैं' (आत्मा) हूँ।

इस अद्भुत प्रसंग ने राजा जनक को तीनों अवस्थाओं से परे तुरीय पद (आत्म-स्थिति) का बोध कराया।

📖 संदर्भ: अष्टावक्र गीता / योग वासिष्ठ

ऋग्वेद और मुण्डक उपनिषद में एक सुंदर रूपक आता है: एक ही पेड़ पर दो सुंदर पक्षी बैठे हैं जो सदा साथ रहते हैं। उनमें से एक पक्षी (जीवात्मा) पेड़ के मीठे और कड़वे फलों को स्वाद ले-लेकर खाता है और सुखी-दुःखी होता रहता है। दूसरा पक्षी (परमात्मा) बिना कुछ खाए केवल शांत भाव से नीचे बैठे उस पहले पक्षी को देखता रहता है। जब पहला पक्षी फल खाना छोड़कर अपने साथी की ओर देखता है, तो वह मुक्त हो जाता है।

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।

तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥ **अर्थ:** सदा साथ रहने वाले दो सखा पक्षी एक ही वृक्ष पर निवास करते हैं। उनमें से एक वृक्ष के फलों को खाता है, और दूसरा बिना खाए केवल देखता रहता है।

यह कथा हमें संसार के भोगों की आसक्ति को छोड़कर साक्षी भाव में स्थित होने का परम संकेत देती है।

📖 संदर्भ: ऋग्वेद (१.१६४.२०) / मुण्डकोपनिषद

भील पुत्र एकलव्य को जब गुरु द्रोणाचार्य ने अपनी सीमाओं के कारण धनुर्विद्या सिखाने से मना कर दिया, तो उसने निराश होने के बजाय गुरु की मिट्टी की प्रतिमा बनाई। उसने उस प्रतिमा को ही साक्षात गुरु मानकर गहन अभ्यास किया और संसार का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बन गया। जब द्रोणाचार्य ने गुरुदक्षिणा में उसके दाहिने हाथ का अंगूठा मांग लिया, तो एकलव्य ने बिना एक क्षण सोचे उसे हंसते हुए काट कर दे दिया।

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥ **अर्थ:** जितेंद्रिय और साधन-परायण श्रद्धावान मनुष्य ही वास्तविक ज्ञान को प्राप्त करता है; और ज्ञान प्राप्त करके वह बिना किसी विलंब के परम शांति को पा लेता है।

यह प्रसंग दर्शाता है कि ज्ञान किसी व्यक्ति की भौतिक उपस्थिति पर नहीं, बल्कि शिष्य की आंतरिक श्रद्धा और समर्पण पर निर्भर करता है।

📖 संदर्भ: महाभारत (आदि पर्व) / श्रीमद्भगवद्गीता (४.३९)

राजकुमारी देवहूति ने सब सुखों को छोड़कर तपस्वी कर्दम ऋषि से विवाह किया। उन्होंने वर्षों तक अत्यंत कठिन परिस्थितियों में पति की सेवा की। कर्दम ऋषि ने अपनी योगशक्ति से एक दिव्य विमान बनाया जिसमें संसार के सारे सुख मौजूद थे। देवहूति चकित रह गईं। तब कर्दम जी ने समझाया कि योग और तपस्या का फल संसार के किसी भी भौतिक ऐश्वर्य से कहीं अधिक शक्तिशाली होता है, परंतु वास्तविक आनंद तो इन सब से परे आत्मा में है।

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसंगिनाम्।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन्॥ **अर्थ:** ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि वह कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानी मनुष्यों की बुद्धि में भ्रम न पैदा करे, बल्कि स्वयं योगयुक्त होकर कर्म करते हुए उनसे भी वैसे ही श्रेष्ठ कर्म करवाए।

यह कथा आज के समय में पारिवारिक जिम्मेदारियों और आध्यात्मिक साधना के सुंदर संतुलन को सिखाती है।

📖 संदर्भ: श्रीमद्भागवत पुराण (तृतीय स्कन्ध)

राजा शिवि अपनी न्यायप्रियता और दयालुता के लिए प्रसिद्ध थे। एक दिन एक डरा हुआ कबूतर उनकी गोद में आकर छिप गया, जिसके पीछे एक भूखा बाज आ रहा था। बाज ने कहा, "राजन! यह कबूतर मेरा भोजन है, इसे मुझे सौंप दीजिए अन्यथा मैं भूखा मर जाऊंगा।" राजा शिवि ने कहा कि शरणागत की रक्षा करना मेरा धर्म है। कबूतर के वजन के बराबर राजा ने अपने ही शरीर का मांस तराजू पर काटना शुरू कर दिया।

