शब्द-दर-शब्द व्याख्या प्रस्तुत करता हूँ। यहाँ मैं अभी केवल शब्दार्थ और उसके दार्शनिक संकेत तक सीमित रह रहा हूँ।
| वैदिक शब्द | शाब्दिक अर्थ | वैज्ञानिक / आध्यात्मिक संकेत |
|---|---|---|
| युवाना | युवा बना दिया, नवीन अवस्था को प्राप्त कराया | जड़ता से मुक्त होकर चेतना का नित्य नवीनीकरण; जीवन-शक्ति का पुनर्जागरण। |
| पितरा | माता-पिता, उत्पत्ति के आधार | जीवन, शरीर, बुद्धि अथवा अस्तित्व के मूल आधार; कारण-तत्त्व। |
| पुनः | पुनः, फिर से | निरन्तर पुनर्निर्माण, नवीनीकरण और विकास की प्रक्रिया। |
| सत्यमन्त्राः | सत्यज्ञानयुक्त, सत्य संकल्प वाले | जिनका विचार, ज्ञान और चेतना सार्वभौमिक सत्य के अनुरूप हो; सत्य ही जिनकी प्रेरक शक्ति हो। |
| ऋजूयवः | सरल गति वाले, सीधी राह पर चलने वाले | जिनका ज्ञान, कर्म और जीवन वक्रता, छल तथा भ्रम से रहित होकर सत्य की दिशा में प्रवाहित होता है। |
| ऋभवः | ऋभु; अत्यन्त कुशल, ज्ञानसम्पन्न, सृजनशील दिव्य पुरुष | ऐसी विकसित चेतनाएँ जो ज्ञान, विवेक और सृजनात्मक शक्ति से स्वयं तथा संसार का परिष्कार करती हैं। |
| विष्टि | विस्तार, पूर्णता, व्यापकता (वैदिक प्रयोगानुसार) | चेतना का विस्तार, सामर्थ्य का विकास, आन्तरिक पूर्णता। |
| अक्रत | किया, सम्पन्न किया, निर्मित किया | आत्मपरिष्कार, रूपान्तरण और सृजन की प्रक्रिया को पूर्ण किया। |
शब्दों को जोड़कर प्रारम्भिक भाव
सत्यज्ञान से प्रेरित, सरल और निष्कपट मार्ग पर चलने वाले ऋभुओं ने अपने मूल आधार (माता-पिता) को पुनः युवा बना दिया; अर्थात् चेतना, जीवन और अस्तित्व के आधार का पुनर्नवीनीकरण एवं उत्कर्ष कर दिया।
अब समझो ऋषि का भाव क्या है युवाना जो हमेशा युवा ज्वान बने रहने वाला है, पितरा माता पिता से मुक्त है, पुनः फिर से सत्यमन्त्रा आत्मा साक्षात्कार करने में समर्थ द्विज हो चुका है वह ऋजूयव: ऋत शाश्वत नियम चैतन्यता का बोध करने वाला यजू योग आत्मा से परमात्मा को जोड़ने वाला जैसे यव: एक प्रकार का अन्न जौ जैसे पृथ्वी से मिलकर अपने अनेक बिज उत्पन्न करता है उसी प्रकार से जिस चेतन पुरुष ने परमात्मा का साक्षात्कार कर लिया है वह अपनी चेतना के आलोक से अनेक जीवात्मा को आलोकित करने में समर्थ हो जाता है, इसलिए वह ऋभव हो जाता है ऋ ऋतं को देखने जानने और जीने वाला भव: हो जाता है, अर्थात समदर्शी इसलिए वह विष्टि कि तरह जैसे बारिश का जल अनेकों प्रकार की औषधियों के जन्म कारण बनता है उसी प्रकार से अक्रत यह आत्मज्ञान उपलब्ध अकर्ता कि तरह निस्वार्थ निष्काम बिना फल कि आकांक्षा के जीवन के कल्याण के लिए निरंतर गतिशील रहता है।
ऋग्वेद १।२०।४ : आत्मसाक्षात्कार, ऋत और चेतना के नित्य यौवन का वैदिक विज्ञान
भाग–१ : युवाना, पितरा और पुनः का आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक रहस्य
मंत्र
भूमिका
ऋग्वेद के मंत्र केवल स्तुति, प्रार्थना अथवा धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं हैं। वे मानव चेतना के विकास का सूक्ष्मतम विज्ञान हैं। प्रत्येक मंत्र साधक को बाहरी संसार से उठाकर उसके अंतःकरण की उस यात्रा पर ले जाता है जहाँ जीवन का वास्तविक रहस्य उद्घाटित होता है।
