ऋग्वेद मंडल १ सूक्त १०५ संस्कृत व्याकरण हिन्दी भावार्थ

ऋग्वेद मंडल १ सूक्त १०५ संस्कृत व्याकरण हिन्दी भावार्थ

अथैकोनविंशत्यृचस्य पञ्चाधिकशततमस्य सूक्तस्याप्त्यस्त्रित ऋषिराङ्गिरसः कुत्सो वा। विश्वेदेवा देवताः। 1,2,12,16,17 निचृत्पङ्क्तिः। 3,4,6,9,15,18 विराट्पङ्क्तिः। 8,10 स्वराट् पङ्क्तिः। 11,14 पङ्क्तिश्छन्दः। पञ्चमः स्वरः। 5 निचृद्बृहती। 7 भुरिग्बृहती। 13 महाबृहती छन्दः। मध्यमः स्वरः। 19 निचृत्त्रिष्टुप् छन्दः। धैवतः स्वरः॥ 

अथ चन्द्रलोकः कीदृश इत्युपदिश्यते॥ 

अब एकसौ पांचवें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में चन्द्रलोक कैसा है, इस विषय को कहा है॥ 

च॒न्द्रमा॑ अ॒प्स्वन्तरा सु॑प॒र्णो धा॑वते दि॒वि। न वो॑ हिरण्यनेमयः प॒दं वि॑न्दन्ति विद्युतो वित्तं॒ मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥1॥ 

च॒न्द्रमाः॑। अ॒प्ऽसु। अ॒न्तः। आ। सु॒ऽप॒र्णः। धा॒व॒ते॒। दि॒वि। न। वः॒। हि॒र॒ण्य॒ऽने॒म॒यः॒। प॒दम्। वि॒न्द॒न्ति॒। वि॒द्यु॒तः॒। वि॒त्तम्। मे॒। अ॒स्य। रो॒द॒सी॒ इति॑॥1॥ 

पदार्थः—(चन्द्रमाः) आह्लादकारकः इन्दुलोकः (अप्सु) प्राणभूतेषु वायुषु (अन्तः) (आ) (सुपर्णः) शोभनं पर्णं पतनं गमनं यस्य (धावते) (दिवि) सूर्य्यप्रकाशे (न) निषेधे (वः) युष्माकम् (हिरण्यनेमयः) हिरण्यस्वरूपा नेमिः सीमा यासां ताः (पदम्) विचारमयं शिल्पव्यवहारम् (विन्दन्ति) लभन्ते (विद्युतः) सौदामिन्यः (वित्तम्) विजानीतम् (मे) मम पदार्थविद्याविदः सकाशात् (अस्य) (रोदसी) द्यावापृथिव्याविव राजप्रजे जनसमूहौ॥1॥ 

अन्वयः—हे रोदसी! मे मम सकाशाद् योऽप्स्वन्तः सुपर्णश्चन्द्रमा दिव्याधावते हिरण्यनेमयो विद्युतश्च धावत्योः वः पदं न विन्दन्त्यस्य पूर्वोक्तस्येमं पूर्वोक्तं विषयं युवां वित्तम्॥1॥

 भावार्थः—हे राजप्रजापुरुषौ! यश्चन्द्रमसश्छायान्तरिक्षजलसंयोगेन शीतलत्वप्रकाशस्तं विजानीतम्। या विद्युतः प्रकाशन्ते ताश्चक्षुर्ग्राह्या भवन्ति याः प्रसीनास्तासां चिह्नं चक्षुषा ग्रहीतुमशक्यम्। एतत्सर्वं विदित्वा सुखं सम्पादयेतम्॥1॥ 

पदार्थः—हे (रोदसी) सूर्यप्रकाश वा भूमि के तुल्य राज और प्रजा जनसमूह! (मे) मुझ पदार्थ विद्या जाननेवाले की उत्तेजना से जो (अप्सु) प्राणरूपी पवनों के (अन्तः) बीच (सुपर्णः) अच्छा गमन करने वा (चन्द्रमाः) आनन्द देनेवाला चन्द्रलोक (दिवि) सूर्य के प्रकाश में (आ, धावते) अति शीघ्र घूमता है और (हिरण्यनेमयः) जिनको सुवर्णरूपी चमक-दमक चिलचिलाहट है, वे (विद्युतः) बिजली लपट-झपट से दौड़ती हुईं (वः) तुम लोगों की (पदम्) विचारवाली शिल्प चतुराई को (न) नहीं (विन्दन्ति) पाती हैं अर्थात् तुम उनको यथोचित काम में नहीं लाते हो (अस्य) इस पूर्वोक्त विषय को तुम (वित्तम्) जानो॥1॥

 भावार्थः—हे राजा और प्रजा के पुरुष! जो चन्द्रमा की छाया और अन्तरिक्ष के जल के संयोग से शीतलता का प्रकाश है, उसको जानो तथा जो बिजुली लपट-झपट से दमकती हैं, वे आखों से देखने योग्य हैं और जो विलाय जाती हैं, उनका चिह्न भी आँख से देखा नहीं जा सकता, इस सबको जानकर सुख को उत्पन्न करो॥1॥

 पुनस्तौ कीदृशावित्युपदिश्यते॥

 फिर वे राजा और प्रजा कैसे हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥ 

अर्थ॒मिद्वा उ॑ अ॒र्थिन॒ आ जा॒या यु॑वते॒ पति॑म्। तु॒ञ्जाते॒ वृष्ण्यं॒ पयः॑ परि॒दाय॒ रसं॑ दुहे वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥2॥ 

अर्थ॑म्। इत्। वै। ऊ॒म्ऽइति॑। अ॒र्थिनः॑। आ। जा॒या। यु॒व॒ते॒। पति॑म्। तु॒ञ्जाते॒ इति॑। वृष्ण्य॑म्। पयः॑। प॒रि॒ऽदाय॑। रस॑म्। दु॒हे॒। वि॒त्तम्। मे॒। अ॒स्य। रो॒द॒सी॒ इति॑॥2॥

 पदार्थः—(अर्थम्) य ऋच्छति प्राप्नोति तम् (इत्) अपि (वै) खलु (उ) वितर्के (अर्थिनः) प्रशस्तोऽर्थः प्रयोजनं येषान्ते (आ) (जाया) स्त्रीव (युवते) युनते बध्नन्ति। अत्र विकरणव्यत्ययेन शः। (पतिम्) स्वामिनम् (तुञ्जाते) दुःखानि हिंस्तः। व्यत्ययेनात्रात्मनेपदम्। (वृष्ण्यम्) वृषसु साधुम् (पयः) अन्नम्। पय इत्यन्ननामसु पठितम्। (निघं॰2.7) (परिदाय) सर्वतो दत्वा (रसम्) स्वादिष्ठमोषध्यादिभ्यो निष्पन्नं सारम् (दुहे) वर्धयेयम् (वित्तं, मे॰) इति पूर्ववत्॥2॥ 

अन्वयः—यथार्थिनोऽर्थं वै पतिं जायेव आयुवते यथा राजप्रजे यद् वृष्ण्यं पयो रसमित् परिदाय दुःखानि तुञ्जाते तथा तच्चाहमपि दुहे। अन्यत् पूर्ववत्॥2॥ 

भावार्थः—अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा स्त्रीष्टं पतिं प्राप्य पुरुषश्चेष्टां स्त्रियं वाऽऽनन्दयतस्तथाऽर्थ- साधनतत्परा विद्युत्पृथिवीसूर्यप्रकाशविद्यां गृहीत्वा पदार्थान् प्राप्य सदा सुखयति नह्येतद्विद्याविदां सङ्गेन विनैषा विद्या भवितुमर्हति दुःखविनाशश्च संभवति। तस्मादेषा सर्वैः प्रयत्नेन स्वीकार्य्या॥2॥

 पदार्थः—जैसे (अर्थिनः) प्रशंसित प्रयोजनवाले जन (अर्थम्) जो प्राप्त होता है, उसको (वै) ही (पतिम्) पति का (जाया) सम्बन्ध करनेवाली स्त्री के समान (आ, युवते) अच्छे प्रकार सम्बन्ध करते हैं (उ) या तो जैसे राजा-प्रजा जिस (वृष्ण्यम्) श्रेष्ठों में उत्तम (पयः) अन्न (इत्) और (रसम्) स्वादिष्ठ ओषधियों से निकाले रस को (परिदाय) सब ओर से देके दुःखों को (तुञ्जाते) दूर करते हैं, वैसे उस-उस को मैं भी (दुहे) बढ़ाऊँ। शेष अर्थ प्रथम मन्त्र में कहे समान जानना चाहिये॥2॥

 भावार्थः—इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे स्त्री अपनी इच्छा के अनुकूल पति को वा पति अपनी इच्छा के अनुकूल स्त्री को पाकर परस्पर आनन्दित करते हैं, वैसे प्रयोजन सिद्ध कराने में तत्पर बिजुली, पृथिवी और सूर्यप्रकाश की विद्या के ग्रहण से पदार्थों को प्राप्त होकर सदा सुख देती है। इसकी विद्या को जाननेवालों के संग के विना यह विद्या होने को कठिन है और दुःख का भी विनाश अच्छी प्रकार नहीं होता। इससे सबको चाहिये कि इस विद्या को यत्न से लेवें॥2॥

 अत्र जगति विद्वांसः कथं प्रष्टव्या इत्युपदिश्यते॥

 इस जगत् में विद्वान् जन कैसे पूछने के योग्य हैं, यह अगले मन्त्र में उपदेश किया है॥

 मो षु दे॑वा अ॒दः स्वरव॑ पादि दि॒वस्परि॑। मा सो॒म्यस्य॑ शं॒भुवः॒ शूने॑ भूम॒ कदा॑ च॒न वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥3॥

