यजुर्वेद ३१।१९ : प्रजापति का चेतना-विज्ञान एवं ब्रह्माण्डीय रहस्य

यजुर्वेद ३१।१९ : प्रजापति का चेतना-विज्ञान एवं ब्रह्माण्डीय रहस्य


अजन्मा प्रजापति – सर्वव्यापक परमात्मा का वैदिक संदेश

वैदिक मंत्र

ॐ प्र॒जाप॑तिश्च॒रति॒ गर्भे॑ अ॒न्तरजा॑यमानो बहु॒धा वि जा॑यते ।
तस्य॒ योनिं॒ परि॑ पश्यन्ति॒ धीरा॒स्तस्मि॑न् ह तस्थु॒र्भुव॑नानि॒ विश्वा॑ ॥

(यजुर्वेद ३१।१९)


🌺 मंत्र की शब्द-दर-शब्द वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक व्याख्या

शब्द शाब्दिक अर्थ वैज्ञानिक / दार्शनिक संकेत
प्रजापतिः समस्त प्रजा का स्वामी समस्त ब्रह्माण्ड का नियामक, सार्वभौमिक चेतना एवं सृष्टि-व्यवस्था का मूल कारण।
चरति विचरण करता है प्रत्येक कण, प्रत्येक ऊर्जा और प्रत्येक जीव में सतत सक्रिय सत्ता।
गर्भे गर्भ में, भीतर प्रत्येक परमाणु, प्रत्येक जीव, प्रत्येक सृष्टि-बीज तथा सृजन की मूल अवस्था।
अन्तः भीतर बाह्य नहीं, प्रत्येक अस्तित्व के अंतरतम में स्थित चेतना।
अजायमानः जन्मरहित जो स्वयं किसी कारण से उत्पन्न नहीं हुआ; अनादि, अनन्त और शाश्वत।
बहुधा अनेक प्रकार से प्रकृति के असंख्य रूपों, नियमों और जीवन-प्रक्रियाओं में प्रकट होने वाला।
विजायते प्रकट होता है स्वयं जन्म नहीं लेता, किन्तु अपनी शक्ति द्वारा अनंत रूपों में व्यक्त होता है।
तस्य उसी परमात्मा का उसी सर्वव्यापक सत्ता का।
योनिम् मूल कारण, उद्गम समस्त सृष्टि का आधार, कारण और उत्पत्ति का रहस्य।
परि पश्यन्ति चारों ओर देखते हैं ज्ञानी पुरुष समस्त सृष्टि में उसी एक सत्ता का दर्शन करते हैं।
धीराः धैर्यवान, ज्ञानी, ध्यानशील विवेक, तप और ध्यान से सत्य का अनुभव करने वाले।
तस्मिन् उसी में उसी परमात्मा में।
निश्चय ही सत्य का दृढ़ प्रतिपादन।
तस्थुः स्थित हैं टिके हुए हैं, उसी पर आश्रित हैं।
भुवनानि समस्त लोक सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड, सभी लोक एवं जीवन-व्यवस्थाएँ।
विश्वा सभी सम्पूर्ण चराचर जगत।

🌼 संक्षिप्त भावार्थ

परम प्रजापति जन्मरहित होकर भी प्रत्येक जीव, प्रत्येक कण और सम्पूर्ण सृष्टि के अंतर में विद्यमान है। वही अपनी दिव्य शक्ति से अनन्त रूपों में प्रकट होता है। ज्ञानीजन उसी को समस्त सृष्टि का मूल कारण मानते हैं और अनुभव करते हैं कि सम्पूर्ण विश्व उसी परम सत्ता में स्थित है।


🌞 आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक संकेत

  • परमात्मा किसी एक स्थान तक सीमित नहीं, बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की आधारभूत चेतना है।
  • सृष्टि निरंतर परिवर्तनशील है, किन्तु उसका मूल कारण अजन्मा और शाश्वत है।
  • प्रत्येक जीव और प्रत्येक पदार्थ के भीतर वही दिव्य सत्ता कार्यरत है।
  • ध्यान, विवेक और आत्मचिन्तन से उस परम सत्य का अनुभव किया जा सकता है।
  • सम्पूर्ण विश्व एक ही सार्वभौमिक व्यवस्था से संचालित हो रहा है; यही वैदिक "ऋत" का सिद्धान्त है।

