🚩‼️ओ३म्‼️🚩
🔥भारतीय परंपरा के अनुरूप मानव जीवन चार भागों मे विभक्त है। इसी को आश्रम व्यवस्था कहते हैं। परमात्मा ने मनुष्य को सौ वर्ष की आयु प्रदान की है और २५ -२५ वर्ष के चार खंड करके इसे हमारे ऋषियों ने ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम में विभाजित कर दिया है। २५ वर्ष ब्रह्मचर्य, विद्याध्ययन और शरीर पुष्टि के लिए। अगले २५ वर्ष पारिवारिक उत्तरदायित्वों को निभाने के लिए, अगले २५ वर्ष परिवार को स्वावलंबी व सुसंस्कृत बनाते हुए आत्मविकास और लोकमंगल की संयुक्त साधना के लिए। अंतिम २५ वर्ष घर परिवार की मोह ममता से छुटकारा पाकर परिभ्रमण करते हुए राष्टृ के लिए, परमात्मा के लिए अपना पूर्णतया समर्पण करने हेतु। जीवनकाल का ऐसा वैज्ञानिक और व्यवहारिक विभाजन क्रम प्राचीनकाल की तरह आज भी प्रासंगिक और उपयोगी है।
परमात्मा की कृपा से हमें सौ वर्ष की पूर्ण आयु प्राप्त हो जाए तो क्या इतना भर ही पर्याप्त होगा? इस दीर्घ आयु का सुख भोग करने के लिए शरीर के अंग-प्रत्यंग में परिपूर्ण पुष्टता एवं निरोगता आवश्यक है तभी तो जीवन का सुख है। अन्यथा रोगी शरीर को जिंदा लाश की तरह सौ वर्ष तक ढोना अपने आप में कठोर दंड के समान ही होगा। इसी से मनुष्य का यह दायित्व है कि वह अपना खान-पान, आचरण, व्यवहार आदि इस प्रकार का रखे कि दीर्घ जीवी होने के साथ शारीरिक रूप से भी पूर्ण स्वस्थ रहे। आंख, कान, नाक, दांत, बाल आदि सभी सौ वर्ष तक पूरी क्षमता से कार्यरत रहें और जीवन शक्ति में किसी भी प्रकार की कमी न आने पावे।
चलो ठीक है, भगवान की कृपा से सौ वर्ष की आयु के साथ शारीरिक स्वास्थ्य भी परिपूर्ण हो गया। क्या इतने से बात बन जाएगी और जीवन लक्ष्य प्राप्त हो जाएगा? नहीं अकेले शारीरिक स्वास्थ्य से क्या होगा। इससे भी अधिक महत्व तो मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य का है। इनके अभाव में शारीरिक शक्ति का उसी तरह दुरूपयोग होता रहेगा जैसे रावण, दुर्योधन आदि ने किया। स्वार्थ, मोह, लोभ के आगे संसार में कुछ दिखाई ही न देगा। सारी शक्ति इसी में लगेगी कि संसार में जो कुछ भी है वह सारी संपत्ति हमें मिल जाए। सारी सुख सुविधाएं हमारे ही अधीन हो जाए। पुत्रैषणा, वित्तैषणा, लोकैषणा के वशीभूत होकर संसार में दूसरों का शोषण करने की प्रवृत्ति बढेगी। सर्वत्र लूट-खसोट, मार-पीट का वातावरण बनेगा। शारीरिक शक्ति का प्रयोग इसी रूप में होगा कि जिसकी लाठी उसी की भैंस। तृष्णा में फंसा हुआ व्यक्ति न तो स्वयं सुखी रह सकेगा और न दूसरों को सुख से जीने देगा।
व्यक्तिगत, पारिवारिक और समाजिक जीवन में सुख, शांति, समृद्धि व संतोष प्राप्त करने के लिए शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक, आत्मिक व आध्यात्मिक स्तर भी उत्कृष्ट होना चाहिए। इन्ही सत्प्रयासों के आधार पर हम जीवन लक्ष्य को पा सकते है।
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🕉️🚩 आज का वेद मंत्र 🚩🕉️
🌷ओ३म् सोमानँ स्वरणं कृणुहि ब्रह्मणस्पते । कक्षीवन्तं य औशिजः ।। ( यजुर्वेद ३|२८ )
