ऐतिहासिक दस्तावेज़: आज़ादी के समय भारत की १३०+ ब्राह्मण रियासतें और जमींदारियाँ

ऐतिहासिक दस्तावेज़: आज़ादी के समय भारत की १३०+ ब्राह्मण रियासतें और जमींदारियाँ

शासक और भूस्वामी के रूप में ब्राह्मणों का भूला हुआ इतिहास एवं उपजातीय विभाजन का दार्शनिक विश्लेषण

प्रस्तावना: इतिहास के पन्नों से लुप्त एक कड़वा और गौरवशाली सच

भारतीय इतिहास की एक विडंबना रही है कि आधुनिक काल में ब्राह्मण समाज को केवल 'घाट के पंडों', 'भिक्षाटन' या केवल 'कर्मकांड' तक सीमित करके देखने का एक षड्यंत्रकारी प्रयास किया गया। किंतु ऐतिहासिक और प्रामाणिक तथ्य इसके सर्वथा विपरीत हैं। स्वतंत्रता के समय भारत में १३० से अधिक बड़ी ब्राह्मण रियासतें विद्यमान थीं। इसके अतिरिक्त हजारों की संख्या में ऐसी छोटी-छोटी जमींदारियां, तालुकदारियां और जागीरें थीं, जिनका इतिहास मुख्यधारा के दस्तावेजों में दर्ज ही नहीं हो पाया। (ध्यान रहे कि इस प्रारंभिक सूची में भूमिहार और त्यागी समाज की विशाल रियासतें अभी सम्मिलित नहीं की गई हैं)।

यह जानकारी किस अज्ञात शोधकर्ता ने, किस उद्देश्य से जुटाई—यह भले ही आज रहस्य हो, परंतु यह हमें एक बड़े सच से रूबरू कराती है। हरिद्वार, काशी या प्रयागराज के घाटों पर जो पंडे (तीर्थ पुरोहित) बैठते हैं, उनके पास बही-खातों के रूप में 'सजरा' मौजूद है, जिसे प्राविधिक भाषा में 'पांज' (लेजर) कहा जाता है। इसमें ३०० से ५०० वर्ष पुराना संपूर्ण हिंदू समाज की वंशावलियों का प्रामाणिक लिखित लेखा-जोखा है, जो आज के डिजिटल डेटाबेस को भी मात देता है।

"इस वृहद सूची को संकलित करते समय एक विस्मयकारी और पीड़ादायक यथार्थ सामने आता है—वह है ब्राह्मणों का सदियों पुराना उपजातीय विभाजन। सरयूपारीण, कान्यकुब्ज, मैथिल, चितपावन, देशस्थ, गौड़, सनाढ्य जैसी सैकड़ों उपजातियों और उपनामों में बंटा यह समाज आज कुछ प्रबुद्ध जनों के प्रयासों से भले ही एक होने की जुगत में हो, परंतु इतिहास गवाह है कि ब्राह्मण आज से नहीं बल्कि सदियों से आंतरिक रूप से बंटा हुआ है।"
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय ४, श्लोक १३)
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥
वैदिक सिद्धांत: परमपिता परमेश्वर ने वर्ण व्यवस्था का निर्माण 'गुण और कर्म' के वैज्ञानिक विभाजन के आधार पर किया था, न कि जन्म या संकीर्ण उपजातियों के आधार पर। जब समाज ने गुण-कर्म को छोड़कर जन्म आधारित ऊंच-नीच और आंतरिक उपजातियों का पाखंड खड़ा किया, तभी से समाज का पतन और विभाजन प्रारंभ हुआ।

ऐतिहासिक सूची: भारत की प्रमुख ब्राह्मण रियासतें, तालुकदारियाँ एवं जमींदारियाँ

नीचे भारत के विभिन्न राज्यों में फैली उन प्रमुख रियासतों और जमींदारियों की सूची दी जा रही है जो स्वतंत्रता के समय अस्तित्व में थीं। यदि इस सूची में आपकी शाखा या उपनाम अछूता है, तो अन्वेषण कीजिए कि इतिहास के कालचक्र में आपकी जड़ें कहाँ छूट गईं:

