🔥 मनुष्य जन्म में किए हुए कर्मों के अनुसार ही आत्मा को शरीर मिलता है । यदि शुभ कर्म अधिक हों तो देव यानि विद्वान का शरीर मिलता है । बुरे कर्म अधिक हों तो पशु , पक्षी , कीड़ा पतंगा आदि का जन्म मिलता है । अच्छे और बुरे कर्म बराबर हों तो साधारण मनुष्य का जन्म मिलता है ।यह जीव मन से शुभ अशुभ किए कर्म का फल मन से भोगता है ।महर्षि मनु ने वेदों के आधार पर ऐसा ही लिखा है । आत्मा मनुष्य या पशु पक्षी जिस भी योनि में जाता है उसी के अनुसार ढल जाता है - जैसे पानी में जो रंग डाला जाता है पानी उसी रंग का बन जाता है।पुनर्जन्म को गीता में ऐसा लिखा है -
जिस प्रकार मनुष्य फटे पुराने कपड़ों को उतारकर नये पहन लेता है ठीक उसी प्रकार यह आत्मा जीर्ण ( निकम्में ) शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण कर लेता है ।
श्रीमद्भगवद्गीता २.२२
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्
अन्यानि संयाति नवानि देही॥
शब्दार्थ
- वासांसि — वस्त्रों को।
- जीर्णानि — पुराने, जीर्ण।
- विहाय — त्यागकर।
- नवानि — नए।
- गृह्णाति — धारण करता है।
- नरः — मनुष्य।
- तथा — उसी प्रकार।
- शरीराणि — शरीरों को।
- देही — शरीरधारी आत्मा।
- अन्यानि — अन्य।
- संयाति — प्राप्त करती है, धारण करती है।
भावार्थ
जैसे मनुष्य पुराने और जीर्ण वस्त्रों को छोड़कर नए वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा पुराने और अनुपयोगी शरीर का त्याग करके कर्मानुसार नया शरीर धारण करती है।
व्याख्या
यह श्लोक आत्मा और शरीर के भेद को अत्यन्त सरल उपमा द्वारा समझाता है।
शरीर परिवर्तनशील है—उसका जन्म होता है, वह वृद्ध होता है और एक दिन नष्ट हो जाता है। किन्तु आत्मा चेतन, अविनाशी और नित्य है। मृत्यु आत्मा का अंत नहीं, बल्कि केवल एक शरीर से दूसरे शरीर में गमन है।
इस श्लोक का उद्देश्य मृत्यु का भय दूर करना है। जैसे वस्त्र बदलने से व्यक्ति नहीं बदलता, वैसे ही शरीर बदलने से आत्मा का अस्तित्व समाप्त नहीं होता।
दार्शनिक संदेश
- आत्मा अमर है, शरीर नश्वर है।
- मृत्यु जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक अवस्था से दूसरी अवस्था में परिवर्तन है।
- नया शरीर आत्मा को उसके पूर्वकृत कर्मों के अनुसार प्राप्त होता है।
- इसलिए मनुष्य को शरीर की अपेक्षा आत्मा के विकास और श्रेष्ठ कर्मों पर अधिक ध्यान देना चाहिए।
व्यावहारिक शिक्षा
- मृत्यु से अत्यधिक भयभीत होने के बजाय जीवन को सार्थक बनाना चाहिए।
- प्रत्येक कर्म का फल मिलता है, इसलिए धर्म, सत्य और न्याय का पालन करना आवश्यक है।
- शरीर की देखभाल आवश्यक है, परन्तु उससे भी अधिक आवश्यक है आत्मिक उन्नति, सदाचार और ज्ञान।
निष्कर्ष
यह श्लोक मानव जीवन को आशा, धैर्य और विवेक प्रदान करता है। यह सिखाता है कि शरीर नश्वर है, परन्तु आत्मा शाश्वत है। अतः मनुष्य को ऐसा जीवन जीना चाहिए कि उसके कर्म उसे उच्चतर गति और आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाएँ।
"शरीर बदलता है, आत्मा नहीं; इसलिए जीवन का वास्तविक लक्ष्य शरीर का श्रृंगार नहीं, आत्मा का संस्कार होना चाहिए।"
ॐ तत्सत्।
🍁🍀🍁🍀🍁🍀🍁🍀
🕉️🚩आज का वेद मंत्र 🚩🕉️
यजुर्वेद ४०.३ (ईशावास्योपनिषद् मन्त्र ३) का भावार्थ एवं विस्तृत व्याख्या
मन्त्र
ॐ असूर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽवृताः।
