अथर्ववेद काण्ड ३ सुक्त २३ सरल संस्कृत शब्दार्थ और हिन्दी भावार्थ

अथर्ववेद काण्ड ३ सुक्त २३ सरल संस्कृत शब्दार्थ और हिन्दी भावार्थ

येन वेहद्बभूविथ नाशयामसि तत्त्वत्।

इदं तदन्यत्र त्वदप दूरे नि दध्मसि ॥१॥

०३।०२३।०१

✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉

भाषार्थ: [हे स्त्री] (येन) जिस कारण से तू (वेहत्) बन्घ्या [बाँझ] (बभूविथ) हुई है, (तत्) उस कारण को (त्वत्) तुझसे (नाशयामसि) हम नष्ट करते हैं। (इदम्=इदानीम्) अभी (तत्) उसको (त्वत्) तुझसे (अन्यत्र) और कहीं (दूरे) दूर (अप=अपहृत्य) हटाकर (निदध्मसि=०-ध्मः) हम रखते हैं ॥१॥

भावार्थः सद्वैद्य पुत्रेष्टि यज्ञ करके ओषधि द्वारा बाँझपन मिटाकर वीर सन्तान उत्पन्न करते हैं, देखो−श्रीमद् दयानन्दकृत संस्कारविधि-गर्भाधानप्रकरण ॥१॥
 
 ✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉

भाषार्थ: [हे नारी!! (येन) जिस कारण से (बेहत्) गर्भघातिनी (बभूविथ) तू हुई है, (तत्) उसे (त्वत्) तुझसे (नाशयामसि) हम [वैद्य] नष्ट करते हैं। (इदम् तत्) इस प्रसिद्ध कारण को (त्वत् अप) तुझसे अपगत कर, (अन्यत्र दूरे) अन्यत्र दूर (निदध्मसि) हम स्थापित करते हैं [फैक देते हैं, सायण।]
 
आ ते योनिं गर्भ एतु पुमान् बाण इवेषुधिम् ।
आ वीरोऽत्र जायतां पुत्रस्ते दशमास्यः ॥२॥

 ०३।०२३।०२

✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉

भाषार्थ: [हे सुभगे] (पुमान्) रक्षा करनेवाला, पराक्रमी (गर्भः) गर्भ (ते) तेरे (योनिम्) गर्भाशय में (आ एतु) आवे, (बाणः इव) जैसे बाण (इषुधिम्) तूणीर [तीरों के थैले] में। (अत्र) इस घर में (दशमास्यः) दश महीने तक पुष्ट हुआ, (ते) तेरा (वीरः) वीर, (पुत्र) कुलशोधक बालक (आ जायताम्) अच्छे प्रकार उत्पन्न हो ॥२॥

भावार्थः वधू और वर यथाविधि ब्रह्मचारी रहकर युक्त आहार विहार करके सन्तान उत्पन्न करें, जिससे गर्भ अवश्य स्थिर रहे और पूर्ण रीति से पुष्ट होकर वीर सन्तान उत्पन्न हो ॥२॥ यहाँ पर अथर्ववेद का० १ सू० ११ मन्त्र ६ का मिलान करो। ऋग्वेद में ऐसा वर्णन है−द॒श मासा॑ञ्छशया॒नः कु॑मा॒रो अधि मा॒तरि॑। नि॒रैतु॑ जी॒वो अक्ष॑तो जी॒वो जीव॑न्त्या॒ अधि॑ ॥ ऋ० ५।७८।९ ॥ (मातरि अधि) माता के गर्भ में जो (कुमारः) बालक (दश मासान्) दश महीनों तक (शशयानः) सोता रहा है, वह (जीवः) जीता हुआ (अक्षतः) घाव से रहित (जीवः) जीव (जीवन्त्याः अधि) जीवती हुई माता से (निरैतु) बाहिर आवे। श्री सायणाचार्य ने यह मन्त्र इस प्रकार श्लोक में लिखा है−दश मासानुषित्वासौ जननीजठरे सुखम्। निर्गच्छतु सुखं जीवो जननी चापि जीवतु ॥ ऋ० सा० भा० ५।७८।९। (जननीजठरे) माता के पेट में (सुखम्) सुख से (दश मासान्) दस महीनों तक (उषित्वा) सोकर (असौ जीवः) वह जीव (निर्गच्छतु) बाहिर आवे, (च) और (जननी अपि) माता भी (जीवतु) जीवित रहे ॥२॥
 
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉

भाषार्थ: (ते योनिम्) तेरी योनि में (पुमान् गर्भः) पुमान् गर्भ (आ एतु) आए (इव) जैसे कि (बाणः) बाण (इषुधिम्१) इषुओं को धारण करनेवाले निषङ्ग में स्वभावतः प्राप्त हो जाता है। (अत्र) इस प्रसूतिकाल में या इस तेरे घर में (दशमास्यः) दसवें मास में पैदा होनेवाला (ते वीरः पुत्रः) तेरा वीर पुत्र (आ जायताम्) आजाए या उत्पन्न हो।

