🚩‼️ओ३म्‼️🚩
🔥आत्मा की सत्ता व स्वरुप।
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एक व्यक्ति कहता है कि 'मैं हूं'। यहाँ 'मैं' का प्रयोग शरीर के लिए नहीं अपितु आत्मा के लिए होता है। यह उचित भी है क्योंकि शरीर के लिए कोई 'मैं' का प्रयोग नहीं करता, अपितु 'मेरा शरीर' का प्रयोग करता है।
सांख्य शास्त्र के रचयिता महर्षि कपिल ने अन्य प्रकार से इस बात को समझाया है―
प्रधानसृष्टि: परार्थं स्वतोऽप्यभोक्तृत्वात् उष्ट्रकुंकुमवहनवत्।
अर्थात्― प्रकृति से परिणत जगत् आत्मा के लिए ही है, प्रकृति के स्वयं भोक्ता न होने से, ऊँट के द्वारा केशर ढोए जाने के समान।
ऊँट केशर को अपने लिए नहीं, अपितु दूसरों के लिए ढोता है। इसी प्रकार प्रकृति से बना जगत् अपने लिए न होकर, आत्माओं के लिए होता है।
कैवल्यार्थं प्रवृत्तेश्च।―(सांख्य १/१०९)
'और मोक्ष के लिए प्रवृत्ति से।'
दु:ख की अत्यन्त निवृत्ति को मोक्ष कहते हैं। दु:खों से बचने के लिए जो प्रवृत्त होता है वह आत्मा कहलाता है।
स्थूल देह को यदि चेतन मान लिया जाए, तो आत्मा के मानने की क्या आवश्यकता है? इस आशंका का समाधान करते हुए आचार्य कपिल कहते हैं―
न सांसिद्धिकं चैतन्यं प्रत्येकादृष्टे:।
―(सां० ३/२०)
'प्रत्येक भूतकण में न देखे जाने से भौतिक तत्त्व में स्वभावत: चैतन्य नहीं है।'
पंचमहाभूतों के कणों में चेतना नहीं पाई जाती, अत: इन कणों के संघात पंचमहाभूतों में चेतना का तो प्रश्न ही नहीं उठता। कुछ वैज्ञानिक कहते हैं कि कुछ तत्त्वों के मेल से चेतना उत्पन्न होती है, परन्तु आज तक कोई वैज्ञानिक भौतिक तत्त्वों से चेतना को उत्पन्न नहीं कर सका। इससे पता चलता है कि मनुष्य का चेतना पर कोई अधिकार नहीं है। यदि पंचमहाभूतों को चेतन माना जाए, तो इसके क्या परिणाम होंगे, महर्षि कपिल इस विषय में कहते हैं―
प्रपंचमरणाद्यभावश्च।―(३/२१)
'समस्त जड़ जगत् और मरणादि का अभाव होना चाहिए।'
यदि पंचमहाभूतों को चेतन मान लिया जाए, तो फिर समस्त जगत् में जड़ता नहीं रहनी चाहिए, अपितु समस्त जगत् चेतन होना चाहिए; परन्तु ऐसा अनुभव में नहीं आता। यदि पंचमहाभूतों को चेतन माना जाए, तो इनका परिणाम जो शरीर है, उसे तो कभी मरना नहीं चाहिए। परन्तु हम शरीर की मृत्यु देखते हैं। इससे स्पष्ट ज्ञात होता है कि चेतना पंचमहाभूतों का धर्म नहीं है, अपितु यह किसी अन्य तत्त्व का धर्म है जिसे आत्मा कहते हैं।
न्यायदर्शन में आचार्य गौतम ने आत्मा की नित्यता के विषय में निम्नलिखित युक्तियाँ उपस्थित की हैं―
पूर्वाभ्यस्तस्मृत्यनुबन्धाज्जातस्य हर्षभयशोकसम्प्रतिपत्ते:।
―(न्याय ३/१/१९)
पहले अभ्यास की हुई स्मृति के लगाव से उत्पन्न हुए को हर्ष, भय, शोक की प्राप्ति होने से आत्मा नित्य है।
जो बालक अभी जन्मा है उसे हर्ष, भय और शोक आदि से युक्त देखा जाता है। ये हर्ष, भय और शोक पूर्वजन्म में अभ्यास की हुई स्मृति के लगाव से ही उत्पन्न होते हैं।
प्रेत्याहाराभ्यासकृतात् स्तन्याभिलाषात् ।
―(न्याय ३/१/२२)
मरकर पूर्वाभ्यासकृत दूध का अभिलाषी होने से आत्मा नित्य है।
