अथर्ववेद काण्ड ३ सुक्त २२ सरल संस्कृत शब्दार्थ और हिन्दी भावार्थ

अथर्ववेद काण्ड ३ सुक्त २२ सरल संस्कृत शब्दार्थ और हिन्दी भावार्थ


हस्तिवर्चसं प्रथतां बृहद्यशो अदित्या यत्तन्वः संबभूव ।तत्सर्वे समदुर्मह्यमेतद्विश्वे देवा अदितिः सजोषाः ॥१॥

०३।०२२।०१

✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉

भाषार्थ: (हस्तिवर्चसम्) हाथी के बल से युक्त (बृहत्) बड़ा (यशः) यश (प्रथताम्) फैले, (यत्) जो (अदित्याः) अदीन वेदवाणी वा प्रकृति के (तन्वः) विस्तार से (संबभूव) उत्पन्न हुआ है, (तत्) सो (एतत्) यह [यश] (मह्यम्) मुझको (सजोषाः) समान प्रीतिवाली (अदितिः) अखण्ड वेदवाणी वा प्रकृति और (विश्वे) सब (देवाः) प्रकाशमान गुणों ने (सर्वे) सर्वव्यापक विष्णु भगवान् में (सम्) ठीक प्रकार से (अदुः) दिया है ॥१॥

भावार्थः मनुष्य वेदविद्या और प्रकृति के यथावत् ज्ञान से (जिस सबका केन्द्र परमेश्वर है) हाथी आदि का सामर्थ्य पाकर यशस्वी होता है। म० ६ देखो ॥१॥ भगवान् पतञ्जलि का वचन है−बलेषु हस्तिबलादीनि ॥ यो० द० ३।२३ ॥ बलों में [संयम करने से] हाथी के से बल हो जाते हैं ॥

 ✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉

भाषार्थ: (हस्तिवर्चसम्) हाथी के तेज जैसा तेज (प्रथताम्) राष्ट्र में फैले, (बृहद् यशः) यह तेज महायशरूप है [यश का उत्पादक है], (यत्) जो तेज कि (अदित्याः) अदीना अर्थात् न क्षीण होनेवाली प्रकृति की (तन्व:) तनु१ से (सं बभूव) सम्पन्न हुआ है। (विश्वे देवा:) प्रकृतिजन्य सब प्राकृतिक दिव्य शक्तियों ने तथा (सजोषाः अदितिः) प्रेमवाली प्रकृति ने, (सर्वे) इन सबने, (तत् एतत्) प्रसिद्ध इस तेज को (मह्यम्) मुझे (सम्, अदुः) परस्पर मिल कर दिया है।

टिप्पणी: [हस्तिवर्चस है महाबलरूपी तेज। सजोषा:=प्रकृति प्रेममयी माता रूप है, जिसने कि हमें शरीर, इन्द्रियाँ तथा मन, बुद्धि तथा खाद्य-पेय अन्न प्रदान किया है और हमारी रक्षा के लिए पृथ्वी, वायु तथा आदित्य आदि प्रदान किये हैं।] [हाथी महाकाय है, उसकी उत्पादक-माता भी महाकाया होनी चाहिए। प्रकृति विस्तार में महाकाया है। इसे द्योतित करने के लिए "तनू" का प्रयोग हुआ है, तनु विस्तारे (तनादि:)]

मित्रश्च वरुणश्चेन्द्रो रुद्रश्च चेततु ।
देवासो विश्वधायसस्ते माञ्जन्तु वर्चसा ॥२॥

 ०३।०२२।०२

✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉

भाषार्थ: (मित्रः) सबका मित्र, (च) और (वरुणः) अति श्रेष्ठ (च) और (इन्द्रः) परम ऐश्वर्यवान् (च) और (रुद्रः) ज्ञानदाता वा दुःखनाशक परमेश्वर (चेततु) चेताता रहे, और (ते) वे [प्रसिद्ध] (विश्वधायसः) सब जगत् के पोषण करनेवाले (देवासः=देवाः) दिव्य पदार्थ [पृथिवी, जल, वायु, तेज, आकाश आदि] (मा) मुझको (वर्चसा) तेज वा बल से (अञ्जन्तु) कान्तिवाला करें ॥२॥