ओ३म् प्र॒जाप॑तिश्च॒रति॒ गर्भे॑ अ॒न्तरजा॑यमानो बहु॒धा वि जा॑यते । तस्य॒ योनिं॒ परि॑ पश्यन्ति॒ धीरा॒स्तस्मि॑न् ह तस्थु॒र्भुव॑नानि॒ विश्वा॑ ।। १९ ।। यजुर्वेद 31/19

प्रजापति: समस्त जीव का स्वामी परमात्मा चरति सभी जीवों में समान रूप से विद्यमान गतिशील है, सभी जीवों के अंतःकरण में अन्त: उनकी अन्तरात्मा में अजायमान: जो जन्म मरण से सर्वथा मुक्त है, बहुधा अनेकों प्रकार के जीवों कि बुद्धि से परे स्वयं के शाश्वत सार्वभौमिक ज्ञान के सामर्थ्य से विजायते विशेष सूक्ष्म वैज्ञानिक रूप से प्रकट होता है, इसलिए तस्य उस परमात्मा का केन्द्र योनिम् मूलकारण उद्गम परि पश्यन्ति धिरा: अत्यंत मेधावी बुद्धि मान जन उसको अपने हृदय में व्याप्त पाते हैं, क्योंकि तस्मिन् उस परमात्मा में ही ह निश्चित रूप से सारा विश्व ब्रह्माण्ड तस्थु: उपस्थित है, भुवनानि समस्त लोकलोकांतर विश्वा ब्रह्माण्डीय ईश्वरी स्वरूप है।

प्रजापति का वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक स्वरूप

यजुर्वेद ३१।१९ का शब्द-दर-शब्द वैज्ञानिक एवं चेतना-विज्ञान आधारित विवेचन (भाग–१)

मंत्र

ॐ प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरजायमानो बहुधा विजायते।
तस्य योनिं परिपश्यन्ति धीरास्तस्मिन्ह तस्थुर्भुवनानि विश्वा॥

यजुर्वेद ३१।१९


भूमिका

यह मंत्र परमात्मा के उस सार्वभौमिक स्वरूप का उद्घाटन करता है जो किसी सीमित स्थान, काल अथवा पदार्थ में बँधा हुआ नहीं है। यहाँ प्रजापति किसी विशेष व्यक्ति, देवता अथवा ऐतिहासिक सत्ता का नाम नहीं, बल्कि उस अनन्त, सर्वव्यापक और चेतन सत्ता का नाम है जो सम्पूर्ण जीवमात्र का आधार है। वही प्रत्येक जीव के अन्तःकरण में समान रूप से विद्यमान रहकर उसके जीवन, ज्ञान, गति और विकास का मूल कारण है।

यह मंत्र बाह्य जगत से अधिक मनुष्य के अन्तर्जगत की ओर संकेत करता है। साधक जब अपने अन्तःकरण की गहराइयों में प्रवेश करता है, तब उसे अनुभव होता है कि जीवन का वास्तविक केन्द्र बाहर नहीं, भीतर है। वही केन्द्र परमात्मा का निवास है। उसी के कारण चेतना सक्रिय है, बुद्धि प्रकाशित है, प्राण गतिशील हैं और सम्पूर्ण सृष्टि नियमबद्ध रूप से संचालित हो रही है।

इस मंत्र का प्रत्येक शब्द चेतना-विज्ञान का एक सूत्र है। प्रत्येक पद साधक को स्वयं के भीतर उतरने की प्रेरणा देता है।


प्रजापतिः — समस्त जीवों का स्वामी परमात्मा

प्रजापति का अर्थ है—समस्त प्राणियों का स्वामी, पालनकर्ता और नियन्ता परमात्मा।

यह स्वामित्व किसी बाहरी शासन का नहीं, बल्कि अस्तित्व का है। जैसे सूर्य बिना घोषणा किए सम्पूर्ण पृथ्वी को प्रकाश देता है, वैसे ही परमात्मा बिना किसी पक्षपात के प्रत्येक जीव में समान रूप से विद्यमान है।

वह किसी जाति, सम्प्रदाय, राष्ट्र अथवा ग्रह का स्वामी नहीं, बल्कि समस्त चेतन जीवन का मूल आधार है।