बच्चा उत्पन्न होते ही माँ के स्तनों का पान करने लगता है। इस जन्म में तो अभी उसने पीने का अभ्यास किया ही नहीं। इससे पता चलता है कि अपने पूर्वजन्म में भोजन का अभ्यास किया है।
महर्षि गौतम ने न्याय-दर्शन में आत्मा की सिद्धि के विषय में निम्न युक्तियाँ दीं―
दर्शनस्पर्शनाभ्यामेकार्थग्रहणात्।
―(न्याय ३/१/१)
'दर्शन और स्पर्शन से एक ही अर्थ का ग्रहण होने से आत्मा शरीर से भिन्न है।'
जिस विषय को हम आँख से देखते हैं उसी को त्वचा से स्पर्श भी करते हैं। नींबू को देखकर रसना में पानी भर जाता है। यदि इन्द्रियाँ ही चेतन होतीं तो ऐसा कदापि नहीं हो सकता था, क्योंकि एक के देखे हुए अर्थ का दूसरे को कभी स्मरण नहीं होता। फिर आँख के देखे हुए विषय का जिह्वा वा त्वचा से क्यों कर अनुभव किया जाता है? जब हम एक इन्द्रिय के अर्थ को दूसरी इन्द्रिय से ग्रहण करते हैं तो इससे सिद्ध होता है कि उस अर्थ के ग्रहण करने में इन्द्रियाँ स्वतन्त्र नहीं हैं, किन्तु इनके अतिरिक्त ग्रहीता कोई और है जिसे आत्मा कहते हैं।यही बात महर्षि कणाद ने वैशेषिक शास्त्र में कही है―
इन्द्रियार्थप्रसिद्धिरिन्द्रियार्थेभ्योऽर्थान्तरस्य हेतु: ।
―(वै० ३,१,२)
इन्द्रियों के अर्थों की प्रसिद्धि इन्द्रियार्थों से अन्य अर्थ (आत्मा) की साधक है।
नाक से सूँघकर जिह्वा से चखना, आँख से देखकर त्वचा से छूना, और कान से सुनकर विषयों का ग्रहण करना आत्मा को सिद्ध करता है।
इस तर्क के खण्डन में यह तर्क दिया जाता है कि आँख और कान आदि इन्द्रियों के रुप और शब्द आदि विषय तो निश्चित हैं जो इन्द्रियों के द्वारा ग्रहण होते हैं, तो फिर आत्मा के मानने की क्या आवश्यकता है? इसके उत्तर में महर्षि गौतम ने कहा है कि इन्द्रियों के विषयों की निश्चितता ही आत्मा की सत्ता का प्रमाण देती है कि वह आत्मा ही इन्द्रियों से अपने-अपने विषयों को ग्रहण कराता है, उनसे भिन्न नहीं।
आचार्य गौतम ने आत्मा की सिद्धि में दूसरी युक्ति दी है―
शरीरदाहे पातकाभावात् ।―(न्याय ३/१/४)
'शरीर को जलाने में पाप नहीं होता।'
इससे सिद्ध होता है कि आत्मा शरीर से पृथक् है। इस पर शंका किए जाने पर कि आत्मा के नित्य होने के कारण सजीव शरीर को जलाने में कोई पाप नहीं, आचार्य गौतम ने कहा है कि नित्य आत्मा के शरीर में होने पर शरीर को जलाए जाने से पाप होता है, क्योंकि आत्मा के शरीर में होने पर शरीर को जलाने से शरीर को कष्ट अनुभव होता है
🌺 सर्वकल्याण की वैदिक प्रार्थना
ऋग्वेद ७.३५.३ का दिव्य संदेश
मन्त्र
ॐ शं नो धाता शमु धर्त्ता नो अस्तु।शं न उरूची भवतु स्वधाभिः।शं रोदसी बृहती शं नो अद्रिः।शं नो देवानां सुहवानि सन्तु॥(ऋग्वेद ७.३५.३)
भावार्थ
हे सृष्टिकर्ता एवं समस्त जगत् के धारण-पोषण करने वाले परमात्मा! हमारे लिए कल्याणकारी बनें। अपनी दिव्य व्यवस्था और प्राकृतिक नियमों से हमें सुख, सामर्थ्य और समृद्धि प्रदान करें। यह विशाल पृथ्वी और आकाश हमारे लिए मंगलकारी हों, पर्वत हमारे लिए कल्याणकारी हों तथा प्रकृति के समस्त दिव्य, उपकारी पदार्थ हमारे जीवन में सुख और शान्ति प्रदान करें।
मन्त्र का गूढ़ संदेश
