महाभारत के आठ अध्यायों में से 1 भीष्म पर्व का भाग भगवत गीता है। गीता में भी कुल आठ अध्याय हैं। आठ अध्यायों की कुल श्लोक संख्या 700 है। वेदों का सार अर्थात रूप है उपनिषद और उपनिषदों का सार है गीता। गीता सभी ग्रंथों का हिंदू धर्मग्रंथ है। यह सर्वमान्य हिंदू धर्मग्रंथ है। इसका वेद और उपनिषदों का पोज़ संस्करण भी कहा जा सकता है।
गीता को अर्जुन के अलावा संजय ने सुना और उन्होंने धृतराष्ट्र को पसंद किया। गीता में श्रीकृष्ण ने 57 अर्जुन4 ने 85, संजय ने 40 और धृतराष्ट्र ने 1 श्लोक कहा है। हरियाणा के कुरूक्षेत्र में जब यह ज्ञान दिया गया तब दिनांक एकादशी थी। वफ़ादारी: उस दिन रविवार था। कहते हैं कि उन्हें यह ज्ञान लगभग 45 मिनट तक दिया गया था।
1.पहला अध्याय- अर्जुनविषादयोग।
इस अध्याय में दोनों सेनाओं के प्रधान-प्रधान शूरवीरों की गणना, नक्षत्र और शंख ध्वनि का वर्णन, अर्जुन द्वारा सेना-निरीक्षण का अपने ही बंधुओं-बांधवों को सामने देखकर मोह से विराग हुए और अर्जुन के कैरता, स्नेह शोक संयुक्त वचन है। अर्जुन का कथन है कि यदि मैं अपने ही बंधुओं को विजय भी प्राप्त कर लेता हूँ तो यह मुझे सुख नहीं देता है।
2.दूसरा अध्याय- सांख्ययोग
श्री कृष्ण कहते हैं कि इसमें असमय ये बातें करना नहीं चाहिए, क्योंकि अब तो सामने युद्ध का चित्र ही दिया गया है। अब अगर तुम लड़ोगे नहीं तो मारे जाओगे। अर्जुन हर तरह से युद्ध को खत्म करने की बात कहते हैं तब श्रीकृष्ण कहते हैं कि अब युद्ध से विमुख होना नपुंसकता और कायरता है। इसी चर्चा में श्रीकृष्ण अर्जुन को आत्मा की अमृतता के बारे में बताते हैं और कहते हैं कि आत्मा का कभी वध नहीं किया जा सकता और तू ही मारे जाने का शोक करने की बात कर रहा है वह उसका शरीर है जो आज नहीं तो कल मर जाना है। जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुख को समान समझकर, उसके बाद युद्ध के लिए तैयार हो जाओ। इसी अध्याय में श्रीकृष्ण सांख्ययोग और स्थिरबुद्धि पुरुष के लक्षण का वर्णन है।
3.तीसरा अध्याय- कर्मयोग
ज्ञानयोग और कर्मयोग के अनुसार जीवन में अनासक्त भाव से नियत कर्म करने की श्रेष्ठता का निरूपण किया गया है। इसमें कर्मों का गंभीर विवेचन किया गया है। अज्ञानी और ज्ञानवान के लक्षण और राग-द्वेष से उपयोगी कर्म करने की प्रेरणा की बातें कही गई हैं। इस अध्याय में ही हिंदू धर्म के कर्म के सिद्धांत का उल्लेख लिखा है। इससे यह प्रतीत होता है कि हिन्दू धर्म कर्मवादी धर्म है, भाग्यवादी नहीं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि वास्तव में संपूर्ण कर्म सभी प्रकार से प्रकृति के गुणों से मिलते हैं, जो कार्य और कारण की एक श्रृंखला है।
4.चौथा अध्याय- ज्ञानकर्मसंन्यासयोग।
नाम से है। इसमें ज्ञान, कर्म और संन्यास योग का वर्णन है। सगुण भगवान का प्रभाव और कर्मयोग का विषय, योगी महात्मा पुरुषों के आचरण और उनकी महिमा, फलसहित पृथक-पृथक यज्ञों का कथन और ज्ञान की महिमा का वर्णन किया गया है।
५.पांचवां अध्याय- कर्मसंन्यासयोग
