परिचय: श्री अघोर कवच माता पार्वती और भगवान भैरव (शिव) के बीच का एक परम कल्याणकारी और गुप्त संवाद है। 'अघोर' का अर्थ है जो घोर न हो, अर्थात जो अत्यंत शांत, सौम्य और रक्षक हो। तंत्र शास्त्र के अनुसार, इस कवच का नियमित पाठ करने से साधक की समस्त भयों, शत्रुओं, तंत्र-बाधाओं और अकाल मृत्यु से रक्षा होती है। यह कवच महामन्त्रों से युक्त है और जीवन में सुख, समृद्धि, कीर्ति और आरोग्य प्रदान करने वाला माना गया है।
मङ्गलाचरण एवं ध्यान
ॐ श्रीगणेशाय नमः । अथ अघोरकवचं लिख्यते । श्री अघोरभैरवाय नमः ।
अर्थ: श्री गणेश जी को नमस्कार है। यहाँ से अघोर कवच लिखा जा रहा है। श्री अघोर भैरव को नमस्कार है।
कवच का प्रारम्भ (संवाद)
श्लोक १
भैरवी उवाच -
भगवन्करुणाम्भोधे शास्त्राम्भोनिधिपारग ।
पुराऽस्माकं वरो दत्तः तं दातुं मे क्षमो भव ॥ १॥
हिन्दी व्याख्या:
भैरवी (माता पार्वती) ने कहा — हे भगवन! आप करुणा के सागर हैं और समस्त शास्त्रों रूपी समुद्र के पारगामी (ज्ञाता) हैं। पूर्वकाल में आपने मुझे एक वरदान दिया था, अब आप मुझे वह वर देने की कृपा करें (अर्थात मुझे उस वरदान को प्रदान करने में समर्थ हों)।
श्लोक २
भैरव उवाच -
सत्यं पुरा वरो दत्तो वरं वरय पार्वति ।
यत्किञ्चिन्मनसीष्टं स्यात्तद्दातुं ते क्षमोऽस्म्यहम् ॥ २॥
हिन्दी व्याख्या:
भैरव (भगवान शिव) ने कहा — हे पार्वती! यह सत्य है कि मैंने पूर्व में तुम्हें वरदान दिया था। इसलिए तुम अपनी इच्छा के अनुसार वर मांग लो। तुम्हारे मन में जो कुछ भी अभीष्ट (प्रिय) हो, वह सब कुछ तुम्हें प्रदान करने में मैं पूरी तरह समर्थ हूँ।
श्लोक ३
देवी उवाच -
अघोरस्य महादेव कवचं देवदुर्लभम् ।
शीघ्रं मे दयया ब्रूहि यद्यहं प्रेयसी तव ॥ ३॥
हिन्दी व्याख्या:
देवी पार्वती ने कहा — हे महादेव! यदि मैं आपकी प्रियतमा हूँ, तो मुझ पर दया करके भगवान अघोर का वह कवच मुझे शीघ्र सुनाइए, जो देवताओं के लिए भी अत्यंत दुर्लभ है।
श्लोक ४
भैरव उवाच -
अघोरकवचं वक्ष्ये महामन्त्रमयं परम् ।
रहस्यं परमं तत्त्वं न चाख्येयं दुरात्मने ॥ ४॥
हिन्दी व्याख्या:
भैरव ने कहा — हे देवी! मैं तुम्हें वह परम अघोर कवच सुनाता हूँ जो महामंत्रों से युक्त और श्रेष्ठ है। यह अत्यंत गोपनीय रहस्य और परम तत्त्व है, जिसे किसी दुष्ट या दुरात्मा व्यक्ति को कभी नहीं बताना चाहिए।
विनियोग, न्यास एवं मूल मंत्र
अस्य श्री अघोरकवचस्य महाकालभैरव ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः श्रीकालाग्निरुद्रो देवता । क्ष्मीं बीजं क्ष्मां शक्तिः क्ष्मः कीलकं श्री अघोर विद्यासिद्ध्यर्थं कवचपाठे विनियोगः ॥