 मो इति॑। सु। दे॒वाः॒। अ॒दः। स्वः॑। अव॑। पा॒दि॒। दि॒वः। परि॑। मा। सो॒म्यस्य॑। श॒म्ऽभुवः॑। शूने॑। भू॒म॒। कदा॑। च॒न। वि॒त्तम्। मे॒। अ॒स्य। रो॒द॒सी॒ इति॑॥3॥

 पदार्थः—(मो) निषेधे (सु) शोभने। अत्र सुषामादित्वात् षत्वम्। (देवाः) विद्वांसः (अदः) प्राप्स्यमानम् (स्वः) सुखम् (अव) विरुद्धे (पादि) प्रतिपद्यतां प्राप्यताम् (दिवः) सूर्यप्रकाशात् (परि) उपरिभावे। अत्र पञ्चम्याः परावध्यर्थे। (अष्टा॰8.3.51) इति विसर्जनीयस्य सः। (मा) निषेधे (सोम्यस्य) सोममैश्वर्यमर्हस्य (शंभुवः) सुखं भवति यस्मात्तस्य। अत्र कृतो बहुलमित्यपादाने क्विप्। (शूने) वर्धने। अत्र नपुंसके भावे क्तः। (अष्टा॰3.3.114) (भूम) भवेम (कदा) कस्मिन् काले (चन) अपि वित्तं, मे, अस्येति पूर्ववत्॥3॥

 अन्वयः—देवा युष्माभिर्दिवस्पर्य्यदः स्वः कदाचन मोऽवपादि वयं सोम्यस्य शंभुवः सुशूने विरुद्धकारिणः कदाचिन्मा भूम। अन्यत्पूर्ववत्॥3॥

 भावार्थः—मनुष्यैरस्मिन् संसारे धर्मसुखविरुद्धं कर्म नैवाचरणीयम्। पुरुषार्थेन सुखोन्नतिः सततं कार्या॥3॥ 

पदार्थः—हे (देवाः) विद्वानो! तुम लोगों से (दिवः) सूर्य के प्रकाश से (परि) ऊपर (अदः) वह प्राप्त होनेहारा (स्वः) सुख (कदा, चन) कभी (मो, अव, पादि) विरुद्ध न उत्पन्न हुआ है। हम लोग (सोम्यस्य) ऐश्वर्य के योग्य (शंभुवः) सुख जिससे हो उस व्यवहार की (सु, शूने) सुन्दर उन्नति में विरुद्ध भाव से चलनेहारे कभी (मा) (भूम) मत होवें। और अर्थ प्रथम मन्त्र के समान जानना चाहिये॥

 भावार्थः—मनुष्यों को चाहिये कि इस संसार में धर्म और सुख से विरुद्ध काम नहीं करें और पुरुषार्थ से निरन्तर सुख की उन्नति करें॥3॥

 पुनस्तैः प्रष्टृभिः समाधातृभिश्च परस्परं कथं वर्त्तित्वा विद्यावृद्धिकार्येत्युपदिश्यते॥

 फिर पूंछने और समाधान देनेवालों को परस्पर कैसे वर्त्ताव रख कर विद्या की वृद्धि करनी चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

 य॒ज्ञं पृ॑च्छाम्यव॒मं स तद्दू॒तो वि वो॑चति। क्व॑ ऋ॒तं पू॒र्व्यं ग॒तं कस्तद् बि॑भर्ति॒ नूत॑नो वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥4॥

 य॒ज्ञम्। पृ॒च्छा॒मि॒। अ॒व॒मम्। सः। तत्। दू॒तः। वि। वो॒च॒ति॒। क्व॑। ऋ॒तम्। पू॒र्व्यम्। ग॒तम्। कः। तत्। बि॒भ॒र्ति॒ नूत॑नः। वि॒त्तम्। मे॒। अ॒स्य। रो॒द॒सी॒ इति॑॥4॥

 पदार्थः—(यज्ञम्) सर्वविद्यामयम् (पृच्छामि) (अवमम्) रक्षादिसाधकमुत्तममर्वाचीनं वा (सः) भवान् (तत्) (दूतः) इतस्ततो वार्ताः पदार्थान् वा विजानन् (वि) विविच्य (वोचति) उच्याद्वदेत्। अत्र लेटि वचधातोर्व्यत्ययेनौकारादेशः। (क्व) कुत्र (ऋतम्) सत्यमुदकं वा (पूर्व्यम्) पूर्वैः कृतम् (गतम्) प्राप्तम् (कः) (तत्) (बिभर्ति) दधाति (नूतनः) नवीनः। वित्तं मे॰ इति पूर्ववत्॥4॥ अन्वयः—हे विद्वन्नहं त्वां प्रति यमवमं यज्ञं पूर्व्यमृतं क्व गतं को नूतनस्तद्बिभर्तीति पृच्छामि स दूतो भवांस्तत्सर्वं विवोचति विविच्योपदिशतु। अन्यत्पूर्ववत्॥4॥ 

भावार्थः—विद्यां चिकीर्षुभिर्ब्रह्मचारिभिर्विदुषां समीपं गत्वाऽनेकविधान् प्रश्नान् कृत्वोत्तराणि प्राप्य विद्या वर्धनीया। भो अध्यापका विद्वांसो! यूयं स्वगतमागच्छत मत्तोऽस्य संसारस्य पदार्थसमूहस्य विद्या अभिज्ञाय सर्वानन्यानेवमेवाध्याप्य सत्यमसत्यं च यथार्थतया विज्ञापयत॥4॥

 पदार्थः—हे विद्वन्! मैं आपके प्रति जिस (अवमम्) रक्षा आदि करनेवाले उत्तम वा निकृष्ट (यज्ञम्) समस्त विद्या से परिपूर्ण (पूर्व्यम्) पूर्वजों ने सिद्ध किया (ऋतम्) सत्यमार्ग वा उत्तम जल स्थान (क्व) कहाँ (गतम्) गया (कः) और कौन (नूतनः) नवीन जन (तत्) उसको (बिभर्ति) धारण करता है, इसको (पृच्छामि) पूछता हूँ (सः) सो (दूतः) इधर-उधर से बातचीत वा पदार्थों को जानते हुए आप (तत्) उस सब विषय को (वि वोचति) विवेक कर कहो। और अर्थ सब प्रथम के तुल्य जानना॥4॥

 भावार्थः—विद्या को चाहते हुए ब्रह्मचारियों को चाहिये कि विद्वानों के समीप जाकर अनेक प्रकार के प्रश्नों को करके और उनसे उत्तर पाकर विद्या को बढ़ावें और हे पढ़ानेवाले विद्वानो! तुम लोग अच्छा गमन जैसे हो वैसे आओ और हमसे इस संसार के पदार्थों की विद्या को सब प्रकार से जान, औरों को पढ़ा कर सत्य और असत्य को यथार्थभाव से समझाओ॥4॥ 

पुनरेते परस्परं कथं किं कुर्य्युरित्युपदिश्यते॥ फिर ये परस्पर कैसे क्या करें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥ 

अ॒मी ये दे॑वाः॒ स्थन॑ त्रि॒ष्वारो॑च॒ने दि॒वः। कद्व॑ ऋ॒तं कदनृ॑तं॒ क्व॑ प्र॒त्ना व॒ आहु॑तिर्वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥5॥20॥

 अ॒मी इति॑। ये। दे॒वाः॒। स्थन॑। त्रि॒षु। आ। रो॒च॒ने। दि॒वः। कत्। वः॒। ऋ॒तम्। कत्। अनृ॑तम्। क्व॑। प्रत्॒ना। वः॒। आऽहु॑तिः। वि॒त्तम्। मे॒। अ॒स्य। रो॒द॒सी॒ इति॑॥5॥

 पदार्थः—(अमी) प्रत्यक्षाऽप्रत्यक्षाः (ये) (देवाः) दिव्यगुणाः पृथिव्यादयो लोकाः (स्थन) सन्ति। अत्र तप्तनप्तनथनाश्चेति थनादेशः। (त्रिषु) नामस्थानजन्मसु (आ) समन्तात् (रोचने) प्रकाशविषये (दिवः) द्योतकस्य सूर्यमण्डलस्य (कत्) कुत्र। पृषोदरादित्वात् क्वेत्यस्य स्थाने कत्। (वः) एषां मध्ये (ऋतम्) सत्यं कारणम् (कत्) (अनृतम्) कार्यम् (क्व) (प्रत्ना) प्राचीनानि (वः) एतेषाम् (आहुतिः) होमः प्रलयः। अन्यत्पूर्ववत्॥5॥ 

अन्वयः—हे विद्वांसो! यूयं दिवो रोचने त्रिष्वमी ये देवा आस्थन वस्तेषामृतं कदनृतं कत्। वस्तेषां प्रत्ना आहुतिश्च क्व भवतीत्येषामुत्तराणि ब्रूत। अन्यत्पूर्ववत्॥5॥ 

भावार्थः—यदा सर्वेषां लोकानामाहुतिः प्रलयो जायते तदा कार्यं कारणं जीवाश्च क्व तिष्ठन्तीति प्रश्नः। एतदुत्तरं सर्वव्यापक ईश्वर आकाशे च कारणरूपेण सर्वं जगत्सुषुप्तवज्जीवाश्च वर्त्तन्त इति। एकैकस्य सूर्यस्य प्रकाशाकर्षणविषये यावन्तो यावन्तो लोका वर्त्तन्ते तावन्तस्तावन्तः सर्व ईश्वरेण रचयित्वा धृत्वा व्यवस्थाप्यन्त इति वेद्यम्॥5॥

 पदार्थः—हे विद्वानो! तुम (दिवः) प्रकाश करनेवाले सूर्य्य के (रोचने) प्रकाश में (त्रिषु) तीन अर्थात् नाम, स्थान और जन्म में (अमी) प्रकट और अप्रकट (ये) जो (देवाः) दिव्य गुणवाले पृथिवी आदि लोक (आ) अच्छी (स्थन) स्थिति करते हैं (वः) इनके बीच (ऋतम्) सत्य कारण (कत्) कहाँ और (अनृतम्) झूंठ कार्यरूप (कत्) कहाँ और (वः) उनके (प्रत्ना) पुराने पदार्थ तथा उनका (आहुतिः) होम अर्थात् विनाश (क्व) कहाँ होता है, इन सब प्रश्नों के उत्तर कहो? शेष मन्त्र का अर्थ पूर्व के तुल्य जानना चाहिये॥5॥

