दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन ऋग्वेद 7.35.9 मंत्र की व्याख्या

दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन ऋग्वेद 7.35.9 मंत्र की व्याख्या


  🔥 दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन

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ओ३म् आ नो वयो वयःशयं महान्तं गह्वरेष्ठाम।

महान्तं पूर्विणेष्ठामुग्रं वचो अपावधीः।।(सामवेद ३५३)

सामवेद 353 मंत्र की व्याख्या

ॐ आ नो वयो वयःशयं महान्तं गह्वरेष्ठाम्।
महान्तं पूर्विणेष्ठामुग्रं वचो अपावधीः॥
— सामवेद 353

शब्दार्थ

  • — हमारे पास, हमारी ओर।
  • नः — हमारे लिए।
  • वयः — बल, जीवन-शक्ति, आयु अथवा पक्षी (संदर्भानुसार); यहाँ जीवन-शक्ति।
  • वयःशयम् — जीवनशक्ति प्रदान करने वाला, बल का आधार।
  • महान्तम् — महान, विशाल।
  • गह्वरेष्ठाम् — गूढ़, हृदय में स्थित, अत्यन्त गहन।
  • पूर्विणेष्ठाम् — आदि से विद्यमान, प्राचीन, सनातन।
  • उग्रम् — शक्तिशाली, पराक्रमी।
  • वचः — वाणी, उपदेश।
  • अपावधीः — दूर करो, हटाओ, अथवा अनुचित वाणी से रक्षा करो।

भावार्थ

हे परमात्मन्! हमें जीवनशक्ति, बल और उत्साह प्रदान करें। आप महान, सनातन और हमारे अंतःकरण में विराजमान हैं। हमें ऐसी शक्ति दें कि हमारी वाणी सत्य, हितकारी और प्रभावशाली बने तथा असत्य, कटु और अधार्मिक वचन हमसे दूर रहें।

वैदिक विवेचन

यह मंत्र मनुष्य के बल, अंतःकरण और वाणी की पवित्रता पर विशेष बल देता है।

  • "महान्तम्" परमात्मा की अनंत महानता का बोध कराता है। वह समस्त सृष्टि से महान तथा प्रत्येक हृदय में विद्यमान है।
  • "गह्वरेष्ठाम्" का तात्पर्य है कि परमात्मा बाहरी आडंबर से नहीं, बल्कि मनुष्य के शुद्ध अंतःकरण में अनुभव किया जाता है।
  • "पूर्विणेष्ठाम्" बताता है कि परमात्मा अनादि और सनातन है; उसका अस्तित्व किसी समय विशेष से प्रारंभ नहीं हुआ।
  • "उग्रं वचः" का आशय यह है कि वाणी में सत्य का सामर्थ्य हो, किंतु वह क्रोध, अहंकार और कटुता से रहित हो।

जीवनोपयोगी शिक्षा

  • शारीरिक शक्ति के साथ मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति का भी विकास करें।
  • अपनी वाणी को सत्य, मधुर और कल्याणकारी बनाएँ।
  • अंतःकरण को शुद्ध रखें, क्योंकि वहीं ईश्वर का अनुभव होता है।
  • अनुचित, असत्य और कठोर वचनों से बचें तथा सदैव विवेकपूर्ण संवाद करें।

निष्कर्ष

यह मंत्र हमें प्रेरणा देता है कि हम परमात्मा से जीवनशक्ति, आत्मबल, विवेक और पवित्र वाणी की प्रार्थना करें। मनुष्य की वास्तविक महानता उसके बल, धन या पद में नहीं, बल्कि उसके शुद्ध चरित्र, सत्यनिष्ठ वाणी और ईश्वरनिष्ठ जीवन में निहित है। यही इस सामवैदिक मंत्र का गूढ़ संदेश है।

    हमें विद्वान पुरूषों के सदुपदेश ग्रहण कर अपनी आत्मा और मन को निर्मल और पवित्र बनाना चाहिए। दोष और दुर्गुण का नाश इसी तरह होगा।

