अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या ॥१॥
०३।०३०।०१
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (सहृदयम्) एकहृदयता, (सांमनस्यम्) एकमनता और (अविद्वेषम्) निर्वैरता (वः) तुम्हारे लिये (कृणोमि) मैं करता हूँ। (अन्यो अन्यम्) एक दूसरे को (अभि) सब ओर से (हर्यत) तुम प्रीति से चाहो (अघ्न्या इव) जैसे न मारने योग्य, गौ (जातम्) उत्पन्न हुए (वत्सम्) बछड़े को [प्यार करती है] ॥१॥
भावार्थः ईश्वर उपदेश करता है, सब मनुष्य वेदानुगामी होकर सत्य ग्रहण करके एकमतता करें और आपा छोड़कर सच्चे प्रेम से एक दूसरे को सुधारें, जैसे गौ आपा छोड़कर तद्रूप होकर पूर्ण प्रीति से उत्पन्न हुए बच्चे को जीभ से चाटकर शुद्ध करती और खड़ा करके दूध पिलाती और पुष्ट करती है ॥१॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: [हे सद्गृहस्थो!] (व:) तुम्हारे लिए (सहृदय) समानहृदय, (सांमनस्यम्) समान मन, (अविद्वेषम्) द्वेष का अभाव (कृणोमि) मैं परमेश्वर नियत करता हूँ, (अन्यो अन्यम्) परस्पर एक-दूसरे की (अभिहर्यत) कामना किया करो, एक-दूसरे को चाहा करो। (अघ्न्या जातं वत्समिव) गौ जैसे नवजात वत्स को चाहती है।
टिप्पणी: [हदयों की समानता है भावनाओं की समानता, परस्पर प्रेम। मनों की समानता है विचारों की समानता। दो प्रकार की समानता हो जाने पर पारस्परिक द्वेष का अभाव हो जाता है। तथा परस्पर के साथ मिलने की कामना अर्थात् इच्छा किया करो, जैसेकि गौ नवजात निज वत्स को चाहती है, उसके साथ प्रेम करती है। अघ्न्या का अर्थ है, न हन्तव्याः, जिसका कि हनन न करना चाहिए।]
अनुव्रतः पितुः पुत्रो मात्रा भवतु संमनाः ।
जाया पत्ये मधुमतीं वाचं वदतु शन्तिवाम् ॥२॥
०३।०३०।०२
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (पुत्रः) कुलशोधक पवित्र, बहुरक्षक वा नरक से बचानेवाला पुत्र [सन्तान] (पितुः) पिता के (अनुव्रतः) अनुकूल व्रती होकर (मात्रा) माता के साथ (संमनाः) एक मनवाला (भवतु) होवे। (जाया) पत्नी (पत्ये) पति से (मधुमतीम्) जैसे मधु में सनी और (शन्तिवाम्) शान्ति से भरी (वाचम्) वाणी (वदतु) बोले ॥२॥
भावार्थः सन्तान माता पिता के आज्ञाकारी, और माता पिता सन्तानों के हितकारी, पत्नी और पति आपस में मधुरभाषी तथा सुखदायी हों। यही वैदिक कर्म आनन्दमूल है। मन्त्र १ देखो ॥२॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (पुत्रः) पुत्र (पितुः अनुव्रतः) पिता के अनुकूल कर्मों को करनेवाला हो, (मात्रा संमनाः भवतु) और माता के साथ समान मनवाला हो। (जाया) पत्नी (पत्ये) पति के लिए (मधुमतीम्) मधुर अर्थात् मीठी, (शान्तिवाम्) तथा शान्तिप्रद (वाचम्) वाणी को (वदतु) बोला करे। व्रतम् कर्मनाम (निघं० २।१)।
मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन् मा स्वसारमुत स्वसा ।
सम्यञ्चः सव्रता भूत्वा वाचं वदत भद्रया ॥३॥
०३।०३०।०३
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (भ्राता) भ्राता (भ्रातरम्) भ्राता से (मा द्विक्षत्) द्वेष न करे (उत) और (स्वसा) बहिन (स्वसारम्) बहिन से भी (मा) नहीं। (सम्यञ्चः) एक मत वाले और (सव्रताः) एकव्रती (भूत्वा) होकर (भद्रया) कल्याणी रीति से (वाचम्) वाणी (वदत) बोलो ॥३॥
भावार्थः भाई-भाई, बहिन-बहिन और सब कुटुम्बी नियमपूर्वक मेल से वैदिक रीति पर चलकर सुख भोगें ॥३॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (मा) न (भ्राता) भाई (भ्रातरम्) भाई के साथ (द्विक्षत्) द्वेष करे, (मा) न (स्वसा) बहिन (स्वसारम्) बहिन के साथ द्वेष करे। (सम्यञ्च:) सम्यक् व्यवहारोंवाले, (सव्रताः) तथा समान कर्मोवाले (भूत्वा) होकर, (भद्रया) सुखदायक तरीके के साथ (वाचम् वदत) वाणी बोला करो।