 भावार्थः—प्रश्न-जब सब लोकों की आहुति अर्थात् प्रलय होता है, तब कार्य्यकारण और जीव कहाँ ठहरते हैं? इसका उत्तर-सर्वव्यापी ईश्वर और आकाश में कारण रूप से सब जगत् और अच्छी गाढ़ी नींद में सोते हुए के समान जीव रहते हैं। एक-एक सूर्य्य के प्रकाश और आकर्षण के विषय में जितने-जितने लोक हैं उतने-उतने सब ईश्वर ने बनाये धारण किये तथा इनकी व्यवस्था की है, यह जानना चाहिये॥5॥

 पुनरेतैः परस्परं किं किं प्रष्टव्यं समाधातव्यं चेत्युपदिश्यते॥ फिर इनको परस्पर क्या-क्या पूछना और समाधान करना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥ कद्व॑ ऋ॒तस्य॑ धर्ण॒सि कद्वरु॑णस्य॒ चक्ष॑णम्। कद॑र्य॒म्णो म॒हस्प॒थाति॑ क्रामेम दू॒ढ्यो॑ वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥6॥ कत्। वः॒। ऋ॒तस्य॑। ध॒र्ण॒सि। कत्। वरु॑णस्य। चक्ष॑णम्। कत्। अ॒र्य॒म्णः। म॒हः। प॒था। अति॑। क्रा॒मे॒म॒। दुः॒ऽध्यः॑। वि॒त्तम्। मे॒। अ॒स्य। रो॒द॒सी॒ इति॑॥6॥

 पदार्थः—(कत्) क्व (वः) एतेषाम् (ऋतस्य) कारणस्य (धर्णसि) धर्त्ता। अत्र सुपां सुलुगिति विभक्तेर्लुक्। (कत्) (वरुणस्य) जलादिकार्यस्य (चक्षणम्) दर्शनम् (कत्) केन (अर्यम्णः) सूर्यस्य (महः) महतः (पथा) मार्गेण (अति) (क्रामेम) उल्लङ्घयेम (दूढ्यः) दुःखेन ध्यातुं योग्यो व्यवहारः (वित्तं, मे अस्य, रोदसी) इति पूर्ववत्॥6॥ अन्वयः—हे विद्वांसो! व एतेषां स्थूलानां पदार्थानामृतस्य सत्यकारणस्य धर्णसि कत् क्वास्ति वरुणस्य चक्षणं कदस्ति महोऽर्यम्णे यो दूढ्यो व्यवहारस्तं कत् केन पथाऽतिक्रामेम तस्य पारं गच्छाम तद्विद्यया परिपूर्णा भवेमेति यावत्। अन्यत् पूर्ववत्॥6॥

 भावार्थः—विद्या चिकीर्षुभिर्विदुषां सविधं प्राप्य कार्यकारणविद्यामार्गप्रश्नान् कृत्वोत्तराणि लब्ध्वा क्रियाकौशलेन कार्याणि संसाध्य दुःखं निहत्य सुखानि लब्धव्यानि॥6॥

 पदार्थः—हे विद्वानो! (वः) इन स्थूल पदार्थों के (ऋतस्य) सत्य कारण का (धर्णसि) धारण करनेवाला (कत्) कहाँ है (वरुणस्य) जल आदि कार्यरूप पदार्थों का (चक्षणम्) देखना (कत्) कहाँ है तथा (महः) महान् (अर्यम्णः) सूर्य्यलोक का जो (दूढ्यः) अति गम्भीर दुःख से ध्यान में आने योग्य व्यवहार है, उसको (कत्) किस (पथा) मार्ग से हम (अति, क्रामेम) पार हों अर्थात् उस विद्या से परिपूर्ण हों। और शेष मन्त्रार्थ प्रथम मन्त्र के तुल्य जानना चाहिये॥6॥

 भावार्थः—विद्या प्राप्ति की इच्छावाले पुरुषों को चाहिये कि विद्वानों के समीप जाकर कार्य्य और कारण के विद्यामार्ग विषयक प्रश्नों को कर उनसे उत्तर पाकर क्रियाकुशलता से कामों को सिद्ध करके दुःख का नाश कर सुख पावें॥6॥

 अथ विदुष एतेषामुत्तराण्येवं दद्युरित्युपदिश्यते॥

 अब विद्वान् जन इनके उत्तर ऐसे देवें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

 अ॒हं सो अ॑स्मि॒ यः पु॒रा सु॒ते वदा॑मि॒ कानि॑ चि॒त्। तं मा॑ व्यन्त्या॒ध्यो॒ वृको॒ न तृ॒ष्णजं॑ मृ॒गं वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥7॥

 अ॒हम्। सः। अ॒स्मि॒। यः। पु॒रा। सु॒ते। वदा॑मि। कानि॑। चि॒त्। तम्। मा॒। व्य॒न्ति॒। आ॒ऽध्यः॑। वृक॑ः। न। तृ॒ष्णऽज॑म्। मृ॒गम्। वि॒त्तम्। मे॒। अ॒स्य। रो॒द॒सी॒ इति॑॥7॥ 

पदार्थः—(अहम्) अहमीश्वरो विद्वान् वा (सः) (अस्मि) (यः) (पुरा) सृष्टेर्विद्योत्पत्तेः प्राग्वा (सुते) उत्पन्नेऽस्मिन् कार्य्ये जगति (वदामि) उपदिशामि (कानि) (चित्) अपि (तम्) (मा) माम् (व्यन्ति) कामयन्ताम्। वाच्छन्दसि सर्वे विधयो भवन्तीतीयङभावे यणादेशः लेट्प्रयोगोऽयम्। (आध्यः) समन्ताद् ध्यायन्ति चिन्तयन्ति ये ते (वृकः) स्तेनो व्याधः। वृक इति स्तेननामसु पठितम्। (निघं॰3.24) (न) इव (तृष्णजम्) तृष्णा जायते यस्मात्तम्। अत्र जन धातोर्डः। ङ्यापोः संज्ञाछन्दसोर्बहुलमिति ह्रस्वत्वम्। (मृगम्) (वित्तं मे॰) इति पूर्ववत्॥7॥

 अन्वयः—हे मनुष्या! योऽहं सृष्टिकर्ता विद्वान् वा सुतेऽस्मिञ्जगति कानिचित्पुरा वदामि सोऽहमस्मि सेवनीयः। तं माध्यो भवन्तो वृकस्तृष्णजं मृगं न व्यन्ति कामयन्तामन्यत्पूर्ववत्॥7॥

 भावार्थः—अत्र श्लेषोपमालङ्कारौ। सर्वान् मनुष्यान् प्रतीश्वर उपदिशति हे मानवा! यूयं यथा मया सृष्टिं रचयित्वा वेदद्वारा यादृशा उपदेशाः कृताः सन्ति तान् तथैव स्वीकुरुत। उपास्यं मां विहायाऽन्यं कदाचिन्नोपासीरन्। यथा कश्चिन्मृगयायां प्रवर्त्तमानश्चोरो व्याधो वा मृगं प्राप्तुं कामयते, तथैव सर्वान् दोषान् हित्वा मां कामयध्वम्। एवं विद्वांसमपि॥7॥

 पदार्थः—हे मनुष्यो! (यः) जो (अहम्) संसार का उत्पन्न करनेवाला (सुते) उत्पन्न हुए इस जगत् में (कानि) (चित्) किन्हीं व्यवहारों को (पुरा) सृष्टि के पूर्व वा विद्वान् मैं उत्पन्न हुए संसार में किन्हीं व्यवहारों को विद्या की उत्पत्ति से पहिले (वदामि) कहता हूं (सः) वह मैं सेवन करने योग्य (अस्मि) हूं (तम्) उस (मा) मुझको (आध्यः) अच्छी प्रकार चिन्तन करनेवाले आप लोग जैसे (वृकः) चोर वा व्याघ्र (तृष्णजम्) पियासे (मृगम्) हरिण को (न) वैसे (व्यन्ति) चाहो। और शेष मन्त्रार्थ प्रथम मन्त्र के तुल्य जानना चाहिये॥7॥

 भावार्थः—इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार हैं। सब मनुष्यों के प्रति ईश्वर उपदेश करता है कि हे मनुष्यो! तुम लोग जैसे मैंने सृष्टि को रच के वेद द्वारा जैसे-जैसे उपदेश किये हैं, उनको वैसे ही ग्रहण करो और उपासना करने योग्य मुझको छोड़ के अन्य किसी की उपासना कभी मत करो। जैसे कोई जीव मृग या रसिक चोर वा बधेरा हरिण को प्राप्त करना चाहता है, वैसे ही सब दोषों को निर्मूल छोड़कर मेरी चाहना करो और ऐसे विद्वान् को भी चाहो॥7॥

 अथ न्यायाधीशस्य समीपेऽर्थिप्रत्यर्थिनौ किंचित् क्लेशादिकं निवेदयेतां तयोर्यथावन्न्यायं स कुर्य्यादित्युपदिश्यते॥

 अब न्यायाधीश के समीप वाद-विवाद करनेवाले वादी-प्रतिवादी जन अपने कुछ क्लेश का निवेदन करें और वह उनका न्याय यथावत् करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