समस्त जीव उसी के कारण जीवित हैं। शरीर बदलते रहते हैं, जीवन की परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं, किन्तु जिस सत्ता से जीवन प्रकाशित है, वह अपरिवर्तनशील रहती है।

प्रजापति का अर्थ केवल सृष्टि का रचयिता नहीं है, बल्कि वह सत्ता है जो प्रत्येक क्षण सृष्टि के प्रत्येक अंश में विद्यमान रहकर जीवन की निरन्तरता बनाए रखती है।

यदि वह चेतना एक क्षण के लिए भी अपनी उपस्थिति हटा ले, तो सम्पूर्ण जीवन-व्यवस्था उसी क्षण समाप्त हो जाए।

अतः प्रजापति कोई दूर स्थित देवता नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव के अस्तित्व का मूलाधार है।


चरति — सभी जीवों में समान रूप से विद्यमान गतिशील है

मंत्र कहता है—चरति

अर्थात् वह परमात्मा जड़ नहीं है।

वह निष्क्रिय नहीं है।

वह प्रत्येक जीव में निरन्तर गतिशील है।

उसकी गति बाहरी पैरों से नहीं, बल्कि चेतना के रूप में है।

उसी के कारण हृदय धड़कता है।

उसी के कारण विचार उत्पन्न होते हैं।

उसी के कारण बुद्धि निर्णय लेती है।

उसी के कारण प्रकृति के प्रत्येक नियम सक्रिय रहते हैं।

उसकी गति इतनी सूक्ष्म है कि सामान्य इन्द्रियाँ उसे नहीं पकड़ सकतीं।

किन्तु उसी गति के कारण सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड चल रहा है।

परमाणु से लेकर आकाशगंगाओं तक जो व्यवस्था दिखाई देती है, उसका मूल कारण वही चेतन गति है।

इसीलिए मंत्र उसे "चरति" कहता है।

वह कहीं से आता-जाता नहीं।

वह सर्वत्र उपस्थित रहकर निरन्तर कार्यशील है।


गर्भे अन्तः — सभी जीवों की अन्तरात्मा में विद्यमान

मंत्र का अगला शब्द है—गर्भे अन्तः

यहाँ गर्भ केवल जैविक गर्भ नहीं है।

गर्भ का अर्थ है—

जिसके भीतर जीवन का बीज सुरक्षित है।

प्रत्येक जीव के अन्तःकरण में एक ऐसा केन्द्र है जहाँ से उसकी चेतना प्रकाशित होती है।

वही उसका वास्तविक गर्भ है।

परमात्मा उसी केन्द्र में विद्यमान है।

मन बदलता है।

विचार बदलते हैं।

भावनाएँ बदलती हैं।

शरीर बदलता है।

किन्तु जो सबका साक्षी है, वह नहीं बदलता।

यही अन्तरात्मा का केन्द्र है।

परमात्मा बाहर खोजने की वस्तु नहीं।

वह पहले से ही प्रत्येक जीव के अन्तर में स्थित है।

जब साधक का मन बाह्य विषयों से हटकर भीतर उतरता है, तब उसी गर्भस्थ चेतना का अनुभव प्रारम्भ होता है।

यही इस मंत्र का आन्तरिक विज्ञान है।


अजायमानः — जन्म और मृत्यु से सर्वथा मुक्त

मंत्र का अगला महान् शब्द है—अजायमानः

जो जन्म नहीं लेता।

जिसका कभी आरम्भ नहीं हुआ।

जिसका कभी अन्त नहीं होगा।

जन्म और मृत्यु शरीर के हैं।

परिवर्तन प्रकृति का है।

किन्तु परमात्मा परिवर्तन के नियम से परे है।

वह समय से पहले भी था।

समय के बाद भी रहेगा।

उसका अस्तित्व किसी कारण पर निर्भर नहीं।

वह स्वयं अपने अस्तित्व का कारण है।

इसीलिए वह जन्मरहित है।

जिसे जन्म लेना पड़े, वह सीमित होगा।

जो सीमित होगा, वह नश्वर होगा।

परन्तु परमात्मा न सीमित है, न नश्वर।

इसीलिए वह अजन्मा है।

साधक जब अपने भीतर उस अजन्मा चेतन तत्व का अनुभव करता है, तभी मृत्यु का भय समाप्त होने लगता है।