यह मंत्र भी उसी श्रेणी का है। प्रथम दृष्टि में यह ऋभुओं की प्रशंसा करता हुआ प्रतीत होता है, किन्तु गहन अध्ययन करने पर स्पष्ट होता है कि यहाँ ऋषि उस मनुष्य की चेतना का वर्णन कर रहे हैं जो आत्मसाक्षात्कार के द्वारा स्वयं को नित्य नवीन, जन्म-मरण के बन्धनों से मुक्त तथा समस्त जीवों के कल्याण के लिए समर्पित बना देता है।
यहाँ प्रत्येक शब्द एक आध्यात्मिक सूत्र है। यदि इन्हें केवल भाषाई अर्थ तक सीमित कर दिया जाए तो मंत्र की जीवंतता समाप्त हो जाती है। परन्तु जब इन्हें चेतना के विज्ञान के रूप में समझा जाता है, तब यह मंत्र साधना का प्रत्यक्ष मार्गदर्शक बन जाता है।
युवाना — जो सदा युवा है
मंत्र का प्रथम शब्द है—युवाना।
सामान्य दृष्टि में युवा होने का अर्थ शरीर की आयु से लगाया जाता है, किन्तु ऋषि यहाँ शरीर की बात नहीं कर रहे।
शरीर का युवा होना समय के अधीन है।
आज युवा है।
कल वृद्ध होगा।
परम सत्य कभी वृद्ध नहीं होता।
आत्मा कभी वृद्ध नहीं होती।
चेतना कभी जीर्ण नहीं होती।
इसलिए यहाँ युवाना का अर्थ है—
जो प्रत्येक क्षण नवीन है।
जिसकी ऊर्जा कभी समाप्त नहीं होती।
जिसका उत्साह परिस्थितियों का दास नहीं बनता।
जो अनुभवों से परिपक्व होता है, किन्तु जड़ नहीं होता।
जिसकी चेतना प्रत्येक क्षण नवीन प्रकाश उत्पन्न करती रहती है।
मनुष्य जब आत्मा को भूल जाता है तब वह आयु की गणना करने लगता है।
जब आत्मा का अनुभव हो जाता है तब समय का भय समाप्त होने लगता है।
क्योंकि आत्मा का कोई जन्मदिन नहीं होता।
उसकी कोई वृद्धावस्था नहीं होती।
उसकी कोई मृत्यु नहीं होती।
वह नित्य युवा है।
इसीलिए जो आत्मस्वरूप में स्थित हो जाता है, उसका जीवन भी नित्य नवीन बना रहता है।
उसका ज्ञान पुराना नहीं पड़ता।
उसकी करुणा सूखती नहीं।
उसकी सृजनशीलता समाप्त नहीं होती।
यही वास्तविक यौवन है।
चेतना का यौवन और शरीर का यौवन
शरीर का यौवन प्रकृति की देन है।
चेतना का यौवन साधना की उपलब्धि है।
शरीर का यौवन समय के साथ क्षीण होता है।
चेतना का यौवन आत्मबोध के साथ बढ़ता जाता है।
शरीर की शक्ति सीमित होती है।
आत्मा की शक्ति असीम होती है।
इसीलिए ऋषि उस मनुष्य को युवा नहीं कहते जिसका शरीर सबल है।
वे उसे युवा कहते हैं जिसकी चेतना प्रत्येक क्षण सत्य से प्रकाशित हो रही है।
ऐसा मनुष्य कभी निराश नहीं होता।
कभी पराजित नहीं होता।
कभी भीतर से बूढ़ा नहीं होता।
उसका जीवन नित्य सृजन बन जाता है।
पितरा — माता-पिता से नहीं, कारण-कार्य के बन्धन से मुक्त
मंत्र का अगला शब्द है—
पितरा।
यहाँ माता-पिता केवल जैविक जन्मदाता नहीं हैं।
वे उस सम्पूर्ण कारण-कार्य श्रृंखला के प्रतीक हैं जिसके माध्यम से शरीर संसार में आता है।
शरीर माता-पिता से प्राप्त होता है।
संस्कार समाज से प्राप्त होते हैं।
विचार वातावरण से प्राप्त होते हैं।
परन्तु आत्मा इनमें से किसी से उत्पन्न नहीं होती।
वह स्वतंत्र सत्ता है।
जो साधक आत्मा का प्रत्यक्ष अनुभव कर लेता है, वह अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लेता है।
तब वह जान जाता है कि उसका अस्तित्व केवल शरीर तक सीमित नहीं है।
यही कारण है कि वह जन्म के कारणों से ऊपर उठ जाता है।
यह माता-पिता का अस्वीकार नहीं है।
यह आत्मा की स्वतंत्र सत्ता का बोध है।
जो स्वयं को केवल शरीर मानता है, वह कारणों में बँधा रहता है।
जो आत्मा को जान लेता है, वह कारणों का साक्षी बन जाता है।