विनियोग का सरल अर्थ: इस अघोर कवच के ऋषि 'महाकालभैरव' हैं, इसका छंद 'अनुष्टुप्' है, इसके देवता 'श्री कालाग्निरुद्र' हैं। 'क्ष्मीं' इसका बीज है, 'क्ष्मां' इसकी शक्ति है, 'क्ष्मः' इसका कीलक है और श्री अघोर विद्या की सिद्धि के लिए इस कवच पाठ में इसका विनियोग किया जाता है।
॥ अथ मुख्य अघोर मन्त्र ॥
अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः ।
सर्वतः सर्वसर्वेभ्यो नमस्तेभ्यो रुद्ररूपेभ्यः ॥
कवच के मुख्य श्लोक (अंग-रक्षण)
श्लोक ५
ॐ अघोरो मे शिवः पातु श्री मेऽघोरो ललाटकम् ।
ह्रीं घोरो मेऽवतां नेत्रे क्लीं घोरो मेऽवताच्छ्रुती ॥ ५॥
हिन्दी व्याख्या:
ॐ अघोर रूपी कल्याणकारी शिव मेरे संपूर्ण शरीर की रक्षा करें। श्रीं अघोर मेरे ललाट (माथे) की रक्षा करें। ह्रीं घोर मेरे दोनों नेत्रों की रक्षा करें और क्लीं घोर मेरे दोनों कानों (श्रोत्रों) की रक्षा करें।
श्लोक ६
सौःतरेभ्योऽवताङ्गडौक्षी नासां पातु सर्वतः क्षं ।
मुखं पातु मे शर्वोऽघोरः सर्वोऽवताङ्गलम् ॥ ६॥
हिन्दी व्याख्या:
सौः तरेभ्यो मेरे गालों (कपोलों) की रक्षा करें। क्षं मेरी नासिका (नाक) की सब ओर से रक्षा करें। भगवान शर्व मेरे मुख की रक्षा करें और अघोर मेरे कंठ (गले) की सब प्रकार से रक्षा करें।
श्लोक ७
घोरश्च मेऽवतात्स्कन्धौ हस्तौ ज्वलन्नमोऽवतु ।
ज्वलनः पातु मे वक्षः कुक्षिं प्रज्वलरुद्रकः ॥ ७॥
हिन्दी व्याख्या:
घोर स्वरूप शिव मेरे दोनों कंधों की रक्षा करें। ज्वलन्नमः मेरे दोनों हाथों की रक्षा करें। अग्नि स्वरूप ज्वलन मेरे वक्षःस्थल (छाती) की रक्षा करें और प्रज्वलरुद्र मेरी कुक्षि (पेट/कोख) की रक्षा करें।
श्लोक ८
पार्श्वौ प्रज्वलरूपेभ्यो नाभिं मेऽघोररूपभृत् ।
शिश्नं मे शूलपाणिश्च गुह्यं रुद्रः सदावतु ॥ ८॥
हिन्दी व्याख्या:
प्रज्वलरूप मेरे दोनों पार्श्वों (पसली और बगल) की रक्षा करें। अघोररूपधारी शिव मेरी नाभि की रक्षा करें। हाथ में त्रिशूल धारण करने वाले शूलपाणि मेरे लिंग (जननेंद्रिय) की रक्षा करें और भगवान रुद्र मेरे गुह्य अंग की सदा रक्षा करें।
श्लोक ९
कटिम् मेऽमृतमूर्तिश्च मेढ्रेऽव्यान्नीलकण्ठकः ।
ऊरू चन्द्रजटः पातु पातु मे त्रिपुरान्तकः ॥ ९॥
हिन्दी व्याख्या:
अमृतमूर्ति मेरी कमर (कटि) की रक्षा करें। नीलकण्ठ मेरे उपस्थ भाग की रक्षा करें। अपने जटाओं में चंद्रमा धारण करने वाले चन्द्रजट मेरे दोनों जांघों (ऊरु) की रक्षा करें और त्रिपुरान्तक सब प्रकार से मेरी रक्षा करें।
श्लोक १०
जङ्घे त्रिलोचनः पातु गुल्फौ याज्ञियरूपवान् ।
अघोरोऽङ्घ्री च मे पातु पादौ मेऽघोरभैरवः ॥ १०॥
हिन्दी व्याख्या:
तीन नेत्रों वाले त्रिलोचन मेरी जंघाओं (पिंडलियों) की रक्षा करें। यज्ञ स्वरूप धारण करने वाले याज्ञियरूपवान मेरे टखनों (गुल्फों) की रक्षा करें। अघोर मेरे पैरों के ऊपरी भाग की और अघोरभैरव मेरे दोनों पैरों के तलवों की रक्षा करें।
