आगामी वैश्विक वैचारिक महासंग्राम: भौतिकवादी दानवता बनाम आध्यात्मिक देवत्व

आगामी वैश्विक वैचारिक महासंग्राम: भौतिकवादी दानवता बनाम आध्यात्मिक देवत्व

२०% शोषक पूंजीपतियों और ८०% ज्ञानवान सर्वहारा मध्यवर्ग के ऐतिहासिक संघर्ष का दार्शनिक विश्लेषण

जीवन एक अनवरत महासंग्राम: सत्य और असत्य का द्वंद्व

यह संपूर्ण जीवन एक बहुत बड़ा और शाश्वत महासंग्राम है। इस संग्राम की गति को कोई भी, किसी भी शर्त पर रोक नहीं सकता; चाहे कोई व्यक्ति विशेष जीवित रहे या न रहे। यह ऐतिहासिक लड़ाई किसी व्यक्ति की नहीं, अपितु 'सत्य' और 'असत्य' के मूल सिद्धांतों के बीच की है। संसार में सत्य को मानने वाले दैवीय तत्व भी उपस्थित हैं और असत्य का पोषण करने वाले दानवीय तत्व भी। त्रेतायुग का रामायण काल हो या द्वापरयुग का महाभारत काल—दुष्टों और देवताओं के मध्य का यह युद्ध आज भी मानव चेतना को स्मरण है।

इतिहास गवाह है कि इस पृथ्वी पर देवत्व और दानवत्व हमेशा सह-अस्तित्व में रहे हैं। आज भले ही दुष्टों का संख्याबल और भौतिक संसाधन देवताओं (सदाचारी पुरुषों) की तुलना में बहुत अधिक दिखाई देते हों, परंतु देवता संख्या में कम होकर भी अपने 'आत्मबल' और 'संकल्पबल' में अत्यंत शक्तिशाली हैं। देवताओं का यह आत्मिक बल दुष्टों के पाशविक बल से कई गुना श्रेष्ठ है। जब इस पाशविक संस्कृति का समूल नाश होगा, तभी इस भूमंडल पर पुनः शांति का साम्राज्य स्थापित होगा और 'रामराज्य' की परिकल्पना साकार होगी। वर्तमान में दुष्टों ने अपनी इस हिंसक और विलासी पाशविक संस्कृति का प्रसार पृथ्वी के एक कोने से दूसरे कोने तक कर दिया है, जिससे सात्विक देव-संस्कृति का निरंतर ह्रास हो रहा है और यह मानवता के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा संकट बन चुका है।

श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय १६, श्लोक ६)
द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च ।
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु ॥
भावार्थ: हे अर्जुन! इस संसार में मनुष्यों के दो ही प्रकार के स्वभाव (वर्ग) होते हैं—एक दैवीय प्रवृत्तियों वाले (देवता) और दूसरे आसुरी प्रवृत्तियों वाले (असुर)। आज का संघर्ष भी इसी शाश्वत दैवासुर संग्राम का आधुनिक रूप है।

यह संघर्ष संप्रदायों का नहीं, 'भ्रष्ट धन' बनाम 'निर्धन ज्ञान' का है

भविष्य का यह महासंग्राम किसी हिंदू-मुस्लिम या पारंपरिक सांप्रदायिक आधार पर नहीं होगा; अपितु यह लड़ाई उन २०% भ्रष्ट पूंजीपतियों (रईसजादों) के विरुद्ध होगी जिन्होंने सत्ता और संसाधनों पर कब्ज़ा कर रखा है, और दूसरी तरफ वे ८०% निर्धन किंतु ज्ञानवान, बुद्धिमान मध्यमवर्गीय लोग होंगे जो अपनी अंतरात्मा की दृष्टि से संसार को देखते हैं। इन शोषक धनिकों के पास विनाशकारी आधुनिक हथियार और तकनीकें हैं, जिनके बल पर वे संपूर्ण मानवता को बंधक बनाने की धमकी देते हैं।

यह लड़ाई पूर्णतः वैश्विक (Global) होगी और पूरा विश्व दो स्पष्ट वैचारिक धड़ों में विभाजित हो रहा है। एक धड़ा वह है जिसके पास केवल भौतिक सामग्रियों, विलासिता और अस्त्र-शस्त्रों का विशाल अंबार है। दूसरा धड़ा वह है जिसके पास आध्यात्मिक शक्तियां और आत्मिक सत्य है, जो उन्हें किसी बाह्य शिक्षक के बिना सीधे उनकी अंतरात्मा से निरंतर प्राप्त हो रहा है।

धनी वर्ग अपनी इस नश्वर संपदा को खोने और 'मृत्यु' से अत्यधिक भयभीत है, इसलिए वह जीवन को कृत्रिम रूप से बढ़ाने और बचने के भौतिक साधनों का संग्रह कर रहा है। इसके विपरीत, ज्ञानवान निर्धन वर्ग इस अकाट्य सत्य को भली-भांति जानता है कि मृत्यु निश्चित और अटल है। मृत्यु के भय से मुक्त होने के कारण यह वर्ग अत्यंत निर्भय है। वे सत्य की रक्षा के लिए अपनी जान हथेली पर रखकर इस जीवन-संग्राम के मैदान में कूद पड़ेंगे और शोषक धनिकों की जड़ों को समूल उखाड़ फेंकेंगे।