टिप्पणी: [१. इषुधि:= इषुओं को रखने की थैली। युद्धकाल में यह योद्धाओं की पीठ पर बांधी रहती है। इसे निषङ्ग तुणीर तथा तर्कश भी कहते हैं।]

 पुमांसं पुत्रं जनय तं पुमान् अनु जायताम् ।
भवासि पुत्राणां माता जातानां जनयाश्च यान् ॥३॥

 ०३।०२३।०३

✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉

भाषार्थ: [हे वधू] (पुमांसम्) रक्षा करनेवाला (पुत्रम्) बहुरक्षक, वीर सन्तान (जनय) उत्पन्न कर, (तम् अनु) उसके पीछे (पुमान्) रक्षा करनेवाला वीर बालक (जायताम्) उत्पन्न होवे। (जातानाम्) उत्पन्न हुए (पुत्राणाम्) नरक से बचानेवाले सन्तानों की (माता) माननीय माता (भवासि) हो, (च) और [उनकी भी] (यान्) जिनको (जनयाः) तू उत्पन्न करे ॥३॥

भावार्थः माता पिता ब्रह्मचर्य और इष्ट भोजन, छादन, व्यायाम आदि से प्रयत्न करें कि उनके सब पुत्र पुत्री सदैव पराक्रमी उत्पन्न होवे और माता पिता तथा संसार की सेवा करके ‘पुमान्’ रक्षक बने रहें ॥३॥
 
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉

भाषार्थ: [हे नारी!] (पुमांसम्) पुमान् (पुत्र) पुत्र को (जनय) तू जन्म दे, (तम् अनु) उसके अनन्तर (पुमान्) पुमान् पुत्र (जायताम्) पैदा हो। (भवासि) तू हो (जातानां पुत्राणाम्) उत्पन्न हुए पुत्रों की, (च) और (यान्) जिन्हें तू (जनयाः) पैदा करेगी, उनकी (माता) माता।
 
यानि बद्राणि बीजान्यृषभा जनयन्ति च ।
तैस्त्वं पुत्रं विन्दस्व सा प्रसूर्धेनुका भव ॥४॥

 ०३।०२३।०४

✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉

भाषार्थ: (च) और (यानि) जैसे (भद्राणि) मङ्गलदायक (बीजानि) बालकों को (ऋषभाः) सूक्ष्मदर्शी ऋषि लोग, अथवा, ऋषभ ओषधि के रस (जनयन्ति) उत्पन्न करते हैं, (तैः) वैसे ही [सन्तानों] के साथ (त्वम्) तू (पुत्रम्) कुलशोधक वा बहुरक्षक बालक को (विन्दस्व) प्राप्त कर, (सा=सा त्वम्) सो तू (प्रसूः) जननेवाली (धेनुका) दूध पिलानेवाली माता [अथवा दुधैल गौ के समान] (भव) हो ॥४॥

भावार्थः मनुष्य बड़े लोगों से ब्रह्मचर्य विद्या और ओषधि विद्या प्राप्त करके बली धर्मात्मा सन्तान उत्पन्न करें। और बलवती माता अपने बच्चों को अपना दूध पिलाकर बलवान् करे, जैसे गौ दूध पिलाकर बच्चे को पुष्ट बनाती है ॥४॥ शब्दकल्पद्रुमकोष में ऋषभ औषध को मधुर, शीतल, रक्तपित्तविकारनाशी वीर्य श्लेष्मकारी, और दाहज्वरहारी लिखा है ॥
 
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉

भाषार्थ: (यानि) जिन (भद्राणि बीजानि) भद्र बीजों को (ऋषभाः) ऋषभगण की ओषधियाँ (जनयन्ति) पैदा करती हैं, (तै:) उन बीजों [के सेवन] द्वारा (त्वम्) तू (पुत्रम् विन्दस्व) पुत्र प्राप्त कर, (सा) वह तू [हे नारी!] (प्रसूः) प्रसव करनेवाली होकर, (धेनुका) अल्पकाया, दूध देनेवाली गौ (भव) बन।

टिप्पणी: [बीजानि पद द्वारा प्रतीत होता है कि "ऋषभा:" ओषधियाँ हैं, जिनके भद्रबीजों के सेवन से नारी पुत्र प्रसव कर नवजात शिशुओं को दुग्ध पिला सकती है। बीज भद्र होने चाहिएँ, दूषितावस्था के नहीं। ऋषभा: को मंत्र ६ में वीरुध कहा है, और ओषधय: भी, तथा "मूलम्" द्वारा इनकी जड़ों को भी सूचित किया है।]
 
कृणोमि ते प्राजापत्यमा योनिं गर्भ एतु ते ।
विन्दस्व त्वं पुत्रं नारि यस्तुभ्यं शमसच्छमु तस्मै त्वं भव ॥५॥