यह मन्त्र केवल व्यक्ति विशेष के लिए नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि के कल्याण की प्रार्थना है। वेद हमें सिखाते हैं कि मनुष्य का सुख प्रकृति के सुख से जुड़ा है।
१. "धाता" — सृष्टि का रचयिता
"धाता" वह परमात्मा है जिसने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की रचना की और प्रत्येक वस्तु को उसके नियमों के अनुसार व्यवस्थित किया।
यजुर्वेद में कहा गया है—
"स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्..."(यजुर्वेद 40.8)
अर्थात् परमात्मा सर्वव्यापक, शुद्ध, निराकार और सर्वज्ञ है।
२. "धर्ता" — पालन करने वाला
परमात्मा केवल सृष्टि का निर्माता ही नहीं, बल्कि उसका पालनकर्ता भी है। सूर्य, वायु, जल, पृथ्वी और समस्त प्राकृतिक नियम उसी की व्यवस्था से संचालित होते हैं।
इसी कारण मनुष्य को प्रकृति का शोषण नहीं, बल्कि संरक्षण करना चाहिए।
३. "रोदसी" — पृथ्वी और आकाश
वेदों में पृथ्वी और आकाश को जीवन का आधार माना गया है।
यदि—
- वायु शुद्ध होगी,
- जल निर्मल होगा,
- वन सुरक्षित होंगे,
- पर्वत संरक्षित होंगे,
तो मानव जीवन भी स्वस्थ और सुखी रहेगा।
यह मन्त्र पर्यावरण संरक्षण का भी महान संदेश देता है।
४. "देवानां सुहवानि"
वेदों में "देव" का अर्थ केवल पूजनीय देवता नहीं, बल्कि वे सभी उपकारी तत्त्व हैं जो जीवन का पोषण करते हैं—जैसे सूर्य, अग्नि, वायु, जल, विद्वान और सद्गुण।
मन्त्र की प्रार्थना है कि ये सभी हमारे लिए मंगलकारी हों और हम भी इनके प्रति कृतज्ञ रहें।
आज के समाज के लिए शिक्षा
आज मानव अनेक संकटों से घिरा है—
- पर्यावरण प्रदूषण,
- जल संकट,
- मानसिक तनाव,
- प्राकृतिक आपदाएँ।
ऋग्वेद का यह मन्त्र सिखाता है कि—
- प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चलो।
- ईश्वर की व्यवस्था का सम्मान करो।
- पृथ्वी, जल, वायु और पर्वतों की रक्षा करो।
- समस्त सृष्टि के कल्याण की भावना रखो।
वेद का सार्वभौमिक संदेश
वेद केवल मनुष्य के सुख की नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि के कल्याण की कामना करते हैं।
इसी भावना को आगे बढ़ाते हुए यजुर्वेद कहता है—
"मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे।"(यजुर्वेद 36.18)
अर्थ: मैं सभी प्राणियों को मित्रभाव से देखूँ।
निष्कर्ष
ऋग्वेद का यह मन्त्र हमें सिखाता है कि हमारा वास्तविक सुख तभी संभव है जब ईश्वर, प्रकृति और मानव समाज—तीनों के साथ हमारा संबंध संतुलित और सामंजस्यपूर्ण हो।
जब हम प्रकृति का सम्मान करेंगे, सत्य और धर्म का पालन करेंगे तथा सबके कल्याण की कामना करेंगे, तभी "शं" अर्थात् वास्तविक शान्ति, सुख और समृद्धि प्राप्त होगी।
🌿 "वेद का धर्म केवल पूजा नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के प्रति उत्तरदायित्व, कृतज्ञता और कल्याण की भावना है।"
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
