महाभारत युद्धोत्तर भारत का सांस्कृतिक पतन, पारसी मत और वर्णसंकर सन्तति

महाभारत युद्धोत्तर भारत का सांस्कृतिक पतन, पारसी मत और वर्णसंकर सन्तति

ऐतिहासिक अन्वेषण एवं सामाजिक यथार्थ का एक सूक्ष्म विश्लेषण

यह तथ्य इतिहास के पन्नों और सामाजिक यथार्थ के गहरे स्वाध्याय से पूर्णतः सिद्ध होता है। वर्तमान युग में जिस प्रकार अनुत्तरदायी और अनचाही संतानें (वर्णसंकर सन्तति) उत्पन्न हो रही हैं, ऐसी विकृति का मूल इतिहास के संक्रमण काल में छिपा है। प्राचीन काल में जब समाज धनी और संपन्न था, तब एक वर्ग ऐसा भी पनपा जो परम आलसी, विलासी, कर्तव्यहीन और पुरुषार्थ से विमुख था। वे पूर्वजों द्वारा संचित 'सम्पत्ति के दुरुपयोग' के अतिरिक्त कुछ नहीं जानते थे। भारत की इसी आंतरिक शिथिलता और चारित्रिक पतन को देखकर विदेशी आक्रांताओं ने इस पुण्यभूमि को पराधीन बनाने के कुत्सित प्रयास प्रारंभ किए थे।

श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय १, श्लोक ४१)
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलश्रियः ।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः ॥
भावार्थ: हे कृष्ण! कुल में अधर्म के बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ अत्यंत दूषित (चरित्रहीन) हो जाती हैं और स्त्रियों के दूषित होने पर वर्णसंकर (अनचाही और अनैतिक) संतानें उत्पन्न होती हैं, जो समाज के पतन का कारण बनती हैं।

महाभारत युद्ध: प्रतिभा और पुरुषार्थ का महाविनाश

महाभारत के उस भयंकर महासंग्राम के पश्चात संपूर्ण आर्यावर्त में ज्ञानी पुरुषों, प्रखर योद्धाओं और नीतिवान विद्वानों का घोर अकाल पड़ गया। राष्ट्र के लगभग सभी शक्तिशाली और सोलह वर्ष से ऊपर के पराक्रमी पुरुष उस युद्ध की अग्नि में आहुत हो चुके थे। जहाँ विश्व के अन्य छोटे देशों ने कुछ शताब्दियों में स्वयं को पुनः व्यवस्थित कर लिया, वहीं भारत—जो इस महाविनाश का मुख्य केंद्र था—अत्यंत क्षत-विक्षत हो चुका था। देश के शरीर में प्राण तो शेष थे, किंतु वह असंतुलित था।

इससे पूर्व कि भारत स्वयं को संभाल पाता, सीमावर्ती क्षेत्रों के वे बर्बर कबीले और समुदाय, जो कभी वैदिक सम्राटों के अधीन (गुलाम) थे, भारत की अकूत संपदा को देखकर लार टपकाने लगे। जब उन पर नियंत्रण रखने वाले चक्रवर्ती सम्राट नहीं रहे, तो वे अनियंत्रित अताताई, पागल भेड़ियों के झुंड की भांति असहाय और असुरक्षित आर्यावर्त पर टूट पड़े। महाभारत के बाद बचे हुए लोग लाचार, बेबस और मेमनों की भांति असुरक्षित थे, जिसका लाभ उठाकर बाहरी तत्वों ने यहाँ शासन और शोषण का चक्र प्रारंभ किया।

फारस (पारस) मार्ग से आगमन और 'जरथ्रुस्त' मत का उदय

महाभारत काल के अवसान के बाद सर्वप्रथम पश्चिमोत्तर दिशा से, फारस की खाड़ी के मार्ग से आक्रांताओं और वैचारिक कूटनीतिज्ञों का आगमन हुआ। प्रारंभ में उन्होंने स्वयं को सेवक और हितैषी के रूप में प्रस्तुत किया। चूंकि उनकी अपनी कोई समृद्ध मौलिक संस्कृति या लिपिबद्ध सभ्यता नहीं थी, इसलिए उन्होंने आर्यावर्त के प्राचीन वैदिक सिद्धांतों का गहन अध्ययन किया।

पंडित रघुनंदन शर्मा ने अपनी कालजयी कृति 'वैदिक सम्पत्ति' में अकाट्य प्रमाणों के साथ यह स्पष्ट किया है कि किस प्रकार इसी फारस मार्ग से आए हुए लोगों ने वेदों के सूत्रों को लेकर अपना एक नवीन मत खड़ा किया, जिसे 'पारसी मत' कहा गया। इसके प्रवर्तक आचार्य जरथ्रुस्त (Zoroaster) माने गए। पारसी मत के मूल ग्रंथ 'जिंदावस्ता' (Zend Avesta) में प्रयुक्त ऋचाएं, शब्द (जैसे 'अहुरमज्दा' जो वैदिक 'असुर महत' का अपभ्रंश है) और यज्ञीय परंपराएं सीधे तौर पर वेदों से ली गई हैं।

