🔥यज्ञ - अध्यात्म - प्रेरक
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जैसे भौतिक अग्नि में हव्य की आहुति देकर अग्निहोत्र होता है, वैसे अध्यात्मिक जगत में भी अग्निहोत्र होता है। परमात्मा रुपी अग्नि में जीवात्मा, प्राण, मन,बुद्धि एवं इन्द्रियों को समर्पित करना आध्यात्मिक अग्निहोत्र कहलाता है। भौतिक अग्निहोत्र के साथ-साथ अग्निहोत्री को यह आध्यात्मिक अग्निहोत्र भी करना होता है, तभी उसका अग्निहोत्र पूर्ण माना जाता है। इसलिए यज्ञकर्त्ता निम्न मन्त्र का पाठ कर यज्ञ का प्रारम्भ करता है।
" ओ३म् उद्बुध्यस्वाग्ने प्रतिजागृहि त्वमिष्टापूर्ते संसृजेथामयं च। "
हे परमात्माग्निम तू उद्बुद्ध होकर मेरे ह्रदय में जाग जिससे तू और मेरा आत्मा मिलकर दोनों "इष्ट" और "पुष्ट" का सर्जन करे। इन "इष्ट" और "पुष्ट" रूपी महान कार्यों को वही व्यक्ति पूर्ण कर सकता है जिसने भौतिक अग्नि को प्रज्वलित करने के पश्चात परमात्मा रुपी दिव्य अग्नि को अपने ह्रदय रुपी यज्ञकुण्ड में स्थापित कर लिया है।बाहर की अग्नि को हम समिधा और धृत से प्रदीप्त करते हैं और शारीरिक अग्नि को अस्थिरुपी समिधा व वीर्य रूपी धृत से प्रदीप्त करते हैं। परमात्माग्नि में समर्पित हमारे तेज को वह अपने महान् तेज से सूक्ष्म और तेजस्वी बनाकर अधिक विस्तृत कर देता है और हमारी स्वार्थ भावना परार्थ में बदल जाती है। व्यक्तिगत कामनाओं का अन्त हो जाता है। " मै " व मेरा परिवार न रहकर समस्त विश्व अपना परिवार बन जाता है। अग्न्याधान मन में यज्ञमान ईश्वर से कहता है - " धौ: इव वरिम्णा " अर्थात् मै द्युलोक एवं पृथ्वी की तरह विस्तृत हो जाऊँ। कितना सुन्दर है यह यज्ञ का आध्यात्मिक स्वरूप।
🚩‼️आज का वेद मंत्र ‼️🚩
🌷 ओ३म् शं नो देव: विश्वदेवा भवन्तु शं सरस्वती सह धीभिरस्तु। शमभिषाच: शमु रातिषाच: शं नो दिव्या: पार्थिवा: शं नो अप्या:।।( ऋग्वेद ७\३५\११)
🌷अर्थ :- दिव्य गुण युक्त विद्वान् हमारे लिए सुखकारी हो, ज्ञान- विज्ञान वाली वेद विद्या उत्तम क्रियाओं सहित हमें सुखदायक हो, यज्ञकर्त्ता और आत्मदर्शी जन हमें सुख देने वाले हो, विद्या धनादि प्रदान करने वाले हमें सुखदायी हो, द्युलोक,आकाश और पृथ्वी के पदार्थ हमें सुखदायक हो, जल के पदार्थ हमें सुखकारी हो ।
मंत्र
ओ३म् शं नो देवाः विश्वदेवा भवन्तु शं सरस्वती सह धीभिरस्तु।
शमभिषाचः शमु रातिषाचः शं नो दिव्याः पार्थिवाः शं नो अप्याः॥
(ऋग्वेद 7.35.11)
पद-पदार्थ
- शं नः = हमारा कल्याण हो।
- देवाः विश्वदेवाः = समस्त दिव्य गुणों वाले विद्वान, उपकारी एवं प्रकाशमान श्रेष्ठ जन।
- सरस्वती = ज्ञान, वाणी और विद्या की अधिष्ठात्री शक्ति।
- सह धीभिः = बुद्धि, विवेक और प्रज्ञा सहित।
- अभिषाचः = रक्षक, संकटों को दूर करने वाले।
- रातिषाचः = दानशील, उपकारी, हितकारी व्यक्ति।
- दिव्याः = आकाशीय या उच्च गुणों वाली शक्तियाँ।
- पार्थिवाः = पृथ्वी पर स्थित जीवनोपयोगी पदार्थ एवं शक्तियाँ।