 सं मा॑ तपन्त्य॒भितः॑ स॒पत्नी॑रिव॒ पर्श॑वः। मूषो॒ न शि॒श्ना व्य॑दन्ति मा॒ध्यः॑ स्तो॒तारं॑ ते शतक्रतो वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥8॥ सम्। मा॒। त॒प॒न्ति॒। अ॒भितः॑। स॒पत्नीः॑ऽइव। पर्श॑वः। मूषः॑। न। शि॒श्ना। वि। अ॒द॒न्ति॒। मा॒। आ॒ऽध्यः॑। स्तो॒तार॑म्। ते॒। श॒त॒क्र॒तो॒ इति॑ शतऽक्रतो। वि॒त्तम्। मे॒। अ॒स्य। रो॒दसी इति॑॥8॥ 

पदार्थः—(सम्) (मा) मां प्रजास्थं वा पुरुषम् (तपन्ति) क्लेशयन्ति (अभितः) सर्वतः (सपत्नीरिव) यथाऽनेकाः पत्न्यः समानमेकपतिं दुःखयन्ति (पर्शवः) परानन्यान् शृणन्ति हिंसन्ति ते पर्शवः पार्श्वस्था मनुष्यादयः प्राणिनः। (मूषः) आखवः। अत्र जातिपक्षमाश्रित्यैकवचनम्। (न) इव (शिश्ना) अशुद्धानि सूत्राणि (वि) विविधार्थे (अदन्ति) विच्छिद्य भक्षयन्ति (मा) (आध्यः) परस्य मनसि शोकादिजनकाः (स्तोतारम्) धर्मस्य स्तावकम् (ते) तव (शतक्रतो) असंख्यातोत्तमप्रज्ञ बहूत्तमकर्मन् वा न्यायाध्यक्ष (वित्तं, मे, अस्य, रोदसी) इति पूर्ववत्॥8॥

 अत्राह निरुक्तकारः—मूषो मूषिका इत्यर्थः। मूषिकाः पुनर्मुष्णातेः। मूषोऽप्येतस्मादेव। सन्तपन्ति मामभितः सपत्न्य इवेमाः पर्शवः कूपपर्शवः। मूषिका इवास्नातानि सूत्राणि व्यदन्ति। स्वाङ्गाभिधानं वा स्यात्। शिश्नानि व्यदन्तीति वा। सन्तपन्ति माध्यः कामाः। स्तोतारं ते शतक्रतो वित्तं मे अस्य रोदसी। जानीतं मेऽस्य द्यावापृथिव्याविति। त्रितं कूपेऽवहितमेतत्सूक्तं प्रतिबभौ। तत्र ब्रह्मेतिहासमिश्रमृङ्मिश्रं गाथामिश्रं भवति। त्रितस्तीर्णतमो मेधया बभूव। अपि वा सङ्ख्यानामैवाभिप्रेतं स्यात्। एकतो द्वितस्त्रित इति त्रयो बभूवुः। (निरु॰4.5-6)॥8॥ 

अन्वयः—हे शतक्रतो न्यायाधीश! ते तव प्रजास्थं स्तोतारं मा मां ये पर्शवः सपत्नीरिवाभितः संतपन्ति य आध्यो मूषः शिश्ना व्यदन्ति न मा मामभितः संतपन्ति तानन्यायकारिणो जनांस्त्वं यथावच्छाधि। अन्यत्पूर्ववत्॥8॥ 

भावार्थः—अत्रोपमालङ्कारः। हे न्यायाध्यक्षादयो मनुष्या! यूयं यथा सपत्न्यः स्वपतिमुद्वेजयन्ति, यथा वा स्वार्थसिद्ध्यसिद्धिका मूषिकाः परद्रव्याणि विनाशयन्ति, यथा च व्यभिचारिण्यो गणिकादयः स्त्रियः सौदामन्य इव प्रकाशवत्यः कामिनः शिश्नादिरोगद्वारा धर्मार्थकाममोक्षानुष्ठानप्रतिबन्धकत्वेन तं पीडयन्ति, तथा ये दस्य्वादयो मिथ्यानिश्चयकर्मवचनादस्मान् क्लेशयन्ति तान् संदण्ड्यैतानस्मांश्च सततं पालयत, नैवं विना सततं राज्यैश्वर्ययोगोऽधिको भवितुं शक्यः॥8॥ 

पदार्थः—हे (शतक्रतो) असंख्य उत्तम विचारयुक्त वा अनेकों उत्तम-उत्तम कर्म करनेवाले न्यायाधीश! (ते) आपकी प्रजा वा सेना में रहने और (स्तोतारम्) धर्म का गानेवाला मैं हूं (मा) मुझको जो (पर्शवः) औरों को मारने और तीर के रहनेवाले मनुष्य आदि प्राणी (सपत्नीरिव) (अभितः, सम्, तपन्ति) जैसे एक पति को बहुत स्त्रियां दुःखी करती हैं, ऐसे दुःख देते हैं। जो (आध्यः) दूसरे के मन में व्यथा उत्पन्न करनेहारे (मूषः) मूषे जैसे (शिश्ना) अशुद्ध सूतों को (वि, अदन्ति) विदार-विदार अर्थात् काट-काट खाते हैं (न) वैसे (मा) मुझको संताप देते हैं, उन अन्याय करनेवाले जनों को तुम यथावत् शिक्षा करो। और शेष मन्त्रार्थ प्रथम मन्त्र के समान जानिये॥8॥ 

भावार्थः—इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे न्याय करने के अध्यक्ष आदि मनुष्यो! तुम जैसे सौतेली स्त्री अपने पति को कष्ट देती है वा जैसे अपने प्रयोजन मात्र का बनाव-बिगाड़ देखनेवाले मूषे पराये पदार्थों का अच्छी प्रकार नाश करते हैं और जैसे व्यभिचारिणी वेश्या आदि कामिनी दामिनी स्त्री दमकती हुई कामीजन के लिङ्ग आदि रोगरूपी कुकर्म्म के द्वारा उसके धर्म्म, अर्थ, काम और मोक्ष के करने की रुकावट से उस कामीजन को पीड़ा देती हैं, वैसे ही जो डाकू, चोर, चवाई, अताई, लड़ाई, भिड़ाई, करनेवाले झूठ की प्रतीति और झूठे कामों की बातों में हम लोगों को क्लेश देते हैं, उनको अच्छे प्रकार दण्ड देकर हम लोगों को तथा उनको भी निरन्तर पालो, ऐसे करने के विना राज्य का ऐश्वर्य्य नहीं बढ़ सकता॥8॥

 अथ न्यायाधीशादिभिः सह प्रजाः कथं वर्त्तेरन्नित्युपदिश्यते॥ 

अब न्यायाधीशों के साथ प्रजाजन कैसे वर्त्तें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥ 

अ॒मी ये स॒प्त र॒श्मय॒स्तत्रा॑ मे नाभि॒रात॑ता। त्रि॒तस्तद्वे॑दा॒प्त्यः स जा॑मि॒त्वाय॑ रेभति वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥9॥

 अ॒मी इति॑। ये। स॒प्त। र॒श्मयः॑। तत्र॑। मे। नाभिः॑। आऽत॑ता। त्रि॒तः। तत्। वे॒द॒। आ॒प्त्यः। सः। जा॒मि॒ऽत्वाय॑। रे॒भ॒ति॒। वि॒त्तम्। मे॒। अ॒स्य। रो॒द॒सी॒ इति॑॥9॥ 

पदार्थः—(अमी) (ये) (सप्त) सप्ततत्वाङ्गमिश्रितस्य भावाः सप्तधा (रश्मयः) (तत्र) तस्मिन्। ऋचि तुनुघेति दीर्घः। (मे) मम (नाभिः) शरीरमध्यस्था सर्वप्राणबन्धनाङ्गम् (आतता) समन्ताद्विस्तृता (त्रितः) त्रिभ्यो भूतभविष्यद्वर्त्तमानकालेभ्यः (तत्) तान् (वेद) जानाति (आप्त्यः) य आप्तेषु भवः सः (सः) (जामित्वाय) कन्यावत्पालनाय प्रजाभावाय (रेभति) अर्चति। अन्यत् पूर्ववत्॥9॥

 अन्वयः—यत्रामी ये सप्त रश्मय इव सप्तधा नीतिप्रकाशाः सन्ति, तत्र मे नाभिरातता यत्र नैरन्तर्येण स्थितिर्मम तद् य आप्त्यो विद्वान् त्रितो वेद स जामित्वाय राजभोगाय प्रजा रेभति। अन्यत्सर्वं पूर्ववत्॥9॥

 भावार्थः—यथा सूर्येण सह रश्मीनां शोभासङ्गौ स्तस्तथा राजपुरुषैः प्रजानां शोभासङ्गौ भवेताम्। यो मनुष्यः कर्मोपासनाज्ञानानि यथावत् विजानाति, सः प्रजापालने पितृवद्भूत्वा सर्वाः प्रजा रञ्जयितुं शक्नोति नेतरः॥9॥ 

पदार्थः—जहाँ (अमी) (ये) ये (सप्त) सात (रश्मयः) किरणों के समान नीतिप्रकाश हैं (तत्र) वहाँ (मे) मेरी (नाभिः) सब नसों को बांधनेवाली तोंद (आतता) फैली है, जिसमें निरन्तर मेरी स्थिति है (तत्) उसको जो (आप्त्यः) सज्जनों में उत्तम जन (त्रितः) तीनों अर्थात् भूत, भविष्यत् और वर्त्तमान काल से (वेद) जाने अर्थात् रात-दिन विचारे (सः) वह पुरुष (जामित्वाय) राज्य भोगने के लिये कन्या के तुल्य (रेभति) प्रजाजनों की रक्षा तथा प्रशंसा और चाहना करता है। और अर्थ प्रथम मन्त्रार्थ के समान जानो॥9॥ 

भावार्थः—जैसे सूर्य्य के साथ किरणों की शोभा और सङ्ग है, वैसे राजपुरुषों के साथ प्रजाजनों की शोभा और सङ्ग हो तथा जो मनुष्य कर्म, उपासना और ज्ञान को यथावत् जानता है, वह प्रजा के पालने में पितृवत् होकर समस्त प्रजाजनों का मनोरञ्जन कर सकता है, और नहीं॥9॥

