सृष्टि की क्रमबद्ध व्यवस्था और परमात्मा की सर्वोच्च सत्ता यजुर्वेद 14.28 का गहन वैदिक संदेश
ॐ
मन्त्र
— यजुर्वेद 14.28
भूमिका
यजुर्वेद का यह मन्त्र सृष्टि की उत्पत्ति, ज्ञान की स्थापना और समाज की सुव्यवस्थित व्यवस्था का अत्यन्त गूढ़ वर्णन करता है। यह मन्त्र किसी पौराणिक कथा का वर्णन नहीं करता, बल्कि यह बताता है कि परमात्मा ने इस सृष्टि की रचना एक निश्चित नियम, क्रम और उद्देश्य के अनुसार की है।
वेदों के अनुसार सृष्टि अराजकता का परिणाम नहीं है। इसके पीछे सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और न्यायकारी परमात्मा की बुद्धिमत्तापूर्ण योजना कार्य करती है। उसी ने जीवों के रहने योग्य संसार की व्यवस्था बनाई, ज्ञान का प्रकाश फैलाया, पंचमहाभूतों की रचना की और ऐसे ऋषियों को उत्पन्न किया जिन्होंने मानव समाज को सत्य, विज्ञान और धर्म का मार्ग दिखाया।
यह मन्त्र हमें यह भी सिखाता है कि किसी भी समाज की उन्नति के लिए प्रजा, ज्ञान, प्रकृति और ऋषि-परम्परा—इन चारों का संतुलित विकास आवश्यक है।
मन्त्र
शब्दार्थ
- एकया — एक के द्वारा, प्रथम व्यवस्था से।
- स्तुवत् — स्तुति करते हुए, ईश्वर की महिमा का वर्णन करते हुए।
- प्रजाः — समस्त जीव, प्राणी, मानव समाज।
- अधीयन्त — स्थापित हुए, प्रकट हुए।
- प्रजापतिः — प्रजा का पालन करने वाला परमात्मा।
- अधिपतिः — सर्वोच्च स्वामी।
- तिसृभिः — तीन के द्वारा।
- ब्रह्म — वेदज्ञान, दिव्य ज्ञान।
- ब्रह्मणस्पतिः — ज्ञान का अधिष्ठाता परमात्मा।
- पञ्चभिः — पाँच के द्वारा।
- भूतानि — पंचमहाभूत तथा समस्त प्राणी।
- भूतानां पतिः — समस्त प्राणियों का स्वामी।
- सप्तभिः — सात के द्वारा।
- सप्त ऋषयः — ज्ञान के प्रचारक महान ऋषि।
- धाता — सृष्टि का धारण-पोषण करने वाला परमात्मा।
भावार्थ
सृष्टि के आदि में परमात्मा की व्यवस्था से प्रजा की उत्पत्ति हुई और वही उनका स्वामी था। फिर परमात्मा ने वेदज्ञान का प्रकाश किया और वही ज्ञान का अधिपति रहा। इसके पश्चात् पंचमहाभूतों और समस्त प्राणियों की व्यवस्था स्थापित हुई, जिनका भी वही स्वामी है। तत्पश्चात् महान ऋषियों का प्रादुर्भाव हुआ, जिन्होंने वेदज्ञान का प्रचार कर मानवता का मार्गदर्शन किया। इन सबका आधार और अधिपति एकमात्र परमात्मा ही है।
परमात्मा ही सृष्टि का सर्वोच्च अधिपति है
मन्त्र की प्रत्येक पंक्ति "अधिपतिरासीत्" शब्द पर समाप्त होती है।
यह बार-बार यह स्पष्ट करती है कि—
- प्रजा का स्वामी परमात्मा है।
- ज्ञान का स्वामी परमात्मा है।
- प्रकृति का स्वामी परमात्मा है।
- ऋषियों का भी स्वामी परमात्मा है।
अर्थात् सम्पूर्ण सृष्टि किसी मनुष्य, देवता या अन्य सत्ता के अधीन नहीं, बल्कि केवल एक सर्वशक्तिमान परमात्मा के अधीन है।
ज्ञान सृष्टि का प्रथम प्रकाश है
मन्त्र में प्रजा के बाद ब्रह्म अर्थात् वेदज्ञान का उल्लेख किया गया है।
यह इस बात का संकेत है कि केवल जन्म लेना पर्याप्त नहीं है। यदि ज्ञान न हो तो मनुष्य और पशु के जीवन में कोई विशेष अन्तर नहीं रह जाता।
वेदों के अनुसार शिक्षा, विवेक, विज्ञान, नैतिकता और आध्यात्मिक ज्ञान ही मानव जीवन को महान बनाते हैं।
पंचमहाभूतों का महत्व
मन्त्र में भूतानि शब्द पंचमहाभूतों और समस्त प्राणियों की ओर संकेत करता है।