- अप्याः = जल सम्बन्धी शक्तियाँ, जल और उससे प्राप्त होने वाले जीवनोपयोगी साधन।
भावार्थ
हे परमात्मन्! समस्त दिव्य गुणों से युक्त श्रेष्ठ जन हमारा कल्याण करें। ज्ञान और बुद्धि से युक्त सरस्वती हमारे लिए मंगलकारिणी हो। हमारी रक्षा करने वाले तथा परोपकार करने वाले लोग हमारा हित करें। आकाशीय, पृथ्वीगत और जल से सम्बन्धित सभी प्राकृतिक शक्तियाँ हमारे लिए कल्याणकारी हों।
गुरु और गुरुडम के संदर्भ में मंत्र की व्याख्या
यह मंत्र बताता है कि मनुष्य का कल्याण किसी एक व्यक्ति की अंध-भक्ति से नहीं, बल्कि ज्ञान, विवेक, विद्वानों की संगति और प्रकृति के नियमों के अनुरूप जीवन से होता है।
1. "शं नो देवाः विश्वदेवा भवन्तु"
यहाँ "विश्वदेव" उन सभी श्रेष्ठ, विद्वान और उपकारी व्यक्तियों का संकेत है जो समाज को ज्ञान और सदाचार प्रदान करते हैं।
सच्चा गुरु स्वयं को ही सब कुछ नहीं मानता, बल्कि अन्य विद्वानों और सत्य के स्रोतों का भी सम्मान करता है।
गुरुडम इसके विपरीत कहता है—
"केवल मेरे पास सत्य है, बाकी सब गलत हैं।"
वेद कहता है कि कल्याण अनेक श्रेष्ठ विद्वानों और दिव्य गुणों से होता है, किसी एक व्यक्ति की निरंकुश सत्ता से नहीं।
2. "शं सरस्वती सह धीभिरस्तु"
सरस्वती यहाँ ज्ञान, विद्या और विवेक का प्रतीक है।
सच्चा गुरु:
- प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता देता है।
- तर्क और प्रमाण का सम्मान करता है।
- शिष्य की बुद्धि का विकास करता है।
गुरुडम:
- प्रश्नों को दबाता है।
- अंधविश्वास को बढ़ाता है।
- विवेक के स्थान पर व्यक्तिपूजा स्थापित करता है।
मंत्र स्पष्ट कहता है कि कल्याण "धी" (बुद्धि) से है, अंधानुकरण से नहीं।
3. "शमभिषाचः शमु रातिषाचः"
सच्चा गुरु रक्षक और उपकारी होता है। वह शिष्य का शोषण नहीं करता, बल्कि उसका उत्थान करता है।
यदि कोई तथाकथित गुरु:
- भय पैदा करे,
- धन-संग्रह को ही लक्ष्य बनाए,
- अनुयायियों का मानसिक या आर्थिक शोषण करे,
तो वह वैदिक अर्थ में गुरु नहीं, बल्कि गुरुडम का प्रतिनिधि है।
4. "शं नो दिव्याः पार्थिवाः शं नो अप्याः"
वेद मनुष्य को प्रकृति, विज्ञान, ज्ञान और समस्त सृष्टि से जोड़ता है।
सच्चा गुरु:
- परमात्मा, प्रकृति और सत्य के नियमों का ज्ञान देता है।
- व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाता है।
गुरुडम:
- व्यक्ति को गुरु-निर्भर बनाता है।
- स्वतंत्र चिंतन को हतोत्साहित करता है।
वैदिक संदेश
इस मंत्र का मूल संदेश है कि—
ज्ञान, विवेक, विद्वानों की संगति, परोपकार और प्रकृति के नियमों का अनुसरण ही कल्याण का मार्ग है।
अतः सच्चा गुरु वह है जो सरस्वती (विद्या) और धी (बुद्धि) की ओर ले जाए, जबकि गुरुडम वह है जो व्यक्ति को ज्ञान से हटाकर व्यक्तिपूजा में बाँध दे।
वेद का गुरु सत्य का मार्गदर्शक होता है; गुरुडम का गुरु स्वयं ही लक्ष्य बन बैठता है।
॥ ओम् शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

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