मंत्र का मूल संकेत
इस मंत्र में "यः" शब्द का तीन बार प्रयोग अत्यन्त अर्थपूर्ण है। यह केवल पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि सृष्टि के तीन शाश्वत तत्त्वों का संकेत है।
- प्रथम "यः" — परम चेतन, सर्वव्यापक परमात्मा, जो समस्त ऊर्जा और चेतना का मूल स्रोत है।
- द्वितीय "यः" — जीवात्मा, जो उस परम चेतना से शक्ति ग्रहण करके जीवन का अनुभव करती है।
- तृतीय "यः" — प्रकृति, जिसके माध्यम से वह चेतना और ऊर्जा विविध रूपों में प्रकट होकर समस्त सृष्टि का संचालन करती है।
इन्हीं तीनों के समन्वय से जीवन की पूर्ण व्यवस्था निर्मित होती है। परमात्मा ऊर्जा का मूल स्रोत है, जीव उसका ग्रहणकर्ता है और प्रकृति उसकी अभिव्यक्ति का क्षेत्र है।
जैसे विद्युत उत्पादन केन्द्र से ऊर्जा उत्पन्न होती है, चालक माध्यम से प्रवाहित होती है और किसी यंत्र से जुड़कर उसे गति प्रदान करती है, उसी प्रकार परमात्मा की चेतन शक्ति जीव और प्रकृति के माध्यम से सम्पूर्ण सृष्टि को गतिशील बनाती है।
अतः इस मंत्र का संदेश केवल प्रार्थना नहीं, बल्कि चेतना, प्राणशक्ति और प्रकृति के पारस्परिक सम्बन्ध का एक सूक्ष्म वैदिक विज्ञान है।
| वैदिक शब्द | मूल अर्थ | चेतना-विज्ञान आधारित संकेत |
|---|---|---|
| यः | जो | वह परम चेतन सत्ता, जो समस्त अस्तित्व का आधार है। |
| रेवान् | ऐश्वर्यवान, प्रकाशमान, सम्पन्न | जो अनन्त ज्ञान, चेतना, शक्ति और दिव्य गुणों से परिपूर्ण है; आत्मिक समृद्धि का स्रोत। |
| यः | वही | उसी परमात्मा का पुनः निर्देश, जिससे उसकी एकत्वपूर्ण सत्ता का बोध होता है। |
| अमीवहा | रोग, दुःख, क्लेश और दोषों का नाश करने वाला | जो अज्ञान, भय, मोह, दुर्बलता और चेतना के समस्त विकारों का हरण करता है; आत्मज्ञान का प्रकाशक। |
| वसुवित् | वसु (धन, श्रेष्ठ तत्त्व, दिव्य सम्पदा) का ज्ञाता अथवा देने वाला | जो समस्त भौतिक और आध्यात्मिक सम्पदाओं का मूल स्रोत है तथा जीव को उसके वास्तविक आन्तरिक वैभव का बोध कराता है। |
| पुष्टिवर्द्धनः | पुष्टि करने वाला, विकास और पोषण करने वाला | जो शरीर, प्राण, मन, बुद्धि और आत्मबल का समन्वित विकास करता है तथा चेतना को पूर्णता की ओर अग्रसर करता है। |
| सः | वही | वही परमात्मा। |
| नः | हमारा | समस्त जीवों का, समस्त साधकों का। |
| सिषक्तु | जोड़ दे, संलग्न करे, एकत्व स्थापित करे | हमारी चेतना को परमात्मा से जोड़ दे; आत्मा और परमात्मा के योग की अवस्था प्रदान करे। |
| यः | जो | वही परम सत्ता। |
| तुरः | तीव्रगामी, समर्थ, विघ्नों को पार कराने वाला, बलवान | जो समस्त बाधाओं से परे ले जाने वाला, तीव्र चेतनाशक्ति से सम्पन्न और आत्मोन्नति का प्रेरक है। |
समग्र भाव-संकेत
जो परमात्मा अनन्त ज्ञान और दिव्य ऐश्वर्य से सम्पन्न है, जो अज्ञान, दुःख और समस्त आन्तरिक विकारों का नाश करता है, जो वास्तविक सम्पदा का दाता तथा चेतना के सर्वांगीण विकास का आधार है, वही परम समर्थ और तीव्र चेतनाशक्ति वाला परमात्मा हमारी आत्मा को अपने साथ जोड़ दे और हमें आत्मोन्नति के मार्ग पर अग्रसर करे।।
य: यह जो रेवान निरंतर एक चाल सतत् चलने वाला य: यह अमीवहा अमिट शाश्वत वहा प्राणवायु है, वह वसुवित् जो शरीर को गति जीवन शक्ति देती है, पुष्टिवर्धन: पालन पोषण और उसके विकास के लिए जिम्मेदार है, स: वही शक्ति प्राणऊर्जा न: हम सब विद्युत भौतिकं ऊर्जा जब किसी यंत्र से जोड़ते हैं सिषक्तु तो यं: यंत्र तुर: तीव्र वेग से चलने में समर्थ होता है।
