मुक्ति क्या है ? शांति क्या है, ओ३म् का स्मरण

मुक्ति क्या है ? शांति क्या है, ओ३म् का स्मरण


मुक्ति क्या है ?

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   मुञ्चन्ति पृथग् भवन्ति जना यस्यां सा मुक्तिः।।

जिसमें छूट जाना हो उसका नाम मुक्ति है, अर्थात् सांसारिक दुःखों से छूटना ही मुक्ति कहाती है।

   दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानां उत्तरोत्तरापाये तदन्तरापायादपवर्गः।।

―(न्याय० १/१/२)

अर्थात्―दुःख, जन्म, प्रवृत्ति, दोष और मिथ्याज्ञान उत्तरोत्तर अर्थात् आगे-आगे के नष्ट हो जाने पर उसके अनन्तर के अव्यवहित पूर्व के नाश हो जाने से मोक्ष होता है।

   इसमें दुःख, जन्म, प्रवृत्ति, दोष और मिथ्याज्ञान―ये पाँच पदार्थ कहे गए हैं। उसमें उत्तर अर्थात् अगला पदार्थ अपने से पहले का कारण है। इस प्रकार दुःख का कारण जन्म, जन्म का कारण प्रवृत्ति, प्रवृत्ति का कारण दोष और दोष का कारण मिथ्याज्ञान है।

    यह एक तर्कपूर्ण व्यवस्था है कि कारण के नाश हो जाने पर कार्य का नाश हो जाता है। फल स्वरुप मिथ्याज्ञान के नाश से दोषों का नाश, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश, प्रवृत्ति के नाश से जन्म का नाश और जन्म के नाश से दुःखों का नाश सम्भव है।

   तदत्यन्तविमोक्षोऽपवर्गः।।―(न्याय० १/१/२२)

जो दुःख का अत्यन्त विच्छेद होता है, वही मुक्ति कहाती है। 

   महर्षि कपिल मुक्ति के सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहते हैं―

    अथ त्रिविधदुःखात्यन्तनिवृत्तिरत्यन्तपुरुषार्थः।।

―(सांख्य १/१)

तीन प्रकार के दुःखों की अतिशय निवृत्ति मोक्ष है।

   संसार में दुःखों से छूटने के लिए धन आदि अनेक उपायों का प्रयोग करते हैं। थोड़े-बहुत समय के लिए हम छुटकारा पाते भी हैं, पर फिर हमें शीघ्र ही अन्य दुःख-समूह आ घेरता है। किसी एक दुःख-निवृत्ति के काल में भी अन्य दुःख आते रहते हैं। इस प्रकार सांसारिक साधनों के द्वारा न तो हमारे दुःख अधिक समय के लिए छूट पाते हैं और न उतने काल में नैरन्तर्य की स्थिति आ पाती है। क्योंकि जितने समय के लिए कोई कष्ट दूर होता है, उसके अन्तराल में अन्य कष्ट आ उपस्थित होते हैं। अत एव इन अवस्थाओं को परम पुरुषार्थ, मोक्ष या अपवर्ग नहीं कहा जा सकता। मोक्ष की अवस्था वही है, जहाँ तीनों प्रकार के दुःखों की अधिकाधिक समय के लिए मुक्ति हो जाये, उस में नैरन्तर्य की अवस्था बनी रहे। अभिप्राय यह है उतने समय में किसी प्रकार के दुःख का अस्तित्व नहीं रहना चाहिए।

    दुःख के समस्त प्रकारों का तीन वर्गों में समावेश किया गया है―आध्यात्मिक, आधिभौतिक तथा आधिदैविक। आध्यात्मिक दुःख वह है जो अपने आन्तरिक कारणों से उत्पन्न होता है। यह दो प्रकार का है―एक शारीरिक, दूसरा मानसिक। शरीर की वात, पित्त, कफ आदि की विषमता से अथवा आहार-विहार आदि की विषमता से जो दुःख उत्पन्न होता है, वह शारीरिक दुःख कहा जाता है। जो काम, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष, राग आदि मनोविकारों के कारण दुःख उत्पन्न होता है उसे मानसिक दुःख कहते हैं। 

