ओ३म् अहानि शं भवन्तु न: शं रात्री: प्रतिधीयताम् ।शं न इन्द्राग्नी भवतामवोभि: शं न इन्द्रावरूणा रातहव्या। शं न इन्द्रापूषणा वाजसातौ शमिन्द्रासोमा सुविताय शं यो:।(यजुर्वेद ३६|११)
अर्थ :- हे ईश्वर ! दिन हमें सुखकारी हो, रातें शान्ति देने वाली हों, विद्युत् वा अग्नि रक्षक सामग्री सहित सुखकारक हो, विद्युत् व जल के ग्रहण करने योग्य सुख हमें शान्ति दायक हो, विद्युत् और पृथ्वी हमारे लिए अन्नो के सेवनार्थ सुखदायी हों तथा विद्युत् और उत्तम् औषधियां रोगनाशक एवं भय निवर्तक हों, ऐसी कृपा करो ।
ओ३म् शं नो अग्निर्ज्योतिर्निको अस्तु शं नो मित्रावरूणवश्विना शमशं न: सुकृतां सुकृतानि सन्तु शं न इशिरो अभि वतु वात:। (ऋग्वेद 7|35|4)
अर्थ :- ज्योतियों के सुकर्म हमें शांति प्रदान करने वाले हो, दिन और रात हमें शांति देने वाले हो, सूर्य और चन्द्रमा हमें शांति देने वाले हो, धर्मात्माओं के सुकर्म हमें शांति कारक हो, ज्योतिर्विज्ञान हमारे लिए सब ओर से शांति देने वाले हो।
ओ3म् शं नो धाता शमु धृत नो अस्तु श न उरुचि भवतु स्वधाभि:। शं रोदसि बृहति शं नो अदृ: शं नो देवानां सुहावनि सन्तु। (ऋग्वेद 7|35|3)
अर्थ:- सबका संरक्षण तथा धारण करने वाले हारा भगवान हमारे लिए शांति प्रदान करने वाले हो, पृथ्वी अमृतमय अनादि भिक्षुओं के साथ शांति प्रदान करने वाले हो, व्यापक अंतरिक्ष एवं भूमि हमारे लिए शांति प्रदान करने वाले हो, हो मेघ व हमें शांति प्रदान करने वाले हो तथा देवों-विद्वानों के सुंदर स्तुति ज्ञान हमारे लिए शांति प्रदान करने वाले हो।
ओ३म् शि॒वो भू॒त्व मह्य॑मग्ने॒ऽअथो॑ सीद् शिववस्त्वम्। शिवाः कृत्वा दिशाः सर्वः॒ स्वं योनि॑मि॒हास॑दः॥17॥
भावार्थ - राजा को अपने धर्मात्मा होके पेज के उपदेशों से धार्मिक कर और न्याय की गद्दी पर बैठ कर धार्मिक न्याय करना चाहिए॥17॥
ओ३म् एकयास्तुवत प्रजाऽ अधीयन्त प्रजापतिरधिपतिरासीत्।
तिसृभिरस्तुवत ब्रह्मासृज्यत ब्रह्मणस्पतिरधिपतिरासीत्।
पञ्चभिरस्तुवत भूतान्यसृज्यन्त भूतानां पतिरधिपतिरासीत्।
सप्तभिरस्तुवत सप्तऽ ऋषयोऽसृज्यन्त धाताधिपतिरासीत्॥ यजुर्वेद १४-२८॥
अर्थ :- इस ब्रह्मांड के निर्माता ईश्वर है। वो ही तो है जिन्होंने हमारी आत्मा को मनुष्य शरीर दिया है। उनकी स्तुति एक वाणी से करे। उन्होंने हमारे जीवन को चलाने और मुक्ति प्राप्त करने के लिए सर्वश्रेष्ठ ज्ञान, वेद दिये। उस ईश्वर ने पांच महाभूत- पृथ्वी, जल, तेज, वायु आकाश बनाऐ। जिससे समस्त प्रकृति का निर्माण हुआ। मानव शरीर भी प्रकृति का एक अंश है। हमें उसकी स्तुति पांच (शरीर, मन, बुद्धि, स्मृति, चेतना) से करनी चाहिए। ईश्वर ने सप्त ऋषय - दो कान, दो नासिका, दो आंख और एक मुख बनाए। इन सप्त ऋषय से भूतों का मनुष्य ज्ञान प्राप्त करे और उनमें उस रचीयता के महत्व के दर्शन करे। वह सब को धारण करने वाला है। वह सब का स्वामी है ।हमें उसकी स्तुति करनी चाहिये।
