ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके प्रलोभन और आत्मज्ञान


ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान्कामांश्छन्दतः प्रार्थयस्व। इमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः। आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व नचिकेतो मरणं माऽनुप्राक्शीः ॥

॥ लिप्यन्तरणम् ॥

ye ye kāmā durlabhā martyaloke sarvānkāmāṁśchandataḥ prārthayasva | imā rāmāḥ sarathāḥ satūryā na hīdṛśā lambhanīyā manuṣyaiḥ | ābhirmatprattābhiḥ paricārayasva naciketo maraṇaṁ mā'nuprākśīḥ ||

॥ अन्वयः ॥

ये ये कामाः मर्त्यलोके दुर्लभः तान् सर्वान् कामान् छन्दतः प्रार्तयस्व। इमं सरथाः सतूर्याः रामाः ईदृशाः मनुष्यैः नहि लम्भनीयाः मत्प्रत्तभिः अभिः परिचारयस्व। नचिकेतः मरणम् मा अनुप्राक्षिः ॥

॥ अन्वयलिप्यन्तरणम् ॥

ye ye kāmāḥ martyaloke durlabhaḥ ( tān ) sarvān kāmān chandataḥ prārtayasva| imaṁ sarathāḥ satūryāḥ rāmāḥ īdṛśāḥ manuṣyaiḥ nahi lambhanīyāḥ matprattabhiḥ abhiḥ paricārayasva| naciketaḥ maraṇam mā anuprākṣiḥ ||

॥ सुबोधिनीभाष्यम् - गोपालानन्दस्वामिरचितम् ॥

ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान् कामान् छन्दतः प्रार्थयस्व । इमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः । आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व नचिकेतो मरणं माऽनुप्राक्षीः ॥२५॥

ये ये काम मर्त्यलोके दुर्लभाः तान् सर्वान् यथेच्छं प्रार्थयस्व । दुर्लभमेव तु वरणीयम्, न सुलभमिति, सर्वलोकदुर्लभं मा वृणीष्व । मर्त्यलोके जातस्त्वं मर्त्यदुर्लभं वृणीष्व । मर्त्यदुर्लभाः कामाः बहवः सन्ति इति यावत् । इमाः - दिव्याः, रमयन्ति पुरुषम् इति रामाः अप्सरसः, न केवलं रामाः, दिव्यैः रथैः, दिव्यैः वादित्रैश्च सह गृहाण । ईदृशा: - दिव्याः, मनुष्यैः न लम्भनीया हि मानुषदुर्लभः अयमर्थ इति सुप्रसिद्धमेतत् । तत् आभि: - मया दत्ताभिः परिचारयस्व, आत्मानमिति शेषः । बहवो देहान्तरेणापि या एव कामयमानाः महताप्यायासेन यागादि चरन्ति ता एव अहमहमिकया पादसंवाहिन्यः परिचारिकाः तव अद्यैव भविष्यन्ति । तत् आभिः आत्मानं परिचरस्व, मरणं माऽनुप्राक्षीः - आत्यन्तिकशरीर- विश्लेषवृत्तं मा विचारय ॥२५॥

॥ आङ्गल-अर्थः ॥

ye ye kämäù martyaloke durlabhäù (tän) sarvän kämän chandataù prärthayasva| imäù sarathäù satüryäù rämäù édåçäù manuñyaiù na hi lambhanéyäù | matprattäbhiù äbhiù paricärayasva| naciketaù maraëam mä anupräkñéù ||

॥ हिन्दी-अर्थः ॥

'' जिन-जिन कामनाओं की पूर्ति मर्त्यलोक में दुर्लभ है, उन सभी कामनाओं को तुम सहर्ष माँग लो। देखो! अपने रथों एवं वाद्यो सहित ये मनोहारिणी रमणीयां हैं, मनुष्यों के लिए इस प्रकार की रमणीयां अलभ्य हैं, मैं इन्हें तुम्हें दूँगा। हे नचिकेता! (मेरे द्वारा प्रदत्त)* इन्हें अपनी परिचारिकाओं के रूप में स्वीकार करके इनके साथ सुख सें रहो। किन्तु, मृत्यु के विषय में प्रश्न मत करो।"

॥ शब्दावली ॥

ये ये कामाः - ye ye kāmāḥ - all desires that

मर्त्यलोके - martyaloke - in the world of mortals

दुर्लभः - durlabhaḥ - hard to win

तान् सर्वान् कामान् - tān sarvān kāmān - all those desires

छन्दतः - chandataḥ - at thy pleasure

प्रार्तयस्व - prārtayasva - demand

इमाः - imāḥ - these

सरथाः - sarathāḥ - with chariots

सतूर्याः - satūryāḥ - with bugles

रामाः - rāmāḥ - delectable women

ईदृशाः - īdṛśāḥ - whose like are, these I will give thee;. But of death question not,.”

मनुष्यैः - manuṣyaiḥ - by men

न हि - na hi - not

लम्भनीयाः - lambhanīyāḥ - to be won

मत्प्रत्तभिः - matprattabhiḥ - given by me

अभिः - abhiḥ - with these

परिचारयस्व - paricārayasva - live for thy handmaidens

नचिकेतः - naciketaḥ - O Nachiketas!