यही पितरा का आंतरिक रहस्य है।
स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ
स्वतंत्रता का अर्थ केवल बाहरी बन्धनों से मुक्त होना नहीं है।
वास्तविक स्वतंत्रता तब आती है जब मनुष्य अपने विचारों, भय, स्मृतियों और अहंकार के बन्धनों से मुक्त हो जाता है।
तब उसका जीवन प्रतिक्रियाओं से नहीं, चेतना से संचालित होता है।
वह परिस्थितियों का दास नहीं रहता।
वह स्वयं प्रकाश का स्रोत बन जाता है।
ऐसा मनुष्य जन्म के कारणों का सम्मान करता है, किन्तु स्वयं को केवल उन्हीं तक सीमित नहीं करता।
यही आध्यात्मिक स्वतंत्रता है।
पुनः — नित्य आत्मनवीकरण का विज्ञान
मंत्र का अगला शब्द है—
पुनः।
इसका सामान्य अर्थ "फिर" होता है।
किन्तु यहाँ इसका संकेत अत्यन्त गहरा है।
आत्मसाक्षात्कार एक बार घटित होकर समाप्त हो जाने वाली घटना नहीं है।
जीवन प्रत्येक क्षण नया है।
प्रत्येक श्वास नई है।
प्रत्येक अनुभव नया है।
इसलिए चेतना भी प्रत्येक क्षण अपने आपको नवीनीकृत करती रहती है।
यही पुनः है।
जो व्यक्ति अतीत में जीता है, वह भीतर से बूढ़ा हो जाता है।
जो वर्तमान में जीता है, वह नित्य युवा रहता है।
इसलिए पुनः का अर्थ केवल दोहराव नहीं, बल्कि निरन्तर नवीनता है।
प्रत्येक दिन स्वयं को फिर से पहचानना।
प्रत्येक क्षण सत्य को फिर से जीना।
प्रत्येक कर्म को पुनः पवित्र बनाना।
यही आत्मविकास का वास्तविक विज्ञान है।
नवीनता ही जीवन है
प्रकृति हमें प्रतिदिन यह शिक्षा देती है।
सूर्य प्रतिदिन नया उदय होता है।
वायु प्रत्येक क्षण नई है।
जल निरन्तर प्रवाहित होकर निर्मल रहता है।
बीज बार-बार अंकुरित होकर जीवन का विस्तार करता है।
यदि प्रकृति रुक जाए तो जीवन समाप्त हो जाएगा।
उसी प्रकार यदि चेतना का विकास रुक जाए तो मनुष्य केवल स्मृतियों का संग्रह बनकर रह जाता है।
ऋषि इसलिए साधक को पुनः-पुनः जागने की प्रेरणा देते हैं।
क्योंकि आत्मा नित्य नवीन है।
परमात्मा नित्य नवीन है।
और जो परमात्मा से जुड़ता है, उसका जीवन भी नित्य नवीन हो जाता है।
भाग–१ का सार
इस मंत्र के प्रारम्भिक तीन शब्द ही सम्पूर्ण साधना का आधार प्रस्तुत करते हैं।
युवाना हमें नित्य नवीन चेतना का संदेश देता है।
पितरा हमें शरीर और कारण-कार्य के बन्धनों से ऊपर उठकर आत्मस्वरूप को पहचानने की प्रेरणा देता है।
पुनः हमें यह स्मरण कराता है कि आत्मबोध एक निरन्तर जागरण है, जो प्रत्येक क्षण जीवन को नया बनाता है।
जब साधक इन तीन अवस्थाओं में प्रवेश कर लेता है, तभी वह मंत्र के अगले चरण—सत्यमन्त्राः—के योग्य बनता है।
ऋग्वेद १।२०।४ : आत्मसाक्षात्कार, ऋत और चेतना के नित्य यौवन का वैदिक विज्ञान
भाग–२ : सत्यमन्त्राः और ऋजूयवः का चेतना-विज्ञान
मंत्र
सत्यमन्त्राः — सत्य के प्रत्यक्ष अनुभव में स्थित चेतना
मंत्र का अगला शब्द है—सत्यमन्त्राः।
यह केवल सत्य बोलने वाले मनुष्य का परिचय नहीं है। यहाँ "सत्य" और "मंत्र" दोनों शब्द अपने गहनतम अर्थ में प्रयुक्त हुए हैं।
सत्य वह नहीं जो समय के साथ बदल जाए। सत्य वह है जो तीनों कालों में समान रूप से विद्यमान रहे। जो न उत्पन्न होता है, न नष्ट होता है, न परिवर्तन से प्रभावित होता है। वही सत्य है।
मंत्र केवल उच्चारण करने योग्य शब्द नहीं है। मंत्र वह है जो मन को त्राण दे, मन को अज्ञान, भय, मोह और सीमितता से मुक्त कर दे। जो चेतना को उसके मूल स्रोत तक पहुँचा दे, वही वास्तविक मंत्र है।