 पुनरेते परस्परं कथं वर्त्तेरन्नित्युपदिश्यते॥

 फिर ये परस्पर कैसे वर्त्तें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥ 

अ॒मी ये पञ्चो॒क्षणो॒ मध्ये॑ त॒स्थुर्म॒हो दि॒वः। दे॒व॒त्रा नु प्र॒वाच्यं॑ सध्रीची॒ना नि वा॑वृतुर्वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥10॥21॥ 

अ॒मी इति॑। ये। पञ्च॑। उ॒क्षणः॑। मध्ये॑। त॒स्थुः। म॒हः। दि॒वः। दे॒व॒ऽत्रा। नु। प्र॒ऽवाच्य॑म्। स॒ध्री॒ची॒नाः। नि। व॒वृ॒तुः॒। वि॒त्तम्। मे॒। अ॒स्य। रो॒द॒सी॒ इति॑॥10॥

 पदार्थः—(अमी) प्रत्यक्षाप्रत्यक्षाः (ये) (पञ्च) यथाग्निवायुमेघविद्युत्सूर्य्यमण्डलप्रकाशास्तथा (उक्षणः) जलस्य सुखस्य वा सेक्तारो महान्तः। उक्षा इति महन्नामसु पठितम्। (निघं॰3.3) (मध्ये) (तस्थुः) तिष्ठन्ति (महः) महतः (दिवः) दिव्यगुणपदार्थयुक्तस्याकाशस्य (देवत्रा) देवेषु विद्वत्सु वर्त्तमानाः (नु) शीघ्रम् (प्रवाच्यम्) अध्यापनोपदेशार्थं विद्याऽऽज्ञापकं वचः (सध्रीचीनाः) सहवर्त्तमानाः (नि) (वावृतुः) वर्त्तन्ते। अत्र वर्त्तमाने लिट्। व्यत्ययेन परस्मैपदम्। तुजादीनां दीर्घोऽभ्यासस्येति दीर्घत्वम्। अन्यत् पूर्ववत्॥10॥

 अन्वयः—हे सभाध्यक्षादयो जना! युष्माभिर्यथाऽमी उक्षणः पञ्च महो दिवो मध्ये तस्थुर्यथा च सध्रीचीना देवत्रा निवावृतुस्तथा ये नितरां वर्त्तन्ते तान् प्रजाराजप्रसङ्गिनः प्रति विद्यान्यायप्रकाशवचो नु प्रवाच्यम्। अन्यत् पूर्ववत्॥10॥

 भावार्थः—अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा सूर्यादयो घटपटादिपदार्थेषु संभुज्य वृष्ट्यादिद्वारा महत्सुखं सम्पादयन्ति सर्वेषु पृथिव्यादिपदार्थेष्वाकर्षणादिना सहिता वर्त्तन्ते च। तथैव सभाद्यध्यक्षादयो महद्गुणविशिष्टान् मनुष्यान् सम्पाद्यैतैः सह न्यायप्रीतिभ्यां सह वर्त्तित्वा सुखिनः सततं कुर्युः॥10॥

 पदार्थः—हे सभाध्यक्ष आदि सज्जनो! तुमको जैसे (अमी) प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष (उक्षणः) जल सींचने वा सुख सींचनेहारे बड़े (पञ्च) अग्नि, पवन, बिजुली, मेघ और सूर्य्यमण्डल का प्रकाश (महः) अपार (दिवः) दिव्यगुण और पदार्थयुक्त आकाश के (मध्ये) बीच (तस्थुः) स्थिर हैं और जैसे (सध्रीचीनाः) एक साथ रहनेवाले गुण (देवत्रा) विद्वानों में (नि, वावृतुः) निरन्तर वर्त्तमान हैं, वैसे (ये) जो निरन्तर वर्त्तमान हैं, उन प्रजा तथा राजाओं के संगियों के प्रति विद्या और न्याय प्रकाश की बात (नु) शीघ्र (प्रवाच्यम्) कहनी चाहिये। और शेष मन्त्रार्थ प्रथम मन्त्र के समान जानना चाहिये॥10॥

 भावार्थः—इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य आदि घटपटादि पदार्थों में संयुक्त होकर वृष्टि आदि के द्वारा अत्यन्त सुख को उत्पन्न करते हैं और समस्त पृथिवी आदि पदार्थों में आकर्षणशक्ति से वर्त्तमान हैं वैसे ही सभाध्यक्ष आदि महात्मा जनों के गुणों वा बड़े-बड़े उत्तम गुणों से युक्त मनुष्यों को सिद्ध करके इनसे न्याय और प्रीति के साथ वर्त्तकर निरन्तर सुखी करें॥10॥ 

पुनरेतैः सह प्रजापुरुषाः कथं वर्त्तेरन्नित्युपदिश्यते॥

 फिर इन राजपुरुषों के साथ प्रजापुरुष कैसे वर्त्ताव रक्खें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

 सु॒प॒र्णा ए॒त आ॑सते॒ मध्य॑ आ॒रोध॑ने दि॒वः। ते से॑धन्ति प॒थो वृकं॒ तर॑न्तं य॒ह्वती॑र॒पो वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥11॥ 

सु॒ऽप॒र्णाः। ए॒ते। आ॒स॒ते॒। मध्ये॑। आ॒ऽरोध॑ने। दि॒वः। ते॒। से॒ध॒न्ति॒। प॒थः। वृक॑म्। तर॑न्तम्। य॒ह्वतीः॑। अ॒पः। वि॒त्तम्। मे॒। अ॒स्य। रो॒द॒सी॒ इति॑॥11॥

 पदार्थः—(सुपर्णाः) सूर्यस्य किरणाः (एते) (आसते) (मध्ये) (आरोधने) (दिवः) सूर्यप्रकाशयुक्तस्याकाशस्य (ते) (सेधन्ति) निवर्त्तयन्तु (पथः) मार्गान् (वृकम्) विद्युतम् (तरन्तम्) संप्लावकम् (यह्वतीः) यह्वान् महत इवाचरन्ती। यह्व इति महन्नामसु पठितम्। (निघं॰3.3) यह्वशब्दादाचारे क्विप्। (अपः) जलानि प्राणवती प्रजा वा। अन्यत् पूर्ववत्॥11॥ 

अन्वयः—हे प्रजास्था मनुष्या! यथैते सुपर्णा दिवो मध्य आरोधने आसते। यथा च ते तरन्तं वृकं प्रक्षिप्य यह्वतीरपः पथश्च सेधन्ति, तथैव यूयं राजकर्माणि सेवध्वम्। अन्यत्पूर्ववत्॥11॥

 भावार्थः—अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथेश्वरनियमे सूर्यकिरणादयः पदार्था यथावद्वर्त्तन्ते तथैव प्रजास्थैर्युष्माभिरपि राजनीतिनियमे च वर्त्तितव्यम्। यथैते सभाद्यध्यक्षादयो दुष्टान् मनुष्यान् निवर्त्य प्रजा रक्षन्ति तथैव युष्माभिरप्येते सदैवेर्ष्यादीन्निवर्त्य रक्ष्याः॥11॥ 

पदार्थः—हे प्रजाजनो! आप लोग जैसे (एते) ये (सुपर्णाः) सूर्य्य की किरणें (दिवः) सूर्य्य के प्रकाश से युक्त आकाश के (मध्ये) बीच (आरोधने) रुकावट में (आसते) स्थिर हैं और जैसे (ते) वे (तरन्तम्) पार कर देनेवाली (वृकम्) बिजुली को गिरा के (यह्वतीः) बड़ों के वर्त्ताव रखते हुए (अपः) जलों और (पथः) मार्गों को (सेधन्ति) सिद्ध करते हैं, वैसे ही आप लोग राज कामों को सिद्ध करो। और शेष मन्त्रार्थ प्रथम मन्त्र के तुल्य जानना चाहिये॥11॥

 भावार्थः—इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे ईश्वर के नियमों में सूर्य की किरणें आदि पदार्थ यथावत् वर्त्तमान हैं, वैसे ही तुम प्रजा-पुरुषों को भी राजनीति के नियमों में वर्त्तना चाहिये। जैसे सभाध्यक्ष आदि जन दुष्ट मनुष्यों की निवृत्ति करके प्रजाजनों की रक्षा करते हैं, वैसे तुम लोगों को भी ये ईर्ष्या, अभिमान आदि दोषों को निवृत्त करके रक्षा करने योग्य हैं॥11॥

 पुनरेतान् प्रति विद्वांसः किं किमुपदिशेयुरित्युपदिश्यते॥ 

फिर विद्वान् जन इनके प्रति क्या-क्या उपदेश करें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥ 

नव्यं॒ तदु॒क्थ्यं॑ हि॒तं देवा॑सः सुप्रवाच॒नम्। ऋ॒तम॑र्षन्ति॒ सिन्ध॑वः स॒त्यं ता॑तान॒ सूर्यो॑ वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥12॥

 नव्य॑म्। तत्। उ॒क्थ्य॑म्। हि॒तम्। देवा॑सः। सु॒ऽप्र॒वा॒च॒नम्। ऋ॒तम्। अ॒र्ष॒न्ति॒। सिन्ध॑वः। स॒त्यम्। त॒ता॒न॒। सूर्यः॑। वि॒त्तम्। मे॒। अ॒स्य। रो॒द॒सी॒ इति॑॥12॥

 पदार्थः—(नव्यम्) उत्तमेषु नवेषु नूतनेषु व्यवहारेषु भवम् (तत्) (उक्थ्यम्) उक्थेषु प्रशंसनीयेषु भवम् (हितम्) सर्वाविरुद्धम् (देवासः) विद्वांसः (सुप्रवाचनम्) सुष्ठ्वध्यापनमुपदेशनं यथा तथा (ऋतम्) वेदसृष्टिक्रमप्रत्यक्षादिप्रमाणविद्वदाचरणानुभवस्वात्मपवित्रतानामनुकूलम् (अर्षन्ति) प्रापयन्तु। लेट् प्रयोगोऽयम्। (सिन्धवः) यथा समुद्राः (सत्यम्) जलम्। सत्यमित्युदकनामसु पठितम्। (निघं॰1.12) (ततान) विस्तारयति। तुजादित्वाद्दीर्घः। (सूर्य्यः) सविता। अन्यत् पूर्ववत्॥12॥