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—इन्हीं पाँच तत्वों से हमारा शरीर और सम्पूर्ण संसार बना है।
इसलिए वेद हमें इन प्राकृतिक तत्वों का सम्मान करने और उनका संरक्षण करने की शिक्षा देते हैं। प्रकृति का संतुलन बिगाड़ना ईश्वर की व्यवस्था के विरुद्ध कार्य करना है।
सप्त ऋषियों का वास्तविक महत्व
मन्त्र में सप्त ऋषि का उल्लेख अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
वैदिक परम्परा में ऋषि वे हैं जिन्होंने परमात्मा के ज्ञान को ग्रहण किया, उसका गहन चिन्तन किया और उसे समाज तक पहुँचाया।
ऋषि अन्धविश्वास नहीं फैलाते, बल्कि—
- सत्य का प्रचार करते हैं।
- विज्ञान और तर्क का सम्मान करते हैं।
- धर्म और नैतिकता की शिक्षा देते हैं।
- मानव समाज को उन्नति का मार्ग दिखाते हैं।
आज भी प्रत्येक सच्चा शिक्षक, शोधकर्ता और सत्य का प्रचारक ऋषि-परम्परा का ही प्रतिनिधि है।
सृष्टि की क्रमबद्ध व्यवस्था
यह मन्त्र बताता है कि सृष्टि में सब कुछ नियम और क्रम से चलता है।
- सूर्य समय पर उदित होता है।
- ऋतुएँ निश्चित क्रम से आती हैं।
- प्रकृति निश्चित नियमों का पालन करती है।
- कर्म का फल भी निश्चित नियम के अनुसार मिलता है।
इसलिए मनुष्य को भी अनुशासन, मर्यादा और ईश्वर के नियमों के अनुसार जीवन जीना चाहिए।
आज के समाज के लिए प्रेरणा
आज संसार अनेक समस्याओं से घिरा हुआ है—अज्ञान, पर्यावरण संकट, नैतिक पतन और सामाजिक असंतुलन।
यह मन्त्र हमें बताता है कि यदि समाज को उन्नत बनाना है तो—
- शिक्षा का प्रसार करना होगा।
- प्रकृति का संरक्षण करना होगा।
- विद्वानों का सम्मान करना होगा।
- ईश्वर के नियमों के अनुसार जीवन जीना होगा।
यही स्थायी विकास का वास्तविक आधार है।
इस मन्त्र की मुख्य शिक्षाएँ
- सम्पूर्ण सृष्टि का वास्तविक स्वामी केवल परमात्मा है।
- ज्ञान मानव जीवन की सबसे बड़ी शक्ति है।
- प्रकृति का संरक्षण प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है।
- ऋषि समाज के मार्गदर्शक होते हैं।
- सृष्टि नियम और अनुशासन से संचालित होती है।
- समाज की उन्नति ज्ञान, प्रकृति और सदाचार के संतुलन से होती है।
- ईश्वर की व्यवस्था का पालन ही वास्तविक धर्म है।
उपसंहार
यजुर्वेद 14.28 का यह मन्त्र हमें सृष्टि की वैज्ञानिक, नैतिक और आध्यात्मिक व्यवस्था का अद्भुत दर्शन कराता है। यह बताता है कि परमात्मा ही सम्पूर्ण जगत का सर्वोच्च अधिपति है। उसी ने प्रजा, ज्ञान, प्रकृति और ऋषि-परम्परा की स्थापना करके मानव जीवन को उन्नति का मार्ग प्रदान किया।
यदि हम इस वैदिक संदेश को अपने जीवन में अपनाएँ, ज्ञान को महत्व दें, प्रकृति की रक्षा करें, विद्वानों का सम्मान करें और परमात्मा के नियमों के अनुसार जीवन जीएँ, तो हमारा व्यक्तिगत जीवन, समाज और राष्ट्र—तीनों समृद्ध और सुखी बन सकते हैं।
॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
🔥भतृहरी वैराग्य शतक में विद्या की प्रशंसा करते हुए कहा गया है -
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येषां न विद्या न तपो न दानं न शील न गुणों न धर्म:। ते मृत्यु लोके भूवि भारभूत मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ।।
