श्रीमदखिलाण्डदेवीजम्बुकेश्वरस्तुतिः





श्रीमदखिलाण्डदेवीजम्बुकेश्वरस्तुतिः

(श्रीजम्बुकेश्वरक्षेत्रे) अपराधसहस्राणि ह्यपि कुर्वाणे मयि प्रसीदाम्ब । अखिलाण्डदेवि करुणावाराशे जम्बुकेशपुण्यतते ॥ १॥ ऊर्ध्वस्थिताभ्यां करपङ्कजाभ्यां गाङ्गेयपद्मे दधतीमधस्तात् । वराभये सन्दधतीं कराभ्यां नमामि देवीमखिलाण्डपूर्वाम् ॥ २॥ जम्बूनाथमनोऽम्बुजातदिनराड्बालप्रभासन्ततिं शम्बूकादिवृषावलिं कृतवतीं पूर्वं कृतार्थामपि । कम्बूर्वीधरधारिणीं वपुषि च ग्रीवाकुचव्याजतो ह्यम्बूर्वीधररूपिणीं हृदि भजे देवीं क्षमासागरीम् ॥ ३॥ जम्बूमूलनिवासं कम्बूज्ज्वलगर्वहरणचणकण्ठम् । अम्बूर्वीधररूपं शम्बूकादेर्वरप्रदं वन्दे ॥ ४॥ इति श‍ृङ्गेरि श्रीजगद्गुरु श्रीसच्चिदानन्दशिवाभिनवनृसिंह- भारतीस्वामिभिः विरचिता श्रीमदखिलाण्डदेवीजम्बुकेश्वरस्तुतिः सम्पूर्णा ।

यहाँ श्रीमदखिलाण्डदेवीजम्बुकेश्वरस्तुतिः- का हिन्दी और अंग्रेजी (English) में सटीक और सरल अनुवाद दिया गया है।

यह स्तुति शृंगेरी के जगद्गुरु श्री सच्चिदानन्द शिवाभिनव नृसिंह भारती स्वामीजी द्वारा रचित है, जिसमें तिरुवानैकोवल (तमिलनाडु) के प्रसिद्ध जम्बुकेश्वर (जल तत्व लिंग) और माता अखिलाण्डेश्वरी की महिमा गाई गई है।

श्लोक १

अपराधसहस्राणि ह्यपि कुर्वाणे मयि प्रसीदाम्ब ।

अखिलाण्डदेवि करुणावाराशे जम्बुकेशपुण्यतते ॥ १॥

हिन्दी अनुवाद:- हे माता! मुझ जैसे जीव द्वारा हजारों अपराध (गलतियाँ) किए जाने पर भी आप मुझ पर प्रसन्न होइए। हे अखिलाण्डेश्वरी (पूरे ब्रह्मांड की स्वामिनी)! आप करुणा का अगाध सागर हैं और जम्बुकेश्वर (भगवान शिव) के पुण्य का विस्तार हैं।

English Translation:- O Mother! Even though I commit thousands of offenses, please be gracious unto me. O Goddess Akhilandeshwari (Ruler of the Universe), you are an ocean of compassion and the divine embodiment of Lord Jambukeswara's merits.

श्लोक २

ऊर्ध्वस्थिताभ्यां करपङ्कजाभ्यां गाङ्गेयपद्मे दधतीमधस्तात् ।

वराभये सन्दधतीं कराभ्यां नमामि देवीमखिलाण्डपूर्वाम् ॥ २॥

हिन्दी अनुवाद:- अपने ऊपर के दो कर-कमलों (हाथों) में स्वर्ण-कमल धारण करने वाली तथा नीचे के दो हाथों से 'वरदान' और 'अभय' मुद्रा प्रदर्शित करने वाली, उन आदिशक्ति माता अखिलाण्डेश्वरी को मैं प्रणाम करता हूँ।

English Translation:- I bow down to Goddess Akhilandeshwari, who holds golden lotuses in Her upper two lotus-like hands, and bestows boons (Vara) and fearlessness (Abhaya) with Her lower two hands.

श्लोक ३

जम्बूनाथमनोऽम्बुजातदिनराड्बालप्रभासन्ततिं।

शम्बूकादिवृषावलिं कृतवतीं पूर्वं कृतार्थामपि ।

कम्बूर्वीधरधारिणीं वपुषि च ग्रीवाकुचव्याजतो।

ह्यम्बूर्वीधररूपिणीं हृदि भजे देवीं क्षमासागरीम् ॥ ३॥

हिन्दी अनुवाद:- जो जम्बूनाथ (भगवान शिव) के मन रूपी कमल को खिलाने के लिए सूर्य की बाल-किरणों के समान हैं; जिन्होंने प्राचीन काल में शम्बूक (शंख) आदि साधारण जीवों को भी परमार्थ (मोक्ष) प्रदान कर कृतार्थ किया; जिनके कंठ (गले) में शंख और वक्ष पर पर्वत जैसी सुंदरता सुशोभित है; और जो साक्षात जल एवं पृथ्वी तत्व के रूप में व्याप्त हैं—उन क्षमा की सागर रूपी देवी का मैं अपने हृदय में ध्यान (भजन) करता हूँ।

English Translation:- I meditate in my heart upon the Goddess who is an ocean of forgiveness; who is like the morning sun that blossoms the lotus-like mind of Lord Jambunatha; who in the past blessed even lowly creatures like snails/shells to attain liberation; whose neck resembles a conch and whose form embodies the elements of water and earth.

श्लोक ४

जम्बूमूलनिवासं कम्बूज्ज्वलगर्वहरणचणकण्ठम् ।

अम्बूर्वीधररूपं शम्बूकादेर्वरप्रदं वन्दे ॥ ४॥

हिन्दी अनुवाद:- जो जम्बू (जामुन) वृक्ष की जड़ के पास निवास करते हैं (जम्बुकेश्वर); जिनका कंठ शंख की चमक के गर्व को भी हरने वाला (अत्यंत सुंदर) है; जो जल और पृथ्वी तत्व के स्वरूप हैं, और जिन्होंने शम्बूक आदि भक्तों को वरदान दिया, उन भगवान शिव और देवी की मैं वंदना करता हूँ।

English Translation:- I bow down to the Divine Power who resides at the root of the Jambu tree, whose beautiful neck humbles the pride of a shining conch, who manifests as the elements of water and earth, and who bestows boons upon devotees like Shambuka.

उपसंहार (Conclusion)

इति श‍ृङ्गेरि श्रीजगद्गुरु श्रीसच्चिदानन्दशिवाभिनवनृसिंह-भारतीस्वामिभिः विरचिता श्रीमदखिलाण्डदेवीजम्बुकेश्वरस्तुतिः सम्पूर्णा ।

हिन्दी:- इस प्रकार शृंगेरी के श्री जगद्गुरु श्री सच्चिदानन्द शिवाभिनव नृसिंह भारती स्वामीजी द्वारा रचित 'श्रीमदखिलाण्डदेवीजम्बुकेश्वरस्तुति' संपूर्ण हुई।

English: Thus concludes the 'Srimad Akhilandadevi Jambukeswara Stutih' composed by the Jagadguru of Sringeri, Sri Sacchidananda Shivabhinava Nrisimha Bharati Swamigal.



एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

Featured post

डिजिटल दीमक और बिखरता समाज (The Modern Crisis)

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

View of the Site

यह ब्लॉग खोजें