ओ३म् स पर्य्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्। कवि-मनीषी परिभू: स्वयम्भूर्याथ्यातथ्यतोऽर्थान व्यदधाच्छाश्वतीभ्य: समाभ्य: ।। ( यजुर्वेद ४०\८ )
हे मनुष्यों ! यदि अनन्त शक्तिशाली, अजन्मा, अखण्ड, सदा से मुक्त, न्यायकारी, पापरहित, सर्वज्ञ, सब का द्रष्टा , नियन्ता और अनादिस्वरूप वाला ब्रह्म सृष्टि के आदि मे स्वयं प्रोक्त वेदों के द्वारा शब्द, अर्थ और सम्बन्ध को बनाने वाली विधा का उपदेश न करें तो कोई भी विद्वान न बन सके; और न धर्म, अर्थ, काम , मोक्ष के फल को प्राप्त कर सके। इस लिए इस ब्रह्म की उपासना सदा करों ।
ओ३म् आ नो भद्रा: क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद् भिद:। देवा नो यथा सदमिदवृधेऽअसन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवे दिवे। ( यजुर्वेद २५.१४ )
अर्थ:- हे ईश्वर ! हमारे शुद्ध विचार तथा उत्तम श्रेष्ठ कर्म निर्विध्न सम्पन्न होते रहें।सर्वोत्तम विद्वद्- जन हमारी सभा में सर्वदा हमारी वृद्धि और रक्षा के लिए प्रतिदिन बने रहें ।
ओ३म् सन: पितेव सूनवेऽग्ने सूपायनो भव। सचस्वा न स्वस्तये।।( ऋग्वेद १.९ )
अर्थ:- हे ज्ञानस्वरूप परमेश्वर ! जैसे पुत्र के लिए पिता वैसे आप हमारे लिए उत्तम ज्ञान और सुख देने वाले हैं। आप हम लोगों को कल्याण के लिए सदा युक्त करें।
ओ३म् यो रेवान् यो अमीवहा वसुवित्पुष्टिवर्द्धनः । स नः सिषक्तु यस्तुरः ।। ( यजुर्वेद ३. २९ )
अर्थ :- जो इस संसार में धन है सो सब जगदीश्वर का ही है । मनुष्य लोग जैसी परमेश्वर की प्रार्थना करें, वैसा ही उनको पुरुषार्थ भी करना चाहिए । जैसे विद्या आदि धनवाला परमेश्वर है ऐसा विशेषण ईश्वर का कह वा सुनकर मनुष्य कृतकृत्य अर्थात् विद्या आदि धनवाला नहीं हो सकता, किन्तु अपने पुरुषार्थ से विद्या आदि धन की वृद्धि वा रक्षा निरन्तर करनी चाहिए जैसे परमेश्वर अविद्या आदि रोगों को दूर करनेवाला है, वैसे मनुष्यों को भी उचित है कि आप भी अविद्या आदि रोगों को निरन्तर दूर करें । जैसे वह वस्तुओं को यथावत् जानता है, वैसे मनुष्यों को भी उचित है की अपने सामर्थ्य के अनुसार सब पदार्थ-विद्याओं को यथावत् जानें जैसे वह सबकी पुष्टि को बढ़ाता है, वैसे मनुष्य को भी सबके पुष्टि आदि गुणों को निरन्तर बढ़ावें । जैसे वह अच्छे-अच्छे कार्यों को बनाने में शीघ्रता करता है, वैसे मनुष्य भी उत्तम-उत्तम कार्यों को त्वरा से करें और जैसे हम लोग उस परमेश्वर की उत्तम कर्मों के लिए प्रार्थना निरन्तर करते हैं, वैसे परमेश्वर भी हम सब मनुष्यों को उत्तम पुरुषार्थ से उत्तम-उत्तम गुण वा कर्मों के आचरण के साथ निरन्तर संयुक्त करें ।
ओ३म् स न: पितेव सूनवेऽग्ने सूपायनो भव । सचस्वा न: स्वस्तये । (ऋग्वेद १।१।९ )
अर्थ:- हे ज्ञानस्वरूप परमेश्वर! जैसे पुत्र के लिए पिता वैसे आप हमारे लिए उत्तम् ज्ञान और सुख देने वाले हैं । आप हम लोगों को कल्याण के लिए सदा युक्त करें ।
ओ३म् मनो न्वाह्वामहे नाराशँसेन स्तोमेन । पितृणां च मन्मभिः ।। ( यजुर्वेद. ३।५३ )