भावार्थः सब स्त्री पुरुष परमेश्वर की महिमा को जानें और विज्ञानपूर्वक सब पदार्थों से उपकार लेकर तेजस्वी और यशस्वी होवें ॥२॥

 ✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉

भाषार्थ: (मित्र: च) मित्रों को बढ़ानेवाला मन्त्री, (वरुण: च) और निज प्रत्येक राष्ट्र का अधिपति, (इन्द्रः) सम्राट, (रुद्रः च) और रौद्रकर्मा युद्ध मंत्री, (चेततु) इनमें से प्रत्येक [ राष्ट्र में] सचेत रहे, सावधान रहे। (विश्वधायसः देवासः) सब प्रजाजनों का धारण-पोषण करनेवाले अन्य अधिकारी वर्ग (ते) वे (मा) मुझ साम्राज्य के स्वामी को, (वर्चसा) वर्चस् द्वारा (अञ्जन्तु) कान्तियुक्त करें। "च" पद समुच्चयार्थक हैं।

टिप्पणी: [मित्र:=मित्रेणाग्ने मित्रधा यतस्व (अथर्व० २।६।४), अर्थात् हे अग्नि अर्थात् अग्रणी प्रधानमन्त्री! तू मित्र अर्थात् स्नेही "मित्र" नामक मन्त्री द्वारा मित्रधा होकर, मित्र राजाओं को धारण करने में यत्न किया कर। अग्नि:=अग्रणीर्भवति (निरुक्त ७।४।१४)। वरुणः="इन्द्रश्च सम्राड् वरुणश्च राजा" (यजु:० ८।३७)। विश्वधायस विश्व+धा (युक्)+असुन्, प्रथमा विभक्ति बहुवचन। अञ्जन्तु=अञ्जू व्यक्तिम्रक्षणकान्तिगतिषु (रुधादिः)।]

येन हस्ती वर्चसा संबभूव येन राजा मनुष्येस्वप्स्वन्तः । येन देवा देवतामग्र आयन् तेन मामद्य वर्चसाग्ने वर्चस्विनं कृणु ॥३॥

 ०३।०२२।०३

✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉

भाषार्थ: (येन) जिस (वर्चसा) तेज से (हस्ती) हाथी, और (येन) जिस [तेज] से (राजा) ऐश्वर्यवान् राजा (मनुष्येषु) मनुष्यों और (अप्सुअन्तः) जल और अन्तरिक्ष के भीतर (संबभूव) पराक्रमी हुआ है, और (येन) जिस [तेज] से (देवाः) देवताओं [महात्मा पुरुषों] ने (अग्रे) पहिले काल में (देवताम्) देवतापन (आयन्) पाया है, (अग्ने) हे ज्ञानस्वरूप जगदीश्वर ! (तेन वर्चसा) उस तेज से (माम्) मुझको (अद्य) आज (वर्चस्विनम्) तेजस्वी (कृणु) कर ॥३॥

भावार्थः सब स्त्री पुरुष हाथी आदि पशुओं, और पूर्वज शूरवीर ऋषि महात्माओं के बुद्धि बल का अनुभव करके (अद्य) आज अर्थात् शीघ्र उपाय से जल, थल, और आकाश में, (अग्नि) परमेश्वर की भक्ति के साथ अपनी गति बढ़ावें और अग्नि के समान तेजस्वी होकर संसार में कीर्तिमान् होवें ॥३॥ योगेश्वर पतञ्जलि का वचन है−तीव्रसंवेगानामासन्नः ॥ यो० द० १।२१ ॥ [समाधिलाभ] उग्र अच्छे वेगवालों के समीप होता है ॥

 ✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉

भाषार्थ: (येन वर्चसा) जिस वर्चस् के साथ (हस्ती संबभूव) हाथी पैदा हुआ है, (येन) जिस वर्चस् के साथ (राजा मनुष्येषु) राजा मनुष्यों में हुआ है [जिस वर्चस् के साथ] (अप्सु अन्तः) मेघीय जलों में विद्युत पैदा होती है, (येन) जिस वर्चस् के साथ (अग्रे) पूर्वकाल से (देवा:) दिव्यजन (देवताम् आयन्) देवता को प्राप्त हुए हैं, (तेन वर्चसा) उस वर्चस् के साथ (अग्ने) हे अग्रणी प्रधानमन्त्री। (माम्) मुझको (अद्य) आज (वर्चस्विनम् कृणु) वर्चस्वी कर।

टिप्पणी: [वर्चस्= वर्च दीप्तौ (भ्वादिः)। हस्ती आदि में दीप्ति अर्थात् तेज पृथक् पृथक् रूपवाला है। हस्ती का तेज है बल, शारीरिक बल। राजा आदि में भी तेज अपने अपने ढंग का है। व्यक्ति जोकि प्रजाओं द्वारा "राजा" निर्वाचित हुआ है, वह प्रधानमन्त्री से कहता है कि आज जबकि मैं राजासनस्थ हुआ हैं, तू मुझे वर्चस्वी कर, राज्य में मेरे वर्चस् को बढ़ा। निर्वाचन काल में राज्याधिकारी अधिकार से वञ्चित कर दिए जाने चाहिएं, केवल प्रधानमंत्री ही निर्वाचन का प्रबन्ध करे-यह भाव प्रतीत होता है।]

यत्ते वर्चो जातवेदो बृहद्भवत्याहुतेः । यावत्सूर्यस्य वर्च आसुरस्य च हस्तिनः । तावन् मे अश्विना वर्च आ धत्तां पुष्करस्रजा ॥४॥

०३।०२२।०४

✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉

भाषार्थ: (यत्) जिस कारण से (जातवेदः) उत्पन्न संसार के ज्ञानवाले परमेश्वर ! (ते) तेरे लिये (आहुतेः) आहुति [आत्मदान] से [हमारा] (वर्चः) तेज (बृहत्) बड़ा (भवति) होता है, (यावत्) जितना (वर्चः) तेज वा बल (आसुरस्य) प्राणियों वा मेघों के हितकारक (सूर्यस्य) सूर्य का (च) और (हस्तिनः) हाथी का है, (तावत्) उतना (वर्चः) तेज वा बल (मे) मेरे लिये (पुष्करस्रजा=०-जौ) पोषण देनेवाले (अश्विना=०-नौ) माता पिता वा सूर्य्य चन्द्रमा (आधत्ताम्) सब प्रकार देवें ॥४॥

भावार्थः सब स्त्री पुरुष माता पिता की सुशिक्षा और सूर्य चन्द्रमा के समान नियम से परमेश्वर की आज्ञापालन में मन लगाकर अपना बल बढ़ावें और सूर्य आदि दूरस्थ और हाथी आदि पृथिवीस्थ पदार्थों का बल, विज्ञान द्वारा जानकर उन्नति करें ॥४॥

 ✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉

भाषार्थ: (जातवेदः) उत्पन्न पदार्थों में विद्यमान हे अग्नि! (आहुते:) आहुति से (यत्) जो (ते) तेरा (बृहत् वर्चः) महावर्चस् (भवति) हो जाता है, (यावत्) जितना बड़ा (सूर्यस्य वर्चः) सूर्य का वर्चस् है, (च) और जितना बड़ा (आसुरस्य) प्राणवान् (हस्तिनः) हाथी का वर्चस् है, (पुष्करस्रजा) पद्ममाला धारण करनेवाले (अश्विना) हे दो अश्वियो! (तावत्) उतना बड़ा वर्चस् (मे) मुझमें (आ धत्ताम्) तुम स्थापित करो।

