अतिथि को भारतीय संस्कृति में माता, पिता और गुरू के पश्चात चौथा महान देवता माना गया है।

 


 🔥 अतिथि को भारतीय संस्कृति में माता, पिता और गुरू के पश्चात चौथा महान देवता माना गया है। यों तो घात लगाकर आने वाले चोर, ठग और अपराधी प्रवृत्ति के लोग भी अतिथि होने का वैसा प्रयत्न कर सकते हैं जैसा कि रावण ने सीता को अतिथि के नाम पर ही ठग लिया था। वस्तुतः अतिथि से तात्पर्य उन उदार आत्माओं से है जो कृपापूर्वक स्वयं कष्ट उठाकर किसी के यहां आते हैं और उसे सहयोग अनुदान से लाभान्वित करते हैं। प्राचीनकाल में उदारमना संत ऐसा ही अनुग्रह करने गृहस्थों के यहां पधारते थे और अपने पुण्य प्रभाव से उनको सुखी व समुन्नत बनाने का प्रयास करते थे। ऐसे श्रेष्ठ मानवों का, अतिथियों का देवोपम सत्कार किया जाना उचित भी है और आवश्यक भी है। शास्त्रों ने इसी से अतिथि को देवता मानने और उसका समुचित सम्मान करने का निर्देश दिया है। 'अतिथि देवो भव'।

  वैदिक धर्म में पंच-यज्ञो का बडा महत्व है और अतिथि यज्ञ भी हमारा एक दैनिक कर्तव्य है। जब भी हमारे घर पर कोई ऐसा व्यक्ति आ जाए जो वेदादि शास्त्रों का विद्वान हो, जिसने अपना जीवन संसार के कल्याण में लगा दिया हो, तो हमें भोजन, वस्त्रादि से उसका सत्कार करना चाहिए। साथ ही यदि कोई दीन, दुखी असहाय और अनाथ प्राणी द्वार पर आ जाए या कहीं भी मिल जाए तो हर प्रकार से उसकी सहायता करना भी अतिथि सेवा है।

  प्राचीनकाल में अतिथि को भोजन कराकर ही गृहस्थ भोजन ग्रहण करते थे। जिस दिन कोई अतिथि न मिले तो अपने को भाग्यहीन समझते थे। हमें भी अपने हृदय में ऐसी ही भावना रखनी चाहिए। अतिथि को खिलाया हुआ भोजन व्यर्थ नहीं जाता। हमारे अन्न से शक्ति पाकर कोई देश और जाति का उद्धार करता है और किसी के प्राणों की रक्षा होती है- यह स्वयं ही महत्वपूर्ण है। जिस घर से अतिथि निराश लौट जाता है उसकी अपकीर्ति होती है। कभी भी अतिथि को निराश नहीं लौटने देना चाहिए। पर दुष्टों और मक्कारों से सावधान रहना भी आवश्यक है।

   आजकल तो बस यार दोस्तों की, मेहमानों की, सरकारी कर्मचारियों आदि की जमकर खातिर की जाती है क्योंकि इससे उन्हे लाभ पहुंचने की संभावना रहती है। बहाना कुछ भी हो सकता है, बच्चों का जन्म दिन, विवाह, परीक्षा में पास होना आदि। लोगों को आग्रहपूर्वक बुलाकर हर प्रकार से उनके खाने पीने की व्यवस्था की जाती है। यही नहीं सुरा सुंदरी का सरंजाम भी जुटाया जाता है। क्या इसे अतिथि सत्कार कहा जा सकता है? क्या यह लेन देन नहीं है कि अमुक ने अपने बच्चों के जन्म दिन पर दावत की थी तो हम भी उससे ऊंचा आयोजन करें? क्या यह विशुद्ध व्यापार नहीं है कि दावत में कुछ व्यय करके उससे असंख्य गुना कमाने का मार्ग सुनिश्चित हो रहा है? क्या यह उच्च अधिकारियों को रिश्वत देकर अपना काम निकालने का साधन नहीं है? हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इस प्रकार एक व्यक्ति के भोजन आदि पर जो व्यय होता है, उतने में दस-बीस-पचास असहाय व्यक्तियों की सहायता की जा सकती है जिन्हे इसकी सचमुच आवश्यकता है। यही असली पुण्य कर्म है।

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🕉️🚩 आज का वेद मंत्र 🚩🕉️

🌷 ओ३म् उपप्रयन्तो अध्वरं मन्त्रं वोचेमाग्नये ।आरे अस्मे च शृण्वते ।।( यजुर्वेद ३:११ )