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥ **अर्थ:** जो योगी सब भूतों में स्थित मुझ परमात्मा को एकीभाव से भजता है, वह सब प्रकार से व्यवहार करता हुआ भी मुझमें ही निवास करता है।

तराजू का पलड़ा तब तक नहीं बढ़ा जब तक राजा स्वयं उस पर नहीं बैठ गए। तब इंद्र और अग्नि प्रकट हुए और बोले कि वे केवल उनकी करुणा की परीक्षा ले रहे थे।

📖 संदर्भ: महाभारत (वन पर्व) / श्रीमद्भगवद्गीता (६.३१)

जब शुकदेव जी ज्ञान की अंतिम मुहर लगवाने राजा जनक के पास पहुँचे, तो जनक ने जानबूझकर उन्हें द्वार पर सात दिनों तक बिना किसी सत्कार के खड़ा रखा। शुकदेव के मन में कोई क्रोध नहीं आया। फिर उन्हें महल के भीतर ले जाकर अप्सराओं और मदिरा के बीच रखा गया, फिर भी उनका मन विचलित नहीं हुआ। अंत में जनक ने उन्हें एक लबालब भरा हुआ तेल का कटोरा दिया और कहा कि इसे लेकर पूरी मिथिला नगरी का चक्कर लगाओ, पर एक बूंद भी गिरनी नहीं चाहिए।

यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥ **अर्थ:** जिस प्रकार वायु रहित स्थान पर रखा हुआ दीपक कभी हिलता-डुलता नहीं है, एकाग्र चित्त वाले योगी के मन की स्थिति भी वैसी ही अचल हो जाती है।

शुकदेव जी लौट आए और तेल की एक बूंद भी नहीं गिरी क्योंकि उनका पूरा ध्यान केवल कटोरे पर था, बाहरी चकाचौंध पर नहीं। जनक ने कहा कि तुम पहले से ही पूर्ण ज्ञानी हो।

📖 संदर्भ: महाभारत (शान्ति पर्व) / श्रीमद्भगवद्गीता (६.१९)

दस्यु रत्नाकर जंगल में राहगीरों को लूटते थे। एक दिन उन्हें देवर्षि नारद मिले। रत्नाकर ने उन्हें लूटना चाहा, तो नारद ने पूछा, "तुम यह जो पाप कर रहे हो, क्या इसमें तुम्हारा परिवार भी हिस्सेदार बनेगा?" रत्नाकर ने घर जाकर पूछा, तो पत्नी और बच्चों ने साफ मना कर दिया कि पाप आपका है, हमारा नहीं। रत्नाकर की आंखें खुल गईं। वे नारद के चरणों में गिर गए। नारद ने उन्हें 'मरा-मरा' (उल्टा राम नाम) जपने को कहा, जिससे वे महर्षि वाल्मीकि बन गए।

उलटा नामु जपत जगु जाना। बाल्मीकि भए ब्रह्म समाना॥ 

अर्थ: उल्टा नाम (मरा-मरा) जपते-जपते संपूर्ण संसार गवाह बना कि डाकू वाल्मीकि साक्षात ब्रह्म के समान पवित्र महर्षि बन गए।

यह कथा हमें सिखाती है कि संगति और नाम-जप की शक्ति से बड़े से बड़ा पापी भी परम पावन संत बन सकता है।

📖 संदर्भ: रामचरितमानस (बालकाण्ड) / अध्यात्म रामायण

महर्षि याज्ञवल्क्य जब सन्यास लेने लगे, तो उन्होंने अपनी संपत्ति अपनी दो पत्नियों, कात्यायनी और मैत्रेयी में बांटनी चाही। विदुषी मैत्रेयी ने पूछा, "भगवन! यदि यह संपूर्ण पृथ्वी धन-दौलत से भर जाए और मुझे मिल जाए, तो क्या मैं अमर हो जाऊँगी?" याज्ञवल्क्य ने कहा, "नहीं, तुम्हारा जीवन भी धनवानों जैसा ही साधन संपन्न हो जाएगा, पर धन से अमृतत्व (मोक्ष) की कोई आशा नहीं है।"

येनाहं नामृता स्यां किमहमतेन कुर्याम्? यदेव भगवान् वेद तदेव मे ब्रूहीति॥ 

अर्थ: जिससे मैं अमर न हो सकूँ, उस धन-दौलत को लेकर मैं क्या करूँगी? हे भगवन! आप जो अमृतत्व का साधन जानते हैं, केवल वही मुझे बताइए।