यजुर्वेद ३।२९ : शब्द-दर-शब्द चेतना-विज्ञान आधारित व्याख्या
मंत्र
शब्दार्थ एवं चेतना-विज्ञान आधारित संकेत
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यः — वह परम चेतन सत्ता।
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रेवान् — जो निरन्तर एक समान गति से, अविराम और अखण्ड रूप से समस्त सृष्टि में प्रवाहित एवं कार्यरत है। उसकी गति कभी रुकती नहीं, क्योंकि वही जीवन का शाश्वत प्रवाह है।
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यः — वही परमात्मा।
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अमीवहा — अमिट, शाश्वत और सर्वव्यापी प्राणशक्ति, जो समस्त जीवों के भीतर प्राणवायु के रूप में निरन्तर गतिशील रहती है तथा जीवन का आधार बनती है।
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वसुवित् — जो शरीर को जीवन, गति, ऊर्जा और क्रियाशीलता प्रदान करता है। वही समस्त जीवों के भीतर प्राणबल का मूल स्रोत है।
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पुष्टिवर्द्धनः — जो शरीर, प्राण, मन और चेतना का पालन-पोषण करता है तथा उनके निरन्तर विकास और संतुलन के लिए उत्तरदायी है।
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सः — वही एक परम प्राणशक्ति।
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नः — हम सब जीवों को।
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सिषक्तु — उसी प्रकार जोड़ दे, जैसे विद्युत ऊर्जा किसी यंत्र से जुड़ते ही उसे क्रियाशील बना देती है; उसी प्रकार हमारी चेतना को परम प्राणशक्ति से जोड़ दे।
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यः — वही परम चेतन ऊर्जा।
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तुरः — जिसके साथ जुड़ने पर जीवन तीव्र गति, सामर्थ्य, उत्साह और पूर्ण कार्यक्षमता प्राप्त कर लेता है।
भाव संकेत
यह मंत्र उस परम प्राणशक्ति का वर्णन करता है जो सम्पूर्ण सृष्टि में निरन्तर प्रवाहित हो रही है। वही प्रत्येक जीव के भीतर प्राण, गति और जीवन का आधार है। वही शरीर का पालन-पोषण करती है, विकास करती है और चेतना को सक्रिय रखती है। जैसे विद्युत ऊर्जा किसी यंत्र से जुड़कर उसे गतिशील और शक्तिशाली बना देती है, उसी प्रकार जब जीवात्मा उस परम प्राणशक्ति से जुड़ जाती है, तब उसका सम्पूर्ण जीवन जागृत, सामर्थ्यवान और उद्देश्यपूर्ण बन जाता है।
अपने पुत्र और पुत्रियों को ब्रह्मचर्य, सदाचार व विद्या के द्वारा विद्वान, विदुषी, सुंदर और शीलयुक्त बनाने का पुनीत कर्तव्य प्रत्येक सद्गृहस्थ निभाए।
परिवार की पाठशाला में व्यक्ति को सुसंस्कारों की शिक्षा मिलती है। समाज को गौरांवित करने वाले मणिमुक्तक भी इसी खदान में से निकलते हैं। व्यक्ति और समाज दो पहिए हैं जिनके सुसंचालन की धुरी परिवार संस्था को ही माना जाता है। धुरी में गडबडी होने पर प्रगति रथ का आगे बढ सकना कठिन है। इस तथ्य को समझा जा सके तो व्यक्ति को समर्थ और समाज को परिष्कृत बनाने की ही तरह परिवारों को भी सुसंस्कृत बनाने की आवश्यकता समझी जा सकेगी। सुसंस्कृत परिवारों का हर सदस्य उसी छोटे घरोंदे में स्वर्गीय सुख-शांति और प्रगति की चेतनात्मक संपदा प्राप्त करता है।