येन देवा न वियन्ति नो च विद्विषते मिथः ।
तत्कृण्मो ब्रह्म वो गृहे संज्ञानं पुरुषेभ्यः ॥४॥
०३।०३०।०४
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (येन) जिस [वेद पथ] से (देवाः) विजय चाहनेवाले पुरुष (न) नहीं (वियन्ति) विरुद्ध चलते हैं (च) और (नो) न कभी (मिथः) आपस में (विद्विषते) विद्वेष करते हैं। (तत्) उस (ब्रह्म) वेद पथ को (वः) तुम्हारे (गृहे) घर में (पुरुषेभ्यः) सब पुरुषों के लिये (संज्ञानम्) ठीक-ठीक ज्ञान का कारण (कृण्मः) हम करते हैं ॥४॥
भावार्थः सार्वभौम हितकारी वेदमार्ग पर चलकर घर के सब लोग आनन्द भोगें ॥४॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (येन) जिस द्वारा (देवाः) माता-पिता आदि देव (न वियन्ति) न विरुद्ध-विरुद्ध मार्ग पर चलते हैं, (नो च) और न (मिथः) परस्पर (विद्विषते) विद्वेष करते हैं, (तत्) उस (ब्रह्म) अर्थात् वेद को (वः) तुम्हारे (गृहे) घर में (कृण्मः) हम नियम करते हैं, जोकि (पुरुषेभ्यः) गृहस्थ पुरुषों के लिए (संज्ञानम्) गृहजीवन सम्बन्धी यथार्थ ज्ञान देता है। देवा:=मातृदेवो भव, पितृदेवोभव, आचार्यदेवो भव (तैत्तिरीय उपनिषद् अनुवाक ११, संदर्भ २)। गृहस्थ पुरुषों के लिए वेदस्वाध्याय नियत किया है, ताकि उन्हें गृहस्थ धर्म का सम्यक्-ज्ञान हो सके।
ज्यायस्वन्तश्चित्तिनो मा वि यौष्ट संराधयन्तः सधुराश्चरन्तः । अन्यो अन्यस्मै वल्गु वदन्त एत सध्रीचीनान् वः संमनसस्क्र्णोमि ॥५॥
०३।०३०।०५
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (ज्यायस्वन्तः) बड़ों का मान रखनेवाले (चित्तिनः) उत्तम चित्तवाले, (संराधयन्तः) समृद्धि [धन धान्य की वृद्धि] करते हुए और (सधुराः) एक धुरा होकर (चरन्तः) चलते हुए तुम लोग (मा वि यौष्ट) अलग-अलग न होओ, और (अन्यो अन्यस्मै) एक दूसरे से (वल्गु) मनोहर (वदन्तः) बोलते हुए (एत) आओ। (वः) तुमको (सध्रीचीनान्) साथ-साथ गति [उद्योग वा विज्ञान] वाले और (संमनसः) एक मनवाले (कृणोमि) मैं करता हूँ ॥५॥
भावार्थः वेदानुयायी मनुष्य विद्यावृद्ध, धनवृद्ध, आयुवृद्धों का आदर करके उत्तम गुणों की प्राप्ति, और मिलकर उद्योग से, धन धान्य राज आदि बढ़ाते और आनन्द भोगते हैं ॥५॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (ज्यायस्वन्तः) बुजुर्गों की सत्तावाले, (चित्तिनः) निज-निज कर्तव्यों में सचेत, (संराधयन्तः) मिलकर गृह्यकार्यों को सिद्ध करते हुए, (सधुराः) गृहशकट को समान धुरा में (चरन्तः) मिलकर चलते हुए (मा वि यौष्ट) परस्पर वियुक्त अर्थात् पृथक् न होओ। (अन्यो अन्यस्मै) एक दूसरे के लिए (वल्गुः) शोभन अर्थात् प्रियवचन (वदन्तः) बोलते हुए (एत) घर में आया करो, (सध्रीचीनान् वः) साथ-साथ गृहकार्यों में चलते हुए तुम्हें (संमनसः) एक विचारोंवाले (कृणोमि) मैं परमेश्वर करता हूँ।
टिप्पणी: [सधुरा:=शकट की एक-धुरा में लगे बैल जैसे परस्पर मिलकर चलते हैं, वैसे गृहस्थ-शकट की धुरा में लगकर तुम सब परस्पर मिलकर चला करो। एत= बाहर के कामों से निवृत्त होकर जब घर आया करो, तो एक-दूसरे के प्रति प्रियभाषण किया करो।]
समानी प्रपा सह वोऽन्नभागः समाने योक्त्रे सह वो युनज्मि । सम्यञ्चोऽग्निं सपर्यतारा नाभिमिवाभितः ॥६॥
०३।०३०।०६