टिप्पणी: [जातवेदः= जाते-जाते विद्यते वा (निरुक्त ७‌।५।१९) आसुरस्य=असुर एव आसुरः, स्वार्थेऽण् । असुरः= प्राणवान्, यथा असुरत्वम्= प्राणवत्वम् (निरुक्त १०।३।३४)। मे=मह्यम्। अश्विना= रथाश्वों और अश्वारोहियों के अश्व; दो प्रकार के अश्वों के नियन्ता दो सेनापति। पुष्करस्रजा=दोनों सेनापतियों के सत्कारार्थ पद्मपुष्पमालाएँ। मे वर्च: आधत्ताम्= मुझ निर्वाचित राजा में दोनों सेनापति वर्चस् का आधान करें।]

यावच्चतस्रः प्रदिशश्चक्षुर्यावत्समश्नुते ।
तावत्समैत्विन्द्रियं मयि तद्धस्तिवर्चसम् ॥५॥

०३।०२२।०५

✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉

भाषार्थ: (यावत्) जितनी दूर (चतस्रः) चारों (प्रदिशः) महादिशायें हैं, और (यावत्) जितनी दूर (चक्षुः) आँख [दर्शन शक्ति] (समश्नुते) फैलती है, (तावत्) वहाँ तक (मयि) मुझमें (तत्) वह (हस्तिवर्चसम्) हाथी के बलवाला (इन्द्रियम्) परम ऐश्वर्य (समैतु) आकर मिले ॥५॥

भावार्थः मनुष्य सब पार्थिव और दिव्य पदार्थों के यथावत् ज्ञान से सामर्थ्य बढ़ाकर उन्नति करें ॥५॥

 ✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉

भाषार्थ: (चतस्रः प्रदिशः) चार प्रकृष्ट-दिशाएँ (यावत्) जितने प्रदेश में व्याप्त हैं तथा (चक्षुः) रूपग्राहक आँख (यावत्) जितने प्रदेश को (समश्नुते) सम्यक् व्याप्त करती है, जितने प्रदेश तक देख सकती है, (तावत्) उतना (इन्द्रियम्) ऐन्द्रियिक बल (समैतु) मुझे प्राप्त हो, (मयि) और मुझमें (तद्) वह अर्थात् उत्तम (हस्तिवर्चसम्) हाथी का वर्चस् (ऐतु) प्राप्त हो। हस्तिवर्चस् है, बल का अतिशय।

हस्ती मृगाणां सुषदामतिष्ठावान् बभूव हि ।
तस्य भगेन वर्चसाभि षिञ्चामि मामहम् ॥६॥

 ०३।०२२।०६

✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉

भाषार्थ: (हि) क्योंकि (सुषदाम्) सुखसे चढ़ने योग्य (मृगाणाम्) पशुओं में (हस्ती) हाथी (अतिष्ठावान्) प्रतिष्ठावाला (बभूव) हुआ है, (तस्य) उसके (भगेन) सेवनीय (वर्चसा) कान्ति से (अहम्) मैं (माम्) अपने को (अभिषिञ्चामि) भले प्रकार सींचूँ [शुद्ध करूँ] ॥६॥

भावार्थः जैसे हाथी में अन्य पशुओं से अधिक बुद्धि बल होता है, वैसे ही प्रधान पुरुष अन्य पुरुषों से अधिक बुद्धिबलवाला होवे ॥६॥

 ✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉

भाषार्थ: (सुषदाम्) सुख से स्थित हुए। (मृगाणाम्) मृगों के मध्य, (हस्ती) हाथी, (हि) निश्चय से (अतिष्ठावान्) बल में सबको अतिक्रान्त करके स्थित हुआ है; (तस्य) उस हाथी के (भगेन) यश द्वारा (वर्चसा) तथा तेज द्वारा. (अहम्) मैं (माम्) अपने-आपका (अभिषिच्यामि) अभिषेक करता है।

टिप्पणी: [भगेन=यशसा, यथा "ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः। ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा।" नवनिर्वाचित राजा, जल द्वारा अभिषिक्त न होकर, अपने-आपको यश और तेज द्वारा अभिषिक्त होने का अभिलाषी है। यह चाहता है कि राज्य में उसका यश और तेज बढ़े।।


 









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