इसमें सांख्ययोग और कर्मयोग का निर्णय, सांख्ययोगी और कर्मयोगी के लक्षण और उनकी महिमा, ज्ञानयोग का विषय और भक्ति सहित ध्यानयोग का वर्णन का वर्णन किया गया है। उपरोक्त सभी योगों के वर्णन में अध्यात्म, ईश्वर, मोक्ष, आत्मा, धर्म नियम आदि का वर्णन है किसी भी प्रकार के युद्ध या युद्ध करने का नहीं।
६.छठा अध्याय- आत्मसंयमयोग
इसमें कर्मयोग का विषय और योगारूढ़ पुरुष के लक्षण, आत्म-उद्धार के लिए प्रेरणा और भगवत्प्राप्त पुरुष के लक्षण, विस्तार से ध्यान योग का वर्णन, मन के निग्रह का विषय, योगभ्रष्ट पुरुष की गति का विषय और ध्यानयोगी की महिमा का वर्णन किया गया है।
७.सातवां अध्याय- ज्ञानविज्ञानयोग
इसमें विज्ञान सहित ज्ञान का विषय, संपूर्ण पदार्थों में कारण रूप से ईश्वर की व्यापकता का कथन, आसुरी स्वभाव वालों की निंदा और भगवद्भक्तों की प्रशंसा, भगवान के प्रभाव और स्वरूप को न जानने वालों की निंदा और जानने वालों की महिमा का वर्णन किया गया है।
८.आठवां अध्याय- अक्षरब्रह्मयोग
इसमें ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादि के विषय में अर्जुन के सात प्रश्न और श्रीकृष्ण के द्वारा दिए गए उनके उत्तर है। भक्ति योग का विषय और शुक्ल एवं कृष्ण मार्ग के रहस्य का वर्णन है।
९. नौवां अध्याय- राजविद्याराजगुह्ययोग
इसमें प्रभावसहित ज्ञान का विषय है। इसमें जगत का ईश्वर से संबंध और प्रकृति तत्वों की चर्चा है। इसमें जगत की उत्पत्ति का विषय, भगवान का तिरस्कार करने वाले आसुरी प्रकृति वालों की निंदा और दैवी प्रकृति वालों के भगवद्भजन का प्रकार, सर्वात्म रूप से प्रभाव सहित भगवान के स्वरूप का वर्णन, सकाम और निष्काम उपासना का फल और निष्काम भगवद् भक्ति की महिमा का वर्णन है।
१०.दसवां अध्याय- विभूतियोग
इसमें भगवान की विभूति और योगशक्ति का कथन तथा उनके जानने का फल, फल और प्रभाव सहित भक्तियोग का कथन, अर्जुन द्वारा भगवान की स्तुति तथा विभूति और योगशक्ति को कहने के लिए प्रार्थना, भगवान द्वारा अपनी विभूतियों और योगशक्ति का वर्णन है। विभूति अर्थात सिद्धियां और शक्तियां।
११.ग्यारहवां अध्याय- विश्वरूपदर्शनयोग
इसमें विश्वरूप के दर्शन हेतु अर्जुन की प्रार्थना, भगवान द्वारा अपने विश्व रूप का वर्णन, संजय द्वारा धृतराष्ट्र के प्रति विश्वरूप का वर्णन, अर्जुन द्वारा भगवान के विश्वरूप का देखा जाना और उनकी स्तुति करना, भगवान द्वारा अपने प्रभाव का वर्णन और अर्जुन को युद्ध के लिए उत्साहित करना, भयभीत हुए अर्जुन द्वारा भगवान की स्तुति और चतुर्भुज रूप का दर्शन कराने के लिए प्रार्थना, भगवान द्वारा अपने विश्वरूप के दर्शन की महिमा का कथन तथा चतुर्भुज और सौम्य रूप का दिखाया जाना, बिना अनन्य भक्ति के चतुर्भुज रूप के दर्शन की दुर्लभता का और फलसहित अनन्य भक्ति का वर्णन है।
१२.बारहवां अध्याय- भक्तियोग
इसमें साकार और निराकार के उपासकों की उत्तमता का निर्णय और भगवत्प्राप्ति के उपाय का वर्णन है और इसमें भगवत्-प्राप्त पुरुषों के लक्षण बताए गए हैं।
१३.तेरहवां अध्याय- क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग
इसमें ज्ञानसहित क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के विषय का वर्णन है और ज्ञानसहित प्रकृति-पुरुष के विषय का विषद वर्णन किया गया है। अर्थात स्थिति, ज्ञान, आत्मा, परमात्मा और पंच तत्वों का रहस्यमयी ज्ञान है।
१४.चौदहवां अध्याय- गुणत्रयविभागयोग
इसमें ज्ञान की महिमा और प्रकृति-पुरुष से जगत् की उत्पत्ति का वर्णन है। सत्, रज, तम- तीनों गुणों का विषय का विषद विवेचन है। इसके अलावा भगवत्प्राप्ति का उपाय और गुणातीत पुरुष के लक्षण बताए गए हैं।
१५.पंद्रहवां अध्याय- पुरुषोत्तमयोग
इसमें संसार को उल्टे वृक्ष की तरह बताकर भगवत्प्राप्ति के उपाय बताए गए हैं। इसमें जीवात्मा के विषय का विषद विवेचन और प्रभाव सहित परमेश्वर के स्वरूप का वर्णन किया गया है और इसमें क्षर, अक्षर, पुरुषोत्तम के विषय के भी विषद वर्णन है।
१६.सोलहवां अध्याय- दैवासुरसम्पद्विभागयोग
इसमें फलसहित दैवी और आसुरी व्यक्ति और संपदा का कथन किया गया है। आसुरी संपदा वालों के लक्षण और उनकी अधोगति का विर्णन भी मिलेगा। इसके अलावा शास्त्रविपरीत आचरणों को त्यागने और शास्त्रानुकूल आचरणों के लिए प्रेरणा दी गई है।
१७.सत्रहवां अध्याय- श्रद्धात्रयविभागयोग
इसमें श्रद्धा का और शास्त्रविपरीत घोर तप करने वालों के विषय का वर्णन है। इसमेंई आहार, यज्ञ, तप और दान के पृथक-पृथक भेद बताए गए हैं। इसके अलावा ॐ तत्सत् के प्रयोग की व्याख्या की गई है।
१८.अठारहवां अध्याय- मोक्षसंन्यासयोग
इसमें त्याग का विषद वर्णन, कर्मों के होने में सांख्यसिद्धांत का कथन, तीनों गुणों के अनुसार ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख के पृथक-पृथक भेद का वर्णन, फल सहित वर्ण धर्म के विषय का वर्णन, ज्ञाननिष्ठा का वर्णन, भक्ति सहित कर्मयोग का विवेचन और अंत में श्रीगीताजी के माहात्म्य का वर्णन है।
आखिर गीता में क्या खास है?
गीता में भक्ति, ज्ञान और कर्म मार्ग की चर्चा की गई है। उसमें यम-नियम और धर्म-कर्म के बारे में भी बताया गया है। गीता ही कहती है कि ब्रह्म (ईश्वर) एक ही है। गीता को बार-बार पढ़ेंगे तो आपके समक्ष इसके ज्ञान का रहस्य खुलता जाएगा। गीता के प्रत्येक शब्द पर एक अलग ग्रंथ लिखा जा सकता है। इसका कोई सा भी अध्याय अन्य अध्याय का रिपिटेशन नहीं है। विषय भले ही एक हो लेकिन प्रत्येक अध्याय में अलग ही तरह का ज्ञान है।
गीता में सृष्टि उत्पत्ति, जीव विकास क्रम, हिन्दू संदेशवाहक क्रम, मानव उत्पत्ति, योग, धर्म-कर्म, ईश्वर, भगवान, देवी-देवता, उपासना, प्रार्थना, यम-नियम, राजनीति, युद्ध, मोक्ष, अंतरिक्ष, आकाश, धरती, संस्कार, वंश, कुल, नीति, अर्थ, पूर्वजन्म, प्रारब्ध, जीवन प्रबंधन, राष्ट्र निर्माण, आत्मा, कर्मसिद्धांत, त्रिगुण की संकल्पना, सभी प्राणियों में मैत्रीभाव आदि सभी की जानकारी है। गीता का मुख्य ज्ञान है कैसे स्थितप्रज्ञ पुरुष बनना, ईश्वर को जानना या मोक्ष प्राप्त करना।
श्रीमद्भगवद्गीता योगेश्वर श्रीकृष्ण की वाणी है। इसके प्रत्येक श्लोक में ज्ञानरूपी प्रकाश है जिसके प्रस्फुटित होते ही अज्ञान का अंधकार नष्ट हो जाता है। ज्ञान-भक्ति-कर्म योग मार्गों की विस्तृत व्याख्या की गई है। इन मार्गों पर चलने से व्यक्ति निश्चित ही परम पद का अधिकारी बन जाता है।