जब सत्य और मंत्र का मिलन होता है, तब सत्यमन्त्राः की अवस्था उत्पन्न होती है।
यह वह स्थिति है जहाँ मनुष्य का प्रत्येक विचार सत्य से प्रेरित होता है, प्रत्येक निर्णय सत्य पर आधारित होता है और प्रत्येक कर्म सत्य की अभिव्यक्ति बन जाता है।
आत्मसाक्षात्कार ही सत्यमंत्र है
संसार में असंख्य शब्द बोले जाते हैं।
असंख्य ग्रन्थ पढ़े जाते हैं।
असंख्य विचार सुने जाते हैं।
किन्तु यदि मनुष्य स्वयं को नहीं जानता, तो यह समस्त ज्ञान अधूरा रह जाता है।
इसलिए ऋषि कहते हैं कि सबसे बड़ा मंत्र आत्मा का प्रत्यक्ष अनुभव है।
जब मनुष्य स्वयं को शरीर नहीं, चेतना के रूप में जानता है, तब उसके भीतर सत्य का उदय होता है।
तब उसे किसी बाहरी प्रमाण की आवश्यकता नहीं रहती।
उसकी आत्मा स्वयं प्रमाण बन जाती है।
यही आत्मसाक्षात्कार है।
और यही सत्यमन्त्राः का वास्तविक अर्थ है।
सत्य का अनुभव बुद्धि से परे है
बुद्धि तर्क कर सकती है।
विश्लेषण कर सकती है।
निर्णय कर सकती है।
किन्तु सत्य का अंतिम अनुभव बुद्धि से नहीं होता।
वह चेतना से होता है।
जैसे सूर्य के उदय के बाद अन्धकार अपने आप समाप्त हो जाता है, वैसे ही आत्मसाक्षात्कार के बाद भ्रम अपने आप समाप्त होने लगता है।
सत्य को सिद्ध नहीं करना पड़ता।
सत्य स्वयं प्रकाशित होता है।
जिस चेतना में यह प्रकाश जाग जाता है, वही सत्यमंत्र बन जाती है।
ऐसा मनुष्य केवल शास्त्रों का ज्ञाता नहीं रहता।
वह स्वयं चलता-फिरता शास्त्र बन जाता है।
सत्य का मंत्र और जीवन का परिवर्तन
सत्य केवल विचार नहीं बदलता।
वह सम्पूर्ण जीवन बदल देता है।
जिसने आत्मा को जान लिया—
उसका भय बदल जाता है।
उसका लोभ समाप्त होने लगता है।
उसका अहंकार पिघलने लगता है।
उसका क्रोध करुणा में परिवर्तित होने लगता है।
उसके लिए धर्म कोई नियम नहीं रह जाता।
धर्म उसका स्वभाव बन जाता है।
इसीलिए ऋषि ने पहले युवाना, फिर पुनः, और उसके बाद सत्यमन्त्राः कहा है।
क्योंकि आत्मा के नित्य नवीन जागरण के बिना सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव सम्भव नहीं।
ऋजूयवः — ऋत और योग का जीवित स्वरूप
अब मंत्र अपने सबसे गूढ़ शब्द पर पहुँचता है—
ऋजूयवः।
यह शब्द साधारण नहीं है।
इसमें ऋषि ने सम्पूर्ण साधना का विज्ञान समाहित कर दिया है।
आपकी व्याख्या के अनुसार—
ऋ का संकेत है ऋत—अर्थात् शाश्वत सार्वभौमिक नियम।
यु का संकेत है योग—जीवात्मा और परमात्मा का मिलन।
यवः का संकेत केवल जौ नहीं है, बल्कि उस बीज का है जो पृथ्वी से जुड़कर असंख्य नए बीज उत्पन्न करता है।
इन तीनों संकेतों को जोड़ने पर ऋजूयवः का अत्यन्त गहन अर्थ प्रकट होता है।
ऋत का बोध
ऋत वह नियम है जिससे सम्पूर्ण सृष्टि संचालित हो रही है।
सूर्य उसी से उदित होता है।
ग्रह उसी से गति करते हैं।
ऋतुएँ उसी से बदलती हैं।
बीज उसी से अंकुरित होता है।
प्राण उसी से प्रवाहित होते हैं।
यदि एक क्षण के लिए भी यह व्यवस्था टूट जाए, तो सम्पूर्ण जीवन अस्त-व्यस्त हो जाएगा।
जो साधक इस शाश्वत नियम को पहचान लेता है, वह अपने जीवन को भी उसी के अनुरूप ढाल देता है।
यही ऋत का बोध है।
योग का वास्तविक अर्थ
योग केवल शरीर की क्रियाएँ नहीं हैं।
योग केवल आसन नहीं है।
योग केवल प्राणायाम नहीं है।
