ज्ञान स्वरूप है ईश्वर परमात्मा, ज्ञान और प्रकाश के स्रोत

English version is at the end🙏

     वह अग्नि प्रभु पर-अवर ऋषियों से स्तुत्य है।

प्राचीन और अर्वाचीन सभी ऋषियों के द्वारा स्तुत्य है-- पूज्य है या विद्या की दृष्टि से प्राचीन और नवीन अर्थात् गुरु और शिष्य सभी के द्वारा स्तुति-प्रार्थना और उपासना करने योग्य है । क्योंकि स्तुति को प्राप्त हुआ- हुआ वह परमेश्वर (इह देवान् आवक्षति) इस संसार में हमें उपासकों,सूर्य, चन्द्र, वायु आदि दिव्य देवों को प्राप्त करता है वह इस मानव जीवन में हमें दिव्या गुना को प्राप्त कराता है। 

इस मन्त्र में बताया गया है कि हम उस प्रकाश स्वरूप प्रभु की उपासना क्यों करेंक्ष? क्योंकि वह ज्ञानस्वरूप प्रभु प्रत्येक युग के पुराने और नए पहले और अब के सभी ऋषि,मुनि, ज्ञानी, ध्यानी, गुरु और शिष्यों, पिता और पुत्रों आदि आदि के द्वारा सदा पूजनीय रहा है और होगा। और फिर उसी की कृपा से हमें इस जगत में इन सूर्य, चन्द्र, वायु आदि देवों की प्राप्ति होती है या उसी की अनुकम्पा से हमें दिव्य गुण,कर्म , स्वभावों की प्राप्ति होती है। 
         ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌                वैदिक मन्त्र
अग्नि:पूर्वाभिर्ऋषि भिरिड्यो नूतनैरुत। 
स देवॉं एह वक्षति।। ऋग्वेद 1.1.2
        ‌‌        
ज्ञान स्वरूप है ईश्वर 
करे ज्ञान पथ पर अग्रसर 
देवों में दिव्यता लाये 
जो बनाते मानव हितकर ।। 
ज्ञान स्वरूप...... 

सूर्य, चन्द्र, वायु रूप में 
देवों का दर्शन दिखाएं 
मानव जीवन में हमको 
उपलब्ध सद्गुण कराए 
जो है उपासक दिव्य रूप
प्राप्त कराते जगदीश्वर।। 
ज्ञान स्वरूप...... 

गुरु शिष्य सबके द्वारा 
पूजनीय ईश्वर कहलाए 
स्तुति प्रार्थना उपासना से 
देव उपास्य बन जाए 
नूतन- पुरातन ऋषियों से 
पूजे जाते परमेश्वर ऋ। 
ज्ञान स्वरूप......
                 ‌        शब्दार्थ:-
अग्रसर =आगे ही आगे होना
उपलब्ध= प्राप्त होना
नूतन= नया
पुरातन= पुराना, पहले का


‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌                vaidik mantra
agni:poorvaabhirrshi bhiridyo nootanairut. 
sa devon eh vakshati.. rigved 1.1.2
        ‌‌        

    Vaidik Bhajan👇

gyaan svaroop hai eeshvar 
kare gyaan path par agrasar 
devon mein divyataa laaye 
jo banaate maanav hitakar .. 
gyaan svaroop...... 

soorya, chandra, vaayu roop mein 
devon ka darshan dikhaayen 
maanav jeevan mein hamako 
upalabdha sadgun karaaye 
jo hai upaasak divya roop
praapt karaate jagadeeshvar.. 
gyaan svaroop...... 

guru shishya sabake dvaaraa 
poojaneeya eeshvar kahalaaye 
stuti praarthanaa upaasanaa se 
dev upaasya ban jaaye 
nootan- puraatan rishiyon se 
pooje jaate parameshvar  
gyaan svaroop......

‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌Meaning of words:-

Agrasar = to be ahead

Availd = to be attained

Nutan = new

Puratan = old, earlier

Meaning of bhajan👇

           God is the form of knowledge

Makes us move forward on the path of knowledge

Brings divinity in gods

Who makes humans beneficial.

 Knowledge form......

Shows the vision of Gods in the form of Sun, Moon and Air

Make us attain the good qualities in human life

The worshipper gets the divine form

O Jagadishwar.

Knowledge form......

Guru and disciple all

Called God worshipable

By praise, prayer and worship

God becomes worshipable

God is worshiped by new and old sages.

Knowledge form......

Swaadhyaay(self study) 👇

 That Agni Prabhu is praised by all the sages, ancient and modern. He is worthy of worship or from the viewpoint of knowledge, he is worthy of praise, prayer and worship by all, ancient and new, i.e. Guru and disciple. Because that God (Iha Devan Aavakshati) who has received praise, gives us divine gods like worshippers, Sun, Moon, Air etc. in this world. He gives us divine qualities in this human life. 