 अन्वयः—हे देवासो! भवन्तो यथा सिन्धवः सत्यमर्षन्ति सूर्यश्च ततान तथा यद्दतं नव्यमुक्थ्यं हितं तत् सुप्रवाचनमर्षन्तु। अन्यत् पूर्ववत्॥12॥

 भावार्थः—अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा सागरेभ्यो जलमुत्थितमूर्ध्वं गत्वा सूर्यातपेन वितत्य प्रवर्ष्य च सर्वेभ्यः प्रजाजनेभ्यः सुखं प्रयच्छति तथा विद्वज्जनैर्नित्यनवीनविचारेण गूढा विद्या ज्ञात्वा प्रकाश्य सकलहितं सम्पाद्य सत्यधर्मं विस्तार्य प्रजाः सतत सुखयितव्याः॥12॥

 पदार्थः—हे (देवासः) विद्वानो! आप जैसे (सिन्धवः) समुद्र (सत्यम्) जल की (अर्षन्ति) प्राप्ति करावें और (सूर्य्यः) सूर्य्यमण्डल (ततान) उसका विस्तार कराता अर्थात् वर्षा कराता है, वैसे जो (ऋतम्) वेद, सृष्टिक्रम, प्रत्यक्षादि प्रमाण, विद्वानों के आचरण, अनुभव अर्थात् आप ही आप कोई बात मन से उत्पन्न होना और आत्मा की शुद्धता के अनुकूल (नव्यम्) उत्तम नवीन-नवीन व्यवहारों और (उक्थ्यम्) प्रशंसनीय वचनों में होनेवाला (हितम्) सबका प्रेमयुक्त पदार्थ (तत्) उसको (सुप्रवाचनम्) अच्छी प्रकार पढ़ाना, उपदेश करना जैसे बने वैसे प्राप्त कीजिये। शेष मन्त्रार्थ प्रथम मन्त्र के समान जानना चाहिये॥12॥ 

भावार्थः—इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे समुद्रों से उड़कर जल ऊपर को चढ़ा हुआ, सूर्य्य के ताप से फैल कर, बरस के, सब प्रजाजनों को सुख देता है, वैसे विद्वान् जनों को नित्य नवीन-नवीन विचार से गूढ़ विद्याओं को जान और प्रकाशित कर सबके हित का सम्पादन और सत्य धर्म्म के विचार से प्रजा को निरन्तर सुख देना चाहिये॥12॥

 पुनर्विद्वान् प्रजासु किं कुर्यादित्युपदिश्यते॥

 फिर विद्वान् प्रजाजनों में क्या करे, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

 अग्ने॒ तव॒ त्यदु॒क्थ्यं॑ दे॒वेष्व॒स्त्याप्य॑म्। स नः॑ स॒त्तो म॑नु॒ष्वदा दे॒वान् य॑क्षि वि॒दुष्ट॑रो वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥13॥ 

अग्ने॑। तव॑। त्यत्। उ॒क्थ्य॑म्। दे॒वेषु॑। अ॒स्ति॒। आप्य॑म्। सः। नः॒। स॒त्तः। म॒नु॒ष्वत्। आ। दे॒वान्। य॒क्षि॒। वि॒दुःऽत॑रः। वि॒त्तम्। मे॒। अ॒स्य। रो॒द॒सी॒ इति॑॥13॥

 पदार्थः—(अग्ने) सकलविद्याविज्ञातः (तव) (त्यत्) तत् (उक्थ्यम्) प्रकृष्टं विद्यावचः (देवेषु) विद्वत्सु (अस्ति) वर्त्तते (आप्यम्) आप्तुं योग्यम्। अत्राप्लृधातोर्बाहुलकादौणादिको यन् प्रत्ययः। (सः) (नः) अस्मान् (सत्तः) अविद्यादिदोषान् हिंसित्वा विज्ञानप्रदः। अत्र बाहुलकाद् सद्लृधातोरौणादिकः क्तः प्रत्ययः। (मनुष्वत्) मनुषु मनुष्येष्विव (आ) (देवान्) विदुषः (यक्षि) सङ्गमयेत् (विदुष्टरः) अतिशयेन विद्वान्। अन्यत् पूर्ववत्॥13॥

 अन्वयः—हे अग्ने विद्वन्! यस्य तव त्यद्यदाप्यं मनुष्वदुक्थ्यं देवेष्वस्ति स सत्तो विदुष्टरस्त्वं नोऽस्मान् देवान् सम्पादयन्नायक्षि। अन्यत् पूर्ववत्॥13॥

 भावार्थः—यः सर्वा विद्या अध्याप्य विद्वत्सम्पादने कुशलोऽस्ति तस्मात् सकलविद्याधर्मोपदेशान् सर्वे मनुष्या गृह्णीयुः, नेतरस्मात्॥13॥

 पदार्थः—हे (अग्ने) समस्त विद्याओं को जाने हुए विद्वान् जन! (तव) आपका (त्यत्) वह जो (आप्यम्) पाने योग्य (मनुष्वत्) मनुष्यों में जैसा हो वैसा (उक्थ्यम्) अति उत्तम विद्यावचन (देवेषु) विद्वानों में (अस्ति) है। (सः) वह (सत्तः) अविद्या आदि दोषों को नाश करनेवाले (विदुष्टरः) अति विद्या पढ़े हुए आप (नः) हम लोगों को (देवान्) विद्वान् करते हुए उनकी (आ यक्षि) संगति को पहुंचाइये अर्थात् विद्वानों की पदवी को पहुंचाइये। और मन्त्रार्थ प्रथम मन्त्र के समान है॥13॥

 भावार्थः—जो विद्वान् समस्त विद्या को पढ़ाकर विद्वान्पन के उत्पन्न कराने में कुशल है, उससे समस्त विद्या और धर्म के उपदेशों को सब मनुष्य ग्रहण करें, और से नहीं॥3॥

 पुनः स तत्र किं कुर्यादित्युपदिश्यते॥

 फिर वह विद्वान् वहाँ क्या करे, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥ 

स॒त्तो होता॑ मनु॒ष्वदा दे॒वाँ अच्छा॑ वि॒दुष्ट॑रः। अ॒ग्निर्ह॒व्या सु॑षूदति दे॒वो दे॒वेषु॒ मेधि॑रो वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥14॥ 

स॒त्तः। होता॑। म॒नु॒ष्वत्। आ। दे॒वान्। अच्छ॑। वि॒दुःऽत॑रः। अ॒ग्निः। ह॒व्या। सु॒सू॒द॒ति॒। दे॒वः। दे॒वेषु॑। मेधि॑रः। वि॒त्तम्। मे॒। अ॒स्य। रो॒द॒सी॒ इति॑॥14॥ 

पदार्थः—(सत्तः) विज्ञानवान् दुःखहन्ता (होता) ग्रहीता (मनुष्वत्) यथोत्तमा मनुष्या श्रेष्ठानि कर्माण्यनुष्ठाय पापानि त्यक्त्वा सुखिनो भवन्ति तथा (आ) (देवान्) विदुषो दिव्यक्रियायोगान् वा (अच्छ) सम्यग्रीत्या। अत्र निपातस्य चेति दीर्घः। (विदुष्टरः) अतिशयेन वेत्ता (अग्निः) सद्विद्याया वेत्ता विज्ञापयिता वा (हव्या) दातुं ग्रहीतुं योग्यानि (सुषूदति) ददाति (देवः) प्रशस्तो विद्वान्मनुष्यः (देवेषु) विद्वत्सु (मेधिरः) मेधावी। अत्र मेधारथाभ्यामीरन्निरचौ। (अष्टा॰वा॰5.2।109) इति वार्त्तिकेन मत्वर्थीय ईरन् प्रत्ययः। (वित्तं, मे॰) इति पूर्ववत्॥14॥ 

अन्वयः—हे मनुष्या! यः सत्तो देवान् होता विदुष्टरोऽग्निर्मेधिरो देवेषु देवो मनुष्वद्धव्याच्छ सुषूदति तस्मात् सर्वैर्विद्याशिक्षे ग्राह्ये। अन्यत्पूर्ववत्॥14॥ भावार्थः—ईदृशो भाग्यहीनः को मनुष्यः स्याद्यो विदुषां सकाशाद् विद्याशिक्षे अगृहीत्वैषां विरोधी भवेत्॥14॥ 

पदार्थः—हे मनुष्यो! जो (सत्तः) विज्ञानवान् दुःख दुःख हरनेवाला (देवान्) विद्वान् वा दिव्य-दिव्य क्रियायोगों का (होता) ग्रहण करनेवाला (विदुष्टरः) अत्यन्त ज्ञानी (अग्निः) श्रेष्ठ विद्या का जानने वा समझानेवाला (मेधिरः) बुद्धिमान् (देवेषु) विद्वानों में (देवः) प्रशंसनीय विद्वान् मनुष्य (मनुष्वत्) जैसे उत्तम मनुष्य श्रेष्ठ कर्मों का अनुष्ठान कर पापों को छोड़ सुखी होते हैं, वैसे (हव्या) देने-लेने योग्य पदार्थों को (अच्छ आ, सुषूदति) अच्छी रीति से अत्यन्त देता है, उस उत्तम विद्वान् से विद्या और शिक्षा को ग्रहण करनी चाहिये॥14॥

 भावार्थः—ऐसा भाग्यहीन कौन जन होवे जो विद्वानों के समीप से विद्या और शिक्षा न लेके और इनका विरोधी हो॥14॥