योग वह अवस्था है जहाँ जीवात्मा अपने वास्तविक स्रोत से पुनः जुड़ जाती है।
जब यह मिलन होता है, तब मन का विभाजन समाप्त हो जाता है।
भय समाप्त होने लगता है।
अहंकार गलने लगता है।
मनुष्य पहली बार अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानता है।
इसीलिए ऋजूयवः का अर्थ है—
जो ऋत को जानकर योग में स्थित हो गया है।
यवः का आध्यात्मिक रहस्य
ऋषि का संकेत अत्यन्त अद्भुत है।
जौ का एक छोटा सा बीज पृथ्वी से जुड़ता है।
वह स्वयं समाप्त नहीं होता।
वह अनेक नए बीज उत्पन्न कर देता है।
यही प्रकृति का नियम है।
आत्मज्ञानी पुरुष भी ऐसा ही होता है।
वह केवल स्वयं प्रकाशित नहीं होता।
वह अपने प्रकाश से असंख्य चेतनाओं को प्रकाशित करने की क्षमता प्राप्त कर लेता है।
उसका ज्ञान संग्रह नहीं बनता।
वह बीज बन जाता है।
जहाँ भी जाता है, वहाँ चेतना का अंकुर फूटने लगता है।
यही वास्तविक गुरु का कार्य है।
वह अनुयायी नहीं बनाता।
वह जागृत चेतनाएँ उत्पन्न करता है।
चेतना का विस्तार ही ऋजूयवः है
जिस प्रकार बीज के भीतर सम्पूर्ण वृक्ष छिपा रहता है, उसी प्रकार आत्मसाक्षात्कार के भीतर सम्पूर्ण मानवता के कल्याण की सम्भावना छिपी रहती है।
जो स्वयं सत्य को जान लेता है, वह अनिवार्य रूप से दूसरों के जीवन में भी प्रकाश का कारण बनता है।
उसे ऐसा करने के लिए प्रयास नहीं करना पड़ता।
जैसे सूर्य को प्रकाश फैलाने का प्रयास नहीं करना पड़ता।
वैसे ही जागृत चेतना स्वयं प्रकाश फैलाती है।
यही ऋजूयवः की अवस्था है।
यह केवल साधक की उपलब्धि नहीं।
यह सम्पूर्ण मानव समाज के लिए वरदान है।
भाग–२ का सार
सत्यमन्त्राः वह चेतना है जो आत्मसाक्षात्कार के द्वारा सत्य में स्थित हो चुकी है।
ऋजूयवः वह महापुरुष है जिसने ऋत का बोध, योग की पूर्णता और चेतना के प्रसार का रहस्य जान लिया है।
वह स्वयं प्रकाशित होकर असंख्य आत्माओं को प्रकाशित करने की क्षमता प्राप्त कर लेता है।
वह ज्ञान का संग्रहकर्ता नहीं, बल्कि ज्ञान का स्रोत बन जाता है।
ऋग्वेद १।२०।४ : आत्मसाक्षात्कार, ऋत और चेतना के नित्य यौवन का वैदिक विज्ञान
भाग–३ : ऋभवः, विष्टि और अक्रत का आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक रहस्य
मंत्र
ऋभवः — ऋत को जानने, जीने और प्रकट करने वाला
मंत्र का अगला शब्द है—ऋभवः।
यही इस मंत्र का चरम बिन्दु है।
आपकी व्याख्या के अनुसार ऋभवः कोई साधारण विशेषण नहीं, बल्कि आत्मज्ञान की परिपूर्ण अवस्था का नाम है।
"ऋ" अर्थात् ऋत—वह शाश्वत, सार्वभौमिक और अपरिवर्तनशील नियम जिसके अधीन सम्पूर्ण सृष्टि संचालित होती है।
"भवः" अर्थात् उस सत्य में स्थित होकर उसी के अनुरूप जीवन जीने वाला।
इस प्रकार ऋभवः वह है जिसने ऋत को केवल पढ़ा नहीं, केवल सुना नहीं, बल्कि उसे अपने जीवन का प्रत्यक्ष अनुभव बना लिया है।
उसकी दृष्टि बदल जाती है।
उसका विचार बदल जाता है।
उसका कर्म बदल जाता है।
उसका सम्पूर्ण अस्तित्व ऋत का माध्यम बन जाता है।
ऋभु बनने की प्रक्रिया
मनुष्य जन्म से ऋभु नहीं होता।
वह अज्ञान से प्रारम्भ करता है।
इन्द्रियों के आकर्षण में भटकता है।
अहंकार में उलझता है।
सुख-दुःख के द्वन्द्व में जीता है।
किन्तु जब वह आत्मसाक्षात्कार की दिशा में अग्रसर होता है, तब उसके भीतर परिवर्तन प्रारम्भ होता है।
पहले वह स्वयं को जानता है।