२०% शोषक बनाम ८०% सर्वहारा: क्रांति का इतिहास और वैश्विक विस्तार

वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में संपूर्ण विश्व की आबादी के मात्र २०% लोग ही संसाधनों को नियंत्रित कर रहे हैं, जबकि शेष ८०% निर्धन और मध्यमवर्गीय लोग इनके अन्याय, दमन और शोषण का शिकार हैं। यह विशाल ८०% जनसमुदाय संगठित होकर इन २०% अत्याचारी धनिकों के अहंकार को चूर-चूर कर देगा और न्यायसंगत व्यवस्था की स्थापना करेगा। ऐसा ही एक प्रयोग पूर्व में रूस की 'बोल्शेविक क्रांति' के रूप में इतिहास देख चुका है, जिसने पूंजीवाद की चूलें हिला दी थीं, भले ही बाद में वह तंत्र नास्तिकता की ओर मुड़ गया।

परंतु आगामी संघर्ष अत्यंत व्यापक और आध्यात्मिक होगा, जिसकी वैचारिक भूमि 'भारत' से तैयार होगी; क्योंकि भारत का इतिहास हमेशा से धर्मयुद्धों (न्याय के युद्धों) का रहा है। इस युद्ध में आस्तिक और नास्तिक (जो न्याय के पक्षधर हैं) दोनों एक साथ खड़े होंगे। यह वैचारिक क्रांति भारत से प्रारंभ होकर चीन, रूस, दक्षिण अफ्रीका, यूरोप और अमेरिका होते हुए संपूर्ण विश्व में दावानल की तरह फैल जाएगी। इस वैश्विक आंदोलन का वैचारिक नेतृत्व संपूर्ण विश्व में फैले हुए 'वैदिक विद्वान' करेंगे। इसके प्रभाव से विभिन्न देशों की सेनाओं और व्यवस्थाओं के भीतर विद्रोह होगा, शोषक राजनेता और जनविरोधी अधिकारी अपदस्थ होंगे, और एक न्यायसंगत 'समान विचार' वाले जन-आंदोलन का उदय होगा।

ऋग्वेद (मण्डल १०, सूक्त ४२, मंत्र ५)
नकिष्टं कर्मणा नशद्यश्चक्रे तमु वर्तयत् ।
अध प्र जज्ञे धनदा अस्य शत्रून् हनिष्यति ॥
भावार्थ: अन्यायपूर्वक और अधर्म से अर्जित किया गया धन कभी स्थिर नहीं रहता; कालचक्र उसे नष्ट कर देता है। जो पुरुषार्थी और सत्यनिष्ठ लोग हैं, ईश्वर उनके भीतर आत्मबल जागृत कर शोषकों और शत्रुओं का पराभव करता है।

भारतीय मध्यमवर्ग: स्वतंत्रता से लेकर आधुनिक सत्ता के शीर्ष तक

आज पूरी दुनिया में जो सबसे अधिक बुद्धिमान और समझदार लोगों का समूह है, वह सामान्य और मध्यमवर्गीय समाज ही है। विश्व का सबसे बड़ा और बौद्धिक रूप से जाग्रत मध्यमवर्ग भारत में ही निवास करता है। आर्थिक दृष्टि से भले ही यह वर्ग सीमित साधनों में जीता हो, परंतु मानसिक और बौद्धिक दृष्टि से यह अदम्य है। यह वर्ग अपनी संस्कृति और अस्तित्व की रक्षा के लिए संसार की बड़ी से बड़ी साम्राज्यवादी शक्ति से टकराने का सामर्थ्य रखता है।

विगत इतिहास साक्षी है कि जब भारत पर आक्रांता मुगलों और अंग्रेजों ने कब्ज़ा किया था, तब उनकी सदियों पुरानी गुलामी की बेड़ियों को काटने वाले और स्वतंत्रता की अलख जगाने वाले यही भारत के मध्यमवर्गीय और साधारण लोग ही थे। देश स्वतंत्र हुआ, परंतु कूटनीति के तहत अंग्रेजों ने भारत का विभाजन कर दिया और सत्ता की बागडोर अपने ही मानस-पुत्रों और छद्म-धर्मनिरपेक्ष कठपुतलियों के हाथों में सौंप दी।

परंतु समय बदला, और इसी प्रखर चेतना संपन्न भारतीय मध्यमवर्ग ने उन कठपुतलियों और देशविरोधी तत्वों को लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता के गलियारों से बाहर खदेड़ दिया। आज भारत के सर्वोच्च नेतृत्व पर अधिकार किसी राजशाही घराने या किसी बड़े पूंजीपति का नहीं, अपितु इसी साधारण मध्यमवर्गीय परिवार से आने वाले राष्ट्रभक्त नेतृत्व का है। यही मध्यवर्ग की वास्तविक शक्ति है, जो आगामी युग में भारत को पुनः 'विश्वगुरु' के आसन पर प्रतिष्ठित करेगी।