 ०३।०२३।०५

✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉

भाषार्थ: (ते) तेरे लिये (प्राजापत्यम्) सन्तानरक्षक कर्म [गर्भाधान, पुंसवनादि संस्कार] (कृणोमि) मैं करता हूँ, (ते) तेरा (गर्भः) गर्भ (योनिम्) गर्भाशय में (आ एतु) आवे। (नारि) हे नर की हितकारिणी ! (त्वम्) तू (पुत्रम्) कुलशोधक सन्तान (विन्दस्व) प्राप्त कर (यः) जो (तुभ्यम्) तुझको (शम्) सुखदायक (असत्) होवे, (उ) और (त्वम्) तू (तस्मै) उसको (शम्) सुखदायक (भव) हो ॥५॥

भावार्थः सब मनुष्य वैद्यक शास्त्र के अनुसार उचित काल में उचित रीति से अमोघ गर्भाधानादि संस्कार करके सन्तान उत्पन्न करें, जिससे उस सन्तान का जन्म, आप उसको और माता पिता सबको सुखदायक हों ॥५॥
 
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉

भाषार्थ: (ते) तेरे लिए (प्राजापत्यम्) प्रजोत्पादक यज्ञ (कृणोमि) मैं पति करता हूँ, [अभिप्राय है गर्भाधान संस्कार], (गर्भः) गर्भ (ते योनिम्) तेरी योनि को (आ एतु) प्राप्त हो (नारि) हे नारि! (त्वम्) तू (पुत्रम् विन्दस्व) पुत्र को प्राप्त कर, (यः) जो पुत्र कि (तुभ्यम्) तेरे लिए (शम् असत्) सुखदायी हो, (शम् उ) और सुख देनेवाली ही (तस्मै) उस पुत्र के लिए (त्वम्) तू (भव) हो।

टिप्पणी: ["आ योनिं गर्भ एतु ते" द्वारा स्पष्ट है कि मन्त्र में गर्भाधान का वर्णन है। इस निमित्त किये जानेवाले यज्ञ को "प्राजापत्य" कहा है। प्रजापति है परमेश्वर। वह समग्र प्राणियों का पति है, रक्षक है। पति भी सन्तानोत्पत्ति कर, सन्तानों का पति अर्थात् रक्षक बनना चाहता है। अतः गर्भाधानसम्बन्धी यज्ञ अर्थात् संस्कार करता है। ताकि गर्भाधान के समय पति-पत्नी की भावनाएँ यज्ञमयी हों।]
 
यासां द्यौः पिता पृथिवी माता समुद्रो मूलं वीरुधां बभूव । तास्त्वा पुत्रविद्याय दैवीः प्रावन्त्वोषधयः ॥६॥

 ०३।०२३।०६

✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉

भाषार्थ: (यासाम् वीरुधाम्) जिन उगनेवाली अन्नादि ओषधियों का (द्यौः) सूर्य (पिता) पालनेवाला, (पृथिवी) पृथिवी (माता) उत्पन्न करनेवाली, और (समुद्रः) समुद्र [जल] (मूलम्) जड़ (बभूव) हुआ है, (ताः) वे (देवीः) दिव्य गुणवाली (ओषधयः) औषधें (पुत्रविद्याय) सन्तान पाने के लिये (त्वा) तेरी (प्र) अच्छे प्रकार (अवन्तु) रक्षा करें ॥६॥

भावार्थः अन्न आदि अनेक औषधियाँ सूर्य द्वारा वृष्टि और प्रकाश पाकर पृथिवी और जल के संयोग से उत्पन्न होती हैं, उनमें से उत्तम-२ बलवर्धक औषधों के उचित खान पान से माता पिता उत्तम सन्तान उत्पन्न करें ॥६॥
 
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉

भाषार्थ: (यासाम् वीरुधाम्) जिन विरोहणशील औषधियों का (पिता) पिता (द्यौः) द्युलोक है, (माता पृथिवी) और माता पृथिवी है, (समुद्र:) समुद्र (मूलम्) मूल कारण (बभूव) है; (ता: दैवीः ओषधयः) वे दिव्य औषधियां, (पुत्रविद्याय) पुत्र प्राप्ति के लिए, (त्वा प्रावन्तु) तुझे सुरक्षित करें।

टिप्पणी: [द्यौः पिता है, वर्षारूपी वीर्यप्रदाता। पृथिवी माता है, ओषधियाँ पृथिवी से प्राप्त होती हैं। समुद्र है "मूलम्" अर्थात् मूलकारण, ये सामुद्रिक औषधियां हैं, जो आसन्न समुद्र-तट१ पर पैदा होती हैं।] [१. यथा "गङ्गायां घोषाः"=गङ्गातटे घोषाः, उपचारात्।]
 
 




एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

Featured post

डिजिटल दीमक और बिखरता समाज (The Modern Crisis)

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

View of the Site

यह ब्लॉग खोजें