क्र.सं. रियासत / एस्टेट / जमींदारी का नाम वंश / उपनाम ब्राह्मण शाखा (वर्ग)
उत्तर प्रदेश एवं मध्य भारत क्षेत्र
अयोध्या संपदापाठकसकलद्वीपी
असदामऊ (बाराबंकी) तालुकदारीपाण्डेयकान्यकुब्ज
मलाओ पांडे (गोरखपुर)पांडेसरयूपारीण
बरेली मिश्र संपदामिश्रकान्यकुब्ज
सिसेंडी ब्राह्मण एस्टेट (लखनऊ)तिवारीकान्यकुब्ज
चेतिया इस्टेट (सिद्धार्थनगर)तिवारीसरयूपारीण
हरदोई रियासतपाण्डेयकान्यकुब्ज
चौबे जागीर (पहराज, पालदेव, तरांव, भैसुंडा, कामता रजौला)चौबेकान्यकुब्ज
जालौन एस्टेट-देशस्थ
१०जौनपुर एस्टेटदुबेकान्यकुब्ज
११धानेपुर इस्टेट (गोंडा - सिंघा चंदा, अकबरपुर सहित)पांडेसरयूपारीण
१२बंसी एस्टेट (सिद्धार्थनगर)मिश्रकान्यकुब्ज
१३तिरोहा इस्टेट (बुन्देलखण्ड)अवस्थीकान्यकुब्ज
१४झाँसी एस्टेट-खराडे
१५नहरिया एस्टेट (बस्ती)पांडेसरयूपारीण
१६शाहजहाँपुर की कोठी (जमींदारी)-कान्यकुब्ज
१७जमुही इस्टेट (सिद्धार्थनगर)त्रिपाठीकान्यकुब्ज
१८महराजगंज रामपुर एस्टेटतिवारीसरयूपारीण
१९इटावा भरथना इस्टेटशुक्लकान्यकुब्ज
२०पीलीभीत बीसलपुर जमींदारीदुबेकान्यकुब्ज
२१उन्नाव करदहा एस्टेटबाजपेयीकान्यकुब्ज
२२डभौरा रियासतदीक्षितकान्यकुब्ज
२३मैनपुरी भोंगांव जमींदारी इस्टेटपाण्डेयकान्यकुब्ज
२४दत्तनागर राजपाण्डेयसरयूपारीण
२५जगन्दिसपुर राज-कान्यकुब्ज
२६हिरंगौ राजपाण्डेयकान्यकुब्ज
२७बिशनगढ़ एस्टेट (कन्नौज से अयोध्या)तिवारीकान्यकुब्ज
२८प्रयागराज जमींदारी संपदापाण्डेयसरयूपारीण
२९गोरखपुर दुबे जमींदारीदुबेसरयूपारीण
३०त्रिवेदी संपदा (बाराबंकी)त्रिवेदीकान्यकुब्ज
३१मुरादाबाद संपदाचौबेकान्यकुब्ज
३२जाजमऊ रियासत (कानपुर)तिवारीकान्यकुब्ज
३३गाजीपुर जमींदारी रियासतपांडेसरयूपारीण
३४खैराबाद रियासत (हरदोई, सीतापुर, लखीमपुर)त्रिवेदीकान्यकुब्ज
३५आजमगढ़ संपदापांडेयकान्यकुब्ज
३६बलिया रेवती एस्टेटपांडेकान्यकुब्ज
३७فतेहपुर जमींदारीदुबेकान्यकुब्ज
३८राजगढ़ (गोरखपुर) जमींदारीतिवारीसरयूपारीण
३९बगदार एस्टेटपांडेसरयूपारीण
४०प्रतापगढ़ जमींदारी समूहपांडेय, शुक्ल, मिश्र, उपाध्यायमिश्रित
४१मनैन राज-सरयूपारीण
४२पोखरा राज-सरयूपारीण
४३बरहामपुर राज-सरयूपारीण
४४वेदभूम राज-कान्यकुब्ज
४५खानगाह राज-कश्मीरी पंडित
४६गोविंदपुर राज-गौड़
४७घसौली राज-गौड़
४८डबका राज-गौड़
४९खानसूली राज-सारस्वत
५०राज शेखपुरा-गौड़
५१राज सदियापुर-गौड़
५२राज रतुपुर-कान्यकुब्ज
५३राज तिठौर-नागर
५४राज मुराहां / मुरहरि-कान्यकुब्ज
५५राज तराई-सरयूपारीण
पश्चिम बंगाल क्षेत्र
५६नादिया राज-कुलीन कान्यकुब्ज
५७नटोरे राज-कुलीन कान्यकुब्ज
५८गंगटिया राज-कुलीन कान्यकुब्ज
५९गोबरदंगा राज-कुलीन कान्यकुब्ज
६०बलिहार जमींदारी-कुलीन कान्यकुब्ज
६१भुकैलाश राज-कुलीन कान्यकुब्ज
६२सेरामपुर राज-कुलीन कान्यकुब्ज
