मानव की शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शान्ति के सर्वांगीण कल्याण की वैदिक प्रार्थना

 

मानव की शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शान्ति के सर्वांगीण कल्याण की वैदिक प्रार्थना



 🕉️🚩ओ३म्🚩🕉️

   🔥मानव की शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शान्ति के लिए प्राचीन ऋषि-मुनियों ने अनेक विधानों की व्यवस्था की थी, जिनका पालन करते हुए मानव अपनी आत्मशुद्धि, आत्मबल-वृद्धि और आरोग्य की रक्षा कर सकता है, इन्हीं विधि-विधानों में से एक है यज्ञ। वैदिक विधान से हवन, पूजन, मंत्रोच्चारण से युक्त, लोकहित के विचार से की गई पूजा को ही यज्ञ कहते हैं। यज्ञ मनुष्य तथा देवताओं के बीच संतुलन व सम्बंध स्थापित करने वाला माध्यम है। 

   यज्ञ विष्णु का स्वरूप है और विष्णु व्यापक हैं। ज्ञान, ध्यान, आराधना और चिंतन यज्ञ हैं, सेवा भी यज्ञ है और देश सेवा सबसे बड़ा यज्ञ है। प्रत्येक श्रेष्ठ कार्य जो परोपकार व हित की भावना से युक्त हो वह यज्ञ है।

    ऋषि दयानंद जी यज्ञ की परिभाषा देते हुए बोलते हैं कि

धात्वर्थ के अभिप्राय से यज्ञ शब्द का अर्थ तीन प्रकार का होता है अर्थात् एक जो इस लोक और परलोक के सुख के लिये विद्या , ज्ञान और धर्म के सेवन से वृद्ध अर्थात् बड़े - बड़े विद्वान् हैं , उनका सत्कार करना । दूसरा अच्छी प्रकार पदार्थों के गुणों के मेल और विरोध के ज्ञान से शिल्पविद्या का प्रत्यक्ष करना और तीसरा नित्य विद्वानों का समागम अथवा शुभगुण विद्या सुख धर्म और सत्य का नित्य दान करना है 

   चार वेद, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद, ईश्वरीय ज्ञान है जिसे सर्वव्यापक, सर्वज्ञ व सर्वशक्तिमान सृष्टिकर्ता ईश्वर ने सृष्टि के आरम्भ में चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा को दिया था। ईश्वर प्रदत्त यह ज्ञान सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। वेद सभी मनुष्यों के लिए यज्ञ करने का विधान करते हैं। 

     यह संसार ईश्वर का बनाया हुआ है और सभी मनुष्यों व प्राणियों को उसी ने जन्म दिया है। अतः ईश्वर सभी मनुष्यादि प्राणियों का माता, पिता व आचार्य  है। उसकी आज्ञा का पालन करना ही मनुष्य का धर्म है और न करना ही अधर्म है। इस आधार पर यज्ञ करना मनुष्य धर्म और जो नहीं करता वह अधर्म करता है।

   स्वामी दयानन्द सरस्वती ने अग्निहोत्र से लेकर अश्वमेधपर्यन्त यज्ञों की चर्चा की है। अग्निहोत्र एक नैत्यिक कर्तव्य है जो शास्त्र-मर्यादा के अनुसार सभी को करना होता है। 

    यज्ञ से मानव के भौतिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, प्राकृतिक एवं व्यक्तिगत उद्देश्य पूर्ण होते हैं। यज्ञ किसी-न-किसी इच्छा की पूर्ति के लिए किया जाता है। ‘स्वर्ग कामोयज्ञेत’ अर्थात स्वर्ग की कामना से यज्ञ करो।

     ऋग्वेद के अनुसार अग्नि के बिना देवता की अनुकम्पा प्राप्त नहीं होती। अथर्ववेद के अनुसार हमारे अनुदान और प्रतिवेदन देवताओं के पास एक अग्नि के माध्यम से पहुँचते हैं। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार अग्नि ही देवताओं  का मुख है। वे इसी माध्यम से मनुष्यों की भेंट स्वीकार करते और अपने वरदान उन पर उडे़लते हैं। स्वर्ग तक आत्मा को पहुँचाने वाला वाहन यज्ञाग्नि को माना गया है। यज्ञीय सत्कर्मों से प्रसन्न हुए देवता, मनुष्यों की सुख सुविधा का सम्वर्धन करते हैं। उन्हें श्रेष्ठ समुन्नत बनाते हैं।