श्लोक ११
पादादिमूर्धपर्यन्तमघोरात्मा शिवोऽवतु ।
शिरसः पादपर्यन्तं पायान्मेऽघोरभैरवः ॥ ११॥
हिन्दी व्याख्या:
पैरों से लेकर मस्तक (सिर) तक अघोर स्वरूप वाले शिव मेरी रक्षा करें, और मस्तक से लेकर पैर तक स्वयं भगवान अघोरभैरव मेरी रक्षा करें।
काल एवं दिशाओं से रक्षा
श्लोक १२
प्रभाते भैरवः पातु मध्याह्ने वटुकोऽवतु ।
सन्ध्यायां च महाकालो निशायां कालभैरवः ॥ १२॥
हिन्दी व्याख्या:
प्रातःकाल के समय भैरव मेरी रक्षा करें। दोपहर के समय वटुक भैरव मेरी रक्षा करें। सायंकाल (संध्या समय) महाकाल रक्षा करें और रात्रि के समय कालभैरव मेरी रक्षा करें।
श्लोक १३
अर्द्धरात्रे स्वयं घोरो निशान्तेऽमृतरूपधृत् ।
पूर्वे मां पातु ऋग्वेदो यजुर्वेदस्तु दक्षिणे ॥ १३॥
हिन्दी व्याख्या:
आधी रात (मध्यरात्रि) के समय स्वयं भगवान घोर रक्षा करें और रात्रि के अंत (भोर/सूर्योदय से पूर्व) में अमृतरूपधारी शिव रक्षा करें। पूर्व दिशा में ऋग्वेद मेरी रक्षा करें और दक्षिण दिशा में यजुर्वेद मेरी रक्षा करें।
श्लोक १४
पश्चिमे सामवेदोऽव्यादुत्तरेऽथर्ववेदकः ।
आग्नेय्यामग्निरव्यान्मां नैरृत्यां नित्यचेतनः ॥ १४॥
हिन्दी व्याख्या:
पश्चिम दिशा में सामवेद और उत्तर दिशा में अथर्ववेद मेरी रक्षा करें। आग्नेय कोण (South-East) में अग्निदेव मेरी रक्षा करें और नैऋत्य कोण (South-West) में नित्यचेतन स्वरूप शिव मेरी रक्षा करें।
श्लोक १५
वायव्यां रौद्ररूपोऽव्यादैशान्यां कालशासनः ।
ऊर्ध्वोऽव्यादूर्ध्वरेताश्च पाताले परमेश्वरः ॥ १५॥
हिन्दी व्याख्या:
वायव्य कोण (North-West) में रौद्ररूप शिव रक्षा करें और ईशान कोण (North-East) में काल को भी अनुशासित करने वाले कालशासन रक्षा करें। ऊपर की ओर ऊर्ध्वरेता (ऊर्ध्वलिंगी) शिव रक्षा करें और पाताल (नीचे की ओर) में स्वयं परमेश्वर मेरी रक्षा करें।
श्लोक १६
दशदिक्षु सदा पायाद्देवः कालाग्निरुद्रकः ।
अग्नेर्मां पातु कालाग्निर्वायोर्मां वायुभक्षकः ॥ १६॥
हिन्दी व्याख्या:
दशों दिशाओं में सदा साक्षात् भगवान कालाग्निरुद्र मेरी रक्षा करें। अग्नि के भय से मुझे कालाग्नि बचाएं और वायु के प्रकोप से वायुभक्षक (शिव का एक रूप) मेरी रक्षा करें।
श्लोक १७
जलादौर्वामुखः पातु पथि मां शङ्करोऽवतु ।
निषण्णम् योगध्येयोऽव्याद्गच्छन्तं वायुरूपभृत् ॥ १७॥
हिन्दी व्याख्या:
जल के संकटों से वडवानल रूपी और्वामुख मेरी रक्षा करें। मार्ग (रास्ते) में चलते समय भगवान शंकर मेरी रक्षा करें। बैठे हुए या विश्राम की अवस्था में योगियों द्वारा ध्यान करने योग्य योगध्येय शिव रक्षा करें और चलते या दौड़ते समय वायुरूपधारी शिव मेरी रक्षा करें।
श्लोक १८
गृहे शर्वः सदा पातु बहिः पायाद्वृषध्वजः ।
सर्वत्र सर्वदा पातु मामघोरोऽथ घोरकः ॥ १८॥