अर्थ :- मनुष्यों को मनुष्यपन की सफलता के लिए विद्या आदि गुणों से युक्त मन को करना चाहिए । जैसे ऋतु अपने-अपने गुणों को क्रम-क्रम से प्रकाशित करते हैं तथा जैसे विद्वान लोग क्रम-क्रम से अनेक प्रकार की अन्य-अन्य विद्याओं का साक्षात्कार करते हैं, वैसा ही पुरुषार्थ करके सब मनुष्यों को निरन्तर विद्या और प्रकाश की प्राप्ति करनी चाहिए ।
ओ३म् तरणिरित्सिषासति वाजं पुरंध्या युजा। आ व इन्द्रं पुरुहूतं नमे गिरा नेमिं तष्टेव सुद्र्वम्॥ ऋग्वेद( ७।३२।२० )
अर्थ ;- एक व्यक्ति अपने सत्य कर्म और उपासना से ज्ञान और स्थिर मन प्राप्त करने के लिए दयालु परमात्मा को अपनी तरफ झुका लेता है। जैसे बढ़ई सख्त लकड़ी को मोड़ कर पहिए का निर्माण कर लेता है। फिर वह व्यक्ति उस ज्ञान को उनको भी वितरित करता है जो उसके लिए योग्य है।
ओ३म् उद्यानं ते पुरुष नावयानं जीवातुं ते दक्षतातिं कृणोमि। आ हि रोहेमममृतं सुखं रथमथ जिविर्विदथमा वदासि।( अथर्ववेद ८।१।६ )
अर्थ :- हे जीव ! तेरा उत्थान ही उत्थान हो ; पतन कभी न हो, तेरा जीवन बल से युक्त रहे, इस शरीररुपी अमृतयुक्त सुखकारी रथ पर चढ कर धर्म अर्थ काम व मोक्ष के लिये पुरुषार्थ कर । इस शरीर के जीर्ण होने पर अर्थात बुढ़ापे में भी इसी प्रकार पुरुषार्थ व ज्ञान का प्रचार प्रसार करता रहें ।
ओ३म् तदेजति तन्नैजति ददूदूरे तद्न्तिके । तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्रात:( यजुर्वेद ४०।५)
अर्थ :- हे मनुष्यों ! वह ब्रह्म चलता सा है, ऐसा मूढ़ मानते हैं, वह व्यापक होने से अपने स्वरूप से कभी भी चलायमान नही होता । जो लोग उसकी आज्ञा के विरुद्ध आचरण करते हैं, वे उसकी प्राप्ति के लिए इधर-उधर भागते हुए भी उसको नहीं जान सकते, और जो ईश्वर की आज्ञा के अनुसार आचरण करते हैं, वे अति निकट अपनी आत्मा में स्थित ब्रह्म को प्राप्त कर लेते है । जो ब्रह्म सब प्रकृति आदि के बाहर और भीतर के अवयवों में व्यापक होकर सब जीवों के अन्तर्यामी रूप से सब पाप और पुण्य कर्मों को जानता हुआ ठीक- ठाक फल प्रदान करता है, अत: इसी ब्रह्म का ही सबको ध्यान ( उपासना) करनी चाहिए और इसी से सबको डरना चाहिए ।
ओ३म् स्वस्ति न: पथ्यासु धन्वसु स्वस्त्यप्सु वृजने स्वर्वति।
स्वस्ति न: पुत्रकथेषु योनिषु स्वस्ति राये मरूतो दधातन ( ऋग्वेद। १०। ६३।१५।)
अर्थ:- हे जगदीश! हमें ऐसे सन्मार्ग पर चलाओ कि आपकी कृपा से हम जल वाले स्थानों वा मरुस्थलों में, लाभदायक संग्रामो में, पुत्रों के कर्मों से युक्त घरों में, भोज्य, धनादि की प्राप्ति में सफलता-सुख प्राप्त करे।
ओ३म् अरिष्ट:स मर्तो विश्व एधते प्र प्रजाभिर्जायते धर्मणस्परि। यमादित्यासो नयथा सुनोतिभिरति विश्वानि दुरिता स्वस्तये ( ॠग्वेद)
हे आदित्य ब्रह्मचारियो, जिस मनुष्य को आप सुन्दर मार्ग पर ले जाते हो , वह मनुष्य-समूह किसी से पीड़ित न होता हुआ संसार में उन्नति करता है और धर्म पालन करता हुआ प्रजाओं , पुत्र-पौत्रादि से फलता वा फूलता है।

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