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (वः) तुम्हारी (प्रपा) जलशाला (समानी) एक हो, और (अन्नभागः) अन्न का भाग (सह) साथ-साथ हो, (समाने) एक ही [योक्त्रे] जोते में (वः) तुमको (सह) साथ-साथ (युनज्मि) मैं जोड़ता हूँ। (सम्यञ्चः) मिलकर गति [उद्योग वा ज्ञान] रखनेवाले तुम (अग्निम्) अग्नि [ईश्वर वा भौतिक अग्नि] को (सपर्यत) पूजो (इव) जैसे (अराः) अरा [पहिये के दंडे] (नाभिम्) नाभि [पहिये के बीचवाले काठ] में (अभितः) चारों ओर से [सटे होते हैं] ॥६॥
भावार्थः जैसे अरे एक नाभि में सटकर पहिये को रथ का बोझ सुगमता से ले चलने योग्य करते हैं, ऐसे ही मनुष्य एक वेदानुकूल धार्मिक रीति पर चलकर अपना खान-पान मिलकर करें, मिलकर रहें और मिलकर ही (अग्नि) को पूजें अर्थात् १-परमेश्वर की उपासना करें, २-शारीरिक अग्नि को, जो जीवन और वीरपन का चिह्न है, स्थिर रक्खें, ३-हवन करके जलवायु शुद्ध रक्खें और ४-शिल्पव्यवहार में प्रयोग करके उपकार करें और सुख से रहें ॥६॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (समानी प्रपा) एक-पानीयशाला हो, (व:) तुम्हारा (अन्नभागः) अन्न का सेवन (सह) साथ-साथ हो। (समाने योक्त्रे) एक-जुए में (व:) तुमको (सह) साथ-साथ (युनज्मि) मैं जोतता है; (सम्यञ्च:) परस्पर संगत हुए अर्थात् मिलकर (अग्निम्) अग्निहोत्र की अग्नि की (सपर्यत) पूजा किया करो, (इव) जैसे कि (नाभिम् अभितः) रथचक्र की नाभि अर्थात् केन्द्र के चारों ओर (अराः) अरा लगे होते हैं।
टिप्पणी: [अभिप्राय यह, ग्रहवासियों का खाना-पीना एक-सा और साथ-साथ बैठकर होना चाहिए। अन्नभाग:=भज सेवायाम्। समाने युक्त्रे=सधुराः चरन्तः (मन्त्र ५)। सपर्यत=सपर पूजायाम् (कण्ड्वादि)। अरा:=जैसे रथचक्र के केन्द्र के चारों ओर अरा लगे रहते हैं, वैसे अग्निहोत्र में अग्निकुण्ड के चारों ओर बैठकर अग्निहोत्र किया करो। अरा:=spokes.]
सध्रीचीनान् वः संमनसस्कृणोम्येकश्नुष्टीन्त्संवननेन सर्वान् । देवा इवामृतं रक्षमाणाः सायंप्रातः सौमनसो वो अस्तु ॥७॥
०३।०३०।०७
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (संवननेन) यथावत् सेवन वा व्यापार से (वः सर्वान्) तुम सबको (सध्रीचीनान्) साथ-साथ गति [उद्योग वा ज्ञान] वाले, (संमनसः) एक मन वाले और (एकश्नुष्टीन्) एक भोजनवाले (कृणोमि) मैं करता हूँ। (देवाः इव) विजय चाहनेवाले पुरुषों के समान (अमृतम्) अमरपन [जीवन की सफलता] को (रक्षमाणाः) रखते हुए तुम [बने रहो] (सायं प्रातः) सायंकाल और प्रातःकाल में (सौमनसः) चित्त की प्रसन्नता (वः) तुम्हारे लिये (अस्तु) होवे ॥७॥
भावार्थः ‘देव’ पुरुषार्थी विजयी पुरुष मिलकर मृत्यु के कारण आलस्य आदि छोड़ने से अमर अर्थात् यशस्वी होते हैं। इसी प्रकार सब मनुष्य आपस में मिलकर उद्योग करके सुखी रहें और सायं प्रातः दो काल परमेश्वर की आराधना करके चित्त प्रसन्न करें ॥७॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: गृहकार्यों के सम्पादन में (व:) तुम्हें, (सध्रीचीनान्) साथ-साथ चलनेवालों अर्थात् सहोद्योगियों को (संमनसः) एकमनवाले, एकविचारवाले (कृणोमि) मैं परमेश्वर करता हूँ, (संवननेन) तथा पारस्परिक मेल, सहमति द्वारा (सर्वान्) सबको (एकश्नुष्टीन्) एकविध अन्न का भोजन करनेवाला करता हूँ। (देवाः) मातृदेव तथा पितृदेव या अन्य दिव्यगुणी (इव) जैसे (अमृतम्) निज अमरपन की (रक्षमाणाः) रक्षा करते हुए (सौमनसः) प्रसन्नचित्त होते हैं, वैसे (सायम् प्रातः) सायम् तथा प्रातः काल (व:) तुम्हारे (सौमनसः) चित्त की प्रसन्नता (अस्तु) हो।
टिप्पणी: [देवा: अमृतम्=गृहस्थ में रहते मातृदेव तथा पितृ देव, गृहकार्यों में व्यापृत रहते हुए भी, निज अमरपन को न भूलें, उसकी सदा रक्षा करते रहें। श्नुष्टीन्=अश भोजने (क्र्यादिः)। एकश्नुष्टिम्= एकविधस्य अन्नस्य भुक्तिम् (सायण)।]