ताँस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः॥
(यजुर्वेद ४०.३)
शब्दार्थ
- असूर्याः — प्रकाशरहित, ज्ञानहीन, ईश्वर-विमुख।
- लोकाः — अवस्थाएँ, लोक, जीवन की स्थितियाँ।
- अन्धेन तमसा आवृताः — घोर अज्ञानरूपी अंधकार से आच्छादित।
- प्रेत्य — मृत्यु के पश्चात् अथवा इस शरीर का त्याग करने पर।
- अभिगच्छन्ति — प्राप्त होते हैं, पहुँचते हैं।
- आत्महनः — आत्मा का कल्याण नष्ट करने वाले; अपने आत्मिक विकास का विनाश करने वाले।
- जनाः — मनुष्य।
भावार्थ
जो मनुष्य अपने आत्मिक कल्याण की उपेक्षा करते हैं, सत्य, धर्म और ईश्वर-ज्ञान से विमुख रहते हैं, वे मृत्यु के पश्चात् अज्ञान और दुःख से युक्त अवस्थाओं को प्राप्त होते हैं।
व्याख्या
इस मन्त्र में "आत्महनः" शब्द अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ केवल शारीरिक आत्महत्या करने वाला नहीं है। वैदिक भाष्यकारों ने इसका व्यापक अर्थ किया है—जो मनुष्य अपने आत्मा के विकास को नष्ट कर देता है, अर्थात्—
- विद्या का त्याग करता है,
- सत्य और धर्म से विमुख रहता है,
- ईश्वर का स्मरण नहीं करता,
- पाप, अधर्म और अज्ञान में जीवन व्यतीत करता है,
- अपने मनुष्य जीवन के उद्देश्य को खो देता है।
ऐसा व्यक्ति अपने अमूल्य मानव जीवन का दुरुपयोग करता है, इसलिए उसे "आत्महन" कहा गया है।
"असूर्य लोक" का तात्पर्य ऐसे अंधकारमय जीवन या ऐसी गति से है जहाँ ज्ञान, शान्ति और आनन्द का अभाव हो। यह केवल किसी भौतिक स्थान का वर्णन नहीं, बल्कि अज्ञान और अधर्म की स्थिति का भी द्योतक है।
महर्षि दयानन्द सरस्वती के अनुसार
महर्षि दयानन्द ने इस मन्त्र का अर्थ करते हुए स्पष्ट किया कि आत्महन वे लोग हैं जो विद्या, धर्म, सत्य और परमात्मा की उपासना का त्याग कर अपने आत्मकल्याण का नाश करते हैं। ऐसे लोग अपने कर्मों के अनुसार दुःखद परिणामों को प्राप्त होते हैं।
जीवनोपयोगी शिक्षा
- मनुष्य जीवन आत्मोन्नति के लिए मिला है।
- केवल भौतिक सुख ही जीवन का लक्ष्य नहीं है।
- विद्या, सत्य, यज्ञ, सेवा और ईश्वर-उपासना से जीवन को प्रकाशित करना चाहिए।
- अज्ञान, आलस्य, व्यसन, हिंसा और अधर्म से बचना चाहिए।
- प्रतिदिन आत्मचिन्तन करें कि क्या हमारे कर्म आत्मा को ऊँचा उठा रहे हैं या पतन की ओर ले जा रहे हैं।
निष्कर्ष
यह मन्त्र मनुष्य को चेतावनी देता है कि यदि वह अपने आत्मिक विकास की उपेक्षा करेगा और अज्ञान तथा अधर्म में जीवन बिताएगा, तो उसका परिणाम दुःखद होगा। वहीं जो व्यक्ति ज्ञान, सत्य, धर्म और ईश्वर-उपासना का मार्ग अपनाता है, वह अपने जीवन को प्रकाश, शान्ति और कल्याण की ओर ले जाता है।
"आत्मा का वास्तविक हनन शरीर का नाश नहीं, बल्कि सत्य, ज्ञान और धर्म से विमुख होकर अपने अमूल्य मानव जीवन को व्यर्थ गँवा देना है।"
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
💐अर्थ :- वे ही मनुष्य असुर, दैत्य, राक्षस, पिशाच एवं दुष्ट है, जो आत्मा में और वाणी में और कर्म में कुछ और ही करते हैं । वे कभी अविद्या रूप दुःखसागर से पार होकर आनन्द को नही प्राप्त कर सकते ।और जो लोग जो आत्मा में सो मन में, जो मन में सो वाणी में,जो वाणी में सो कर्म में कपटरहित आचरण करते हैं, वे ही देव, आर्य सौभाग्यवान् जन सब जगत् को पवित्र करते हुए इस लोक तथा परलोक में अनुपम सुख को प्राप्त करते हैं ।

0 टिप्पणियाँ
If you have any Misunderstanding Please let me know