प्रामाणिक आध्यात्मिक एवं प्रज्ञा कथाएं (भाग-4)
वेदांत, इतिहास, पुराण और संतों के प्रामाणिक प्रसंगों से संकलित २० दिव्य कथाएं।
बालक नचिकेता ने जब पिता के गलत दान का विरोध किया, तो पिता ने क्रोध में आकर कहा, "मैं तुम्हें मृत्यु को दान देता हूँ।" पिता के वचनों को सत्य करने के लिए नचिकेता सीधे यमराज के द्वार पर पहुँचे। यमराज वहां नहीं थे, इसलिए नचिकेता तीन दिनों तक भूखे-प्यासे द्वार पर बैठे रहे। लौटने पर यमराज ने उनकी निष्ठा देखकर तीन वरदान मांगने को कहा। नचिकेता ने तीसरे वरदान में मृत्यु के बाद आत्मा के रहस्य को जानने की इच्छा प्रकट की।
यमराज ने नचिकेता को सांसारिक प्रलोभन दिए, परंतु नचिकेता अडिग रहे। तब यमराज ने उन्हें आत्मज्ञान का सर्वोच्च उपदेश दिया।
राजा ययाति को शुक्राचार्य के श्राप से असमय ही बुढ़ापा मिल गया था। भोगों की इच्छा अभी शांत नहीं हुई थी, इसलिए उन्होंने अपने पुत्र पुरु से उसकी युवावस्था उधार मांग ली। ययाति ने हजारों वर्षों तक युवा रहकर हर प्रकार के भौतिक और इंद्रिय सुखों को भोगा। परंतु अंत में उन्हें बोध हुआ कि भोगों को भोगने से वासना शांत नहीं होती, बल्कि आग में घी की तरह और भड़कती है।
ययाति ने अपने पुत्र की जवानी वापस की और परम वैराग्य को धारण कर वन में तपस्या करने चले गए।
वृत्रासुर के आतंक से त्रस्त होकर जब देवता ब्रह्मा जी के पास गए, तो उन्होंने बताया कि नैमिषारण्य में तपस्या कर रहे महर्षि दधीचि की अस्थियों से यदि वज्र बनाया जाए, तभी उस असुर का वध संभव है। इंद्र संकोचवश दधीचि के पास पहुँचे। महर्षि दधीचि ने हंसते हुए कहा, "यह शरीर तो नश्वर है, यदि यह किसी के कल्याण के काम आ सके, तो इससे बड़ा सौभाग्य क्या होगा।" उन्होंने तुरंत समाधि लगाकर प्राण त्याग दिए।
दधीचि के इस अद्वितीय त्याग के कारण ही देवराज इंद्र सृष्टि की रक्षा करने में सफल हो सके।
देवर्षि नारद को एक बार अभिमान हो गया कि उन्होंने कामदेव को जीत लिया है और उन पर माया का कोई असर नहीं हो सकता। भगवान विष्णु ने उनकी इस सूक्ष्म आसक्ति को दूर करने के लिए एक मायावी नगर का निर्माण किया। वहाँ की राजकुमारी के स्वयंवर में जाने के लिए नारद ने भगवान से उनका सुंदर रूप मांगा। भगवान ने उन्हें 'हरि' रूप दे दिया (हरि का एक अर्थ वानर भी होता है)। स्वयंवर में अपना उपहास देखकर नारद को अत्यंत क्रोध आया।
जब माया का पर्दा हटा, तो नारद जी को अपनी भूल का अहसास हुआ और वे भगवान के चरणों में गिर पड़े।
एक बालक सत्यकाम अपनी माता जाबाला से अपना गोत्र पूछकर महर्षि गौतम के पास शिक्षा ग्रहण करने पहुँचा। गौतम ने पूछा, "पुत्र, तुम्हारा गोत्र क्या है?" सत्यकाम ने पूरी सरलता से कहा, "गुरुदेव, मेरी माता अनेक स्थानों पर सेविका का कार्य करती थीं, उन्हें मेरा गोत्र नहीं पता। मेरा नाम सत्यकाम है और मेरी माता का नाम जाबाला है, इसलिए मैं सत्यकाम जाबाल हूँ।"
सत्यकाम की इस प्रामाणिकता ने उन्हें उपनिषद काल का सबसे महान ब्रह्मज्ञानी ऋषि बना दिया।