जिस मनुष्य ने न विद्या प्राप्त की है , न ही धर्म अथवा ज्ञान प्राप्ती के लिये तप किया है , न कष्ट सहन किया है , न कभी दान किया है , न उसने शील और दुसरे गुणों को धारण किया है , ऐसा मनुष्य इस पृथ्वी पर भार ही है।वह मनुष्य पशु रूप में पशु के समान ही विचरण कर रहा है।
सभी ऋषि , मुनियों और वेद का भी यही मानना है कि बिना ज्ञान के मुक्ति संभव नही है।इसलिए वेदों में ज्ञान प्राप्ती मनुष्य मात्र के लिये आवश्यक बताई गई है।इस विषय में यजुर्वेद का कहना है।
यथेमां वाचं कल्याणी भावदानी जनैभ्य:। ब्रह्म राजन्याभ्यां शूद्रयचार्यायच स्वाय चारणाय च.।।
हें मनुष्यों जैसे मैं ईश्वर ब्राह्मण और क्षत्रियों को , वैश्य को, शूद्रों को, स्त्रियों को सेवको आदि को , सबका कल्याण करने वाली वेद वाणी का उपदेश करता हूँ। वैसे आप भी करे। मंत्र में स्पष्ट रूप से ज्ञानार्जन प्रत्येक व्यक्ति के लिये सुलभ करने को कहां गया है।
फिर अथर्ववेद के काण्ड- ४ 'सुक्त २१' के सातो मंत्रों में विद्या की ही प्रशंसा की गयी है।अथर्ववेद का यह भी मानना है कि विद्या(वेदों) का प्रादुर्भाव परब्रह्म परमेश्वर के द्वारा सृष्टि के प्रारम्भ से ही हुआ है। उसने अपने ज्ञान (वेद ) में से मनुष्य के लियें आवश्यक वेदों के ज्ञान का दान सृष्टि के प्रारम्भ में ही कर दिया है। विद्या ( वेदों ) का ज्ञान कल्याण करने वाला होता है और वह सृष्टि के प्रारम्भ में ही परमात्मा के द्वारा दिया जाता है।
सर्वेषामेव दानानां ब्रह्मदानं विशिष्यते।
वार्यन्नगो-महीवासस्तिलकाञ्चनसर्पिषाम्। (मनुस्मृति)
संसार में जितने दान है अर्थात् जल, अन्न, गौ पृथ्वी , वस्त्र , तिल, सुवर्ण, धृत आदि इन सब दानों से वेद विद्या का दान अति श्रेष्ठ है।
कोई कितना ही ज्ञानी और विद्यावान हो , यदि वह अपने आचरण में विद्या और ज्ञान का उपयोग नही करता तो वह मूर्ख ही नही महामूर्ख हैं। वह उस जानवर की तरह है जिस पर बहुत सी किताबें लदी होती है पर वह उन पुस्तकों के ज्ञान से लाभ नही उठा पाता। जैसे तपेली और कलछी को स्वादिष्ट व्यंजन के स्वाद का आनन्द नही मिलता।
🔥ओ३म् एकयास्तुवत प्रजाऽ अधीयन्त प्रजापतिरधिपतिरासीत्। तिसृभिरस्तुवत ब्रह्मासृज्यत ब्रह्मणस्पतिरधिपतिरासीत्।पञ्चभिरस्तुवत भूतान्यसृज्यन्त भूतानां पतिरधिपतिरासीत्। सप्तभिरस्तुवत सप्तऽ ऋषयोऽसृज्यन्त धाताधिपतिरासीत्॥ यजुर्वेद १४-२८॥
💐 अर्थ :- इस ब्रह्मांड के निर्माता ईश्वर है। वो ही तो है जिन्होंने हमारी आत्मा को मनुष्य शरीर दिया है। उनकी स्तुति एक वाणी से करे। उन्होंने हमारे जीवन को चलाने और मुक्ति प्राप्त करने के लिए सर्वश्रेष्ठ ज्ञान, वेद दिये। उस ईश्वर ने पांच महाभूत- पृथ्वी, जल, तेज, वायु आकाश बनाऐ। जिससे समस्त प्रकृति का निर्माण हुआ। मानव शरीर भी प्रकृति का एक अंश है। हमें उसकी स्तुति पांच (शरीर, मन, बुद्धि ,स्मृति, चेतना) से करनी चाहिए। ईश्वर ने सप्त ऋषय - दो कान, दो नासिका, दो आंख और एक मुख बनाए। इन सप्त ऋषय से भूतों का मनुष्य ज्ञान प्राप्त करे और उनमें उस रचीयता के महत्व के दर्शन करे। वह सब को धारण करने वाला है। वह सब का स्वामी है ।हमें उसकी स्तुति करनी चाहिये।

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