क्योंकि तब वह समझता है कि परिवर्तन शरीर में है, चेतना में नहीं।


प्रजापति का वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक स्वरूप

यजुर्वेद ३१।१९ का शब्द-दर-शब्द वैज्ञानिक एवं चेतना-विज्ञान आधारित विवेचन (भाग–२)


बहुधा विजायते — परमात्मा अपनी शाश्वत ज्ञानशक्ति से अनन्त रूपों में प्रकट होता है

मंत्र कहता है—

"बहुधा विजायते।"

यहाँ अत्यन्त सूक्ष्म रहस्य छिपा हुआ है।

परमात्मा स्वयं अजायमान है, अर्थात् जन्मरहित है। जो स्वयं जन्म नहीं लेता, वही अपनी अनन्त शक्ति से अनन्त रूपों में प्रकट होता है। यही "बहुधा विजायते" का वास्तविक संकेत है।

इसका अर्थ यह नहीं कि परमात्मा अनेक टुकड़ों में विभाजित हो जाता है। परमात्मा अपनी पूर्णता में स्थित रहकर अपनी चेतना, ज्ञान और शक्ति के द्वारा असंख्य जीवों में जीवन का संचार करता है।

जैसे एक सूर्य करोड़ों जलाशयों में प्रतिबिम्बित होता है, किन्तु स्वयं विभाजित नहीं होता; उसी प्रकार परमात्मा प्रत्येक जीव के अन्तःकरण में प्रकाशित होकर भी एक ही रहता है।

इसी प्रकार एक विद्युत् स्रोत असंख्य यंत्रों को शक्ति देता है, किन्तु स्वयं अनेक नहीं हो जाता। प्रत्येक यंत्र अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार उस शक्ति को ग्रहण करता है। ठीक वैसे ही प्रत्येक जीव अपनी पात्रता, संस्कार, बुद्धि और चेतना के अनुसार परमात्मा के ज्ञान का अनुभव करता है।

परमात्मा किसी विशेष भाषा, संस्कृति, देश या सम्प्रदाय में सीमित होकर प्रकट नहीं होता। उसका प्रकाश सर्वत्र है। वह प्रकृति के नियमों में भी प्रकट है, जीवन की धड़कन में भी, विचार की सूक्ष्मता में भी और आत्मबोध की परम अनुभूति में भी।

इसीलिए मंत्र "बहुधा" कहता है—असंख्य प्रकार से, अनन्त प्रकार से, निरन्तर।


विजायते — विशेष सूक्ष्म वैज्ञानिक रूप से प्रकट होता है

"वि" उपसर्ग यहाँ विशेषता का बोध कराता है।

परमात्मा का प्रकट होना स्थूल नहीं, सूक्ष्म है।

वह आँखों से दिखाई देने वाली वस्तु नहीं है, बल्कि वह वह सत्ता है जिसके कारण आँख देखती है।

वह कानों से सुनाई देने वाली ध्वनि नहीं है, बल्कि वही शक्ति है जिसके कारण श्रवण सम्भव है।

वह मस्तिष्क नहीं है, किन्तु वही चेतना है जिसके कारण मस्तिष्क विचार करता है।

वह हृदय नहीं है, किन्तु वही जीवन है जिसके कारण हृदय स्पन्दित होता है।

इस प्रकार परमात्मा का प्राकट्य पदार्थ के रूप में नहीं, बल्कि प्रत्येक पदार्थ के पीछे कार्यरत सार्वभौमिक चेतना के रूप में है।

जो जितना सूक्ष्म होता जाता है, वह उतना ही उस दिव्य सत्ता का अनुभव करने लगता है।

इसीलिए ऋषि बाहरी प्रमाणों से अधिक अन्तःकरण की निर्मलता पर बल देते हैं।


तस्य — उसी परमात्मा का

मंत्र आगे कहता है—

"तस्य..."

