परमात्मा की समीपता से ही श्रेष्ठता उपजती है

 *🚩‼️ओ३म्‼️🚩*


 🔥परमात्मा की समीपता से ही श्रेष्ठता उपजती है
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   परमात्मा के जितने ही समीप हम पहुँचते हैं उतनी ही श्रेष्ठताएँ हमारे अन्तःकरण में उपजती तथा बढ़ती हैं। उसी अनुपात से आन्तरिक शान्ति की भी उपलब्धि होती चलती है।

  हिमालय की ठण्डी हवाएँ उन लोगों को अधिक शीतलता प्रदान करती हैं जो उस क्षेत्र में रहते हैं। इसी प्रकार आग की भट्टियों के समीप काम करने वालों को गर्मी अधिक अनुभव होती है। जीव ज्यों-ज्यों परमात्मा के निकट पहुँचता जाता है, त्यों-त्यों उसे उन विभूतियों का अपने में अनुभव होने लगता है जो उस परम प्रभु में ओत प्रोत हैं।

    उपासना का अर्थ है—पास बैठना। परमात्मा के पास बैठने से ही ईश्वर उपासना हो सकती है। साधारण वस्तुएँ तथा प्राणी अपनी विशेषताओं की छाप दूसरों पर छोड़ते हैं तो परमात्मा के समीप बैठने वालों पर उन दैवी विशेषताओं का प्रभाव क्यों न पड़ेगा?

   पुष्प वाटिका में जाते ही फूलों की सुगन्ध से चित्त प्रसन्न होता है। चन्दन के वृक्ष अपने समीपवर्ती वृक्षों को सुगन्धित बनाते हैं। सज्जनों के सत्संग से साधारण व्यक्तियों की मनोभावनाएँ सुधरती हैं, फिर परमात्मा अपनी महत्ता की छाप उन लोगों पर क्यों न छोड़ेगा जो उसकी समीपता के लिए प्रयत्नशील रहते है ।

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🔥 अज्ञो भवति वै बाल: पिता भवति मनत्रद:। अज्ञं हि बालमित्याहु: पितेत्येव तु मन्त्रदम्।। ( महर्षि मनु )

🌷 क्योंकि चाहे सौ वर्ष का भी हो प्रन्तु जो विधा विज्ञान रहित है वह बालक और जो विधा विज्ञान का दाता है उस बालक को भी वृद्ध मानना चाहिए । क्योंकि सब शास्त्र अज्ञानी को बालक और आप्त विद्वान ज्ञानी को पिता कहते है ।

मनुस्मृति का यह वचन : भावार्थ एवं व्याख्या

श्लोक:

अज्ञो भवति वै बालः पिता भवति मन्त्रदः।
अज्ञं हि बालमित्याहुः पितेत्येव तु मन्त्रदम्॥

शब्दार्थ

  • अज्ञः — ज्ञान से रहित, अनुभवहीन।
  • बालः — बालक।
  • पिता — पिता, संरक्षक।
  • मन्त्रदः — उत्तम शिक्षा, उपदेश और विवेक प्रदान करने वाला।
  • मन्त्र — यहाँ अर्थ है शिक्षा, परामर्श, विवेकपूर्ण मार्गदर्शन।

भावार्थ

बालक जन्म से अज्ञान और अनुभवहीन होता है। पिता वह कहलाता है जो उसे उत्तम शिक्षा, सदुपदेश, विवेक और संस्कार प्रदान करे। इसलिए केवल जन्म देने वाला ही पिता नहीं, बल्कि ज्ञान और जीवन का सही मार्ग दिखाने वाला ही वास्तविक अर्थ में पिता है।

व्याख्या

यह वचन परिवार में शिक्षा और संस्कार के महत्व को रेखांकित करता है।

बालक जन्म लेते समय न भाषा जानता है, न धर्म-अधर्म का विवेक, न कर्तव्य का ज्ञान। उसका व्यक्तित्व परिवार और समाज द्वारा दिए गए संस्कारों से निर्मित होता है। इसलिए पिता का प्रथम कर्तव्य केवल पालन-पोषण करना नहीं, बल्कि—

  • सत्य का ज्ञान देना,
  • सदाचार की शिक्षा देना,
  • विद्या के प्रति प्रेरित करना,
  • चरित्रवान बनाना,
  • आत्मनिर्भर और कर्तव्यनिष्ठ बनाना है।

यदि पिता केवल भौतिक सुविधाएँ दे, परन्तु शिक्षा और संस्कार न दे, तो वह अपने प्रमुख दायित्व का निर्वाह नहीं करता।

वैदिक दृष्टि

वैदिक परम्परा में माता-पिता को प्रथम गुरु कहा गया है। बालक का चरित्र घर में ही बनना आरम्भ होता है। इसलिए माता-पिता का आचरण स्वयं आदर्श होना चाहिए, क्योंकि बालक उपदेश से अधिक अनुकरण द्वारा सीखता है।

ज्ञान का अर्थ केवल अक्षरज्ञान नहीं, बल्कि—

  • सत्यवादिता,
  • अनुशासन,
  • आत्मसंयम,
  • परोपकार,
  • ईश्वर-भक्ति,
  • और कर्तव्यपालन भी है।

आज के समय में इस शिक्षा की प्रासंगिकता

आज अनेक माता-पिता अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा तो दिलाते हैं, किन्तु नैतिक शिक्षा और जीवन-मूल्यों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाते। यह श्लोक स्मरण कराता है कि—

  • बच्चों को केवल सफल नहीं, सुसंस्कृत बनाना भी आवश्यक है।
  • शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, बल्कि उत्तम चरित्र का निर्माण भी है।
  • माता-पिता का समय, प्रेम और मार्गदर्शन किसी भी भौतिक संपत्ति से अधिक मूल्यवान है।

निष्कर्ष

यह वचन बताता है कि पिता की महानता केवल जन्मदाता होने में नहीं, बल्कि ज्ञानदाता, संस्कारदाता और जीवन का सही मार्ग दिखाने वाले मार्गदर्शक होने में है। जो माता-पिता अपने बच्चों को विद्या, विवेक और सदाचार प्रदान करते हैं, वही समाज और राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करते हैं।

"संतान को धन से अधिक धर्म, विद्या और संस्कार का उत्तराधिकार देना ही माता-पिता का सर्वोच्च कर्तव्य है।"

ॐ।