प्राणायाम शिक्षा! मन की दिव्य शक्ति पर वैदिक चिंतन

 

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 🚩 ‼️ ओ3म् ‼️🚩

🔥प्राणायाम शिक्षा!!!

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   प्राणायाम का महत्व, विधि, प्रकार और लाभ।

   प्राणायाम अभ्यास का विषय है, ईश्वर का साक्षात्कार है।

     महर्षि दयानन्द सरस्वती जी रचित अमर ग्रन्थ 'सत्यार्थ प्रकाश' आर्ष ग्रन्थों के प्रमाण सहित अनेक विद्याओं का अतुल्य भण्डार है।

   उसी भंडारे से आज हम "प्राणायाम शिक्षा" पर प्रकाश डाल रहे हैं | आशा है कि आप ईश्वर के साक्षात् मार्ग में प्राणायाम करेंगे...

   योगशास्त्र सूत्र 2/28 में प्राणायाम का महत्व बताया गया है कि महर्षि पतंजलि का निर्माण कैसे होता है...

   "जब मनुष्य प्राणायाम करता है तब प्रतिक्षण उत्तरोत्तर काल में शक्ति का नाश और ज्ञान का प्रकाश होता है | जब तक मुक्ति नहीं होती तब तक उसकी आत्मा का ज्ञान बराबर बढ़ जाता है |"

   वहीं महर्षि मनुमहाराज मनुस्मृति 6/71 में निहित हैं...

   "जैसे अंगी में तपाने से सुवर्णादि कक्षों के मल नष्ट शुद्ध हो जाते हैं, वैसे ही प्राणायाम करके मन आदि इंद्रियों के दोष क्षणिका निर्मल हो जाते हैं।

  प्राणायाम की विधि के संबंध में महर्षि पतंजलि योगशास्त्र 1/34 में बताया गया है कि...

  जैसे भारी वेग से वामन अन्न बाहर निकलता है, वैसे ही प्राण को बाहर खींचता है, वैसे ही बलशक्ति रोक देवे। जब बाहर की ओर झुकना, तब मूलेन्द्रिय को ऊपर की ओर खींचना, वायु को बाहर की ओर फेंकना। जब तक मूलेन्द्रिया को ऊपर खींचा जाए, तब तक प्राण बाहर रहता है।

  इस प्रकार प्राण बाहर अधिक क्षेत्र हो सकते हैं। जब चिंता हो तब धीरे-धीरे हवा के अंदर लेके फिर भी कल्पना ही हो जाए, धीरे-धीरे-धीरे-धीरे हवा के अंदर इच्छा हो जाए। और मन में 'ओ3म्' का जप होता है। इस प्रकार करने से आत्मा और मन की पवित्रता और स्थिरता होती है।

  प्राणायाम के प्रकार:~~~

  एक 'बह्यविषय' का अर्थ है बाहर ही प्राण को अधिक लाभ।

  दूसरा 'अभ्यन्तर' अर्थात इसके अंदर देखें प्राण छोड़ें, किश्ते रोकें।

  तीसरा 'स्तंभप्रवृत्ति' अर्थात एक ही युद्ध जहां-का-तहां प्राण को यथाशक्ति लाभ।

   चौथा 'बाह्याभ्यन्तराक्षेपी' अर्थात् जब प्राण बाहर की ओर आवे, तब उसके विरुद्ध, जहाँ से न पहुँचे।

  प्राणायाम के लाभ:~~~

  पुरुषों के शरीर में वीर्य वृद्धि को बल प्राप्त होता है, स्थिर बल, माप, स्क्रिबिएटा, सभी सिद्धांतों को शीघ्र ही ग्रहण किया जाता है।

  प्राणायाम सभी जात मजहब देश आदि से परे शुद्ध स्वरूप भगवान के दर्शन का मार्ग मूल रूप से सार्वभौमिक है।

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🕉️🚩आज का वेद मंत्र 🕉️🚩

🌷ओ३म् यस्मिन्नृच: साम यजु शि यस्मिन प्रतिष्ठित रथनाभविरा:। यस्मिंशचित सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मन: शिवसद्कल्पमस्तु (यजुर्वेद 34|5)