संतान के जन्म के पश्चात उसका समुचित पालन-पोषण, भोजन, वस्त्र, शिक्षा आदि की व्यवस्था करने का दायित्व भी सद्गृहस्थ पर ही है। केवल इतना ही नहीं, बच्चों का चरित्र निर्माण करना भी अभिभावकों का ही कर्तव्य है। इसे ठीक से न निभाया गया तो बच्चे अनेक दुर्गुणों से घिर जाते हैं और अपने लिए, परिवार के लिए तथा समाज के लिए अभिशाप सिद्ध होते हैं। उनको दुर्गुणों से बचाना और सदगुणों से अभ्यस्त करना भी उन्ही का कर्तव्य है। बच्चा जन्मजात कुछ भले बुरे संस्कार लेकर अवश्य आता है पर उनका विकसित अथवा नष्ट होना बहुत कुछ परिस्थितियों पर निर्भर करता है। बच्चों के मानसिक विकास का मुख्य आधार माता-पिता की मनोभूमि और घर का वातावरण ही होता है। यह भी एक रहस्यात्मक तथ्य है कि बालक गर्भ में आने के दिन से ही सीखना आरंभ करता है और पांच वर्ष की आयु तक अपनी मनोभूमि के निर्माण का लगभग तीन चौथाई कार्य पूर्ण कर लेता है। इस अवधि में बच्चा बहुत संवेदनशील रहता है। ज्ञान-विज्ञान, लोक व्यवहार आदि की शिक्षा तो बाद में मिलती है पर स्वभाव, अहंकार, चरित्र, आस्थाएं आदि जिस आयु में सीखी जाती है वह गर्भ में प्रवेश करने वाले दिन से लेकर पांच वर्ष तक ही हैं।
इसीलिए हमारे शास्त्रों ने गर्भाधान संस्कार को संस्कारों में पहला संस्कार माना है और गर्भ स्थापना की पूरी तैयारी का भी विधान किया है। पति-पत्नि दोनों को पहले से ही अपने दोष दुर्गुणों का परिष्कार करके आचरण, व्यवहार एवं संभाषण की समस्त गतिविधियां सुधार लेनी चाहिए। बाप का बीज और माता की जमीन दोनों का ही समान महत्व है संतान रूपी उपवन के निर्माण में। होनहार बच्चों की उत्पत्ति का मूल आधार यहीं से प्रारंभ होता है। अभिमन्यु का उदाहरण सर्वविदित ही है।
बच्चे पैदा करना व्यक्तिगत क्रीडा-विनोद का विषय नहीं है। एक नए व्यक्ति के जन्म एवं उसके व्यक्तित्व को निर्मित करने का यह महान उत्तरदायित्व है। यदि हम इस कर्तव्य को भूलते हैं तो स्वयं उद्विग्न रहने वाले, परिवार को दुखी करने वाले और समाज में दुष्प्रवृत्तियां बढाने वाले राक्षसों को ही उत्पन्न करे़गे और अपने पाप से अपने और सबके लिए नरक का सृजन करेंगें ।
🌷 ओ३म् यो रेवान् यो अमीवहा वसुवित्पुष्टिवर्द्धनः । स नः सिषक्तु यस्तुरः।। ( यजुर्वेद ३\२९ )
💐अर्थ :- जो इस संसार में धन है सो सब जगदीश्वर का ही है । मनुष्य लोग जैसी परमेश्वर की प्रार्थना करें, वैसा ही उनको पुरुषार्थ भी करना चाहिए । जैसे विद्या आदि धनवाला परमेश्वर है ऐसा विशेषण ईश्वर का कह वा सुनकर मनुष्य कृतकृत्य अर्थात् विद्या आदि धनवाला नहीं हो सकता, किन्तु अपने पुरुषार्थ से विद्या आदि धन की वृद्धि वा रक्षा निरन्तर करनी चाहिए जैसे परमेश्वर अविद्या आदि रोगों को दूर करनेवाला है, वैसे मनुष्यों को भी उचित है कि आप भी अविद्या आदि रोगों को निरन्तर दूर करें । जैसे वह वस्तुओं को यथावत् जानता है, वैसे मनुष्यों को भी उचित है की अपने सामर्थ्य के अनुसार सब पदार्थ-विद्याओं को यथावत् जानें जैसे वह सबकी पुष्टि को बढ़ाता है, वैसे मनुष्य को भी सबके पुष्टि आदि गुणों को निरन्तर बढ़ावें । जैसे वह अच्छे-अच्छे कार्यों को बनाने में शीघ्रता करता है, वैसे मनुष्य भी उत्तम-उत्तम कार्यों को त्वरा से करें और जैसे हम लोग उस परमेश्वर की उत्तम कर्मों के लिए प्रार्थना निरन्तर करते हैं, वैसे परमेश्वर भी हम सब मनुष्यों को उत्तम पुरुषार्थ से उत्तम-उत्तम गुण वा कर्मों के आचरण के साथ निरन्तर संयुक्त करें ।

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