    💐  अर्थ  :- मनुष्यों को वेदमन्त्रों के साथ ईश्वर की स्तुति वा यज्ञ के अनुष्ठान को करके जो ईश्वर भीतर बाहर सब जगह व्याप्त होकर सब व्यवहारों को सुनता वा जानता हुआ वर्त्तमान है, इस कारण उससे भय मानकर अधर्म करने की इच्छा भी न करनी चाहिए । जब मनुष्य परमात्मा को जानता है, तब समीपस्थ और जब नहीं जानता तब दूरस्थ है, ऐसा निश्चय जानना चाहिए ।

यजुर्वेद 3.11 मंत्र की व्याख्या

ॐ उपप्रयन्तो अध्वरं मन्त्रं वोचेमाग्नये।
आरे अस्मे च शृण्वते॥
— यजुर्वेद 3.11

शब्दार्थ

  • उपप्रयन्तः — समीप आते हुए, श्रद्धापूर्वक आगे बढ़ते हुए।
  • अध्वरम् — यज्ञ; ऐसा श्रेष्ठ कर्म जिसमें हिंसा, छल और द्वेष न हो।
  • मन्त्रम् — पवित्र वाणी, ज्ञानयुक्त प्रार्थना।
  • वोचेम — हम बोलें, उच्चारण करें।
  • अग्नये — अग्नि के लिए; अर्थात् ज्ञान, प्रकाश और परमात्मा के उद्देश्य से।
  • आरे — दूर।
  • अस्मे — हमसे।
  • — और।
  • शृण्वते — सुनने वाले के लिए, जो हमारी प्रार्थना को ग्रहण करता है।

भावार्थ

हम श्रद्धा और विनम्रता के साथ यज्ञ तथा श्रेष्ठ कर्मों के समीप आएँ और ज्ञानस्वरूप अग्नि (परमात्मा) के लिए पवित्र मंत्रों का उच्चारण करें। वह हमारी प्रार्थना को स्वीकार करे तथा हमारे जीवन से अज्ञान, पाप और दुःख को दूर करे।

वैदिक विवेचन

यह मंत्र बताता है कि यज्ञ केवल अग्नि में आहुति डालने का नाम नहीं, बल्कि श्रद्धा, ज्ञान और सत्कर्म से युक्त जीवन का नाम है।

  • "उपप्रयन्तः" का तात्पर्य है कि ईश्वर-उपासना और यज्ञ के लिए मन, वचन और कर्म से तैयार होकर आगे बढ़ना चाहिए।
  • "अध्वर" का शाब्दिक अर्थ है—हिंसा रहित कर्म। इसलिए वैदिक यज्ञ का उद्देश्य लोककल्याण, पर्यावरण की शुद्धि, आत्मशुद्धि और समाज में सद्भाव स्थापित करना है।
  • "मन्त्रं वोचेम" से शिक्षा मिलती है कि मंत्रों का उच्चारण केवल परंपरा निभाने के लिए नहीं, बल्कि उनके अर्थ को समझकर, श्रद्धा और एकाग्रता के साथ करना चाहिए।
  • "अग्नि" यहाँ ज्ञान, प्रकाश, ऊर्जा और परमात्मा के दिव्य गुणों का प्रतीक है। ज्ञानरूपी अग्नि ही अज्ञानरूपी अंधकार को दूर करती है।

जीवनोपयोगी शिक्षा

  • प्रत्येक शुभ कार्य श्रद्धा और शुद्ध भावना से प्रारंभ करें।
  • मंत्रों का केवल पाठ ही नहीं, उनके अर्थ को भी जीवन में उतारें।
  • अपने जीवन को यज्ञमय बनाएँ—अर्थात् सेवा, त्याग और परोपकार से युक्त रखें।
  • ज्ञान को अपनाकर अज्ञान, भय और बुराइयों को दूर करें।
  • ईश्वर की उपासना के साथ-साथ समाज के हित में कार्य करना ही सच्चा वैदिक धर्म है।

निष्कर्ष

यह मंत्र हमें प्रेरणा देता है कि हम ज्ञान, श्रद्धा और पवित्र भाव से यज्ञमय जीवन अपनाएँ। जब हमारी वाणी मंत्रमय, कर्म यज्ञमय और विचार शुद्ध होते हैं, तब हमारा जीवन स्वयं प्रकाश का स्रोत बन जाता है। यही वेद का संदेश है—श्रेष्ठ विचार, श्रेष्ठ कर्म और ईश्वर के प्रति समर्पण।


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