वैदिक साहित्य के अध्ययन से यह भी ज्ञात होता है कि हम जितना अधिक सुख भोगेंगे उतना अधिक हमारी इन्द्रिया व शरीर के अवयव कमजोर व निर्बल होते जाते हैं जो आगे चलकर रोग व आयुनाश का कारण बनते हैं। अतः ईश्वरोपासना एवं यज्ञ प्रधान वैदिक धर्म व संस्कृति ही सर्वोत्तम साधन है जिसका अनुसरण कर मनुष्य अपने इस जीवन को शारीरिक बल की हानि व रोगों से बचाकर अपने परजन्म को भी सुधारता है। अतः हमें वेदों के मार्ग पर ही चलना चाहिये।
ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश के सप्तमसमुल्लास में बृहदारण्यक उपनिषद का वचन देकर उसका हिन्दी अनुवाद किया है। उसमें महर्षि याज्ञवल्क्य अपनी पत्नी मैत्रेयी को आत्मा में विद्यमान ईश्वर को जानने की प्रेरणा कर रहे हैं।
उपनिषद का वचन है
‘य आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्यात्मा शरीरम्। आत्मनोऽन्तरो यमयति स त आत्मान्तर्याम्यमृतः।’
इसका अर्थ करते हुए ऋषि दयानन्द लिखते हैं ‘महर्षि याज्ञवल्क्य अपनी स्त्री मैत्रेयी से कहते हैं कि हे मैत्रेयि! जो परमेश्वर आत्मा अर्थात् जीव में स्थित और जीवात्मा से भिन्न है, जिस को मूढ़ जीवात्मा नहीं जानता कि वह परमात्मा मेरे में (मेरी आत्मा में) व्यापक है, जिस परमेश्वर का जीवात्मा शरीर अर्थात् जैसे शरीर में जीव रहता है वैसे ही जीव में परमेश्वर व्यापक है। जीवात्मा से भिन्न रहकर (परमात्मा) जीव के पाप पुण्यों का साक्षी होकर उन के फल जीवों को देकर नियम में रखता है वही अविनाशीस्वरूप (परमात्मा) तेरा भी अन्तर्यामी आत्मा अर्थात् तेरे भीतर व्यापक है, उस (अपनी आत्मा और परमात्मा) को तू जान।
मंत्र
“य आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद,
यस्यात्मा शरीरम्।
आत्मनोऽन्तरो यमयति,
स त आत्मान्तर्याम्यमृतः॥”
पदच्छेद एवं शब्दार्थ
- यः = जो
- आत्मनि तिष्ठन् = आत्मा में स्थित है
- आत्मनः अन्तरः = आत्मा से भिन्न होकर भी उसके भीतर विद्यमान है
- यम् आत्मा न वेद = जिसे जीवात्मा पूर्णतः नहीं जानता
- यस्य आत्मा शरीरम् = जिसके लिए जीवात्मा शरीर के समान अधीन है
- आत्मनः अन्तरः यमयति = जो भीतर से आत्मा का नियमन करता है
- सः = वही
- ते आत्मा अन्तर्यामी = वह तुम्हारा अन्तर्यामी परमात्मा है
- अमृतः = अविनाशी, नित्य
भावार्थ
जो परमात्मा जीवात्मा के भीतर स्थित है, किन्तु जीवात्मा से भिन्न है; जिसे जीवात्मा अपनी सीमित बुद्धि से पूर्ण रूप से नहीं जान सकता; जिसके अधीन जीवात्मा है और जो भीतर से जीव के कर्मों, शक्तियों तथा जीवन-व्यवस्था का संचालन करता है—वही अमर, सर्वव्यापक और अन्तर्यामी परमात्मा है।
विस्तृत व्याख्या
यह उपनिषद् का प्रसिद्ध अन्तर्यामी ब्राह्मण है। इसमें परमात्मा और जीवात्मा के सम्बन्ध का अत्यन्त सूक्ष्म वर्णन किया गया है।
1. परमात्मा भीतर है, पर जीव नहीं है
मंत्र कहता है कि परमात्मा आत्मा के भीतर विद्यमान है, परन्तु वही आत्मा नहीं है। यदि जीव और परमात्मा पूर्णतः एक ही होते, तो "अन्तरो" (भिन्न होकर भीतर स्थित) शब्द का प्रयोग नहीं किया जाता।
जैसे—
- सूर्य के प्रकाश में अनेक वस्तुएँ दिखाई देती हैं,
- किन्तु सूर्य उन वस्तुओं से भिन्न रहता है,
वैसे ही परमात्मा प्रत्येक जीव में विद्यमान होकर भी उससे भिन्न रहता है।
2. जीवात्मा सीमित, परमात्मा असीम
“यमात्मा न वेद” का अर्थ है कि जीव अपनी सीमित बुद्धि के कारण परमात्मा के सम्पूर्ण स्वरूप को नहीं जान सकता।
मनुष्य ज्ञान प्राप्त कर सकता है, ईश्वर का अनुभव कर सकता है, परन्तु अनन्त परमात्मा को पूर्णतः सीमित बुद्धि में समेट नहीं सकता।
3. अन्तर्यामी का अर्थ
अन्तर्यामी अर्थात् भीतर से संचालित करने वाला।
परमात्मा—
- प्राणों की गति का आधार है,
- प्रकृति के नियमों का नियन्ता है,
- कर्मफल व्यवस्था का संचालक है,
- प्रत्येक जीव के हृदय में साक्षी रूप से स्थित है।
वह किसी कठपुतली की तरह जीव को बाध्य नहीं करता, बल्कि न्यायपूर्वक कर्मों का फल प्रदान करता है।
4. आत्मा परमात्मा का शरीर?