💐 अर्थ :- पुत्र दो प्रकार के होते हैं, एक तो औरस जो अपने वीर्य से उत्पन्न होता है और दूसरा जो विद्या पढ़ाने के लिए विद्वान किया जाता है । हम सब मनुष्यों को इसलिए ईश्वर की प्रार्थना करनी चाहिए कि जिससे हम लोग विद्या से प्रकाशित सब क्रियाओं में कुशल और प्रीति से विद्या के पढ़ानेवाले पुत्रों से युक्त हों ।
🌺 ज्ञान, मधुर वाणी और श्रेष्ठ बुद्धि की प्रार्थना
यजुर्वेद ३.२८ का वैदिक संदेश
मन्त्र
ॐ सोमानँ स्वरणं कृणुहि ब्रह्मणस्पते।
कक्षीवन्तं य औशिजः॥
(यजुर्वेद ३.२८)
भावार्थ
हे ब्रह्मणस्पते (वेदज्ञान के अधिष्ठाता परमेश्वर)! हमें ऐसा सोम अर्थात् आनन्द, शान्ति, उत्साह और प्रेरणा प्रदान करें, जिससे हमारी वाणी मधुर, प्रभावशाली और ज्ञानयुक्त बने। जैसे आपने विद्वान ऋषि कक्षीवान् औशिज को ज्ञान, वाणी और यश प्रदान किया, वैसे ही हमें भी विद्या, विवेक और सत्य का प्रकाश प्रदान करें।
मन्त्र का गूढ़ संदेश
इस मन्त्र में मनुष्य केवल धन या भौतिक सुख की प्रार्थना नहीं करता, बल्कि वह ज्ञान, उत्तम वाणी और विवेक की याचना करता है।
१. "ब्रह्मणस्पते"
ब्रह्मणस्पति का अर्थ है—वेदज्ञान के स्वामी, समस्त ज्ञान के अधिष्ठाता परमेश्वर।
वेद बार-बार बताते हैं कि सच्चा ज्ञान ईश्वर-प्रदत्त है और उसका उपयोग मानवता के कल्याण के लिए होना चाहिए।
२. "सोम" का वास्तविक अर्थ
वेदों में "सोम" का अर्थ केवल किसी पेय से नहीं है। अनेक स्थानों पर इसका अर्थ—
- आनन्द,
- उत्साह,
- मानसिक प्रसन्नता,
- प्रेरणा,
- और जीवन को ऊर्जावान बनाने वाली दिव्य चेतना
भी किया गया है।
जब मन ज्ञान और सत्य से भर जाता है, तब वही वास्तविक सोम है।
३. कक्षीवान् ऋषि से प्रेरणा
मन्त्र में ऋषि कक्षीवान् औशिज का उल्लेख आदर्श विद्वान के रूप में है। वे अपनी विद्वत्ता, सत्यनिष्ठा और प्रभावशाली वाणी के लिए प्रसिद्ध माने जाते हैं।
संदेश यह है कि मनुष्य को ऐसे विद्वानों के गुण अपनाने चाहिए—
- सत्य बोलना,
- ज्ञान अर्जित करना,
- और अपने ज्ञान का उपयोग लोककल्याण के लिए करना।
आज के समाज के लिए शिक्षा
आज सूचना (Information) बहुत है, परन्तु विवेक (Wisdom) की आवश्यकता पहले से अधिक है।
- ज्ञान हो, पर अहंकार न हो।
- वाणी प्रभावशाली हो, पर कटु न हो।
- बुद्धि तेज हो, पर उसका उपयोग लोकमंगल के लिए हो।
यही इस वैदिक मन्त्र का संदेश है।
जीवन के लिए प्रेरणा
✅ प्रतिदिन स्वाध्याय करें।
✅ मधुर और सत्य वाणी बोलें।
✅ ज्ञान का उपयोग समाज की भलाई में करें।
✅ विद्वानों का सम्मान करें।
✅ ईश्वर से सद्बुद्धि और विवेक की प्रार्थना करें।
निष्कर्ष
यजुर्वेद का यह मन्त्र हमें सिखाता है कि मनुष्य का सबसे बड़ा धन ज्ञान, विवेक और मधुर वाणी है। जिस व्यक्ति की बुद्धि सत्य से प्रकाशित होती है और जिसकी वाणी लोकमंगल का साधन बनती है, वही वास्तव में सफल और सम्मानित जीवन जीता है।
"विद्या से विवेक, विवेक से सदाचार और सदाचार से ही समाज का कल्याण होता है।"
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
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