   वेदों में परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना की गई है - 

   हे, प्रभु! हमारा जीवन यज्ञमय हो, जिससे हमारे अन्तस में ‘‘इदं न मम’’ की भावना का उदय हो। यज्ञ से अहिंसा (न्याय) की सात्विक वृत्तियों का उदय होता है। अथर्ववेद में कहा गया है - मैं मानव जीवन-रूपी यज्ञ में मन से हवन करता हूँ। यह मेरा जीवन-यज्ञ जगत् रचयिता प्रभु ने विस्तृत किया है, इसमें सब देव, दिव्यभाव एवं प्रसन्नता से शामिल हों। मनुष्य जन्म और शरीर सभी योनियों में श्रेष्ठ बनाये रखूँ और इससे कभी भी दूषित कर्म न होने दूँ।

   भारतीय संस्कृति में मनुष्य योनि को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। वेदों में तो इस शरीर को अयोध्या कहा गया है। ‘‘अष्ट चक्रा नव द्वारा देवानां पूरयोध्या’’। इसी शरीर के द्वारा हम धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष को हासिल कर सकते हैं, लेकिन यह तभी सम्भव है, जब हमारे सभी कर्म ‘‘दैव्य’’ कोटि यानि यज्ञमय (सतकर्म) हों। इसमें नित्य किए जाने वाले पंचमहायज्ञों (ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, अतिथियज्ञ और बलिवैश्वयज्ञ ) के अतिरिक्त संस्कृति, भाषा, राष्ट्र, समाज, धर्म, आत्मा और सर्वहित-यज्ञों को शामिल किया गया है। पूरे ब्रह्माण्ड में हर पल ‘‘इदं न मम’’ का यज्ञ नदियाँ, वृक्ष, बादल, पुष्प, सूर्य, चन्द्र, वायु, सागर, वन सभी कर रहे हैं। यदि ब्रह्माण्ड के इन यज्ञों (परोपकार व कर्तव्य) के रहस्य को समझ लिया जाए, तो स्वार्थ और हिंसा के कारण जो समस्याएँ पैदा हुई हैं, उनका समाधान निकल सकता है।

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 🕉️🚩आज का वेद मंत्र 🕉️🚩

🌷ओ३म् शं नो अग्निर्ज्योतिरनीको अस्तु शं नो मित्रावरूणावश्विना शम्।शं न: सुकृतां सुकृतानि सन्तु शं न इषिरो अभिवातु वात:।(७|३५|४)

💐अर्थ:- ज्योतियों की ज्योति ज्ञानस्वरूप परमेश्वर हमारे लिए शान्ति दायक हो, दिन और रात हमें शान्ति कारक हो, सूर्य और चन्द्रमा हमें शान्ति देने वाले हो, धर्मात्माओं के सुकर्म हमें शान्ति कारक हो, गतिशील पवन हमारे लिए सब ओर से शान्ति देने वाली  हो।

ऋग्वेद 7.35.4 : सर्वांगीण कल्याण की वैदिक प्रार्थना

मंत्र

ॐ शं नो अग्निर्ज्योतिरनीको अस्तु शं नो मित्रावरुणावश्विना शम्।
शं नः सुकृतां सुकृतानि सन्तु शं न इषिरो अभिवातु वातः॥ (ऋग्वेद 7.35.4)


भावार्थ

हे परमात्मन्! अग्नि अपने प्रकाश और ऊर्जा सहित हमारे लिए कल्याणकारी हो। मित्र और वरुण हमारे लिए मंगलकारी हों। अश्विनीकुमारों के गुण हमारे लिए हितकारी हों। हमारे शुभ कर्म हमें शुभ फल प्रदान करें और जीवनदायी, प्रेरणादायक वायु हमारे लिए सुख और स्वास्थ्य का कारण बने।


वैदिक दृष्टि से कल्याण का सूत्र

यह मंत्र केवल व्यक्तिगत सुख की नहीं, बल्कि प्रकृति, समाज और कर्म—तीनों के सामंजस्य की प्रार्थना है।