“यस्यात्मा शरीरम्” का अभिप्राय यह नहीं कि जीव वास्तव में परमात्मा का भौतिक शरीर है, बल्कि यह कि जीव परमात्मा पर आश्रित है।
जैसे शरीर आत्मा के अधीन कार्य करता है, वैसे ही समस्त जीव और जगत परमात्मा की सत्ता पर आश्रित हैं।
5. वैदिक दर्शन का संदेश
यह मंत्र तीन अनादि सत्यों की ओर संकेत करता है—
- परमात्मा — सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, अन्तर्यामी।
- जीवात्मा — चेतन, सीमित ज्ञान वाला, कर्म करने वाला।
- प्रकृति — जगत का उपादान कारण।
परमात्मा सबमें व्याप्त है, पर किसी में सीमित नहीं है।
आध्यात्मिक शिक्षा
- परमात्मा बाहर खोजने की वस्तु नहीं, वह हमारे भीतर भी विद्यमान है।
- प्रत्येक कर्म करते समय यह स्मरण रहे कि अन्तर्यामी परमात्मा सबका साक्षी है।
- आत्मचिन्तन, सत्याचरण और उपासना से परमात्मा के निकटता का अनुभव होता है।
- अहंकार का त्याग कर ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करना आध्यात्मिक उन्नति का आधार है।
निष्कर्ष
यह मंत्र बताता है कि परमात्मा प्रत्येक जीव के भीतर स्थित होकर भी उससे भिन्न, सर्वज्ञ, सर्वनियन्ता और अमर है। वही समस्त जीवन का आधार, कर्मफलदाता और अन्तर्यामी है। जब मनुष्य इस सत्य को समझ लेता है, तब उसका जीवन ईश्वर-चेतना, उत्तरदायित्व और आत्मिक शान्ति से भर जाता है।
“जो परमात्मा सबके भीतर रहकर सबका संचालन करता है, वही अन्तर्यामी, अमृत और उपासना के योग्य परम सत्य है।”
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
हम यदि अपनी आत्मा और परमात्मा को यथार्थरुप में जान लेंगे तो हमें अपने जीवन के उद्देश्य व लक्ष्य मोक्ष सहित मोक्ष प्राप्ति के साधनों का भी ज्ञान हो जायेगा और तब हम अपनी आत्मा के प्रति न्यायपूर्वक सत्य व्यवहार कर उसकी उन्नति कर सकते हैं। सांसारिक सुखों में पड़कर हम अपनी आत्मा को निर्बल करते हैं जिसका परिणाम परजन्म में उन्नति न होकर अवनति होता है। पशु, पक्षियों व स्थावर योनियों के उदाहरण हमारे सामने हैं। वेद और सत्यार्थप्रकाश पढ़कर हम जीवन जीने की सही दिशा प्राप्त कर सकते हैं और अपने मनुष्य जीवन को सार्थक कर सकते हैं।
🕉️🚩आज का वेद मंत्र 🕉️🚩
🌷ओ३म् बृहन्निदिध्म एषां भूरि शस्तं पृथु: स्वरु:।येषामिन्द्रो युवा सखा।। (यजुर्वेद ३३/२४)
💐 :- जिन महानुभाव भद्र पुरुषों ने, विषय भोगों में न फंसकर, महा तेजस्वी, सर्वव्यापक सूर्यवत् प्रतापी, एकरस, महाबली, सबसे बड़े परमेश्वर को, अपना मित्र बना लिया है, उन्हीं का जीवन सफल है। सांसारिक भोगों से विरक्त, परमेश्वर के ध्यान में और उसके ज्ञान में आसक्त, महापुरुषों के सत्संग से ही, मुमुक्षु पुरुषों का कल्याण हो सकता है, न कि विषय लंपट ईश्वर विमुखो के कुसंग का।
मंत्र
ओ३म् बृहन्निदिध्म एषां भूरि शस्तं पृथुः स्वरुः।
येषामिन्द्रो युवा सखा॥
(यजुर्वेद ३३।२४)
पदच्छेद एवं शब्दार्थ
- बृहत् = महान्, विशाल