महाभारत युद्ध के अंत में भीष्म पितामह बाणों की शय्या पर लेटे हुए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहे थे। भगवान कृष्ण युधिष्ठिर को लेकर उनके पास पहुँचे ताकि वे राजनीति और अध्यात्म का अंतिम उपदेश ले सकें। युधिष्ठिर ने पूछा कि जब द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था, तब आपकी यह प्रज्ञा और धर्म कहाँ गए थे? भीष्म ने उत्तर दिया कि दुर्योधन का दूषित अन्न खाने से मेरी बुद्धि मलीन हो गई थी, परंतु बाणों के लगने से वह रक्त बह गया और अब मेरी चेतना शुद्ध है।
भीष्म पितामह का यह उपदेश जीवन में अन्न की शुद्धता और कर्म के प्रति पूरी तरह सतर्क रहने की प्रेरणा देता है।
संत कबीरदास जी के पास कुछ कर्मकांडी पंडित आए और कहने लगे कि तुम नीची जाति के हो, तुम्हारे हाथ का पानी पीने से हमारा धर्म नष्ट हो जाएगा। कबीर जी ने एक मिट्टी के बर्तन में गंगाजल भरकर उनके सामने रख दिया और कहा, "पंडित जी, यह गंगाजल है, इसे ग्रहण करें।" पंडितों ने कहा कि अपवित्र बर्तन में रखने से गंगाजल भी अपवित्र हो गया। कबीर जी मुस्कुराए और बोले कि यदि मिट्टी का स्पर्श गंगा को अपवित्र कर सकता है, तो आपकी अंतरात्मा कैसे शुद्ध रह सकती है?
यह कथा बाह्य आडंबरों पर चोट करती है और आंतरिक शुद्धता को ही अध्यात्म की मूल कसौटी बताती है।
महाभारत के वनवास काल में जब पांचों पांडव प्यास से व्याकुल होकर एक सरोवर के पास पहुँचे, तो वहां के स्वामी यक्ष ने शर्त रखी कि प्रश्नों का उत्तर दिए बिना कोई पानी नहीं पी सकता। चारों भाइयों ने अहंकारवश पानी पी लिया और मूर्छित हो गए। अंत में धर्मराज युधिष्ठिर आए। यक्ष ने पूछा, "इस संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है?" युधिष्ठिर ने उत्तर दिया कि रोज आँखों के सामने लोग मर रहे हैं, फिर भी जीने वाले सोचते हैं कि वे अमर रहेंगे, इससे बड़ा आश्चर्य क्या होगा।
युधिष्ठिर के धर्मपूर्ण उत्तरों से प्रसन्न होकर यक्ष ने सभी पांडवों को पुनः जीवित कर दिया।
भगवान दत्तात्रेय ने जब एक मकड़ी को ध्यान से देखा, तो उन्होंने पाया कि मकड़ी अपने ही भीतर से लार निकालकर एक सुंदर जाले का निर्माण करती है, उसमें खेलती है और अंत में उस पूरे जाले को वापस अपने ही भीतर खींच लेती है। इस सामान्य घटना से दत्तात्रेय को ब्रह्मांड की उत्पत्ति और उसके प्रलय का महान सत्य समझ में आ गया।
यह प्रसंग अद्वैत वेदांत के इस सिद्धांत को प्रमाणित करता है कि ईश्वर इस जगत का निमित्त और उपादान दोनों ही कारण है।
एक रात राजा जनक ने सपना देखा कि उनका राज्य नष्ट हो गया है और वे भूख से तड़प रहे हैं। जैसे ही कोई उन्हें एक मुट्ठी चावल देता है, एक चील आकर उसे छीन लेती है। जनक भूख के मारे रोने लगे, तभी अचानक उनकी आँख खुल गई। उन्होंने देखा कि वे अपने भव्य महल में रेशमी बिस्तर पर लेटे हैं। वे असमंजस में पड़ गए कि वह सत्य था या यह सत्य है? अष्टावक्र ऋषि ने उत्तर दिया, "राजन! न वह सत्य था, न यह सत्य है; केवल तुम ही सत्य हो जो दोनों स्थितियों को देख रहे हो।"
इस अद्भुत प्रसंग ने राजा जनक को तीनों अवस्थाओं से परे तुरीय पद (आत्म-स्थिति) का बोध कराया।
