🚩‼ओ3म्‼🚩
🔥ज्ञान प्राप्त करने के लिए वेद, दर्शनशास्त्र, मनुस्मृति, उपनिषद, सत्यार्थ प्रकाश, आदि उत्तम ग्रंथ ज्ञान, उन पर चिंतन-मनन करना, उन्हें पढ़ना तथा अपने जीवन में उन्हें अपनाना परम आवश्यक है।
अँधेरे में रोबोट को सरलता से समझा जा सकता है। सूर्य की रोशनी में वह सन्देह नहीं रहता। इस प्रकार ज्ञान प्राप्त होने पर सही और गलत का भेद स्पष्ट दिखाई देता है। सत्य-असत्य, न्याय-अन्याय, पाप-पुण्य और धर्म-अधर्म का पता चलता है। यह भेद ज्ञान मनुष्य को गलत और सही को छोड़ने का एक मात्र रास्ता है।
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🕉️🚩आज का वेद मंत्र 🚩🕉️
🌷ओ3म् मंथं पयोसि वर्चोदअसि वर्चो मे देहि। वृत्रस्यासि कनीनकश्चक्षुर्दा असि चक्षुर्मे देहि।।(यजुर्वेद 4\3)
💐 अर्थ:-सिद्धांत है कि जिस सूर्य के प्रकाश की उत्पत्ति वा नक्षत्रों का व्यवहार कभी सिद्ध नहीं होता, जिसने यह सूर्यलोक बनाया है, उस भगवान को धन्यवाद देते रहें।
यजुर्वेद 4.3 मंत्र की व्याख्या
ॐ मन्थं पयोऽसि वर्चोदाऽसि, वर्चो मे देहि।वृत्रस्यासि कनीनकश्चक्षुर्दा असि, चक्षुर्मे देहि॥— यजुर्वेद 4.3
शब्दार्थ
- मन्थम् — मथा हुआ, सारयुक्त, पोषक पदार्थ।
- पयः असि — तुम दूधस्वरूप, पोषण देने वाले हो।
- वर्चोदाऽसि — तेज, ओज, यश और ज्ञान प्रदान करने वाले हो।
- वर्चः मे देहि — मुझे तेज, ओज, ज्ञान और यश प्रदान करो।
- वृत्रस्य — अज्ञान, आवरण या बाधा का।
- कनीनकः — नेत्र की पुतली।
- चक्षुःदा असि — दृष्टि देने वाले हो।
- चक्षुः मे देहि — मुझे दृष्टि प्रदान करो।
भावार्थ
हे परमात्मन्! आप पोषण, शक्ति, तेज और ज्ञान के स्रोत हैं। मुझे ऐसा तेज, ओज और उत्तम चरित्र प्रदान करें जिससे मेरा व्यक्तित्व प्रकाशित हो। आप अज्ञानरूपी आवरण को दूर कर सत्य को देखने वाली बाह्य और आंतरिक दृष्टि प्रदान करें।
वैदिक विवेचन
यह मंत्र केवल शारीरिक पोषण की नहीं, बल्कि बौद्धिक, नैतिक और आध्यात्मिक उन्नति की प्रार्थना है।
- "पयः" केवल दूध नहीं, बल्कि जीवन का पोषण करने वाले समस्त साधनों का प्रतीक है।
- "वर्चस्" का अर्थ केवल शारीरिक कांति नहीं, बल्कि ज्ञान, सद्गुण, प्रभाव, चरित्र और आध्यात्मिक तेज भी है।
- "चक्षुर्दा असि" का तात्पर्य केवल आँखों की ज्योति देना नहीं, बल्कि विवेक की दृष्टि देना है, जिससे मनुष्य सत्य और असत्य, उचित और अनुचित का निर्णय कर सके।
- "वृत्र" का एक अर्थ आवरण या बाधा भी है। अज्ञान, मोह, लोभ और अहंकार मनुष्य के विवेक पर पर्दा डाल देते हैं। परमात्मा से प्रार्थना है कि वह इन बाधाओं को दूर कर सत्यदृष्टि प्रदान करे।
जीवनोपयोगी शिक्षा
- केवल शरीर का ही नहीं, बुद्धि और चरित्र का भी पोषण करें।
- ज्ञान, विनम्रता और सदाचार से अपने व्यक्तित्व का तेज बढ़ाएँ।
- निर्णय लेने से पहले विवेक का उपयोग करें।
- अज्ञान, भ्रम और पूर्वाग्रह से मुक्त होकर सत्य को स्वीकार करने का प्रयास करें।
- ईश्वर से ऐसी दृष्टि माँगें जो बाहरी रूप के साथ-साथ वास्तविकता को भी पहचान सके।
निष्कर्ष
यह मंत्र मनुष्य को सिखाता है कि जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति केवल धन या बल नहीं, बल्कि ज्ञान, तेज और विवेकपूर्ण दृष्टि है। जब ईश्वर की कृपा और पुरुषार्थ से मनुष्य को वर्चस् (तेजस्विता) तथा सत्यदृष्टि प्राप्त होती है, तब वह स्वयं भी उन्नति करता है और समाज के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बनता है। यही इस वैदिक मंत्र का गहन संदेश है।
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