मैत्रेयी के इस अद्भुत प्रश्न से प्रसन्न होकर याज्ञवल्क्य ने उन्हें आत्मा के प्रिय होने का परम रहस्य समझाया।

📖 संदर्भ: बृहदारण्यक उपनिषद (द्वितीय अध्याय, चतुर्थ ब्राह्मण)

वनवास के समय जब श्री राम गंगा पार करने लगे, तो केवट ने उनके पैर धोए बिना नाव पर बिठाने से मना कर दिया। उसने तर्क दिया कि आपके चरणों की धूल से पत्थर की अहिल्या नारी बन गई थी, कहीं मेरी लकड़ी की नाव उड़ गई तो मेरी आजीविका नष्ट हो जाएगी। प्रभु राम उसकी इस भोली चतुराई और अनन्य प्रेम को देखकर मुस्कुराए। नदी पार करने के बाद जब सीता जी ने मुद्रिका देनी चाही, तो केवट ने लेने से मना कर दिया कि हम दोनों एक ही बिरादरी के हैं—मैं गंगा पार कराता हूँ, आप भवसागर पार कराते हैं।

पद कमल धोइ चढ़ाई नाव न नाथ उतराई चहौ।
मोहि राम राउरि आन दसरथ सपथ सब साची कहौ॥ अर्थ:

 हे नाथ! मैं आपके चरण कमल धोकर ही नाव पर चढ़ाऊंगा, मुझे कोई उतराई नहीं चाहिए। मुझे आपकी और राजा दशरथ की सौगंध है, मैं बिल्कुल सच कह रहा हूँ।

यह प्रसंग प्रेम और भक्ति की उस प्रामाणिक अवस्था को दिखाता है जहाँ भक्त और भगवान के बीच का अंतर समाप्त हो जाता है।

📖 संदर्भ: रामचरितमानस (अयोध्याकाण्ड)

उपनिषदों का ऋषि परमात्मा से प्रार्थना करता है कि हे प्रभु! यह जो भौतिक संसार की चकाचौंध और सोने जैसा चमकीला पर्दा है, इसके पीछे वास्तविक सत्य (परमात्मा) छिपा हुआ है। मेरी बुद्धि इस बाहरी आकर्षण में फंस गई है। आप कृपा करके इस चमकीले सोने के ढक्कन को हटा दीजिए ताकि मैं उस परम सत्य का प्रत्यक्ष दर्शन कर सकूं।

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये॥ 

अर्थ:- सत्य का मुख सोने के समान चमकीले पात्र (आकर्षण) से ढका हुआ है। हे सर्वपोषक सूर्य देव! मुझ सत्यधर्मा को दर्शन देने के लिए आप उस आवरण को हटा दीजिए।

यह कथा संकेत करती है कि आधुनिक युग के भौतिक विज्ञान और तकनीकी आकर्षणों के पार जाकर ही हमें उस परम आत्म-तत्व की अनुभूति हो सकती है।

📖 संदर्भ: ईशावास्योपनिषद (श्लोक १५)

बृहदारण्यक उपनिषद के दिव्य संवाद के अंतिम भाग में महर्षि याज्ञवल्क्य राजा जनक को बताते हैं कि जैसे एक विशाल महामत्स्य (बड़ी मछली) नदी के दोनों किनारों पर बिना किसी आसक्ति के तैरती है, वैसे ही यह जीवात्मा स्वप्न और जाग्रत—दोनों अवस्थाओं के किनारों पर विचरती है। परंतु उसका वास्तविक घर सुषुप्ति और समाधि की वह गहरी स्थिति है जहाँ उसे कोई वासना और भय नहीं छू सकता।

तद्यथा महामत्स्य उभे कूले अनुसंचरति... एवमेवायं पुरुष एतावुभावन्तावनुसंचरति॥ 

अर्थ: जैसे एक बड़ी मछली नदी के दोनों किनारों पर बिना रुके घूमती है, वैसे ही यह दिव्य पुरुष (आत्मा) जाग्रत और स्वप्न—दोनों अवस्थाओं में बिना लिप्त हुए गमन करता है।

इस परम सत्य को जानकर राजा जनक पूर्णतः भयमुक्त हो गए। यह कथा आत्मा की निर्लिप्तता और उसकी शाश्वत स्वतंत्रता का सबसे बड़ा प्रमाण है।

📖 संदर्भ: बृहदारण्यक उपनिषद (चतुर्थ अध्याय, तृतीय ब्राह्मण)

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