हिन्दी व्याख्या:
घर के भीतर भगवान शर्व सदा रक्षा करें और घर से बाहर रहने पर बैल की ध्वजा वाले भगवान वृषध्वज मेरी रक्षा करें। सब स्थानों पर और सब समय (सर्वत्र-सर्वदा) मेरे ऊपर आने वाले संकटों से भगवान अघोर और भगवान घोरक रक्षा करें।
विशिष्ट परिस्थितियों और संकटों से रक्षा
श्लोक १९
रणे राजकुले दुर्गे दुर्भिक्षे शत्रुसंसदि ।
द्यूते मारीभये राष्ट्रे प्रलये वादिना कुले ॥ १९॥
हिन्दी व्याख्या:
युद्ध के मैदान में (रणे), राजदरबार या सरकारी संकट में (राजकुले), दुर्गम स्थान या किले में (दुर्गे), अकाल या भुखमरी के समय (दुर्भिक्षे), शत्रुओं की सभा या विवाद में (शत्रुसंसदि), जुए या दांव-पेच में (द्यूते), महामारी के भय के समय (मारीभये), राष्ट्र पर आए संकट में, प्रलयकाल में और वादियों (विवाद या मुकदमों) के बीच में... (अगले श्लोक से संबद्ध)
श्लोक २०
अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्योऽवतान्मां घोरभैरवः ।
घोरघोरतरेभ्यो मां पायान्मन्मथसङ्गरे ॥ २०॥
हिन्दी व्याख्या:
...उन सभी परिस्थितियों में अघोरों और घोरों से स्वयं घोरभैरव मेरी रक्षा करें। घोर से भी अत्यंत घोरतर संकटों में तथा कामदेव के युद्ध (काम-वासना के वेग या संकट) में भी वह मेरी रक्षा करें।
श्लोक २१
सर्वतः सर्वसर्वेभ्यो भोजनावसरेऽवतु ।
नमस्ते रुद्ररूपेभ्योऽवतु मां घोरभैरवः ॥ २१॥
हिन्दी व्याख्या:
सब तरफ से, सब प्रकार के जीवों और बाधाओं से तथा भोजन करने के समय (ताकि विष आदि का असर न हो) मेरी रक्षा हो। भगवान रुद्र के उन सभी रूपों को नमस्कार है। भगवान घोरभैरव मेरी रक्षा करें।
श्लोक २२
सर्वत्र सर्वदाकालं सर्वाङ्गं सर्वभीतिषु ।
हं यं रं लं वं शं षं सं हं लं क्षः अघोरकः ॥ २२॥
हिन्दी व्याख्या:
सब स्थानों पर, सब काल में, मेरे सभी अंगों की और सब प्रकार के भयों से—बीज मंत्र "हं यं रं लं वं शं षं सं हं लं क्षः" से युक्त भगवान अघोरक रक्षा करें। (यह एकादश-बीज मंत्र परम शक्तिशाली है)।
श्लोक २३
अघोरास्त्राय फट् पातु अघोरो मां सभैरवः ।
विस्मारितं च यत्स्थानं स्थलं यन्नामवर्जितम् ॥ २३॥
हिन्दी व्याख्या:
'अघोरास्त्राय फट्' मंत्र मेरी रक्षा करे। भैरव सहित भगवान अघोर मेरी रक्षा करें। जो स्थान इस कवच में छूट गया हो (भूलवश जिसका स्मरण न हुआ हो) अथवा जो स्थान नाम रहित हो...
श्लोक २४
तत्सर्वं मामघोरोऽव्यान्मामथाघोरः सभैरवः ।
भार्यान्पुत्रान्सुहृद्वर्गान्कन्यां यद्वस्तु मामकम् ॥ २४॥
हिन्दी व्याख्या:
...उन सभी अज्ञात और अनाम स्थानों पर भी भगवान अघोर और भैरव सहित अघोर मेरी रक्षा करें। इसके अतिरिक्त मेरी पत्नी (भार्या), पुत्र, मित्र-समूह (सुहृद्वर्ग), कन्या और जो कुछ भी मेरा धन-वैभव या वस्तु है...