This mantra tells us why we should worship that God in the form of light. Because that God in the form of knowledge has always been and will always be worshipped by all the sages, munis, knowledgeable people, meditators, Gurus and disciples, fathers and sons etc. of every era, old and new, past and present.  And then by his grace we get these gods like Sun, Moon, Wind etc. in this world or by his mercy we get divine qualities, deeds, nature. 
‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌ 

ऋग्वेद 1.1.2 मंत्र

मंत्र:

अग्निः पूर्वेभिरृषिभिरीड्यो नूतनैरुत।
स देवान् एह वक्षति॥

— ऋग्वेद 1.1.2

पदच्छेद

  • अग्निः = अग्नि, परम प्रकाशक, ज्ञानस्वरूप ईश्वर अथवा यज्ञाग्नि
  • पूर्वेभिः ऋषिभिः = प्राचीन ऋषियों द्वारा
  • ईड्यः = स्तुति करने योग्य, पूजनीय
  • नूतनैः उत = तथा वर्तमान (नवीन) विद्वानों द्वारा भी
  • सः = वह
  • देवान् = देवों को, अर्थात् विद्वानों, दिव्य गुणों अथवा प्रकाशमय शक्तियों को
  • एह = यहाँ, इस स्थान पर
  • वक्षति = लाता है, पहुँचाता है

भावार्थ

जिस अग्नि (परमात्मा, ज्ञान और प्रकाश के स्रोत) की स्तुति प्राचीन ऋषियों ने की थी और जिसकी उपासना आज के विद्वान भी करते हैं, वही अग्नि (ईश्वर) मनुष्यों को दिव्य गुणों, श्रेष्ठ विद्वानों और कल्याणकारी शक्तियों से जोड़ता है तथा उन्हें अपने समीप लाता है।

वैदिक दृष्टि से व्याख्या

ऋग्वेद का यह दूसरा मंत्र बताता है कि सत्य कभी पुराना नहीं होता। जो तत्व प्राचीन ऋषियों के लिए पूजनीय था, वही आज भी पूजनीय है। वेद किसी व्यक्ति-विशेष की नहीं, बल्कि सनातन सत्य की घोषणा करता है।

यहाँ "अग्नि" का अर्थ केवल भौतिक अग्नि नहीं है, बल्कि—

  • ज्ञान का प्रकाश,
  • अज्ञान का नाशक,
  • यज्ञ और सद्कर्मों का प्रेरक,
  • तथा परमात्मा का तेजस्वी स्वरूप

भी है।

जैसे अग्नि अंधकार को दूर करती है, वैसे ही ईश्वर और सत्यज्ञान मनुष्य के जीवन से अज्ञान, भय और दुःख को दूर करते हैं।

गुरु और गुरुडम के संदर्भ में

इस मंत्र का एक महत्वपूर्ण संदेश यह भी है कि सच्चा गुरु वह है जो स्वयं अग्नि अर्थात् ज्ञान, सत्य और ईश्वर की ओर ले जाए। यदि कोई व्यक्ति स्वयं को ही अंतिम लक्ष्य बना दे, अपने व्यक्तित्व की पूजा करवाए, तो वह वैदिक गुरु नहीं बल्कि गुरुडम का प्रतिनिधि है।

ऋषियों ने अग्नि की स्तुति की, किसी व्यक्ति-पूजा की नहीं। इसलिए वैदिक परम्परा में श्रद्धा का केन्द्र सत्य, वेद, ईश्वर और ज्ञान हैं; व्यक्ति केवल मार्गदर्शक है।

जीवनोपयोगी शिक्षा

  1. प्राचीन ज्ञान का सम्मान करें, परन्तु अन्धानुकरण न करें।
  2. सत्य वही है जो काल के परिवर्तन से नहीं बदलता।
  3. ज्ञानरूपी अग्नि को अपने जीवन में प्रज्वलित रखें।
  4. ऐसे गुरु का अनुसरण करें जो ईश्वर और सत्य की ओर ले जाए।
  5. सद्गुणों और विद्वानों की संगति प्राप्त करना ही वास्तविक आध्यात्मिक उन्नति है।

निष्कर्ष

ऋग्वेद का यह मंत्र घोषणा करता है कि जो सत्य प्राचीन ऋषियों द्वारा स्वीकार किया गया था, वही आज भी उतना ही प्रासंगिक है। ज्ञानरूपी अग्नि ही मनुष्य को देवत्व, सद्गुण और परम कल्याण की ओर ले जाती है। अतः हमें व्यक्ति-पूजा नहीं, बल्कि सत्य, ज्ञान और ईश्वर की उपासना करनी चाहिए। यही इस मंत्र का शाश्वत संदेश है।


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