अर्थात् उसी परमात्मा का।

जो अजन्मा है।

जो सर्वव्यापक है।

जो सबके भीतर चरति है।

जो अनन्त रूपों में अपनी शक्ति का प्रकाश करता है।

अब मंत्र साधक का ध्यान उसके मूल केन्द्र की ओर ले जाता है।


योनिम् — मूल कारण, उद्गम और चेतना का केन्द्र

यहाँ "योनि" शब्द का अर्थ केवल जन्मस्थान नहीं है।

यहाँ इसका अर्थ है—

मूल कारण।

मूल उद्गम।

चेतना का आधार।

सृष्टि में जो कुछ भी प्रकट होता है, उसका कोई न कोई कारण होता है।

किन्तु उन सभी कारणों का भी एक अंतिम कारण है।

वही परमात्मा है।

जीव का शरीर बदलता है।

विचार बदलते हैं।

अनुभव बदलते हैं।

परन्तु जिस चेतना के कारण यह सब सम्भव है, वही वास्तविक मूल केन्द्र है।

साधक जब ध्यान में अपने भीतर उतरता है, तब वह बाहरी घटनाओं से हटकर उसी मूल केन्द्र की खोज करता है।

यही "योनिम्" का आध्यात्मिक रहस्य है।

परमात्मा किसी दिशा में नहीं मिलता।

वह उसी मूल चेतना में अनुभव होता है जहाँ से जीवन का सम्पूर्ण प्रवाह प्रारम्भ होता है।


परि पश्यन्ति — चारों ओर नहीं, सम्पूर्णता में दर्शन करते हैं

"परि" का अर्थ है—सम्पूर्ण रूप से।

"पश्यन्ति" अर्थात् देखते हैं।

ध्यान रहे—

यह सामान्य नेत्रों से देखने की बात नहीं है।

यह अनुभूति की दृष्टि है।

जब साधक का अन्तःकरण निर्मल होता है, तब वह परमात्मा को किसी मूर्ति, किसी स्थान अथवा किसी विशेष दिशा तक सीमित नहीं देखता।

वह अनुभव करता है कि सम्पूर्ण जीवन उसी चेतना से प्रकाशित है।

वह वृक्ष में भी उसी सत्ता को अनुभव करता है।

जीव में भी।

प्रकृति में भी।

अपने भीतर भी।

यही समग्र दृष्टि "परि पश्यन्ति" है।


धीराः — अत्यन्त मेधावी, स्थिरबुद्धि और आत्मद्रष्टा

मंत्र कहता है—

"धीराः"

धीर केवल विद्वान नहीं होता।

धीर वह है जिसकी बुद्धि स्थिर है।

जिसका विवेक जागृत है।

जो परिस्थितियों से विचलित नहीं होता।

जो मन के शोर से ऊपर उठ चुका है।

जिसने अपने अन्तःकरण को निर्मल किया है।

ऐसे धीर पुरुष परमात्मा को कल्पना से नहीं, अनुभव से जानते हैं।

उनका ज्ञान केवल स्मृति का संग्रह नहीं होता।

वह प्रत्यक्ष अनुभूति से उत्पन्न होता है।

उनके लिए परमात्मा कोई विश्वास नहीं, बल्कि जीवन का प्रत्यक्ष सत्य बन जाता है।

इसीलिए वे उसी परम चेतना को अपने हृदय में व्याप्त अनुभव करते हैं।

धीरता का अर्थ है—

मन की चंचलता का अंत।

बुद्धि की निर्मलता।

चेतना की जागृति।

और आत्मा का परमात्मा की ओर पूर्ण समर्पण।

यही धीर पुरुष इस मंत्र के वास्तविक साधक हैं।


प्रजापति का वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक स्वरूप

यजुर्वेद ३१।१९ का शब्द-दर-शब्द वैज्ञानिक एवं चेतना-विज्ञान आधारित विवेचन (भाग–३)


तस्मिन् — उसी परमात्मा में ही सम्पूर्ण अस्तित्व का आधार है

मंत्र अब अपने चरम रहस्य का उद्घाटन करता है—

"तस्मिन्..."