६३राजाओरी एस्टेट-कुलीन कान्यकुब्ज
६४राजशाही राज-कुलीन कान्यकुब्ज
६५महिषादल जमींदारी-कान्यकुब्ज
६६जनई राज-कुलीन कान्यकुब्ज
६७दीघापतिया राज-कुलीन कान्यकुब्ज
६८मुक्तागाचा राज-कुलीन कान्यकुब्ज
६९हेतमपुर राज-कुलीन कान्यकुब्ज
७०अमादपुर जमींदारी-कुलीन कान्यकुब्ज
७१कलासकाठी जमींदारी-कुलीन कान्यकुब्ज
७२भावल एस्टेट-कुलीन कान्यकुब्ज
७३चंचल राज-कुलीन कान्यकुब्ज
७४रौदौली राज-कुलीन कान्यकुब्ज
७५गरिया राजबाड़ी-कुलीन कान्यकुब्ज
७६मानकर रंगमहल राज-कान्यकुब्ज
बिहार क्षेत्र
७७दरभंगा राज-मैथिल ब्राह्मण
७८बनैली राज-मैथिल ब्राह्मण
७९सुरसंड राज-मैथिल ब्राह्मण
८०सिमरांव राज-मैथिल ब्राह्मण
८१पाकुड़ गोकुलपुर राजबाड़ी जमींदारीपांडेकान्यकुब्ज
८२लोहदगा राज-कुलीन कान्यकुब्ज
८३कन्हौली राजशुक्लसरयूपारीण / कान्यकुब्ज
उड़ीसा, मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ क्षेत्र
८४सिमलापाल राज-उत्कल ब्राह्मण
८५बौध राज-उत्कल ब्राह्मण
८६गौरिहार एस्टेटतिवारीकान्यकुब्ज
८७शुक्ल रियासत (नरसिंहपुर, जबलपुर)शुक्लसरयूपारीण
८८चित्रकूट संपदा (सतना)-कान्यकुब्ज
८९धना रियासत-सरयूपारीण
९०बोरधा रियासत-कान्यकुब्ज
९१कसडोल रियासत (रायपुर, बलौदा बाजार)-कान्यकुब्ज
९२बैतूल शाहपुर रियासत-कान्यकुब्ज
९३सिवनी जमींदारियाँ (दो एस्टेट्स)-कान्यकुब्ज एवं सनाढ्य
९४छुईखदान रियासत-बैरागी (वैष्णव)
९५नांदगांव रियासत-बैरागी (वैष्णव)
९६दुर्ग जमींदारी-मिश्रित
९७बिलासपुर जमींदारी समूहपांडेय, त्रिपाठीसरयूपारीण
९८भलेरा रियासतदुबेकान्यकुब्ज
९९मंडला रियासत समूहत्रिपाठी, ओझा, बाजपेयी, जमादारकान्यकुब्ज
१००दमोह जमींदारी-मिश्रित
१०१नरसिंहपुर एस्टेट-जमींदारी
महाराष्ट्र एवं दक्षिण भारत क्षेत्र
१०२भोर संपदा-देशस्थ
१०३इचलकरंजी संपदा-चितपावन
१०४जामखंडी संपदा-चितपावन
१०५गुरुद्वारा संपदा-चितपावन
१०६येलंदूर जागीर-माधव
१०७विशालगढ़ संपदा-देशस्थ
१०८सांगली संपदा-देशस्थ
१०९औंध संपदा-देशस्थ
११०रामदुर्ग एस्टेट्स-चितपावन
१११अर्नी एस्टेट्स-देशस्थ
११२मिराज एस्टेट्स-चितपावन
११३भंडारा एस्टेट्सपांडेकान्यकुब्ज
११४पोलावरम राज-नियोगी तेलुगु
११५चिलकलुरिपेट राज-देशस्थ
११६सेटेनापल्ले राज-देशस्थ
११७लक्कवरम राज-नियोगी तेलुगू
ऋग्वेद (मण्डल १०, सूक्त १९१, मंत्र २)
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम् ।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते ॥
वैदिक संदेश (संगठन सूक्त): तुम सब एक साथ चलो (संगठित रहो), एक स्वर में बोलो, और तुम्हारे मन एक समान होकर ज्ञान को ग्रहण करें। जिस प्रकार प्राचीन काल में देवगण संगठित होकर अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते थे, उसी प्रकार तुम भी अज्ञान और भेदों को त्याग कर समाज कल्याण में प्रवृत्त हो।