ऋग्वेद और मुण्डक उपनिषद में एक सुंदर रूपक आता है: एक ही पेड़ पर दो सुंदर पक्षी बैठे हैं जो सदा साथ रहते हैं। उनमें से एक पक्षी (जीवात्मा) पेड़ के मीठे और कड़वे फलों को स्वाद ले-लेकर खाता है और सुखी-दुःखी होता रहता है। दूसरा पक्षी (परमात्मा) बिना कुछ खाए केवल शांत भाव से नीचे बैठे उस पहले पक्षी को देखता रहता है। जब पहला पक्षी फल खाना छोड़कर अपने साथी की ओर देखता है, तो वह मुक्त हो जाता है।
यह कथा हमें संसार के भोगों की आसक्ति को छोड़कर साक्षी भाव में स्थित होने का परम संकेत देती है।
भील पुत्र एकलव्य को जब गुरु द्रोणाचार्य ने अपनी सीमाओं के कारण धनुर्विद्या सिखाने से मना कर दिया, तो उसने निराश होने के बजाय गुरु की मिट्टी की प्रतिमा बनाई। उसने उस प्रतिमा को ही साक्षात गुरु मानकर गहन अभ्यास किया और संसार का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बन गया। जब द्रोणाचार्य ने गुरुदक्षिणा में उसके दाहिने हाथ का अंगूठा मांग लिया, तो एकलव्य ने बिना एक क्षण सोचे उसे हंसते हुए काट कर दे दिया।
यह प्रसंग दर्शाता है कि ज्ञान किसी व्यक्ति की भौतिक उपस्थिति पर नहीं, बल्कि शिष्य की आंतरिक श्रद्धा और समर्पण पर निर्भर करता है।
राजकुमारी देवहूति ने सब सुखों को छोड़कर तपस्वी कर्दम ऋषि से विवाह किया। उन्होंने वर्षों तक अत्यंत कठिन परिस्थितियों में पति की सेवा की। कर्दम ऋषि ने अपनी योगशक्ति से एक दिव्य विमान बनाया जिसमें संसार के सारे सुख मौजूद थे। देवहूति चकित रह गईं। तब कर्दम जी ने समझाया कि योग और तपस्या का फल संसार के किसी भी भौतिक ऐश्वर्य से कहीं अधिक शक्तिशाली होता है, परंतु वास्तविक आनंद तो इन सब से परे आत्मा में है।
यह कथा आज के समय में पारिवारिक जिम्मेदारियों और आध्यात्मिक साधना के सुंदर संतुलन को सिखाती है।
राजा शिवि अपनी न्यायप्रियता और दयालुता के लिए प्रसिद्ध थे। एक दिन एक डरा हुआ कबूतर उनकी गोद में आकर छिप गया, जिसके पीछे एक भूखा बाज आ रहा था। बाज ने कहा, "राजन! यह कबूतर मेरा भोजन है, इसे मुझे सौंप दीजिए अन्यथा मैं भूखा मर जाऊंगा।" राजा शिवि ने कहा कि शरणागत की रक्षा करना मेरा धर्म है। कबूतर के वजन के बराबर राजा ने अपने ही शरीर का मांस तराजू पर काटना शुरू कर दिया।
तराजू का पलड़ा तब तक नहीं बढ़ा जब तक राजा स्वयं उस पर नहीं बैठ गए। तब इंद्र और अग्नि प्रकट हुए और बोले कि वे केवल उनकी करुणा की परीक्षा ले रहे थे।
जब शुकदेव जी ज्ञान की अंतिम मुहर लगवाने राजा जनक के पास पहुँचे, तो जनक ने जानबूझकर उन्हें द्वार पर सात दिनों तक बिना किसी सत्कार के खड़ा रखा। शुकदेव के मन में कोई क्रोध नहीं आया। फिर उन्हें महल के भीतर ले जाकर अप्सराओं और मदिरा के बीच रखा गया, फिर भी उनका मन विचलित नहीं हुआ। अंत में जनक ने उन्हें एक लबालब भरा हुआ तेल का कटोरा दिया और कहा कि इसे लेकर पूरी मिथिला नगरी का चक्कर लगाओ, पर एक बूंद भी गिरनी नहीं चाहिए।
शुकदेव जी लौट आए और तेल की एक बूंद भी नहीं गिरी क्योंकि उनका पूरा ध्यान केवल कटोरे पर था, बाहरी चकाचौंध पर नहीं। जनक ने कहा कि तुम पहले से ही पूर्ण ज्ञानी हो।