    आधिभौतिक वह दुःख है जो अन्य भूत-प्राणियों से हमें प्राप्त होता है। साँप, बिच्छू आदि के काटने से, अन्य हिंसक प्राणियों द्वारा आघात पहुँचाने से, किसी के मारने-पीटने अथवा कटु वाक्य कहने से, इसी ढंग की किसी भी रीति से होने वाला दुःख आधिभौतिक दुःख कहलाता है।

   आधिदैविक दुःख वह है जो वर्षा, आतप, हिमपात, विद्युत्पात, भूकम्प तथा वायु जनित उत्पातों के कारण उत्पन्न होता है।

   इन तीनों प्रकार के दुःखों की अत्यन्त निवृत्ति, अथवा आत्मा का इन दुःखों से अलग हो जाना छ पुरुषार्थ अर्थात् मोक्ष कहा जाता है।

   ओ३म् पूषा पञ्चाक्षरेण पञ्च दिशऽउदजयत् ताऽउज्जेषं सविता षडक्षरेण षड् ऋतूनुदजयत् तानुज्जेषं मरुत: सप्ताक्षरेण सप्त ग्राम्यान् पशूनुदजयँस्तानुज्जेषं बृहस्पतिरष्टाक्षरेण गायत्रीमुदजयत् तामुज्जेषम्॥_ 

(यजुर्वेद ९-३२)

  शासक चंद्रमा की कीर्ति के समान सभी पांचो दिशाओं (पूर्वादि चार और एक ऊपर/नीचे) को पुष्ट करने वाला हो।

शासक सूर्य की तरह सभी छः वसन्तादि ऋतुओं में शुद्ध करने वाला वाला हो।

शासक वायु के वेग की तरह उपयोगी सात पशुओ(गाय घोङा भैंस ऊंट बकरी भेङ और गधा) की वृद्धि करने वाला हो। 

शासक को विद्वानों की तरह विद्याओं का ज्ञान हो। जिससे जन कल्याण के लिए उत्तम नीतियां अपना सके। 

शान्ति की खोज

  "शांति" की खोज में चलने वाले पथिक को यह जान लेना चाहिए कि अकेले रहने या जंगल, पर्वतों में निवास करने से "शांति" का कोई संबंध नहीं । यदि ऐसा होता तो अकेले रहने वाले जीव-जंतुओं को "शांति" मिल गई होती और जंगल पर्वतों में रहने वाली अन्य जातियाँ कब की शांति प्राप्त कर चुकी होती ।

  अशांति का कारण है, "आंतरिक-दुर्बलता ।" स्वार्थी मनुष्य बहुत चाहते हैं और उसमें कमी रहने पर खिन्न होते हैं ।

   "अहंकारी" का क्षोभ ही उसे जलाता रहता है । कायर मनुष्य हिलते हुए पत्ते से भी डरता है और उसे अपना भविष्य अंधकार से घिरा दीखता है । "असंयमी" की तृष्णा कभी शांत नहीं होती । इस कुचक्र में फँसा हुआ मनुष्य सदा विक्षुब्ध ही रहेगा, भले ही उसने अपना निवास सुनसान एकांत में बना लिया हो ।

   नदी या पर्वत सुहावने अवश्य लगते हैं । विश्राम या जलवायु की दृष्टि से वे स्वास्थ्यकर हो सकते हैं, पर "शांति" का उनमें निवास नहीं । चेतन आत्मा को यह जड़ पदार्थ भला "शांति" कैसे दे पाएँगे ? "शांति" अंदर रहती है और जिसने उसे पाया है, उसे अंदर ही मिली है । अशांति उत्पन्न करने वाली विकृतियों को जब तक परास्त न किया जाए, तब तक शांति का दर्शन नहीं हो सकता, भले ही कितने सुरम्य स्थानों में कोई निवास क्यों न करता रहे ।

ओ३म्  माहिर्भूर्मा पृदाकुर्नमस्तऽआतानानर्वा प्रेहि।

घृतस्य कुल्याऽउपऽऋतस्य पथ्याऽअनु॥ यजुर्वेद ६-१२॥

हे विद्वान मनुष्य, तुम सर्प की तरह कुटिल मार्ग गामी ना बनो, ना ही बाघ की तरह हिंसक बनो और ना ही मूर्ख की तरह घमंडी बनो। तुम बिना हिंसा और घमंड के सीधे और सरल बनो। सत्य के मार्ग पर चलो तुम्हें सभी सुख साधन मिलते चले जाएंगे।