- निदिध्मः = प्रज्वलित अग्नि, तेजस्वी प्रेरणा, उन्नति का साधन
- एषाम् = इन लोगों का
- भूरि = बहुत, प्रचुर
- शस्तम् = प्रशंसनीय, कल्याणकारी, श्रेष्ठ
- पृथुः = विस्तृत, व्यापक
- स्वरुः = प्रकाश, तेज, ज्ञान का प्रकाश
- येषाम् = जिनका
- इन्द्रः = ऐश्वर्यवान, शक्तिशाली, पराक्रमी नेतृत्वकर्ता अथवा परमेश्वर
- युवा = सदैव उत्साहयुक्त, कर्मशील, नवीन शक्ति से युक्त
- सखा = मित्र, सहायक
भावार्थ
जिन मनुष्यों का मित्र और सहायक परम शक्तिशाली, उत्साहदायक और प्रेरणादायी परमेश्वर अथवा दिव्य शक्ति होती है, उनके जीवन में महान् तेज, व्यापक ज्ञान, प्रचुर कल्याण और प्रशंसनीय उन्नति का प्रकाश फैलता है।
विस्तृत व्याख्या
यह मंत्र मनुष्य के जीवन में दिव्य मित्रता, उत्साह, ज्ञान और पुरुषार्थ के महत्व को बताता है।
1. इन्द्र युवा सखा
यहाँ "इन्द्र" का तात्पर्य केवल किसी देवता विशेष से नहीं, बल्कि उस सर्वोच्च शक्ति से है जो मनुष्य को सामर्थ्य, उत्साह और विजय प्रदान करती है। "युवा" विशेषण यह दर्शाता है कि परमात्मा की प्रेरणा कभी वृद्ध नहीं होती; वह सदैव नवीन, जाग्रत और प्रेरणास्पद रहती है।
जब मनुष्य ईश्वर को अपना सच्चा मित्र मानता है, तब उसके भीतर आत्मविश्वास, निर्भयता और पुरुषार्थ का विकास होता है।
2. बृहत् प्रकाश का जीवन
"बृहन्निदिध्म" और "पृथुः स्वरुः" ऐसे जीवन की ओर संकेत करते हैं जो ज्ञान, चरित्र और कर्म से प्रकाशित हो। जिस व्यक्ति के विचार ऊँचे होते हैं, उसका प्रभाव भी व्यापक होता है।
ज्ञान का प्रकाश केवल स्वयं को नहीं, बल्कि समाज को भी दिशा देता है।
3. भूरि शस्तम्
ऐसे व्यक्तियों के कार्य बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय होते हैं। वे समाज में सम्मान प्राप्त करते हैं क्योंकि उनका जीवन लोककल्याण, सत्य और न्याय पर आधारित होता है।
4. वैदिक जीवन-दृष्टि
वेद मनुष्य को निराशा, आलस्य और दुर्बलता से ऊपर उठने की प्रेरणा देते हैं। जो व्यक्ति ईश्वर के नियमों का पालन करते हुए पुरुषार्थ करता है, उसके जीवन में ज्ञान, यश, समृद्धि और कल्याण की वृद्धि होती है।
सामाजिक सन्देश
- ईश्वर को अपना सच्चा मित्र मानो।
- आत्मबल और पुरुषार्थ को विकसित करो।
- ज्ञान का प्रकाश स्वयं प्राप्त करो और दूसरों तक पहुँचाओ।
- ऐसे कार्य करो जो समाज के लिए हितकारी हों।
- सदैव उत्साह और नवचेतना के साथ जीवन जियो।
निष्कर्ष
यह मंत्र घोषणा करता है कि जिस मनुष्य का सखा परमात्मा है, उसका जीवन ज्ञान, तेज, यश और कल्याण से परिपूर्ण हो जाता है। ईश्वर की प्रेरणा से युक्त व्यक्ति स्वयं भी प्रकाशित होता है और समाज को भी प्रकाश प्रदान करता है।
"ईश्वर का सच्चा मित्र वही बनता है जो सत्य, ज्ञान और पुरुषार्थ के मार्ग पर चलता है; और ऐसा व्यक्ति अपने जीवन में महान् सफलता तथा लोकमंगल का आधार बनता है।"
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