दस्यु रत्नाकर जंगल में राहगीरों को लूटते थे। एक दिन उन्हें देवर्षि नारद मिले। रत्नाकर ने उन्हें लूटना चाहा, तो नारद ने पूछा, "तुम यह जो पाप कर रहे हो, क्या इसमें तुम्हारा परिवार भी हिस्सेदार बनेगा?" रत्नाकर ने घर जाकर पूछा, तो पत्नी और बच्चों ने साफ मना कर दिया कि पाप आपका है, हमारा नहीं। रत्नाकर की आंखें खुल गईं। वे नारद के चरणों में गिर गए। नारद ने उन्हें 'मरा-मरा' (उल्टा राम नाम) जपने को कहा, जिससे वे महर्षि वाल्मीकि बन गए।
यह कथा हमें सिखाती है कि संगति और नाम-जप की शक्ति से बड़े से बड़ा पापी भी परम पावन संत बन सकता है।
महर्षि याज्ञवल्क्य जब सन्यास लेने लगे, तो उन्होंने अपनी संपत्ति अपनी दो पत्नियों, कात्यायनी और मैत्रेयी में बांटनी चाही। विदुषी मैत्रेयी ने पूछा, "भगवन! यदि यह संपूर्ण पृथ्वी धन-दौलत से भर जाए और मुझे मिल जाए, तो क्या मैं अमर हो जाऊँगी?" याज्ञवल्क्य ने कहा, "नहीं, तुम्हारा जीवन भी धनवानों जैसा ही साधन संपन्न हो जाएगा, पर धन से अमृतत्व (मोक्ष) की कोई आशा नहीं है।"
मैत्रेयी के इस अद्भुत प्रश्न से प्रसन्न होकर याज्ञवल्क्य ने उन्हें आत्मा के प्रिय होने का परम रहस्य समझाया।
वनवास के समय जब श्री राम गंगा पार करने लगे, तो केवट ने उनके पैर धोए बिना नाव पर बिठाने से मना कर दिया। उसने तर्क दिया कि आपके चरणों की धूल से पत्थर की अहिल्या नारी बन गई थी, कहीं मेरी लकड़ी की नाव उड़ गई तो मेरी आजीविका नष्ट हो जाएगी। प्रभु राम उसकी इस भोली चतुराई और अनन्य प्रेम को देखकर मुस्कुराए। नदी पार करने के बाद जब सीता जी ने मुद्रिका देनी चाही, तो केवट ने लेने से मना कर दिया कि हम दोनों एक ही बिरादरी के हैं—मैं गंगा पार कराता हूँ, आप भवसागर पार कराते हैं।
यह प्रसंग प्रेम और भक्ति की उस प्रामाणिक अवस्था को दिखाता है जहाँ भक्त और भगवान के बीच का अंतर समाप्त हो जाता है।
उपनिषदों का ऋषि परमात्मा से प्रार्थना करता है कि हे प्रभु! यह जो भौतिक संसार की चकाचौंध और सोने जैसा चमकीला पर्दा है, इसके पीछे वास्तविक सत्य (परमात्मा) छिपा हुआ है। मेरी बुद्धि इस बाहरी आकर्षण में फंस गई है। आप कृपा करके इस चमकीले सोने के ढक्कन को हटा दीजिए ताकि मैं उस परम सत्य का प्रत्यक्ष दर्शन कर सकूं।
यह कथा संकेत करती है कि आधुनिक युग के भौतिक विज्ञान और तकनीकी आकर्षणों के पार जाकर ही हमें उस परम आत्म-तत्व की अनुभूति हो सकती है।
बृहदारण्यक उपनिषद के दिव्य संवाद के अंतिम भाग में महर्षि याज्ञवल्क्य राजा जनक को बताते हैं कि जैसे एक विशाल महामत्स्य (बड़ी मछली) नदी के दोनों किनारों पर बिना किसी आसक्ति के तैरती है, वैसे ही यह जीवात्मा स्वप्न और जाग्रत—दोनों अवस्थाओं के किनारों पर विचरती है। परंतु उसका वास्तविक घर सुषुप्ति और समाधि की वह गहरी स्थिति है जहाँ उसे कोई वासना और भय नहीं छू सकता।
इस परम सत्य को जानकर राजा जनक पूर्णतः भयमुक्त हो गए। यह कथा आत्मा की निर्लिप्तता और उसकी शाश्वत स्वतंत्रता का सबसे बड़ा प्रमाण है।

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