ऋषि यहाँ जीवन के प्रमुख आधारों का स्मरण करते हैं—

1. अग्नि — प्रकाश और ऊर्जा का प्रतीक

अग्नि अंधकार को दूर करती है और जीवन को गति देती है। वैदिक साहित्य में अग्नि ज्ञान, ऊर्जा, उत्साह और प्रगति का प्रतीक है।

आज विज्ञान बताता है कि सूर्य की ऊर्जा और ऊष्मा के बिना पृथ्वी पर जीवन असंभव है। वैदिक ऋषि इसी जीवनदायिनी शक्ति को कल्याणकारी बनाने की प्रार्थना करते हैं।


2. मित्र और वरुण — सामाजिक एवं प्राकृतिक व्यवस्था

मित्र मैत्री, सहयोग और सद्भाव का प्रतीक है।

वरुण नियम, अनुशासन और नैतिक व्यवस्था का प्रतीक है।

किसी भी सभ्य समाज के लिए प्रेम और अनुशासन दोनों आवश्यक हैं। केवल मित्रता हो और नियम न हों, या केवल नियम हों और करुणा न हो—दोनों स्थितियाँ असंतुलन उत्पन्न करती हैं।


3. अश्विनौ — स्वास्थ्य और चिकित्सा के प्रतीक

वैदिक साहित्य में अश्विनीकुमारों को रोगनाशक और स्वास्थ्यरक्षक कहा गया है।

यह संदेश देता है कि स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन ही जीवन की सफलता का आधार हैं।


4. सुकृतानि — कर्मफल का शाश्वत सिद्धान्त

मंत्र कहता है—

"शं नः सुकृतां सुकृतानि सन्तु"

अर्थात हमारे अच्छे कर्म हमारे लिए कल्याणकारी फल दें।

यह वैदिक कर्म-सिद्धान्त का सुंदर प्रतिपादन है। मनुष्य जैसा बोता है, वैसा ही काटता है। शुभ कर्म ही स्थायी सुख और सम्मान का आधार हैं।


5. वायु — जीवन का आधार

"शं न इषिरो अभिवातु वातः"

अर्थात प्रेरणादायक और प्राणदायक वायु हमारे लिए मंगलकारी होकर बहे।

आधुनिक विज्ञान के अनुसार शुद्ध वायु स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन और दीर्घायु का आधार है। वैदिक ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व पर्यावरण और स्वच्छ वायु के महत्व को समझ लिया था।


आज के युग के लिए संदेश

यह मंत्र हमें सिखाता है कि सच्चा सुख केवल धन से नहीं आता। उसके लिए आवश्यक हैं—

  • ज्ञान का प्रकाश (अग्नि)
  • मैत्री और अनुशासन (मित्र-वरुण)
  • स्वास्थ्य (अश्विनौ)
  • सत्कर्म (सुकृतानि)
  • स्वच्छ पर्यावरण (वायु)

जब ये पाँचों जीवन में संतुलित होते हैं, तब व्यक्ति, समाज और राष्ट्र का वास्तविक कल्याण होता है।


निष्कर्ष

ऋग्वेद का यह मंत्र मानव जीवन के लिए एक संपूर्ण कल्याण-सूत्र प्रस्तुत करता है। यह हमें याद दिलाता है कि प्रकृति, नैतिकता, स्वास्थ्य और कर्म—इन सबका समन्वय ही सुखी जीवन का आधार है।

"हमारे जीवन में ज्ञान का प्रकाश हो, संबंधों में मित्रता हो, आचरण में धर्म हो, कर्मों में श्रेष्ठता हो और वातावरण में पवित्रता हो—यही वैदिक मंगलकामना है।"

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥ 🙏🏻

ऋग्वेद 7.35.4 : सर्वांगीण कल्याण की वैदिक प्रार्थना

मंत्र

ॐ शं नो अग्निर्ज्योतिरनीको अस्तु शं नो मित्रावरुणावश्विना शम्।
शं नः सुकृतां सुकृतानि सन्तु शं न इषिरो अभिवातु वातः॥ (ऋग्वेद 7.35.4)