 पुनरेतं कीदृशं प्राप्नुयादित्युपदिश्यते॥

 फिर कैसे इसको पावे, यह उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥ 

ब्रह्मा॑ कृणोति॒ वरु॑णो गातु॒विदं॒ तमी॑महे। व्यू॑र्णोति हृ॒दा म॒तिं नव्यो॑ जायतामृ॒तं वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥15॥22॥

 ब्रह्म॑। कृ॒णो॒ति॒। वरु॑णः। गा॒तु॒ऽविद॑म्। तम्। ई॒म॒हे॒। वि। ऊ॒र्णो॒ति॒। हृ॒दा। म॒तिम्। नव्यः॑। जा॒य॒ता॒म्। ऋ॒तम्। वि॒त्त॒म्। मे॒। अ॒स्य। रो॒द॒सी॒ इति॑॥15॥

 पदार्थः—(ब्रह्म) परमेश्वरः। अत्रान्येषामपि दृश्यत इति दीर्घः। (कृणोति) करोति (वरुणः) सर्वोत्कृष्टः (गातुविदम्) वेदवाग्वेत्तारम् (तम्) (ईमहे) याचामहे (वि) (ऊर्णोति) निष्पादयति (हृदा) हृदयेन। अत्र पद्दन्नो॰। (अष्टा॰6.1.63) इति हृदयस्य हृदादेशः। (मतिम्) विज्ञानम् (नव्यः) नवीनो विद्वान् (जायताम्) (ऋतम्) सत्यरूपम् (वित्तं, मे, अस्य॰) इति पूर्ववत्॥15॥ 

अन्वयः—वयं यदृतं ब्रह्म वरुणो गातुविदं कृणोति तमीमहे तत्कृपया यो नव्यो विद्वान् हृदा मतिं व्यूर्णोति सोऽस्माकं मध्ये जायताम्। अन्यत् पूर्ववत्॥15॥

 भावार्थः—नहि कस्यचिन्मनुष्यस्योपरि प्राक्पुण्यसंचयविशुद्धक्रियमाणाभ्यां कर्मभ्यां विना परमेश्वरानुग्रहो जायते। नह्येतेन विना कश्चित्पूर्णां विद्यां प्राप्तुं शक्नोति तस्मात्सर्वैर्मनुष्यैरस्माकं मध्ये प्राप्तपूर्णविद्याः शुभगुणकर्मस्वभावयुक्ता मनुष्याः सदा भूयासुरिति परमात्मा प्रार्थनीयः। एवं नित्यं प्रार्थितः सन्नयं सर्वव्यापकतया तेषामात्मानं सम्प्रकाशयतीति निश्चयः॥15॥

 पदार्थः—हम लोग जो (ऋतम्) सत्यस्वरूप (ब्रह्म) परमेश्वर वा (वरुणः) सबसे उत्तम विद्वान् (गातुविदम्) वेदवाणी के जाननेवाले को (कृणोति) करता है (तम्) उसको (ईमहे) याचते अर्थात् उससे मांगते हैं कि उसकी कृपा से जो (नव्यः) नवीन विद्वान् (हृदा) हृदय से (मतिम्) विशेष ज्ञान को (व्यूर्णोति) उत्पन्न करता है अर्थात् उत्तम-उत्तम रीतियों को विचारता है, वह हम लोगों के बीच (जायताम्) उत्पन्न हो। शेष अर्थ प्रथम मन्त्र के तुल्य जानना चाहिये॥15॥

 भावार्थः—किसी मनुष्य पर पिछले पुण्य इकट्ठे होने और विशेष शुद्ध क्रियमाण कर्म करने के विना परमेश्वर की दया नहीं होती और उक्त व्यवहार के विना कोई पूरी विद्या नहीं पा सकता, इससे सब मनुष्यों को परमात्मा की ऐसी प्रार्थना करनी चाहिये कि हम लोगों में परिपूर्ण विद्यावान् अच्छे-अच्छे गुण, कर्म, स्वभावयुक्त मनुष्य सदा हों। ऐसी प्रार्थना को नित्य प्राप्त हुआ परमात्मा सर्वव्यापकता से उनके आत्मा का प्रकाश करता है, यह निश्चय है॥15॥ 

अथायं मार्गः कीदृश इत्युपदिश्यते॥ अब यह मार्ग कैसा है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

 अ॒सौ यः पन्था॑ आदि॒त्यो दि॒वि प्र॒वाच्यं॑ कृ॒तः।

 न स दे॑वा अति॒क्रमे॒ तं म॑र्तासो॒ न प॑श्यथ वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥16॥

 अ॒सौ। यः। पन्थाः॑। आ॒दि॒त्यः। दि॒वि। प्र॒ऽवाच्य॑म्। कृ॒तः। न। सः। दे॒वाः। अ॒ति॒ऽक्रमे॑। तम्। म॒र्ता॒सः॒। न। प॒श्य॒थ॒। वि॒त्त॒म्। मे॒। अ॒स्य। रो॒द॒सी॒ इति॑॥16॥

 पदार्थः—(असौ) (यः) (पन्थाः) वेदप्रतिपादितो मार्गः (आदित्यः) विनाशरहितः सूर्य्यवत्प्रकाशकः (दिवि) सर्वविद्याप्रकाशे (प्रवाच्यम्) प्रकृष्टतया वक्तुं योग्यं यथास्यात्तथा (कृतः) नितरां स्थापितः (न) निषेधे (सः) (देवाः) विद्वांसः (अतिक्रमे) अतिक्रमितुमुल्लङ्घितुम् (तम्) मार्गम् (मर्त्तासः) मरणधर्माणः (न) निषेधे (पश्यथ) (वित्तं, मे, अस्य) इति पूर्ववत्॥16॥ 

अन्वयः—हे देवा! असावादित्यो यः पन्था दिवि प्रवाच्यं कृतः स युष्माभिर्नातिक्रमेऽतिक्रमितुं न उल्लङ्घितुं न योग्यः। हे मर्त्तासस्तं पूर्वोक्तं यूयं न पश्यथ। अन्यत् पूर्ववत्॥16॥

 भावार्थः—मनुष्यैर्यो वेदोक्तो मार्गः स एव सत्य इति विज्ञाय सर्वाः सत्यविद्याः प्राप्य सदानन्दितव्यम्। सोऽयं विद्वद्भिर्नैव कदाचित् खण्डनीयो विद्यया विनाऽयं विज्ञातोऽपि न भवति॥16॥ 

पदार्थः—हे (देवाः) विद्वान् लोगो! (असौ) यह (आदित्यः) अविनाशी सूर्य्य के तुल्य प्रकाश करनेवाला (यः) जो (पन्थाः)वेद से प्रतिपादित मार्ग (दिवि) समस्त विद्या के प्रकाश में (प्रवाच्यम्) अच्छे प्रकार से कहने योग्य जैसे हो वैसे (कृतः) ईश्वर ने स्थापित किया (सः) वह तुम लोगों को (अतिक्रमे) उल्लङ्घन करने योग्य (न) नहीं है। हे (मर्त्तासः) केवल मरने-जीने वाले विचाररहित मनुष्यो! (तम्) उस पूर्वोक्त मार्ग को तुम (न) नहीं (पश्यथ) देखते हो। शेष मन्त्रार्थ पूर्व के तुल्य जानना चाहिये॥16॥

 भावार्थः—मनुष्यों को चाहिये कि जो वेदोक्त मार्ग है वही सत्य है, ऐसा जान और समस्त सत्यविद्याओं को प्राप्त होकर सदा आनन्दित हों, सो यह वेदोक्त मार्ग विद्वानों को कभी खण्डन करने योग्य नहीं और यह मार्ग विद्या के विना विशेष जाना भी नहीं जाता॥16॥

 पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते॥ 

फिर वह कैसा है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥ 

त्रि॒तःकूपेऽव॑हितो दे॒वान् ह॑वत ऊ॒तये॑। तच्छु॑श्राव॒ बृह॒स्पतिः॑ कृ॒ण्वन्नं॑हूर॒णादु॒रु वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥17॥ 

त्रि॒तः। कूपे॑। अव॑ऽहितः। दे॒वान्। ह॒व॒ते॒। ऊ॒तये॑। तत्। शु॒श्रा॒व॒। बृह॒स्पतिः॑। कृ॒ण्वन्। अं॒हू॒र॒णात्। उ॒रु। वि॒त्तम्। मे॒। अ॒स्य। रो॒द॒सी॒ इति॑॥17॥

 पदार्थः—(त्रितः) यस्त्रीन् विषयान् विद्याशिक्षाब्रह्मचर्याणि तनोति सः। अत्र त्र्युपपदात्तनोतेरौणादिको डः प्रत्ययः। (कूपे) कूपाकारे हृदये (अवहितः) अवस्थितः (देवान्) दिव्यगुणान्वितान् विदुषो दिव्यान् गुणान् वा (हवते) गृह्णाति। अत्र बहुलं छन्दसीति शपः स्थाने श्लोरभावः। (ऊतये) रक्षणाद्याय (तत्) विद्याध्यापनम् (शुश्राव) श्रुतवान् (बृहस्पतिः) बृहत्या वाचः पालकः (कृण्वन्) कुर्वन् (अंहूरणात्) अंहूरं पापं विद्यतेऽस्मिन् व्यवहारे ततः (उरु) बहु (वित्तं, मे, अस्य॰) इति पूर्ववत्॥17॥ 

अन्वयः—य उरु तच्छ्रवणं शुश्राव स विज्ञानं कृण्वन् त्रितः कूपेऽवहितो बृहस्पतिरंहूरणात् पृथग्भूत्वोतये देवान् हवते। अन्यत् पूर्ववत्॥17॥