फिर सत्य को जानता है।
फिर ऋत को पहचानता है।
और अन्ततः उसी के अनुरूप जीवन जीने लगता है।
यहीं साधक से ऋभु बनने की यात्रा पूर्ण होती है।
ऋभु वह है जिसने अपने भीतर के अन्धकार को प्रकाश में बदल दिया हो।
समदर्शिता का उदय
जब तक मनुष्य स्वयं को शरीर मानता है, तब तक उसका व्यवहार भेदभाव से भरा रहता है।
वह अपना और पराया देखता है।
मित्र और शत्रु देखता है।
ऊँच-नीच देखता है।
किन्तु जब वह ऋत को जान लेता है, तब उसकी दृष्टि बदल जाती है।
उसे प्रत्येक जीव में वही एक चेतना दिखाई देती है।
वह समझ जाता है कि भिन्नता केवल शरीरों की है।
चेतना एक है।
प्रकाश एक है।
जीवन का मूल स्रोत एक है।
यही समदर्शिता है।
और यही ऋभवः की सबसे बड़ी पहचान है।
विष्टि — चेतना की वर्षा और लोककल्याण
अब मंत्र कहता है—
विष्टि।
आपकी व्याख्या में इसका अत्यन्त सुंदर संकेत है।
जैसे वर्षा का जल पृथ्वी पर गिरकर असंख्य वनस्पतियों, औषधियों और अन्न का कारण बनता है, उसी प्रकार आत्मज्ञानी पुरुष की जागृत चेतना समाज में ज्ञान, विवेक और जीवन का संचार करती है।
वर्षा कभी अपने लिए नहीं बरसती।
वह सबके लिए बरसती है।
वह यह नहीं देखती कि कौन योग्य है और कौन अयोग्य।
जो पात्र होता है, वह उसका लाभ ले लेता है।
जो अपात्र होता है, वह स्वयं वंचित रह जाता है।
आत्मज्ञानी पुरुष भी ऐसा ही होता है।
उसकी चेतना किसी एक जाति, सम्प्रदाय, वर्ग या राष्ट्र तक सीमित नहीं रहती।
उसका ज्ञान समस्त मानवता के लिए होता है।
वह जहाँ भी जाता है, वहाँ जीवन का संचार होता है।
ज्ञान का प्रसार ही वास्तविक वर्षा है
संसार में अन्न की वर्षा आवश्यक है।
जल की वर्षा आवश्यक है।
किन्तु इन सबसे अधिक आवश्यक है—ज्ञान की वर्षा।
अज्ञान मनुष्य को भीतर से शुष्क बना देता है।
स्वार्थ उसे बाँझ बना देता है।
भय उसकी शक्ति छीन लेता है।
आत्मज्ञान इन सबका अंत कर देता है।
इसलिए ऋभु की चेतना जहाँ पहुँचती है, वहाँ केवल सूचना नहीं पहुँचती, बल्कि जीवन का पुनर्जागरण प्रारम्भ हो जाता है।
यही विष्टि का गूढ़ संकेत है।
अक्रत — अकर्ता भाव में स्थित कर्मयोगी
मंत्र का अंतिम शब्द है—
अक्रत।
यह शब्द अत्यन्त गहरा है।
आपकी व्याख्या के अनुसार इसका अर्थ है—
अकर्ता होकर कर्म करना।
सामान्य मनुष्य प्रत्येक कर्म का फल चाहता है।
यश चाहता है।
सम्मान चाहता है।
प्रतिष्ठा चाहता है।
स्वार्थ चाहता है।
इसीलिए उसका कर्म उसे बाँध देता है।
किन्तु आत्मज्ञानी पुरुष का कर्म अलग होता है।
वह कर्म करता है।
किन्तु स्वयं को कर्ता नहीं मानता।
वह सेवा करता है।
किन्तु प्रतिफल की इच्छा नहीं रखता।
वह लोककल्याण में लगा रहता है।
किन्तु उसके भीतर अहंकार उत्पन्न नहीं होता।
यही अक्रत है।
निष्काम कर्म का वास्तविक स्वरूप
निष्काम कर्म का अर्थ कर्म छोड़ देना नहीं है।
निष्काम कर्म का अर्थ है—
कर्म को परमात्मा के नियम के अनुरूप करना।
फल की चिन्ता से मुक्त होकर करना।
अहंकार से मुक्त होकर करना।
संपूर्ण जीवन को यज्ञ मानकर करना।
जब मनुष्य ऐसा करता है, तब उसका प्रत्येक कर्म समाज के लिए प्रेरणा बन जाता है।
वह किसी पुरस्कार का प्रतीक्षारत नहीं रहता।
उसका पुरस्कार स्वयं कर्म की पवित्रता होती है।
यही आत्मज्ञान की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है।
ऋभु का जीवन कैसा होता है?