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🕉🙏 विदुर नीति 🕉🙏
🌷अक्रोधेन जयेत्क्रोधमसाधुं साधुना जयेत्।जयेत् कदर्य दानेन सत्येनानृतवादिनम्।।( विदुर नीति ७|७१)
💐 अर्थ:- क्रोधी मनुष्य को प्रेम से जीते, दुष्ट मनुष्य को उपकार से साधुता से, कंजूस व्यक्ति को दान से जीते तथा झूठे व्यक्ति को सत्य से जीते = अपना बनाएं, ये सत्पुर्षो के लक्षण है।
श्रीमद्भगवद्गीता : मानव जीवन का दिव्य मार्गदर्शक
"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥" (गीता 4.7)
श्रीमद्भगवद्गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र के लिए एक कालजयी मार्गदर्शक है। महाभारत के युद्धक्षेत्र में अर्जुन के मोह, शोक और भ्रम को दूर करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण द्वारा दिया गया यह उपदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना हजारों वर्ष पूर्व था।
गीता का मूल संदेश
गीता हमें सिखाती है कि जीवन में परिस्थितियाँ कैसी भी हों, मनुष्य को अपने कर्तव्य से विमुख नहीं होना चाहिए।
"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।" (गीता 2.47)
अर्थात् मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फल पर नहीं। जब व्यक्ति फल की चिंता छोड़कर निष्ठापूर्वक कर्म करता है, तब उसका मन शांत और स्थिर रहता है।
गीता का मनोवैज्ञानिक पक्ष
आज तनाव, चिंता, अवसाद और असफलता का भय मानव जीवन की बड़ी समस्याएँ बन चुके हैं। गीता इन समस्याओं का समाधान आत्मविश्वास, आत्मसंयम और समत्वभाव में बताती है।
"समत्वं योग उच्यते।" (गीता 2.48)
सफलता और असफलता, लाभ और हानि, सुख और दुःख—इन सभी परिस्थितियों में संतुलित रहना ही योग है।
व्यक्तित्व निर्माण की शिक्षा
गीता व्यक्ति को तीन महान गुण प्रदान करती है—
- कर्तव्यनिष्ठा
- आत्मविश्वास
- आत्मसंयम
जो व्यक्ति इन गुणों को अपनाता है, वह विपरीत परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होता।
राष्ट्र और समाज के लिए गीता
गीता केवल व्यक्तिगत उत्थान की नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के निर्माण की भी प्रेरणा देती है। जब नागरिक अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं, तब समाज में व्यवस्था, न्याय और समृद्धि स्थापित होती है।
आज की आवश्यकता
आज विज्ञान ने संसार को सुविधाएँ तो दी हैं, परन्तु मन की शांति नहीं। गीता बाहरी प्रगति के साथ-साथ आंतरिक विकास का मार्ग दिखाती है। यह हमें सिखाती है कि सच्ची विजय दूसरों पर नहीं, बल्कि स्वयं पर विजय प्राप्त करने में है।
निष्कर्ष
श्रीमद्भगवद्गीता मानवता की अमूल्य धरोहर है। यह हमें कर्म, ज्ञान, भक्ति और आत्मानुशासन का संतुलित मार्ग प्रदान करती है। जो व्यक्ति गीता के सिद्धांतों को अपने जीवन में उतार लेता है, वह कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सही निर्णय लेने की क्षमता प्राप्त कर लेता है।
"गीता केवल पढ़ने का ग्रंथ नहीं, बल्कि जीने की कला है।"
🙏 जय श्रीकृष्ण।
जय श्रीमद्भगवद्गीता। 📖✨

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