ओम् लिखने का सही तरीक़ा है  ॥ ओ३म् ॥

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   'ओ३म्'। ओम् अक्षर बनता है ढाई अक्षरों से अर्थात् अ+उ+म् से। व्याकरण के अनुसार अ और   उ की सन्धि (मिलान) करने से वह 'ओ' बन जाता है अतः अ+उ=ओ और उसमे म् जोड़ने से ओम् शब्द बनता है। वैदिक ढंग से ओम् को लिखने का सही तरीक़ा है 'ओ३म्' क्योंकि ओ का उच्चारण ३ गुणा लम्बा होना चाहिए - यही दर्शाने के लिए ओ और म् के मध्य में ३ लिखा जाता है। 

    ओ३म् ईश्वर का सर्वप्रिय निज नाम जाना और माना जाता है क्योंकि इस में ईश्वर के सभी प्रकार के गौणिक, कार्मिक तथा अलंकारिक नाम समाहित हो जाते हैं। वेद और आर्ष ग्रन्थों में इसी ओ३म् नाम की व्याख्या उपलब्ध है। इस ओ३म् नाम के मन में उच्चारण से परम् शान्ति का अनुभव प्राप्त होता है। आर्ष ग्रन्थों में ओ३म् नाम की अनेक विशेषताएँ बताई गई हैं।

  १- ओ३म् के उच्चारण मात्र से मृत कोशिकाएँ जीवित हो जाती है ।

   २- मन के नकारात्मक भाव सकारात्मक में परिवर्तित हो जाते है ।

   ३-  तनाव से मुक्ति मिलती है ।

४-  स्टेरॉयड का स्तर कम हो जाता है ।

   ५- चेहरे के भाव तथा  हमारे आसपास के वातावरण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है ।

   ६- मस्तिष्क में सकारात्मक परिवर्तन होते हैं तथा हृदय स्वस्थ होता है ।

   ७-महर्षि पतंजलि जी ने योगदर्शन सूत्र १.२९ में उपदेश किया है कि ओ३म् का अर्थ सहित जप करने से आत्मा परमात्मा का साक्षात्कार होता है और सब विघ्नों का नाश होता है ।

   ८- वेद में परमात्मा ने स्वयं ओम् जप का उपदेश किया है- ओ३म् क्रतो स्मर- यजुर्वेद ४०.१५

हे कर्मशील जीव! तू ओ३म् का स्मरण कर ।

 वृश्चिकस्य विषं पृच्छे मक्षिकायाः मुखे विषम्।

तक्षकस्य  विषं  दन्ते  सर्वांगे दुर्जनस्य तत्॥*

  अर्थ  :-  बिच्छु की पूंछ में विष होता है, मक्षिका (मक्खी) का विष उसके मुँह में होता है, तक्षक (साँप) का विष उसके दाँत में होता है, परन्तु दुष्ट मनुष्य का प्रत्येक अंग विषैला होता है, अतः दुष्ट मनुष्य का संग सबसे भयानक होता है।

शोक शास्त्र ज्ञान और बुद्धि नष्ट कर देता है, शोक से धैर्य नष्ट होता है, शोक से समस्त खुशियां नष्ट हो जाती है अत: शोक के समान कोई शत्रु नही। बीती हुई बातों का शोक नहीं करना चाहिए, भविष्य की चिन्ता भी नही करानी चाहिए और बुद्धिमानी की बात तो यह है कि वर्तमान काल के अनुसार अपने कर्तव्यों का पालन करने में जुटे रहना चाहिए। सब समस्याओं को सुलझाने का एक ही उपाय है  -  प्रयत्न करना और प्रयत्न करना। 

ओ३म् भद्रं कर्णेभि: श्रृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्रा:।स्धिरैड्गैस्तुष्टुवां सस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायु:।। (यजुर्वेद २५|२१)

अर्थ  :- हे दिव्य गुणयुक्त सृष्टि कर्ता देवेश्वर! आप की कृपा से कानों द्वारा हम सदैव भद्रं- कल्याण को ही सुनें अकल्याण की बात हम कभी न सुनें। हे यज्ञनीश्वर  !  हम आखों से सदा शुभ देखें।  हे जगदीश  ! हमारे सब अंग उपाङग सदा दृढ़ और स्थिर बने रहें जिनसे हम लोग स्थिरता से आपकी स्तुति करते हुए सदा आप की आज्ञा का पालन करते रहें।



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