अर्थात् उसी परमात्मा में।

यहाँ "तस्मिन्" केवल किसी स्थान का बोध नहीं कराता, बल्कि उस परम चेतना की ओर संकेत करता है जो सम्पूर्ण सृष्टि का आधार है। जैसे समुद्र के बिना तरंगों का कोई अस्तित्व नहीं होता, वैसे ही परमात्मा के बिना किसी भी जीव, पदार्थ अथवा ब्रह्माण्ड का अस्तित्व सम्भव नहीं है।

परमात्मा किसी वस्तु के भीतर सीमित होकर नहीं रहता, बल्कि प्रत्येक वस्तु उसी में स्थित है। जिस प्रकार आकाश के भीतर ग्रह, नक्षत्र और आकाशगंगाएँ विद्यमान हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण चेतन और जड़ जगत परमात्मा की अनन्त सत्ता में स्थित है।

मनुष्य जब अपने आपको केवल शरीर मानता है, तब वह सीमित हो जाता है। जब वह अपने भीतर स्थित परम चेतना का अनुभव करता है, तब उसे ज्ञात होता है कि उसका वास्तविक अस्तित्व उसी अनन्त सत्ता से जुड़ा हुआ है।

इसीलिए मंत्र "तस्मिन्" कहकर साधक को बाहरी खोज से हटाकर उस परम आधार की ओर ले जाता है, जहाँ से सम्पूर्ण जीवन प्रकाशित हो रहा है।


ह — निश्चय ही, इसमें किसी प्रकार का संशय नहीं

वैदिक भाषा में "ह" दृढ़ता और निश्चय का बोध कराता है।

यह अनुमान नहीं है।

यह कल्पना नहीं है।

यह किसी मत या सम्प्रदाय की धारणा नहीं है।

यह अनुभूत सत्य की घोषणा है।

ऋषि कहते हैं कि यह निश्चित है—समस्त सृष्टि उसी परमात्मा में स्थित है।

जब साधक का अन्तःकरण शुद्ध होता है, तब यह सत्य केवल विचार नहीं रहता, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव बन जाता है।


तस्थुः — सम्पूर्ण विश्व उसी परमात्मा में स्थित है

"तस्थुः" का अर्थ है—स्थित हैं, स्थापित हैं, उसी पर आश्रित हैं।

यह संसार अपने बल पर नहीं चल रहा।

प्रत्येक नियम किसी गहरे सार्वभौमिक नियम से संचालित है।

जीवन का प्रत्येक स्पन्दन किसी महान् चेतना के संरक्षण में है।

जैसे वृक्ष की प्रत्येक शाखा अपने मूल पर आधारित होती है, वैसे ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उस परम चेतना पर आधारित है।

यदि मूल न रहे, तो शाखाएँ भी नहीं रह सकतीं।

यदि चेतना न रहे, तो शरीर केवल पदार्थ रह जाता है।

यदि परमात्मा की सार्वभौमिक सत्ता न हो, तो ब्रह्माण्ड की व्यवस्था एक क्षण भी स्थिर नहीं रह सकती।

अतः "तस्थुः" का अर्थ केवल खड़े होना नहीं, बल्कि उस परम आधार पर पूर्णतः आश्रित होना है।


भुवनानि — समस्त लोक, जीवन के सभी स्तर और चेतना के आयाम

मंत्र कहता है—

"भुवनानि..."

भुवन केवल पृथ्वी नहीं है।

भुवन का अर्थ है—

समस्त लोक।

समस्त अस्तित्व।

समस्त जीवन-व्यवस्थाएँ।

स्थूल, सूक्ष्म और कारण—अस्तित्व के सभी स्तर।

जहाँ कहीं भी जीवन है, जहाँ कहीं भी गति है, जहाँ कहीं भी चेतना का प्रकाश है—वह सब "भुवन" के अन्तर्गत आता है।

मनुष्य का शरीर भी एक भुवन है।

उसका अन्तःकरण भी एक भुवन है।

समाज भी एक भुवन है।

प्रकृति भी एक भुवन है।

ब्रह्माण्ड भी एक भुवन है।

इन सबका आधार एक ही परम चेतना है।

इसलिए ऋषि भुवनों की संख्या नहीं बताते; वे कहते हैं—समस्त भुवन उसी में स्थित हैं।


विश्वा — सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उसी ईश्वरीय स्वरूप की अभिव्यक्ति है

मंत्र का अंतिम शब्द है—

"विश्वा।"

अर्थात्—

जो कुछ भी है।

जो दिखाई देता है।

जो दिखाई नहीं देता।

जो ज्ञात है।

जो अभी अज्ञात है।

सब उसी परमात्मा की सार्वभौमिक सत्ता में स्थित है।

विश्व केवल ग्रहों और तारों का समूह नहीं है।

विश्व चेतना, प्रकृति, ऊर्जा, जीवन और ज्ञान की अखण्ड व्यवस्था है।

परमात्मा इस व्यवस्था के बाहर खड़ा कोई दर्शक नहीं है।

वह इसी व्यवस्था का मूल, आधार और अन्तर्यामी है।

जब साधक इस सत्य को अपने जीवन में अनुभव करता है, तब उसके लिए कोई भी जीव पराया नहीं रहता।