💐अर्थ :- हे परमदेव परमात्मान ! आपकी प्रार्थना से मेरे मन में रथों के मध्य धुरे में होते हैं, वैसे ही ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और गूढ़ तत्वों से अथर्ववेद भी प्रतिष्ठित होते हैं जिनमें सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, प्रजा का साक्षी चेतन परमात्मा विदित होता है, वह मेरे मन में अविद्या का त्याग कर सदा प्रिय विद्या बन रहे हैं। 

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यजुर्वेद 34.5 : मन की दिव्य शक्ति पर वैदिक चिंतन

मंत्र:

ॐ यस्मिन्नृचः साम यजूंषि यस्मिन् प्रतिष्ठिता रथनाभाविवारा:।
यस्मिंश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥ (यजुर्वेद 34.5)

भावार्थ

जिस मन में ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद के समस्त ज्ञान प्रतिष्ठित हैं, जिस प्रकार रथ के पहिये की सभी तीलियाँ नाभि में स्थित रहती हैं, उसी प्रकार सभी प्राणियों के चित्त, विचार और कर्म जिस मन में जुड़े हुए हैं, वह मेरा मन कल्याणकारी संकल्पों वाला हो।


मन: ज्ञान का केंद्र

वेद कहता है कि मन केवल सोचने का उपकरण नहीं, बल्कि समस्त ज्ञान, विवेक और चेतना का केंद्र है। जैसे रथ की नाभि के बिना पहिया नहीं चल सकता, वैसे ही मन के बिना ज्ञान, कर्म और जीवन की कोई दिशा नहीं हो सकती।

ऋग्वेद ज्ञान देता है, यजुर्वेद कर्म की प्रेरणा देता है और सामवेद जीवन में मधुरता एवं सामंजस्य लाता है। इन तीनों का आधार मन है। यदि मन शुद्ध और संयमित है तो ज्ञान भी सही दिशा में कार्य करता है।


वैज्ञानिक दृष्टिकोण

आधुनिक न्यूरोसाइंस बताती है कि मानव मस्तिष्क अरबों न्यूरॉन्स का विशाल नेटवर्क है। हमारी स्मृति, निर्णय क्षमता, भावनाएँ और व्यवहार इसी नेटवर्क पर आधारित हैं।

अनुसंधानों से सिद्ध हुआ है कि सकारात्मक चिंतन, ध्यान (Meditation) और श्रेष्ठ संकल्प मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को बदल सकते हैं। इसे न्यूरोप्लास्टिसिटी (Neuroplasticity) कहा जाता है। अर्थात् हमारे विचार ही हमारे मस्तिष्क की संरचना और जीवन की दिशा को प्रभावित करते हैं।

वेद हजारों वर्ष पूर्व यही संदेश देता है—"तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु", अर्थात् मेरा मन शुभ, कल्याणकारी और रचनात्मक विचारों से युक्त हो।


आध्यात्मिक संदेश

मनुष्य का उत्थान और पतन दोनों मन पर निर्भर हैं।

  • शुभ मन से शुभ कर्म उत्पन्न होते हैं।
  • शुभ कर्म से श्रेष्ठ चरित्र बनता है।
  • श्रेष्ठ चरित्र से सुखी समाज का निर्माण होता है।

इसलिए वैदिक ऋषि धन, पद या शक्ति नहीं माँगते; वे प्रार्थना करते हैं कि उनका मन शुभ संकल्पों वाला बने।


आज के समाज के लिए शिक्षा

आज तनाव, क्रोध, ईर्ष्या और नकारात्मकता का मूल कारण असंयमित मन है। यदि व्यक्ति अपने मन को वेदाध्ययन, स्वाध्याय, योग, ध्यान और सत्संग से संस्कारित करे तो उसका जीवन तथा समाज दोनों बदल सकते हैं।

मन को जीतना ही सबसे बड़ी विजय है।

"जिस मन में शुभ संकल्प जागते हैं, वहीं से महान व्यक्तित्व, महान राष्ट्र और महान सभ्यताओं का निर्माण होता है।"

ॐ तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु। 🙏🏻 मेरा मन सदैव कल्याणकारी संकल्पों वाला हो।


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