🔥मानव समाज के साथ व्यवहार करने वाला
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आध्यात्मिक पथ पर चलने वाले व्यक्ति को चार प्रकार के अनुयायियों के साथ इन चार प्रकारों का व्यवहार करना चाहिए। जिससे मन आकर्षक रहता है और सबसे प्यारा मन शीघ्र एकाग्र हो जाता है। मन के एकाग्र से ध्यान लगाया जाता है। ध्यान पर समाधिस्थ रहने से समाधि की अवस्था प्राप्त होती है।
समाज में जो मनुष्य सुख और सुख के शिक्षक से स्नातक है, उसके साथ मित्रता का व्यवहार करना चाहिए। मित्रता का व्यवहार करने से मन आकर्षित होता है तथा सुख साधन मनुष्य का प्रति द्वेष नहीं होता। यदि उसके साथ मित्रता का व्यवहार न हो तो तृष्णा - द्वेष हो सकता है, क्योंकि मन में हलचल पैदा हो जाएगी जिससे मन एकाग्र नहीं होगा। इसलिए सुखी मनुष्य के साथ मित्रता का व्यवहार करना चाहिए।
अन्य प्रकार के दु:खी और साधन में प्रयोग के साथ चिकित्सा का व्यवहार करना चाहिए। ऐसा करने से परोपकार की भावना पैदा होती है। दु:खी मनुष्य के दु:खों को दूर करने से और सुख सलाह से आनंद की भावना होती है और परोपकार करने से मन निर्मल हो जाता है।
इसके विपरीत जब मनुष्य दु:खियों की सहायता नहीं करता है तो उसका मन कठोर और घृणा से भरा होता है, ऐसा मन एकाग्र की स्थिति में नहीं आता है। इसलिए दु:खियों पर दया की भावना रखनी चाहिए।
तीसरे प्रकार के विद्वान, धार्मिक, महात्मा उपदेश के साथ हर्ष की भावना रूपी व्यवहार करना चाहिए यानी उन्हें देखकर हर्ष महसूस करना चाहिए। यदि महान चित्रों के साथ हर्ष का व्यवहार न किया जाए तो उनका द्वेष हो सकता है और द्वेष से दु:ख उत्पन्न होता है तथा दु:ख से अप्रसन्नता उत्पन्न होगी जिससे मन एकाग्र नहीं हो सकता। इसलिए महात्माओं और तपस्वियों के साथ आनंद और हर्ष की भावना उत्पन्न होनी चाहिए।
चौथे प्रकार के अत्याचारी, अधर्मी संप्रदाय के साथ अदृश्य का व्यवहार करना चाहिए। उनका प्रति न राग करना चाहिए और न द्वेष करना चाहिए अर्थात उनके साथ न मित्रता का व्यवहार करना चाहिए और न शत्रुता का व्यवहार करना चाहिए।
मूल रूप से सुखी मनुष्य में मित्रता की भावना करने से, दु:खी प्रार्थना में दया की भावना करने से, धार्मिक मनुष्य में मित्रता की भावना करने से और पापियों में दृष्टि की भावना करने से चित्त के राग, द्वेष, घृणा, ईष्या और क्रोध आदि मेलों का नाश चित्त शुद्ध-निर्मल हो जाता है। मानव समाज में इस प्रकार से निवास करते हुए आध्यात्मिक प्रगति में सफलता मिलती है।
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🕉️🚩आज का वेद मंत्र 🚩🕉️
🔥ओ3म् इयं ते यज्ञिया तनूरपो मुञ्चामि न प्रजाम्। अह्होमुचः स्वाहाकृताः पृथिवीमाविषात् पृथिव्या संभाव्य।। (यजुर्वेद 4\13
💐 अर्थ :- उपदेश दिया जाना चाहिए कि विद्या से नशे का मेल और सेवन कर रोगग्रस्त शरीर तथा आत्मा की रक्षा करके सुखी होना चाहिए।
मंत्र
ॐ इयं ते यज्ञिया तनूरपो मुञ्चामि न प्रजाम्।अहोमुचः स्वाहाकृताः पृथिवीमाविशत् पृथिव्या सम्भव॥(यजुर्वेद 4.13)
शब्दार्थ
- इयम् — यह।
- ते — तेरी, तुम्हारी।
- यज्ञिया तनूः — यज्ञ के योग्य देह, पवित्र शरीर।
- अपः — दोष, अशुद्धियाँ; अथवा जल।
- मुञ्चामि — मैं मुक्त करता हूँ, छुड़ाता हूँ।
- न — नहीं।
- प्रजाम् — सन्तान, वंश, समाज।
- स्वाहाकृताः — स्वाहा के साथ समर्पित आहुतियाँ।
- पृथिवीम् आविशत् — पृथ्वी में प्रवेश करें।
- पृथिव्या सम्भव — पृथ्वी से उत्पन्न हो, पृथ्वी में ही स्थित हो।
भावार्थ
हे मनुष्य! यह शरीर यज्ञ, सत्कर्म और लोककल्याण के लिए प्राप्त हुआ है। इसे पाप, अशुद्धियों और दुर्व्यसनों से मुक्त करो, न कि अपनी सन्तान, समाज या जीवन के कर्तव्यों से। यज्ञ में समर्पित आहुतियाँ प्रकृति के चक्र में सम्मिलित होकर पृथ्वी और समस्त जीवन के पोषण का कारण बनें।
वैदिक विवेचन
यह मंत्र यज्ञ के माध्यम से शारीरिक, मानसिक और पर्यावरणीय शुद्धि का संदेश देता है।
- "यज्ञिया तनूः" का तात्पर्य है कि मनुष्य का शरीर केवल भोग के लिए नहीं, बल्कि धर्म, सेवा, ज्ञान और परोपकार के लिए बना है।
- "अपो मुञ्चामि" का संकेत है कि मनुष्य अपने भीतर के दोष—काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार और आलस्य—का त्याग करे।
- "स्वाहाकृताः" यह दर्शाता है कि यज्ञ में किया गया प्रत्येक समर्पण त्याग, अनुशासन और लोकमंगल की भावना का प्रतीक है।
- "पृथिवीमाविशत्" से यह शिक्षा मिलती है कि प्रकृति से प्राप्त पदार्थ अंततः प्रकृति में ही लौटते हैं; इसलिए उनका उपयोग संतुलित और उत्तरदायित्वपूर्ण होना चाहिए।
जीवनोपयोगी शिक्षा
- अपने शरीर को ईश्वर की अमूल्य धरोहर मानकर स्वस्थ और पवित्र रखें।
- जीवन का उद्देश्य केवल उपभोग नहीं, बल्कि सेवा, यज्ञ और समाज का कल्याण भी है।
- अपने भीतर के दोषों का त्याग कर सद्गुणों का विकास करें।
- प्रकृति का संरक्षण करें और पर्यावरण के प्रति उत्तरदायी बनें।
निष्कर्ष
यह मंत्र मनुष्य को स्मरण कराता है कि उसका शरीर यज्ञमय जीवन के लिए है। जब हम अपने जीवन को शुद्ध विचार, श्रेष्ठ कर्म, त्याग, सेवा और प्रकृति के सम्मान से जोड़ते हैं, तब हमारा प्रत्येक कर्म यज्ञ बन जाता है। यही वैदिक जीवन-दृष्टि का सार है।

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