भावार्थ

हे परमात्मन्! अग्नि अपने प्रकाश और ऊर्जा सहित हमारे लिए कल्याणकारी हो। मित्र और वरुण हमारे लिए मंगलकारी हों। अश्विनीकुमारों के गुण हमारे लिए हितकारी हों। हमारे शुभ कर्म हमें शुभ फल प्रदान करें और जीवनदायी, प्रेरणादायक वायु हमारे लिए सुख और स्वास्थ्य का कारण बने।


वैदिक दृष्टि से कल्याण का सूत्र

यह मंत्र केवल व्यक्तिगत सुख की नहीं, बल्कि प्रकृति, समाज और कर्म—तीनों के सामंजस्य की प्रार्थना है।

ऋषि यहाँ जीवन के प्रमुख आधारों का स्मरण करते हैं—

1. अग्नि — प्रकाश और ऊर्जा का प्रतीक

अग्नि अंधकार को दूर करती है और जीवन को गति देती है। वैदिक साहित्य में अग्नि ज्ञान, ऊर्जा, उत्साह और प्रगति का प्रतीक है।

आज विज्ञान बताता है कि सूर्य की ऊर्जा और ऊष्मा के बिना पृथ्वी पर जीवन असंभव है। वैदिक ऋषि इसी जीवनदायिनी शक्ति को कल्याणकारी बनाने की प्रार्थना करते हैं।


2. मित्र और वरुण — सामाजिक एवं प्राकृतिक व्यवस्था

मित्र मैत्री, सहयोग और सद्भाव का प्रतीक है।

वरुण नियम, अनुशासन और नैतिक व्यवस्था का प्रतीक है।

किसी भी सभ्य समाज के लिए प्रेम और अनुशासन दोनों आवश्यक हैं। केवल मित्रता हो और नियम न हों, या केवल नियम हों और करुणा न हो—दोनों स्थितियाँ असंतुलन उत्पन्न करती हैं।


3. अश्विनौ — स्वास्थ्य और चिकित्सा के प्रतीक

वैदिक साहित्य में अश्विनीकुमारों को रोगनाशक और स्वास्थ्यरक्षक कहा गया है।

यह संदेश देता है कि स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन ही जीवन की सफलता का आधार हैं।


4. सुकृतानि — कर्मफल का शाश्वत सिद्धान्त

मंत्र कहता है—

"शं नः सुकृतां सुकृतानि सन्तु"

अर्थात हमारे अच्छे कर्म हमारे लिए कल्याणकारी फल दें।

यह वैदिक कर्म-सिद्धान्त का सुंदर प्रतिपादन है। मनुष्य जैसा बोता है, वैसा ही काटता है। शुभ कर्म ही स्थायी सुख और सम्मान का आधार हैं।


5. वायु — जीवन का आधार

"शं न इषिरो अभिवातु वातः"

अर्थात प्रेरणादायक और प्राणदायक वायु हमारे लिए मंगलकारी होकर बहे।

आधुनिक विज्ञान के अनुसार शुद्ध वायु स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन और दीर्घायु का आधार है। वैदिक ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व पर्यावरण और स्वच्छ वायु के महत्व को समझ लिया था।


आज के युग के लिए संदेश

यह मंत्र हमें सिखाता है कि सच्चा सुख केवल धन से नहीं आता। उसके लिए आवश्यक हैं—

  • ज्ञान का प्रकाश (अग्नि)
  • मैत्री और अनुशासन (मित्र-वरुण)
  • स्वास्थ्य (अश्विनौ)
  • सत्कर्म (सुकृतानि)
  • स्वच्छ पर्यावरण (वायु)

जब ये पाँचों जीवन में संतुलित होते हैं, तब व्यक्ति, समाज और राष्ट्र का वास्तविक कल्याण होता है।


निष्कर्ष

ऋग्वेद का यह मंत्र मानव जीवन के लिए एक संपूर्ण कल्याण-सूत्र प्रस्तुत करता है। यह हमें याद दिलाता है कि प्रकृति, नैतिकता, स्वास्थ्य और कर्म—इन सबका समन्वय ही सुखी जीवन का आधार है।

"हमारे जीवन में ज्ञान का प्रकाश हो, संबंधों में मित्रता हो, आचरण में धर्म हो, कर्मों में श्रेष्ठता हो और वातावरण में पवित्रता हो—यही वैदिक मंगलकामना है।"

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥ 🙏🏻

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