"जिंदावस्ता की भाषा और वैदिक संस्कृत में इतना साम्य है कि केवल व्याकरण के आंशिक नियमों को बदलकर अवेस्टा के मंत्रों को शुद्ध वैदिक ऋचाओं में परिवर्तित किया जा सकता है।"
— 'वैदिक सम्पत्ति' (रघुनंदन शर्मा)

स्त्री सामर्थ्य, संरक्षण और कामशास्त्र का विकृत विकास

यहाँ एक महत्त प्रश्न यह उठता है कि रामायण या महाभारत काल में कभी महिलाओं की पृथक सेना होने या उनके द्वारा युद्ध संचालन करने का कोई स्पष्ट प्रमाण क्यों नहीं मिलता? क्या नारियाँ अशक्त या बुद्धिहीन थीं? कदापि नहीं। वैदिक काल में अपाला, घोषा, लोपामुद्रा, गार्गी और अरुंधति जैसी विदुषियों ने वेदों के मंत्रों का साक्षात्कार किया था। किंतु सनातन व्यवस्था में प्रकृति और पुरुष के संतुलन को अनिवार्य माना गया। शास्त्रानुसार, बाह्य समाज और राष्ट्र की रक्षा के लिए पुरुष का संबल प्राकृतिक रूप से आवश्यक है, जबकि अंतर्जगत (संस्कृति और परिवार) का पोषण स्त्री का उत्तरदायित्व है।

जब युद्ध में योग्य पुरुषों का नाश हो गया, तब समाज में केवल वृद्ध, बालक और भारी संख्या में विधवा स्त्रियाँ शेष रहीं। वृद्ध जन युवा वर्ग को नियंत्रित करने में असमर्थ सिद्ध हुए। परिणामतः, समाज में अनियंत्रित कामुकता का प्रसार हुआ। योग्य पुरुषों के अभाव में विकृत शारीरिक संबंधों ने जन्म लिया, जिसने राष्ट्र को केवल 'जनसंख्या' दी, 'वीर पुरुष' नहीं।

युद्ध के बाद के संक्रमण काल में पुरुषों के मानसिक रूप से दुर्बल होने के कारण, समाज का झुकाव पुरुषार्थ से हटकर पूरी तरह विलासिता की ओर हो गया। शक्ति और धन का अपव्यय आध्यात्मिक ग्रंथों के स्थान पर केवल कामशास्त्र के विकृत प्रदर्शन में होने लगा, जिसके साक्ष्य खजुराहो, कोणार्क और असम के कामाख्या आदि के तांत्रिक वास्तुकला के कालखंडों में दिखाई देते हैं। इसी कालखंड में जहाँ कभी आर्यावर्त 'ऋषि-भूमि' कहलाता था, वह अपनी संतानोत्पत्ति की विवशता और पोषण के कारण 'भारत माता' के नाम से अधिक पुकारा जाने लगा।

मनुस्मृति (अध्याय ९, श्लोक ३)
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने ।
रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ॥
सटीक वैचारिक विश्लेषण: इस श्लोक का अर्थ स्त्री को गुलाम बनाना नहीं, बल्कि उसके 'परम संरक्षण' की घोषणा करना है। जब-जब समाज में पुरुष निर्बल या संस्कारहीन होगा, तब-तब स्त्री असुरक्षित होगी या वह मर्यादाविहीन होकर कुल के विनाश का कारण बनेगी। आज की आधुनिक स्त्री यदि एकाकी चलने का दंभ भरती है, तो उसके पीछे भी पुरुषों की चारित्रिक निर्बलता ही मुख्य कारण है।

निष्कर्ष: प्रकृति का नियम और आत्म-सुधार का मार्ग

भारत का पतन किसी बाहरी शक्ति ने नहीं, बल्कि भारतीयों की स्वयं की ऐतिहासिक भूलों, विलासिता और नादानी के कारण हुआ। हम बार-बार आघात सहते रहे, किंतु अपने अहंकार और अज्ञानतावश अपनी त्रुटियों को सुधारने का प्रयास नहीं किया। यह ठीक उसी प्रकार है जैसे कोई व्यक्ति धूम्रपान या मादक द्रव्यों के डिब्बे पर छपी भयंकर चेतावनी को देखकर भी उसे नजरअंदाज करता है और अंततः असाध्य रोग को प्राप्त होता है।

आज भी यही हो रहा है। यदि हम अपनी और अपने समाज की चारित्रिक त्रुटियों को अनदेखा करेंगे, तो यह क्रूर प्रकृति भी हमारे अस्तित्व को विस्मृत कर देगी। प्रकृति का नियम अत्यंत स्पष्ट है—यदि आप अपनी आंतरिक प्रकृति (संस्कार, वीर्य-रक्षण और धर्म) का ध्यान रखेंगे, तभी समष्टि रूपी प्रकृति आपका ध्यान रखेगी। आत्म-अवलोकन, संयम और पुन: शुद्ध वैदिक सिद्धांतों की ओर लौटना ही इस सांस्कृतिक गर्त से बाहर निकलने का एकमात्र मार्ग है।