 भावार्थः—यो मनुष्यो देहधारी जीवास्स्वबुद्ध्या प्रयत्नेन विदुषां सकाशात् सर्वा विद्याः श्रुत्वा मत्वा निदिध्यास्य साक्षात्कृत्वा दुष्टगुणस्वभावपापानि त्यक्त्वा विद्वान् जायते, स आत्मशरीररक्षणादिकं प्राप्य बहुसुखं प्राप्नोति॥17॥

 पदार्थः—जो (उरु) बहुत (तत्) उस विद्या के पाठ को (शुश्राव) सुनता है, वह विज्ञान को (कृण्वन्) प्रकट करता हुआ (त्रितः) विद्या, शिक्षा और ब्रह्मचर्य्य इन तीन विषयों का विस्तार करने अर्थात् इनको बढ़ाने (कूपे) कूआ के आकार वाले अपने हृदय में (अविहतः) स्थिरता रखने और (बृहस्पतिः) बड़ी वेदवाणी का पालनेहारा (अंहूरणान्) जिस व्यवहार में अधर्म है, उससे अलग होकर (ऊतये) रक्षा, आनन्द, कान्ति, प्रेम, तृप्ति आदि अनेकों सुखों के लिये (देवान्) दिव्य गुणयुक्त विद्वानों वा दिव्य गुणों को (हवते) ग्रहण करता है। और शेष मन्त्रार्थ प्रथम के तुल्य जानना चाहिये॥17॥

 भावार्थः—जो मनुष्य वा देहधारी जीव अर्थात् स्त्री आदि भी अपनी बुद्धि से प्रयत्न के साथ पण्डितों की उत्तेजना से समस्त विद्याओं को सुन, मान, विचार और प्रकट कर खोटे गुण, स्वभाव वा खोटे कामों को छोड़ कर विद्वान् होता है, वह आत्मा और शरीर की रक्षा आदि को पाकर बहुत सुख पाता है॥17॥

 पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते॥

 फिर वह कैसा है, यह अगले मन्त्र में उपदेश किया है॥ 

अ॒रु॒णो मा॑ स॒कृद् वृक॑: प॒था यन्तं॑ द॒दर्श॒ हि। उज्जि॑हीते नि॒चाय्या॒ तष्टे॑व पृष्ट्याम॒यी वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥18॥ 

अ॒रु॒णः। मा॒। स॒कृत्। वृक॑ः। प॒था। यन्त॑म्। द॒दर्श॑। हि। उत्। जि॒ही॒ते॒। नि॒ऽचाय्य॑। तष्टा॑ऽइव। पृ॒ष्टि॒ऽआ॒म॒यी। वि॒त्तम्। मे॒। अ॒स्य। रो॒द॒सी॒ इति॑॥18॥ 

पदार्थः—(अरुणः) य ऋच्छति सर्वा विद्या स आरोचको वा। अत्र ऋधातोरौणादिक उनच् प्रत्ययः। (मा, सकृत्) मामेकवारम्। अथवैकपद्यम्, मासानां चार्द्धमासादीनां च कर्त्ता। अत्र मासकृदित्येकं पदं निरुक्तकारप्रामाण्यादनुमीयते। अथ शाकल्यस्तु (मा, सकृत्) इति पदद्वयमभिजानीते। (वृकः) यथा चन्द्रमाः शान्तगुणस्तथा (पथा) उत्तममार्गेण (यन्तम्) गच्छन्तं प्राप्नुवन्तं वा। इण् धातोः शतृ प्रत्ययः। (ददर्श) पश्यति (हि) खलु (उत्) उत्कृष्टे (जिहीते) विज्ञापयति (निचाय्य) समाधाय। अत्र निशामनार्थस्य चायृ धातोः प्रयोगः। अन्येषामपीति दीर्घश्च। (तष्टेव) यथा तक्षकः शिल्पी शिल्पविद्याव्यवहारान् विज्ञापयति तथा (पृष्ट्यामयी) पृष्टौ पृष्ठ आमयः क्लेशरूपो रोगो विद्यते यस्य सः। अन्यत्पूर्ववत्॥18॥ 

अत्र निरुक्तम्। वृकश्चन्द्रमा भवति। विवृतज्योतिष्को वा। विकृतज्योतिष्को वा। विक्रान्तज्योतिष्को वा। अरुण आरोचनः। मासकृन्मासानां चार्धमासानां च कर्ता भवति। चन्द्रमा वृकः। पथा यन्तं ददर्श नक्षत्रगणम्। अभिजिहीते निचाय्य येन येन योक्ष्यमाणो भवति चन्द्रमाः। तक्ष्णुवन्निव पृष्ठरोगी। जानीतं मेऽस्य द्यावापृथिव्याविति। (निरु॰5.20-21)॥18॥

 अन्वयः—योऽरुणो वृको मासकृत् पथा यन्तं ददर्श स निचाय्य पृष्ट्यामयी तष्टे वोज्जिहीते हि। अन्यत्पूर्ववत्॥18॥

 भावार्थः—अत्रोपमावाचकलुप्तोपमालङ्कारौ। यो विद्वान् चन्द्रवच्छान्तस्वभावं सूर्य्यवत् विद्याप्रकाशकरणं स्वीकृत्य विश्वस्मिन् सर्वा विद्याः प्रसारयति स एवाप्तोऽस्ति॥18॥

 पदार्थः—जो (अरुणः) समस्त विद्याओं को प्राप्त होता वा प्रकाशित करता (वृकः) शान्ति आदि गुणयुक्त चन्द्रमा के समान विद्वान् (मा, सकृत्) मुझको एक बार (पथा, यन्तम्) अच्छे मार्ग में चलते हुए को (ददर्श) देखता वा उक्त गुणयुक्त महीना आदि काल विभागों को करनेवाले चन्द्रमा के तुल्य विद्वान् अच्छे मार्ग से चलते हुए को देखता है, वह (निचाय्य) यथायोग्य समाधान देकर (पृष्ट्यामयी) पीठ में क्लेशरूप रोगवान् (तष्टेव) शिल्पी विद्वान् जैसे शिल्प व्यवहारों को समझाता वैसे (उज्जिहीते) उत्तमता से समझाता (हि) ही है। शेष मन्त्रार्थ प्रथम मन्त्र के तुल्य जानना चाहिये॥18॥ 

भावार्थः—इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो विद्वान् चन्द्रमा के तुल्य शान्तस्वभाव और सूर्य्य के तुल्य विद्या के प्रकाश करने को स्वीकार करके संसार में समस्त विद्याओं को फैलाता है, वही आप्त अर्थात् अति उत्तम विद्वान् है॥18॥ 

पुनस्तेन युक्ता वयं कीदृशा भवेमेत्युपदिश्यते॥

 फिर उससे युक्त हम लोग कैसे होवें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥ 

ए॒नाङ्गू॒षेण॑ व॒यमिन्द्र॑वन्तो॒ऽभि ष्या॑म वृ॒जने॒ सर्व॑वीराः। तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑तिः॒ सिन्धुः॑ पृथि॒वी उ॒त द्यौः॥19॥23॥15॥

 ए॒ना। आ॒ङ्गू॒षेण॑। व॒यम्। इन्द्र॑ऽवन्तः। अ॒भि। स्या॒म॒। वृ॒जने॑। सर्व॑ऽवीराः। तत्। नः॒। मि॒त्रः। वरु॑णः। म॒म॒ह॒न्ता॒म्। अदि॑तिः। सिन्धुः॑। पृ॒थि॒वी। उ॒त। द्यौः॥19॥

 पदार्थः—(एना) एनेन (आङ्गूषेण) परमविदुषा (वयम्) (इन्द्रवन्तः) परमैश्वर्य्ययुक्त इन्द्रस्तद्वन्तः (अभि) आभिमुख्ये (स्याम) भवेम (वृजने) विद्याधर्मयुक्ते बले। वृजनमिति बलनामसु पठितम्। (निघं॰2.9) (सर्ववीराः) सर्वे च ते वीराश्च। अन्यत् पूर्ववत्॥19॥

 अन्वयः—येनैनाङ्गूषेण विदुषा सर्ववीरा इन्द्रवन्तो वयं वृजनेऽभिष्याम नस्तन्मित्रो वरुणोऽदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौर्मामहन्ताम्॥19॥

 भावार्थः—मनुष्यैर्यस्याध्यापनेन विद्यासुशिक्षे वर्धेतां तस्य सङ्गेन सर्वा विद्याः सर्वथा निश्चेतव्याः॥19॥

 अत्र विश्वेषां देवानां गुणकृत्यवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिरस्तीति वेदितव्यम्॥ इति पञ्चोत्तरशततमं 105 सूक्तं पञ्चदशोऽनुवाकस्त्रयोविंशो 23 वर्गश्च समाप्तः॥

 पदार्थः—जिस (एना) इस (आङ्गूषेण) परम विद्वान् से (सर्ववीराः) समस्त वीरजन (इन्द्रवन्तः) जिनका परमैश्वर्य्ययुक्त सभापति है व (वयम्) हम लोग (वृजने) विद्याधर्मयुक्त बल में (अभि, स्याम) अभिमुख हों, अर्थात् सब प्रकार से उसमें प्रवृत्त हों (नः) हम लोगों के (तत्) उस विज्ञान को (मित्रः) प्राण (वरुणः) उदान (अदितिः) अन्तरिक्ष (सिन्धुः) समुद्र (पृथिवी) पृथिवी (उत) और (द्यौः) सूर्य्य प्रकाश वा विद्या का प्रकाश ये सब (मामहन्ताम्) बढ़ावें॥19॥

 भावार्थः—मनुष्यों को चाहिये कि जिसके पढ़ाने से विद्या और अच्छी शिक्षा बढ़े, उसके सङ्ग से समस्त विद्याओं का सर्वथा निश्चय करें॥19॥ 

इस सूक्त में समस्त विद्वानों के गुण और काम के वर्णन से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥ यह एकसौ पांचवाँ 105 सूक्त पन्द्रहवां 15 अनुवाक और तेईसवाँ 23 वर्ग पूरा हुआ॥



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