क्योंकि वह जान लेता है कि सभी में वही एक चेतना कार्य कर रही है।

यहीं से करुणा उत्पन्न होती है।

यहीं से सत्य का जीवन प्रारम्भ होता है।

यहीं से धर्म केवल मान्यता नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव बन जाता है।


समग्र भावार्थ

समस्त जीवों का स्वामी परमात्मा प्रत्येक प्राणी के अन्तःकरण में समान रूप से गतिशील है। वह जन्म और मृत्यु से सर्वथा परे, अपनी शाश्वत ज्ञानशक्ति द्वारा अनन्त प्रकार से सूक्ष्म वैज्ञानिक रूप में स्वयं को प्रकट करता है। अत्यन्त मेधावी और आत्मद्रष्टा पुरुष उसी परमात्मा को अपने हृदय में व्याप्त अनुभव करते हैं, क्योंकि सम्पूर्ण विश्व, समस्त लोक-लोकान्तर और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उसी परम चेतना में स्थित होकर उसी के ईश्वरीय स्वरूप की अभिव्यक्ति हैं।


प्रजापति का वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक स्वरूप

यजुर्वेद ३१।१९ का शब्द-दर-शब्द वैज्ञानिक एवं चेतना-विज्ञान आधारित विवेचन (भाग–४ : उपसंहार)


मंत्र का आध्यात्मिक रहस्य

यह मंत्र मनुष्य को बाहर से भीतर की यात्रा कराता है। सामान्य मनुष्य परमात्मा को किसी स्थान, किसी दिशा, किसी विशेष आकृति अथवा किसी सीमित स्वरूप में खोजता है; किन्तु यह वैदिक मंत्र बताता है कि परमात्मा खोजने की वस्तु नहीं, अनुभव करने की सत्ता है। वह प्रत्येक जीव के अन्तःकरण में समान रूप से विद्यमान है और उसी के कारण जीवन, ज्ञान, प्राण, बुद्धि तथा चेतना सक्रिय हैं।

जब मनुष्य स्वयं को केवल शरीर मानता है, तब उसका सम्पूर्ण जीवन जन्म और मृत्यु के भय, सुख-दुःख के द्वन्द्व तथा सीमित इच्छाओं के भीतर बँध जाता है। परन्तु जब वह यह अनुभव करता है कि उसके भीतर एक अजन्मा, अविनाशी और शाश्वत चेतना विद्यमान है, तब उसके जीवन की दिशा ही बदल जाती है।

यही इस मंत्र का मूल संदेश है।


परमात्मा का वैज्ञानिक स्वरूप

वेद परमात्मा को किसी सीमित सत्ता के रूप में प्रस्तुत नहीं करता। वह समस्त अस्तित्व का मूल चेतन सिद्धान्त है।

जिस प्रकार सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड एक अदृश्य नियम से संचालित हो रहा है, उसी प्रकार प्रत्येक जीव का अन्तःकरण भी उसी सार्वभौमिक चेतना से प्रकाशित है।

वह चेतना न दिखाई देती है, न स्पर्श की जा सकती है; किन्तु उसी के कारण देखना, सुनना, सोचना, जानना और अनुभव करना सम्भव होता है।

वह स्वयं जन्म नहीं लेता, किन्तु प्रत्येक जन्म उसी की सत्ता पर आधारित होता है।

वह स्वयं परिवर्तन के अधीन नहीं, किन्तु समस्त परिवर्तन उसी की व्यवस्था के भीतर घटित होते हैं।

यही कारण है कि मंत्र उसे अजायमान कहता है और साथ ही बहुधा विजायते भी कहता है।

अर्थात् वह स्वयं अपरिवर्तित रहते हुए अपनी अनन्त ज्ञानशक्ति से सम्पूर्ण सृष्टि में निरन्तर प्रकट होता रहता है।


धीर पुरुष ही इस सत्य को क्यों जानते हैं?