  हम इस विचार को दृढता से पकडे रहते हैं कि 'मैं एक शरीर हूं और शरीर के अतिरिक्त कुछ भी नहीं हूं।' इसी विचार के कारण हम अधिकतर अपनी शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति में तथा इंद्रिय सुख की लालसा में डूबे रहते हैं। जीवन के सारे क्रियाकलाप केवल इसी उद्देश्य की पूर्ति में लगे रहते हैं। इसके विपरीत ऋषि-मुनियों, संतो, विद्वानों का कहना है कि परम ज्ञान की स्थिति में विकसित होकर विचार यह हो जाता है कि 'मैं न शरीर हूं, न मन न इंद्रिय। मैं तो सच्चिदानंद स्वरूप हूं, शुद्ध चेतन्य आत्मा हूं।' जब विचार इतने परिपक्व हो जाते हैं तो चारों ओर प्रसन्नता, आनंद और परमानंद ही रह जाता है, दुख, क्लेस पूरी तरह समाप्त हो जाते हैं।

    परंतु संसारी व्यक्तियों के लिए इस प्रकार शरीर को भूलकर, इंद्रियों का दमन करके केवल आत्मा का ही ध्यान करना संभव ही नहीं है। यदि सारे व्यक्ति ऐसा करने लगे तो जीवनयापन भी कठिन हो जाएगा। तब क्या कुछ लोग ही इस आदर्श का पालन करें और शेष नारकीय जीवन भोगते रहें? नहीं, एक बीच का सरल मार्ग भी है कि 'मैं शरीर भी हूं और आत्मा भी।' इस विचार के आ जाने से हम शरीर का भी ध्यान रखते हैं और आत्मा का भी। शरीर के साथ साथ हमें हर समय यह ध्यान रहता है कि परमात्मा का एक अंश हमारी आत्मा के रूप में हर समय हमारे साथ है। वह हमारे शरीर के प्रत्येक कार्य को, मन में उठने वाली प्रत्येक विचार तरंग को, निरंतर देखता रहता है। आत्मा का यह ज्ञान हमारे ऊपर एक अंकुश के समान रहता है और दुर्गुणों व दुष्कर्मों से हमें बचाता रहता है।

  कितना भारी अंतर है- कहां आत्मा को भूला हुआ व्यक्ति कुविचारों और कुसंस्कारों को ही जीवन का मूल उद्देश्य समझकर हर प्रकार के दुराचार व पापाचार में फंसा रहता है। और कहां आत्मज्ञान से परिपूर्ण व्यक्ति सदविचारों को ही अपनाता है तथा स्वयं उत्कृष्ट, श्रेष्ठ बनता है एवं समाज को भी उन्नति के पथ पर ले चलता है। ऐसे व्यक्तियों की आत्मा पवित्र होती है और मन दुर्गुणों से मुक्त होकर शुद्ध, निर्मल बन जाता है। वह संसार के भौतिक पदार्थों का उपभोग करता है पर 'त्यक्तेन भुंजीथा' की भावना से। केवल अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ही यह भोग सीमित रहता है और शेष संसार के अन्य प्राणियों के लिए। अपनी इंद्रियों का भी संयमित और मर्यादित उपभोग करने से दुनिया में रहते हुए भी वह स्वर्गीय आनंद प्राप्त करता रहता है।

   इस प्रकार का ज्ञान प्राप्त होता है विद्वानों के सदुपदेश से, सदग्रंथो के स्वाध्याय से और वेद मंत्रों के चिंतन-मनन से। तभी संसार में रहते हुए भी मनुष्य अलिप्त रहता है। उसका दृष्टिकोण भिन्न हो जाता है। आत्मदृष्टि की आभा से जीवन देदीप्यमान हो उठता है। इससे उसके दोष-दुर्गुण स्वतः ही मैदान छोड़कर भाग खडे होते हैं और उनके स्थान पर सदगुणों की वृद्धि होने लगती है।

    जीवन लक्ष्य की प्राप्ति का यह सर्वोत्तम साधन है ।

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 🕉️🚩 आज का वेद मंत्र 🕉️🚩

🌷 ओ३म् शं नो अदितिर्भवतु व्रतेभि: शं नो भवन्तु मरूत: स्वर्का:।शं नो विष्णु: शमु पूषा नो अस्तु शं नो भवित्रं शम्वस्तु वायु:।(ऋग्वेद ७|३५|९)

💐 अर्थ :- नियमों सहित अखण्ड धरती माता हमारे लिए सुखदायी हों, शुभ विचार वाले शूरवीर व बड़े विद्वान लोग हमें सुख देने वाले हो,व्यापक परमेश्वर हमें सुखदायक हो, पुष्टिकारक तत्व व ब्रह्मचर्यादि व्यवहार हमें शान्ति देने वाले हो, अन्तरिक्ष व जल हमें सुखकर हो और पवन सुख देने वाली हो।

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ऋग्वेद 7.35.9 मंत्र की व्याख्या