💐 अर्थ :- सबका पोषण तथा धारण करने हारा परमात्मा हमारे लिए शान्ति दायक हो, पृथ्वी अमृतमय अन्नादि पदार्थों के साथ शान्ति देने वाली हो, विस्तृत अन्तरिक्ष एवं भूमि हमारे लिए शान्तिकारक हो, मेघ व पर्वत हमें शान्ति देने वाले हो और देवों-विद्वानों के सुन्दर स्तुति ज्ञान हमारे लिए शान्ति देने वाला हो ।
🌺 आत्मा की सत्ता का स्वरूप — वेद, उपनिषद् और गीता के प्रमाणों सहित
📖 1. आत्मा नित्य और अविनाशी है
"न जायते म्रियते वा कदाचित्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणोन हन्यते हन्यमाने शरीरे॥"— 2.20
भावार्थ: आत्मा का कभी जन्म नहीं होता और न कभी मृत्यु होती है। शरीर के नष्ट होने पर भी आत्मा नष्ट नहीं होती।
📖 2. शरीर बदलता है, आत्मा नहीं
"वासांसि जीर्णानि यथा विहायनवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्अन्यानि संयाति नवानि देही॥"— 2.22
भावार्थ: जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र छोड़कर नए वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करती है।
📖 3. आत्मा का स्वरूप
"एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यः।"— 3.1.9
भावार्थ: यह आत्मा अत्यन्त सूक्ष्म है और शुद्ध बुद्धि तथा आत्मचिन्तन से जानी जाती है।
आत्मा न आँखों से दिखाई देती है, न किसी उपकरण से मापी जा सकती है; उसका अनुभव ज्ञान, विवेक और साधना से होता है।
📖 4. आत्मा चेतन है, शरीर जड़ है
"पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूः..."— 2.1.1
इस मंत्र का भाव है कि इन्द्रियाँ बाहर की ओर प्रवृत्त हैं, इसलिए मनुष्य बाहरी संसार को देखता है। विरले धीर पुरुष अंतर्मुख होकर आत्मा का साक्षात्कार करते हैं।
📖 5. वेद का प्रमाण
"द्वा सुपर्णा सयुजा सखायासमानं वृक्षं परिषस्वजाते।"— 1.164.20
भावार्थ: एक ही शरीर रूपी वृक्ष में दो चेतन तत्त्वों का वर्णन है—एक जीवात्मा, जो कर्मों के फल का अनुभव करता है, और दूसरा परमात्मा, जो साक्षी रूप में स्थित है।
महर्षि दयानन्द का मत
ने में लिखा है कि—
आत्मा चेतन, अणु स्वरूप, नित्य, इच्छाशक्ति, ज्ञान और प्रयत्न का धारक है। वह न शरीर है और न परमात्मा; वह एक स्वतंत्र जीव है जो अपने कर्मों का फल भोगता है।
आत्मा के प्रमुख गुण
- ✅ चेतन (Conscious)
- ✅ नित्य (Eternal)
- ✅ अविनाशी
- ✅ कर्म करने में स्वतंत्र, फल भोगने में परतंत्र
- ✅ ज्ञान, इच्छा और प्रयत्न का आधार
- ✅ शरीर से भिन्न
आत्मा और शरीर में अंतर
| आत्मा | शरीर |
|---|---|
| चेतन | जड़ |
| नित्य | नश्वर |
| अनुभव करने वाला | अनुभव का साधन |
| कर्मफल का भोक्ता | पंचमहाभूतों से निर्मित |
निष्कर्ष
वेद, उपनिषद् और गीता के अनुसार आत्मा मनुष्य का वास्तविक स्वरूप है। शरीर बदलता है, लेकिन आत्मा नहीं। आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है। वह अपने कर्मों के अनुसार विभिन्न शरीर धारण करती है और अंततः ज्ञान, सत्य और ईश्वर की उपासना द्वारा मोक्ष की ओर अग्रसर होती है।
"जो स्वयं को केवल शरीर मानता है, वह भय और मोह में रहता है; जो स्वयं को आत्मा जानता है, वह सत्य, कर्तव्य और आत्मोन्नति के मार्ग पर चलता है।"
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