वैचारिक मंथन: राजनीतिक चेतना और मध्यवर्गीय समाज का उदय

इतिहास के इस विहंगम सिंहावलोकन से यह स्वतः स्पष्ट है कि भारत को वैचारिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक नेतृत्व देने में इस बौद्धिक वर्ग की महती भूमिका रही है। भारत पर जब विदेशी मुगलों और ब्रिटिश साम्राज्य का क्रूर दमन चक्र चला, तब उनके विरुद्ध सशस्त्र क्रांति और बौद्धिक चेतना जगाने का कार्य भी इसी प्रबुद्ध मध्यवर्गीय समाज ने किया था।

यद्यपि स्वतंत्रता के कालखंड में चालाक कूटनीतिज्ञों ने देश का विभाजन किया और सत्ता के शीर्ष पर अपने छद्म कठपुतली शासकों को स्थापित कर दिया, जिन्होंने इस देश की मूल सनातनी धरोहर को नष्ट करने का कुत्सित प्रयास किया। परंतु समय के चक्र ने करवट बदली, और इसी जाग्रत प्रबुद्ध मध्यवर्ग ने उन छद्म कठपुतलियों को लोकतांत्रिक व्यवस्था से उखाड़ फेंका। आज भारत की बागडोर किसी राजशाही घराने के पास नहीं, बल्कि एक साधारण मध्यवर्गीय परिवार से आने वाले राष्ट्रभक्त नेतृत्व के हाथों में सुरक्षित है।

अतः, वर्तमान युग की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि हम संकीर्ण उपजातीय विभाजनों (कान्यकुब्ज, सरयूपारीण, मैथिल आदि) के पाखंड और संकीर्णताओं से ऊपर उठकर, वेदों के मूल 'गुण-कर्म' आधारित शाश्वत सत्य को पहचानें। जब यह बौद्धिक वर्ग संगठित होकर राष्ट्र सेवा में तत्पर होगा, तभी भारत पुनः संपूर्ण विश्व पटल पर 'विश्वगुरु' के रूप में प्रतिष्ठित हो सकेगा।

ज्ञान, विज्ञान और आत्मबल ही शाश्वत विजय का आधार हैं!
आओ वेदों की ओर लौटें।

— वैचारिक संकलन एवं परिशोधन (ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान डिजिटल प्लेटफॉर्म)

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