ऋभु स्वयं प्रकाशित होता है।
दूसरों को प्रकाशित करता है।
स्वयं मुक्त होता है।
दूसरों को भी मुक्ति की प्रेरणा देता है।
स्वयं सत्य में स्थित होता है।
दूसरों को भी सत्य की ओर ले जाता है।
स्वयं निष्काम होता है।
दूसरों में भी निष्कामता का बीज बोता है।
उसका सम्पूर्ण जीवन एक प्रवाहित नदी के समान होता है।
जो स्वयं भी निर्मल रहती है और अपने मार्ग में आने वाले असंख्य जीवों को भी जीवन प्रदान करती चलती है।
इसीलिए ऋषि ने ऋभु को केवल ज्ञानी नहीं कहा, बल्कि लोकमंगल की जीवित चेतना के रूप में प्रस्तुत किया है।
भाग–३ का सार
इस मंत्र का तृतीय चरण साधना की परिपूर्ण अवस्था का वर्णन करता है।
ऋभवः वह है जिसने ऋत को जानकर उसे अपने जीवन में उतार लिया है।
विष्टि वह दिव्य चेतना है जो वर्षा की भाँति समस्त जीवों के कल्याण हेतु ज्ञान और जीवन का संचार करती है।
अक्रत वह निष्काम अवस्था है जहाँ मनुष्य कर्म करते हुए भी स्वयं को कर्ता नहीं मानता और उसका सम्पूर्ण जीवन लोकमंगल के लिए समर्पित हो जाता है।
यही आत्मसाक्षात्कार की पूर्णता है।
ऋग्वेद १।२०।४ : आत्मसाक्षात्कार, ऋत और चेतना के नित्य यौवन का वैदिक विज्ञान
भाग–४ : समग्र भावार्थ, जीवन-दर्शन एवं उपसंहार
मंत्र
मंत्र का समग्र भाव
यह मंत्र किसी विशेष व्यक्ति की प्रशंसा नहीं करता, बल्कि उस चेतन पुरुष का स्वरूप प्रस्तुत करता है जिसने आत्मसाक्षात्कार के द्वारा अपने वास्तविक अस्तित्व को जान लिया है।
ऐसा पुरुष नित्य युवा रहता है, क्योंकि उसकी चेतना समय की सीमाओं से परे होती है। वह जन्म और मृत्यु के कारण-कार्य बन्धनों से ऊपर उठकर आत्मा की शाश्वत सत्ता में स्थित हो जाता है। सत्य उसके लिए केवल विचार नहीं रहता, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव बन जाता है। वह ऋत—इस सार्वभौमिक व्यवस्था—का साक्षात्कार करके अपने सम्पूर्ण जीवन को उसी के अनुरूप ढाल देता है।
फलस्वरूप वह स्वयं प्रकाश का केन्द्र बन जाता है। जैसे वर्षा का जल समस्त पृथ्वी को जीवन देता है, वैसे ही उसकी जागृत चेतना असंख्य जीवात्माओं के भीतर ज्ञान, विवेक और आत्मबोध का संचार करती है। उसका प्रत्येक कर्म निष्काम, निस्वार्थ और लोककल्याण के लिए समर्पित होता है। यही ऋषि के अनुसार वास्तविक ऋभु का स्वरूप है।
आत्मसाक्षात्कार का वास्तविक उद्देश्य
अनेक लोग समझते हैं कि आत्मज्ञान केवल व्यक्तिगत मुक्ति का साधन है। किन्तु यह मंत्र उस धारणा का अतिक्रमण करता है।
आत्मसाक्षात्कार का उद्देश्य संसार से भागना नहीं, बल्कि संसार को प्रकाश देना है।
जो स्वयं जाग गया है, उसका जीवन केवल उसके लिए नहीं रह जाता।
उसका ज्ञान समाज की धरोहर बन जाता है।
उसकी करुणा समस्त जीवों तक पहुँचती है।
उसका कर्म लोकमंगल का माध्यम बन जाता है।
यदि आत्मज्ञान केवल अपने तक सीमित रह जाए, तो वह अधूरा है।
जब वही ज्ञान दूसरों के जीवन में भी जागृति का कारण बनता है, तभी वह पूर्ण होता है।
यही इस मंत्र का जीवंत संदेश है।
ऋभु का समाज में स्थान
समाज की वास्तविक उन्नति केवल भौतिक साधनों से नहीं होती।
सभ्यता का विकास भवनों, यंत्रों और सम्पत्ति से नहीं मापा जा सकता।
समाज तब उन्नत होता है जब उसमें ऐसे जागृत पुरुष उत्पन्न होते हैं जो सत्य, ऋत और निष्काम कर्म के आदर्श बनते हैं।
ऋभु ऐसा ही व्यक्तित्व है।
वह किसी संप्रदाय का निर्माता नहीं, चेतना का जागरणकर्ता है।
वह अंधानुकरण नहीं कराता, बल्कि प्रत्येक मनुष्य को अपने भीतर स्थित सत्य का अनुभव करने की प्रेरणा देता है।
उसकी उपस्थिति से समाज में विवेक बढ़ता है, करुणा बढ़ती है, सत्य के प्रति निष्ठा बढ़ती है और जीवन में संतुलन स्थापित होता है।
मानव जीवन के लिए प्रेरणा
यह मंत्र प्रत्येक साधक से चार प्रश्न पूछता है—
क्या हमारी चेतना आज भी नवीन है, या केवल पुरानी स्मृतियों का बोझ ढो रही है?