ॐ शं नो अदितिर्भवतु व्रतेभिः।
शं नो भवन्तु मरुतः स्वर्काः।
शं नो विष्णुः शं पूषा नो अस्तु।
शं नो भवित्रं शमस्तु वायुः॥
— ऋग्वेद 7.35.9

शब्दार्थ

  • शम् — कल्याण, सुख, शांति, मंगल।
  • नः — हमारा, हम सबका।
  • अदितिः — अखण्ड, अनन्त, बन्धनरहित; परमात्मा की असीम संरक्षणकारी शक्ति अथवा समग्र प्रकृति।
  • भवतु — हो।
  • व्रतेभिः — श्रेष्ठ नियमों, धर्ममय आचरणों द्वारा।
  • मरुतः — जीवनदायी शक्तियाँ, प्राणवायु, गतिशील प्राकृतिक शक्तियाँ।
  • स्वर्काः — प्रकाशमय, सुखदायक।
  • विष्णुः — सर्वव्यापक परमात्मा।
  • पूषा — पालन-पोषण करने वाला, जीवन का संवर्धन करने वाला।
  • भवित्रम् — पवित्र करने वाला साधन या शक्ति।
  • वायुः — जीवनदायी वायु।

भावार्थ

हमारे लिए अनन्त संरक्षणकारी शक्ति कल्याणकारी हो। श्रेष्ठ नियमों का पालन हमें सुख और शांति प्रदान करे। जीवनदायी प्राकृतिक शक्तियाँ हमारे लिए मंगलकारी हों। सर्वव्यापक परमात्मा तथा समस्त प्राणियों का पालन करने वाली शक्ति हमारा कल्याण करें। पवित्र करने वाली शक्तियाँ और जीवनदायी वायु भी हमारे लिए सुख, स्वास्थ्य और मंगल का कारण बनें।

वैदिक विवेचन

यह मंत्र सर्वांगीण कल्याण की प्रार्थना है। इसमें मनुष्य केवल अपने लिए नहीं, बल्कि उन समस्त शक्तियों के साथ सामंजस्य की कामना करता है जिन पर जीवन आधारित है।

  • "अदिति" अखण्डता और व्यापकता का प्रतीक है। संदेश है कि मनुष्य संकीर्णता छोड़कर उदार और समावेशी दृष्टि अपनाए।
  • "व्रतेभिः" से स्पष्ट है कि वास्तविक कल्याण केवल प्रार्थना से नहीं, बल्कि सत्य, संयम, अनुशासन और धर्ममय जीवन से प्राप्त होता है।
  • "मरुतः" प्राकृतिक शक्तियों और प्राणशक्ति का प्रतीक हैं। इनके प्रति सम्मान और संरक्षण मानव जीवन के लिए आवश्यक है।
  • "विष्णुः" का अर्थ यहाँ सर्वव्यापक परमात्मा है, जो समस्त सृष्टि में व्याप्त होकर उसका संचालन करता है।
  • "पूषा" पोषण का प्रतीक है, जो हमें स्मरण कराता है कि अन्न, जल, सूर्य, पृथ्वी और प्रकृति का सम्मान करना हमारा कर्तव्य है।
  • "वायु" केवल श्वास का आधार नहीं, बल्कि समस्त जीवन का आधार है। शुद्ध वायु और पर्यावरण की रक्षा वैदिक जीवन-दृष्टि का महत्वपूर्ण अंग है।

जीवनोपयोगी शिक्षा

  • जीवन में सत्य, अनुशासन और श्रेष्ठ नियमों का पालन करें।
  • प्रकृति के सभी तत्त्वों—वायु, जल, पृथ्वी और वनस्पतियों—का संरक्षण करें।
  • परमात्मा की सर्वव्यापकता का अनुभव करते हुए सभी प्राणियों के प्रति सद्भाव रखें।
  • अपने जीवन को ऐसा बनाएँ जिससे स्वयं के साथ-साथ समाज और पर्यावरण का भी कल्याण हो।

निष्कर्ष

यह मंत्र हमें सिखाता है कि मनुष्य का वास्तविक सुख तभी संभव है जब उसका जीवन धर्म, प्रकृति और परमात्मा के साथ संतुलित हो। श्रेष्ठ आचरण, प्राकृतिक संसाधनों का सम्मान, ईश्वर में श्रद्धा और लोककल्याण की भावना—यही इस वैदिक प्रार्थना का सार है। यह मंत्र केवल व्यक्तिगत सुख नहीं, बल्कि समस्त विश्व के मंगल और शांति की कामना करता है।


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