मरणम् - maraṇam - of death

मा अनुप्राक्षिः - mā anuprākṣiḥ - question not

प्रलोभन और आत्मज्ञान

कठोपनिषद् का अमर संदेश – जब नचिकेता ने संसार के सभी सुखों को ठुकरा दिया

संस्कृत मंत्र

ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान्कामांश्छन्दतः प्रार्थयस्व।

इमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः।

आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व नचिकेतो मरणं माऽनुप्राक्शीः॥

— कठोपनिषद् (1.1.25)


भावार्थ

हे नचिकेता! इस मर्त्यलोक में जो-जो दुर्लभ भोग और सुख हैं, उन्हें अपनी इच्छा के अनुसार माँग लो। ये सुन्दर रथ, संगीत-वाद्य और अप्सराएँ मनुष्यों को सहज प्राप्त नहीं होतीं। इन्हें मैं तुम्हें देता हूँ। इनसे अपनी सेवा कराओ, लेकिन मृत्यु के रहस्य के विषय में मुझसे प्रश्न मत करो।


जब सत्य की परीक्षा होती है

यह उपनिषद् का अत्यंत प्रेरणादायक प्रसंग है।

धर्मराज नचिकेता की परीक्षा ले रहे हैं।

वे उसे संसार की हर वह वस्तु देने को तैयार हैं, जिसके लिए सामान्य मनुष्य जीवन भर संघर्ष करता है—

  • धन
  • वैभव
  • सुन्दर रथ
  • संगीत
  • ऐश्वर्य
  • विलास
  • दीर्घायु

लेकिन इसके बदले वे चाहते हैं कि नचिकेता मृत्यु और आत्मा के रहस्य के विषय में प्रश्न करना छोड़ दे।


संसार का सबसे बड़ा प्रलोभन

मनुष्य को सत्य के मार्ग से हटाने के लिए प्रलोभन सदैव उपस्थित रहते हैं।

आज भी स्थिति भिन्न नहीं है।

आज के रथ हैं—

📱 आधुनिक उपकरण

🏠 आलीशान भवन

💰 अपार धन

🌟 प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा

🎭 मनोरंजन और भोग

इनमें कोई बुराई नहीं है, लेकिन जब ये जीवन का लक्ष्य बन जाते हैं, तब मनुष्य सत्य की खोज भूल जाता है।


नचिकेता की महानता

नचिकेता जानता था कि—

धन नश्वर है।

यौवन क्षणिक है।

सुख अस्थायी है।

शरीर नाशवान है।

इसलिए उसने कहा—

"ये सब वस्तुएँ कुछ समय बाद समाप्त हो जाएँगी। मुझे वह ज्ञान चाहिए जो मृत्यु के पार का सत्य बताए।"

यही नचिकेता को साधारण मनुष्य से महान बनाता है।


भोग और योग का अंतर

भोग का अर्थ है—

बाहरी वस्तुओं से सुख प्राप्त करना।

योग का अर्थ है—

अपने भीतर स्थित आनंद को खोजना।

भोग का सुख सीमित है।

योग का आनंद असीम है।

भोग वस्तुओं पर निर्भर है।

योग आत्मा पर आधारित है।

भोग समाप्त हो जाता है।

योग मनुष्य को अमर सत्य की ओर ले जाता है।


आज का नचिकेता कौन है?

आज भी हर व्यक्ति के सामने दो मार्ग हैं—

पहला मार्ग

तत्काल सुख, सुविधा और आकर्षण का।

दूसरा मार्ग

ज्ञान, आत्मसंयम और सत्य की खोज का।

जो व्यक्ति कठिन होते हुए भी सत्य का मार्ग चुनता है, वही आधुनिक युग का नचिकेता है।


मृत्यु का प्रश्न क्यों महत्वपूर्ण है?

नचिकेता समझ गया था कि—

यदि मृत्यु का रहस्य नहीं समझा,

यदि आत्मा को नहीं जाना,

यदि जीवन का उद्देश्य नहीं समझा,

तो सारे भोग व्यर्थ हैं।

धन मृत्यु को नहीं रोक सकता।

सत्ता मृत्यु को नहीं रोक सकती।

सौंदर्य मृत्यु को नहीं रोक सकता।

केवल आत्मज्ञान ही मनुष्य को भय से मुक्त कर सकता है।


इस मंत्र से मिलने वाली शिक्षाएँ

1. हर चमकती वस्तु मूल्यवान नहीं होती

कई बार आकर्षण हमें सत्य से दूर ले जाते हैं।

2. अस्थायी और स्थायी में भेद करो

जो नष्ट होने वाला है, उसे अंतिम लक्ष्य मत बनाओ।

3. ज्ञान को धन से ऊपर रखो

धन उपयोगी है, लेकिन ज्ञान दिशा देता है।

4. आत्मचिंतन करो

जीवन का उद्देश्य केवल भोग नहीं है।

5. सत्य के लिए त्याग आवश्यक है

नचिकेता ने भोग छोड़े, तभी उसे ब्रह्मविद्या मिली।


निष्कर्ष

कठोपनिषद् का यह मंत्र मानव जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा को प्रकट करता है।

एक ओर संसार के आकर्षण हैं।

दूसरी ओर आत्मज्ञान का मार्ग है।

अधिकांश लोग आकर्षण चुनते हैं, लेकिन नचिकेता ने सत्य चुना।

इसीलिए उसका नाम हजारों वर्षों बाद भी आदर से लिया जाता है।

"जो क्षणिक सुखों को त्यागकर शाश्वत सत्य की खोज करता है, वही वास्तव में बुद्धिमान है।"

"भोग मनुष्य को कुछ समय के लिए प्रसन्न करते हैं, पर आत्मज्ञान उसे सदा के लिए मुक्त कर देता है।"

॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥


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