क्या हम अपने वास्तविक आत्मस्वरूप को पहचानने का प्रयास कर रहे हैं, या केवल शरीर और अहंकार तक सीमित हैं?
क्या हमारे विचार सत्य से प्रेरित हैं, या केवल स्वार्थ और भय से संचालित हैं?
क्या हमारा ज्ञान केवल हमारे लिए है, या उससे समाज और मानवता भी प्रकाश प्राप्त कर रही है?
इन प्रश्नों के उत्तर ही हमारी आध्यात्मिक यात्रा की दिशा निर्धारित करते हैं।
साधना का व्यावहारिक मार्ग
इस मंत्र का संदेश केवल चिंतन के लिए नहीं, जीवन के लिए है।
प्रतिदिन स्वयं को नवीन बनाने का प्रयास करें।
अपने विचारों को सत्य की कसौटी पर परखें।
ऋत अर्थात् प्रकृति और परमात्मा की सार्वभौमिक व्यवस्था के अनुरूप जीवन जीने का अभ्यास करें।
आत्मज्ञान को केवल व्यक्तिगत उपलब्धि न बनने दें; उसे अपने व्यवहार, सेवा, करुणा और ज्ञान के माध्यम से समाज तक पहुँचाएँ।
कर्म करें, परन्तु कर्तापन का अभिमान न रखें।
यही ऋभु का मार्ग है।
यही वैदिक जीवन का मार्ग है।
उपसंहार
ऋग्वेद का यह मंत्र मानव जीवन के सर्वोच्च विकास का वैदिक सूत्र प्रस्तुत करता है। इसमें नित्य युवा चेतना, जन्म-मरण के बन्धनों से परे आत्मस्वरूप, सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव, ऋत का साक्षात्कार, योग के द्वारा जीव और परमात्मा का मिलन, समदर्शिता, लोककल्याण और निष्काम कर्म—इन सभी को एक अखण्ड जीवन-दर्शन के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
ऋषि का संदेश स्पष्ट है—मनुष्य का वास्तविक उत्कर्ष बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि चेतना के विकास में है। जो स्वयं को जान लेता है, वही सत्य को जानता है। जो सत्य को जानता है, वही ऋत के अनुरूप जीवन जीता है। और जो ऋत में स्थित होकर निष्काम भाव से लोककल्याण करता है, वही वास्तविक अर्थ में ऋभु कहलाने योग्य है।
अतः प्रत्येक साधक का लक्ष्य केवल ज्ञान अर्जित करना नहीं, बल्कि अपने भीतर ऐसी जागृत चेतना का विकास करना होना चाहिए जो स्वयं भी प्रकाशित हो और अपने प्रकाश से समस्त जीवों के जीवन को आलोकित करने में समर्थ बने।
इसी में मनुष्य का यौवन है।
इसी में आत्मा की विजय है।
इसी में जीवन की सार्थकता है।
- सत्यमन्त्राः → आत्मसाक्षात्कार से ज्ञान का जन्म।
- यही वास्तविक द्विजत्व है। दूसरा जन्म शरीर से नहीं, ज्ञान से होता है।
- युवाना → ज्ञानरूपी द्वितीय जन्म प्राप्त करने वाला पुरुष सदैव युवा रहता है।
- पितरा → क्योंकि वह जन्म-मरण के कारण-कार्य बंधनों से ऊपर उठ चुका है, इसलिए माता-पिता से प्राप्त केवल शारीरिक जन्म तक सीमित नहीं रहता।
- ऋजूयवः → वह ऋत और योग के द्वारा परमात्मा से जुड़ जाता है।
- ऋभवः → तब वह स्वयं समदर्शी होकर दूसरों की चेतना को भी प्रकाशित करता है।
- विष्टि → उसका ज्ञान वर्षा के जल की भाँति लोककल्याण का कारण बनता है।
- अक्रत → और वह अकर्ता भाव से निष्काम कर्म करता है।
आत्मज्ञान ही मनुष्य का वास्तविक द्वितीय जन्म है। यही द्विजत्व है। शरीर से जन्म लेना प्रथम जन्म है, परन्तु सत्य के प्रत्यक्ष अनुभव से ज्ञान का जन्म होना ही दूसरा जन्म है। ऐसा ज्ञानवान पुरुष सदैव युवा रहता है, क्योंकि उसकी चेतना समय और शरीर की सीमाओं से परे होती है। वह जन्म-मरण के कारण-कार्य बंधनों से मुक्त होकर आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है। इसलिए ऋषि ने उसे "युवाना" और "पितरा" कहकर उसके शाश्वत, मुक्त और ज्ञानमय स्वरूप का उद्घाटन किया है।
"ज्ञान का जन्म ही वास्तविक द्विजत्व है।"
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।

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