श्लोक २५
तत्सर्वं पातु मे नित्यं अघोरो मांथ घोरकः ।
स्नाने स्तवे जपे पाठे होमेऽव्यात्क्षः अघोरकः ॥ २५॥
हिन्दी व्याख्या:
...उन सबकी भी भगवान अघोर और घोरक नित्य रक्षा करें। स्नान करते समय, स्तुति करते समय, जप, पाठ अथवा हवन (होम) करते समय 'क्षः' बीज मंत्र स्वरूप अघोरक मेरी रक्षा करें।
श्लोक २६
अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः ।
सर्वतः सर्वसर्वेभ्यो नमस्तेभ्यो रुद्ररूपेभ्यः ॥ २६॥
हिन्दी व्याख्या:
जो अघोर (सौम्य) हैं, जो घोर (भयानक) हैं, और जो घोर से भी अति घोरतर हैं; उन सभी सर्व-सर्वेश्वर रुद्ररूपों को मेरा नमस्कार है। वे सब मेरी रक्षा करें।
श्लोक २७
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं सौः क्ष्मं पातु नित्यं मां श्री अघोरकः ।
इतीदं कवचं गुह्यं त्रिषु लोकेषु दुर्लभम् ॥ २7॥
हिन्दी व्याख्या:
"ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं सौः क्ष्मं" इन महाबीज मंत्रों से युक्त श्री अघोरक मेरी नित्य रक्षा करें। इस प्रकार यह परम गोपनीय कवच समाप्त होता है, जो तीनों लोकों में अत्यंत दुर्लभ है।
फलश्रुति एवं महात्म्य (पाठ के लाभ)
श्लोक २८
मूलमन्त्रमयं दिव्यं त्रैलोक्ये सारमुत्तमम् ।
अदातव्यमवाच्यं च कवचं गुह्यमीश्वरि ॥ २८॥
हिन्दी व्याख्या:
भगवान शिव कहते हैं — हे ईश्वरी! यह कवच मूल मंत्रों से निर्मित अत्यंत दिव्य और तीनों लोकों में सबसे उत्तम सार तत्व है। यह परम गोपनीय कवच किसी को भी बिना पात्रता के देने योग्य या बताने योग्य नहीं है।
श्लोक २९-३०
अप्रष्टव्यमस्तोतव्यं दीक्षाहीनेन मन्त्रिणा ।
अदीक्षिताय शिष्याय पुत्राय शरजन्मने ॥ २९॥
न दातव्यं न श्रोतव्यमित्याज्ञां मामकां शृणु ।
परं श्रीमहिमानं च शृणु चास्य सुवर्मणः ॥ ३०॥
हिन्दी व्याख्या:
दीक्षा से हीन मंत्र साधक को इसके विषय में न पूछना चाहिए और न स्तुति करनी चाहिए। जो दीक्षित न हो ऐसे शिष्य को, अथवा अपने पुत्र को भी (यदि वह अदीक्षित या अभक्त हो) यह नहीं देना चाहिए और न ही उसे सुनाना चाहिए, यह मेरी आज्ञा सुनो। अब तुम इस उत्तम कवच (वर्म) की परम श्रेष्ठ महिमा को सुनो।
श्लोक ३१
अदीक्षितो यदा मन्त्री विद्यागृध्नुः पठेदिदम् ।
सदीक्षित इति ज्ञेयो मान्त्रिकः साधकोत्तमः ॥ ३१॥
हिन्दी व्याख्या:
यदि कोई अदीक्षित व्यक्ति भी ज्ञान और विद्या की तीव्र इच्छा (विद्यागृध्नुः) से युक्त होकर श्रद्धापूर्वक इसका पाठ करता है, तो उसे इस कवच के प्रभाव से दीक्षित के समान ही मान लिया जाना चाहिए और वह साधकों में उत्तम हो जाता है।
श्लोक ३२
यः पठेन्मनसा तस्य रात्रौ ब्राह्मे मुहूर्त्तके ।
पूजाकाले निशीथे च तस्य हस्तेऽष्टसिद्धयः ॥ ३२॥
हिन्दी व्याख्या:
जो व्यक्ति रात्रि में, ब्रह्ममुहूर्त में, पूजा के समय अथवा निशीथ काल (मध्यरात्रि) में एकाग्र मन से इसका पाठ करता है, अष्ट-सिद्धियाँ स्वयं उसके हाथों में आ जाती हैं (अर्थात उसे सहज ही सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं)।
श्लोक ३३-३४
