*🚩‼️ओ३म्‼️🚩*
*🔥शुभ या अशुभ मुहूर्त *
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मुहूर्त अर्थात् कोई संस्कार कराने के लिए समय एवं तिथि आदि का निर्धारण करना। लेकिन एक ही दिन में एक ही समय पर पंडितों द्वारा शुभ मुहूर्त बताकर हजारों शादियां या संस्कार करा दिये जाते है। दरअसल विवाह संस्कार एक मैरिज इंडस्ट्रीज बन कर रह गया है जिसके कारण महंगे वैकट हाल, फार्म हाउस, हलवाई से लेकर बैड़ -बाजा और गाडियाँ बेहद महंगी हो जाती है। असल में समय,दिन और कैलेण्डर की कोई भी तारीख़ शुभ-अशुभ नहीं होती। कैई बार तो ऐसा भी देखा गया है कि पंडित द्वारा कोई अशुभ समय बताया गया हो प्रन्तु उस समय इसी कोई दुर्घटना नही होती। एक किस्म से यह भी भय का ही व्यापार है।
आखिर इस निश्चित शुभ-अशुभ समय का निर्धारण कौन करेगा, ईश्वर या ज्योतिष-पंडित? जबकि मुहूर्त का सीधा अर्थ होता है किसी कार्य को करने के लिए जब मौसम अनुकूल हो, हमारे और रिश्तेदारों के पास पर्याप्त समय हो, सब परिवारजन साथ हो; बस यही सबसे अच्छा शुभ मुहूर्त होता है।
सोचिये ! हजारों रुपये देकर विवाह का शुभ मुहूर्त निकलवाया जाता है। शादी के लिए पंडित द्वारा बताये गये शुभ मुहूर्त के बाद भी अगर शादी में आँधी, बरसात, या तलाक़ की नौबत आती है तो पंडित पर ४२० का केस दर्ज करवायें। जिससे कि शुभ-अशुभ के अंधविश्वास फैलाने के लिए पंडित को कठोर सज़ा मिलनी चाहिए।
🚩‼️आज का वेद मंत्र ‼️🚩
🌷 ओ३म् शं नो अग्निर्ज्योतिरनीको अस्तु शं नो मित्रावरूणावश्विना शम्।शं न: सुकृतां सुकृतानि सन्तु शं न इषिरो अभि वातु वात: ।( ऋग्वेद ७|३५|१४ )
💐 अर्थ:- ज्योतियों की ज्योति ज्ञानस्वरूप परमेश्वर हमारे लिए शान्ति दायक हो, दिन और रात हमें शान्ति कारक हो, सूर्य और चन्द्रमा हमें शान्ति देने वाले हो, धर्मात्माओं के सुकर्म हमें शान्ति कारक हो, गतिशील पवन हमारे लिए सब ओर से शान्ति देने वाली हो।
ओ३म् शं नो अग्निर्ज्योतिरनीको अस्तु...
मंत्र
ओ३म् शं नो अग्निर्ज्योतिरनीको अस्तु शं नो मित्रावरूणावश्विना शम्।
शं नः सुकृतां सुकृतानि सन्तु शं न इषिरो अभि वातु वातः॥
(ऋग्वेद 7.35.14)
भावार्थ
हे परमात्मन्! अग्नि अपने प्रकाशमय स्वरूप से हमारे लिए कल्याणकारी हो। मित्र और वरुण तथा अश्विनीकुमार हमारे लिए मंगलदायक हों। श्रेष्ठ पुरुषों के श्रेष्ठ कर्म हमें प्रेरणा दें तथा जीवनदायी वायु हमारे लिए सुख, स्वास्थ्य और शांति प्रदान करे।
वैदिक दृष्टि से सुख और कल्याण का सूत्र
यह मंत्र मनुष्य के सर्वांगीण कल्याण की प्रार्थना है। ऋषि केवल अपने लिए नहीं, बल्कि सम्पूर्ण समाज, प्रकृति और मानवता के मंगल की कामना करता है। यहाँ जीवन के चार प्रमुख आधार बताए गए हैं—
1. अग्नि – ज्ञान और प्रकाश का प्रतीक
अग्नि केवल भौतिक अग्नि नहीं है, बल्कि ज्ञान, ऊर्जा और प्रेरणा का प्रतीक है। जिस प्रकार अग्नि अंधकार को दूर करती है, उसी प्रकार ज्ञान अज्ञान का नाश करता है।
"तमसो मा ज्योतिर्गमय"
— हमें अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले चल।
जब व्यक्ति के जीवन में ज्ञान का प्रकाश होता है, तब उसके निर्णय, कर्म और लक्ष्य सब कल्याणकारी बन जाते हैं।
2. मित्र-वरुण – सामाजिक और नैतिक व्यवस्था
वैदिक साहित्य में मित्र प्रेम, सहयोग और मैत्री के प्रतीक हैं, जबकि वरुण सत्य, न्याय और अनुशासन के।
एक आदर्श समाज तभी बनता है जब उसमें प्रेम भी हो और नियम भी। केवल शक्ति से समाज नहीं चलता, और केवल भावनाओं से व्यवस्था नहीं बनती। मित्र और वरुण का संतुलन ही सभ्यता की नींव है।
3. सुकृत – श्रेष्ठ कर्मों की प्रेरणा
मंत्र कहता है—
"शं नः सुकृतां सुकृतानि सन्तु"
अर्थात् श्रेष्ठ व्यक्तियों के श्रेष्ठ कर्म हमारे लिए प्रेरणास्रोत बनें।
मनुष्य जैसा संग करता है, वैसा ही बनता है। यदि हम महापुरुषों के आदर्शों को अपनाएँ, तो हमारा जीवन भी उत्कृष्ट बन सकता है।
यजुर्वेद कहता है—
"कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः"
अर्थात् श्रेष्ठ कर्म करते हुए ही मनुष्य को जीवन व्यतीत करना चाहिए।
4. वायु – स्वास्थ्य और जीवन शक्ति
वायु जीवन का आधार है। बिना भोजन के मनुष्य कई दिन जीवित रह सकता है, परंतु बिना श्वास के कुछ ही मिनट।
आज आधुनिक विज्ञान भी स्वीकार करता है कि शुद्ध वायु स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन और दीर्घायु का मूल आधार है। ऋषि प्रार्थना करता है कि जीवनदायी वायु हमें निरंतर शक्ति, उत्साह और स्वास्थ्य प्रदान करे।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण
यह मंत्र पर्यावरणीय संतुलन और मानव कल्याण का अद्भुत संदेश देता है—
- अग्नि = ऊर्जा और प्रकाश
- मित्र-वरुण = सामाजिक व्यवस्था और नैतिक नियम
- सुकृत = सकारात्मक कर्म और चरित्र निर्माण
- वायु = स्वास्थ्य और पर्यावरण
यदि ये चारों तत्व संतुलित रहें, तो व्यक्ति, समाज और राष्ट्र सभी उन्नति करते हैं।
संदेश
ऋग्वेद का यह मंत्र हमें सिखाता है कि सच्चा सुख केवल भौतिक साधनों से नहीं मिलता। ज्ञान का प्रकाश, सत्य और मैत्री का आचरण, श्रेष्ठ कर्मों की प्रेरणा तथा शुद्ध वातावरण—ये सभी मिलकर जीवन को मंगलमय बनाते हैं।
आइए हम ज्ञानरूपी अग्नि को प्रज्वलित करें, मित्रता और सत्य का पालन करें, श्रेष्ठ कर्मों को अपनाएँ और प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करें। यही वैदिक जीवन का कल्याणकारी मार्ग है।
॥ ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

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