मंत्र ने स्पष्ट कहा—

"परिपश्यन्ति धीराः।"

धीर वही है जो मन की चंचलता से ऊपर उठ चुका हो।

जिसकी बुद्धि स्वार्थ, भय, मोह और अहंकार से मुक्त होकर सत्य की ओर उन्मुख हो गई हो।

जिसका अन्तःकरण निर्मल हो।

जिसकी दृष्टि केवल बाहरी पदार्थों तक सीमित न रहकर चेतना के मूल स्रोत तक पहुँच गई हो।

ऐसा साधक परमात्मा को कल्पना से नहीं, अनुभूति से जानता है।

उसके लिए ईश्वर कोई मान्यता नहीं, बल्कि जीवन का प्रत्यक्ष अनुभव बन जाता है।


मनुष्य और परमात्मा का सम्बन्ध

मनुष्य परमात्मा से अलग कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है।

जीव की चेतना उसी परम चेतना से प्रकाशित होती है।

जैसे सूर्य का प्रकाश असंख्य दर्पणों में प्रतिबिम्बित होता है, वैसे ही परमात्मा का ज्ञान प्रत्येक जीव में उसकी पात्रता के अनुसार प्रकाशित होता है।

इसलिए आत्मज्ञान का अर्थ किसी नई वस्तु को प्राप्त करना नहीं, बल्कि अपने भीतर पहले से विद्यमान उस दिव्य चेतना को पहचानना है।

यही आत्मबोध है।

यही ब्रह्मविद्या है।

यही जीवन का वास्तविक विज्ञान है।


मानव जीवन के लिए संदेश

यह मंत्र मनुष्य को तीन महान् शिक्षाएँ देता है—

पहली शिक्षा—अपने भीतर स्थित परमात्मा को पहचानो। बाहरी संसार में भटकने से पहले अपने अन्तःकरण को निर्मल बनाओ।

दूसरी शिक्षा—समस्त जीवों में उसी एक परम चेतना का निवास है। इसलिए किसी के प्रति घृणा, हिंसा, छल अथवा अन्याय अन्ततः उसी सार्वभौमिक व्यवस्था के विरुद्ध आचरण है।

तीसरी शिक्षा—ज्ञान का उद्देश्य केवल जानकारी प्राप्त करना नहीं, बल्कि चेतना का विकास करना है। वही ज्ञान मनुष्य को धीर बनाता है और वही उसे परम सत्य का अनुभव कराता है।


साधना का संकेत

यदि साधक इस मंत्र को जीवन में उतारना चाहता है, तो उसे प्रतिदिन कुछ समय अपने अन्तःकरण में स्थित उस मौन चेतना का अनुभव करने का अभ्यास करना चाहिए।

मन को बाहरी विषयों से हटाकर भीतर स्थिर करना चाहिए।

अपने प्रत्येक कर्म में यह स्मरण रखना चाहिए कि वही परमात्मा सभी में समान रूप से विद्यमान है।

जब यह अनुभूति स्थायी होने लगती है, तब जीवन का प्रत्येक कर्म यज्ञ बन जाता है।

प्रत्येक श्वास उपासना बन जाती है।

प्रत्येक विचार ज्ञान का माध्यम बन जाता है।

और प्रत्येक क्षण परमात्मा के सान्निध्य का अनुभव होने लगता है।


उपसंहार

यजुर्वेद का यह मंत्र केवल परमात्मा की स्तुति नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण चेतना-विज्ञान का एक दिव्य सूत्र है। इसमें प्रजापति को समस्त जीवों का स्वामी, प्रत्येक अन्तःकरण में समान रूप से विद्यमान, जन्म-मरण से रहित, शाश्वत ज्ञानस्वरूप और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का मूलाधार बताया गया है।

जो साधक अपने भीतर स्थित इस दिव्य सत्ता का अनुभव कर लेता है, उसके लिए संसार का प्रत्येक जीव उसी परमात्मा की अभिव्यक्ति बन जाता है। तब भेद मिटने लगते हैं, अज्ञान दूर होने लगता है और जीवन सत्य, ज्ञान तथा कल्याण की दिशा में अग्रसर हो जाता है।

यही इस वैदिक मंत्र का वैज्ञानिक, आध्यात्मिक और सार्वभौमिक संदेश है।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।

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