दुःस्वप्ने बन्धने धीरे कान्तारे सागरे भये ।
पठेत् कवचराजेन्द्रं मन्त्री विद्यानिधिं प्रिये ॥ ३३॥
सर्वं तत्प्रशमं याति भयं कवचपाठनात् ।
रजः-सत्त्व-तमोरूपमघोरकवचं पठेत् ॥ ३४॥
हिन्दी व्याख्या:
हे प्रिये! बुरे स्वप्न आने पर, बंदीगृह (जेल या बंधन) में होने पर, घोर जंगल (कान्तारे) में भटकने पर, समुद्र यात्रा के संकट में या किसी भी प्रकार के भयानक भय की स्थिति में साधक को इस विद्या की निधि 'कवचराज' का पाठ करना चाहिए। इस कवच के पाठ से वे सभी संकट और भय तुरंत शांत हो जाते हैं। यह अघोर कवच सत्व, रज और तम तीनों गुणों के दोषों को शांत करने वाला है।
श्लोक ३५-३६
वाञ्छितं मनसा यद्यत्तत्तत्प्राप्नोति साधकः ।
कुङ्कुमेन लिखित्वा च भूर्जत्वचि रवौ शिवे ॥ ३५॥
केवलेन सुभक्ष्ये च धारयेन्मूर्ध्नि वा भुजे ।
यद्यदिष्टं भवेत् तत्तत्साधको लभतेऽचिरात् ॥ ३६॥
हिन्दी व्याख्या:
साधक मन में जो-जो इच्छा रखता है, वह सब प्राप्त कर लेता है। रविवार के दिन, शुभ शिव-योग में कुंकुम (केसर) से भोजपत्र पर इस कवच को लिखकर, उसे सिर पर या दाहिनी भुजा पर धारण करने से साधक की जो-जो मनोकामना होती है, वह उसे बिना किसी विलंब के (शीघ्र ही) प्राप्त हो जाती है।
श्लोक ३७
यद्गृहे अघोरकवचं वर्तते तस्य मन्दिरे ।
विद्या कीर्तिर्धनारोग्यलक्ष्मीवृद्धिर्न संशयः ॥ ३७॥
हिन्दी व्याख्या:
जिस घर या मंदिर में यह अघोर कवच लिखित रूप में उपस्थित रहता है, वहाँ विद्या, कीर्ति (यश), धन, उत्तम स्वास्थ्य (आरोग्य) और लक्ष्मी की निरंतर वृद्धि होती रहती है—इसमें कोई संशय नहीं है।
श्लोक ३८
जपेच्चाघोरविद्यां यो विनानेनैव वर्मणा ।
तस्य विद्या जपं हीनं तस्माद्धर्मं सदा पठेत् ॥ ३८॥
हिन्दी व्याख्या:
जो साधक इस कवच (वर्म) का पाठ किए बिना ही अघोर मंत्र या अघोर विद्या का जप करता है, उसका वह जप और विद्या फलहीन (कमजोर) हो जाती है। इसलिए अघोर साधना में इस कवच का पाठ सदा अनिवार्य रूप से करना चाहिए।
श्लोक ३९
अघोरमन्त्रविद्यापि जपन् स्तोत्रं तथा मनुम् ।
सद्यः सिद्धिं समायाति अघोरस्य प्रसादतः ॥ ३९॥
हिन्दी व्याख्या:
इस कवच के साथ अघोर मंत्र विद्या, स्तोत्र और मूल मनु (मंत्र) का जप करने से साधक भगवान अघोरेश्वर की कृपा से अत्यंत शीघ्र (सद्यः) ही समस्त सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है।
श्लोक ४०
इति श्रीदेवदेवेशि अघोरकवचं स्मरेत् ।
गोप्यं कवचराजेन्द्रं गोपनीयं स्वयोनिवत् ॥ ४०॥
हिन्दी व्याख्या:
भगवान शिव कहते हैं — हे देवदेवेशी! इस प्रकार इस परम दिव्य अघोर कवच का नित्य स्मरण व पाठ करना चाहिए। इस सर्वश्रेष्ठ कवचराज को अपनी अत्यंत निजी और गुप्त वस्तु की भांति सदा छुपाकर (गोपनीय) रखना चाहिए।
॥ उपसंहार ॥
इति श्रीरुद्रयामले तन्त्रे विश्वसारोद्धारे तन्त्रेऽघोरसहस्रनामाख्ये कल्पे अघोरकवचं समाप्तम् ।
(इस प्रकार श्रीरुद्रयामल तंत्र के अंतर्गत विश्वसारोद्धार के अघोरसहस्रनाम कल्प में वर्णित यह श्री अघोर कवच संपूर्ण हुआ।)
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