अनुपम उपदेश रत्नावली


 🔥अनुपम उपदेश रत्नावली
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1 - मूल्य का विचार मत करो―दो वस्तुओं के अधिक मूल्य का विचार मत करो।

(1) पुस्तक यदि मनपसंद हो (2) औषध यदि मनपसंद हो।

2 - एकान्तवास-एकान्तवास से तीन लाभ प्राप्त होते हैं। (1) स्वास्थ्य की वृद्धि, (2) आत्मिक शक्ति की वृद्धि (3) धर्म की वृद्धि।

 3 - चोरी―चोर केवल वही इंसान है जो किसी की वस्तु चुराता है वह भी झूठ बोलता है क्योंकि वह जेनी वा समझी बात को छुपाता है।

  4 भक्त-भक्त केवल वही नहीं जो दिन रात ईश्वर की भक्ति करे वह भी है, जो लोक सेवा में तत्पर है।

  5- आत्मवत व्यवहारकर्ता-जो व्यवहार आपको अपने लिए पास नहीं देता, वह शब्दों के लिए भी मत कर।

   6-धार्मिक की पहचान-धार्मिक मनुष्य वह है जो लोगों को अपनी जान व माल को सुरक्षित रखने की अनुमति देता है।

   7 - हानि नहीं―संसार की कोई भी वस्तु तेरे पास न हो ऊपर निम्न चार हो तो तीन हानि नहीं, (1) सत्य का आचार (2) शीतल का परिहार (3) सबसे अधिक सद्व्यवहार (4) नेक या शुद्ध व्यापार।

   8- कन्या का महत्व―जो वस्तु संतान के लिए बाजार से घर ले आओ, पहले लड़की को दो पुन: लड़के को।

 .9 - शुभ कार्य―जिसको अपने शुभकर्मों पर विश्वास है वही मृत्यु का आलिंगन करता है दूसरा नहीं। अत: उस दिन सोच, जो स्टारकास्ट हो गया और ट्यून कोई शुभकर्म नहीं किया।

  दस-उदारता―दूसरों के दु:ख को अपने ऊपर ले लेना वास्तव में उदारता है।

  11 -आश्चर्य की बात है वह मनुष्य जिसकी मृत्यु का प्रमाण है और फिर भी पापसक्त है। आश्चर्य है उस इंसान पर जो दुनिया को नाशवान जानता है फिर भी फंसा हुआ है, आश्चर्य है उस इंसान पर जो ईश्वर विश्वासी हो और फिर भी चिंताग्रस्त है। आश्चर्य की बात है कि बुद्धि पर जो दुर्गति से बचना चाहता है और फिर भी दोस्ती करता है। आश्चर्य है उस व्यक्ति पर जो ईश्वर भक्त भी अपने स्थान पर दूसरी वस्तु की पूजा करता है, आश्चर्य है ऐसे योगी पर जो मुक्ति की इच्छा रखता है और विषयों में झुक जाता है।

  12 - दुष्ट―बुरे लोगों की जिंदगियां जांच कर ले, सांप और बिच्छुओं से कम न पिएगा।

   13 - भगवान की व्यापकता ―हे मानव ! यदि तू पाप करने की इच्छा रखता है तो ऐसे स्थान की खोज कर जहां भगवान न हों।

   चौदह - भक्ति―हे मानव ! यदि तू भक्ति नहीं चाहता तो उसकी बनाई हुई वस्तुओं का उपयोग और उपभोग भी नहीं कर सकता। जानवर अपने मालिक को नहीं पहचानता है सौरव आश्चर्य है, इंसान अपने भगवान को नहीं पहचानता है।

  15 - नासमझ―संसार एक सराय है लेकिन नासमझों ने इसे अपना घर समझ रखा है।

  6 - सज्जन-दुर्जन का स्वभाव है कि जब कोई नम्रता से बरते तो कठोर हो जाता है और जब कोई नम्रता से बरते तो नाम्र हो जाता है।

  17 - उपकार―जब किसी का उपकार करे तो उसे छिपाओ। यदि कोई तेरा उपकार करे तो उसे सर्वशक्तिमान सम्मुख समर्पण कर।

  १८ - कृपा पात्र कौन―(१) वह विद्वान् जो मूर्खों के आदेश से काम करे, (२) वह सज्जन जिस पर दुर्जन शासक हो, (३) वह गुणवान जो निर्गुणियों के अधीन हो। ये तीनों सर्वाधिक कृपा के पात्र हैं।

  १९ -  हिसाब―ओ भोले, मकानों के बनाने में आयु व्यतीत कर रहा है। बसेंगे दूसरे और हिसाब देगा तू।

  २० - पाप―जो मनुष्य पाप करते समय किवाड़ों को बन्द कर लेता है, लोगों से छिप जाता है और एकान्त में उसकी आज्ञा को भंग करता है तो प्रभु कहता है, ओ मूर्ख, तूने अपनी ओर देखने वालों में मुझे ही सबसे कम समझा है कि सबसे परदा करना आवश्यक समझता है और मुझ से लोगों के बराबर भी लज्जा नहीं करता।
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🚩‼️आज का वेद मंत्र ‼️🚩

🌷ओ३म् तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियञ्जिन्वमवसे हूमहे वयम्। पूषा नो यथा वेदसामसद् वृधे रक्षिता पायुरदब्ध:स्वस्तये।(ऋग्वेद २|१८)

💐अर्थ  :-  चर और अचर जगत् के स्वामी, हमारी बुद्धि को तृप्त करने वाले परमात्मा को अपनी रक्षा के लिए हम पुकारते हैं, जिससे कि वह पोषक हमारे ज्ञान व धनों की बढ़ती और समृद्धि के लिए हमारी सदा रक्षा करें ।

मंत्र

ॐ तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियं जिन्वमवसे हूमहे वयम्।
पूषा नो यथा वेदसामसद् वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये॥

(ऋग्वेद)

शब्दार्थ

  • तम् — उस (परमात्मा को)।
  • ईशानम् — स्वामी, सर्वाधिपति।
  • जगतः — गतिशील संसार का।
  • तस्थुषः — स्थिर पदार्थों का।
  • पतिम् — स्वामी, पालक।
  • धियम् — बुद्धि, विवेक।
  • जिन्वम् — प्रेरित करने वाला, विकसित करने वाला।
  • अवसे — सहायता, संरक्षण के लिए।
  • हूमहे — हम आह्वान करते हैं।
  • पूषा — पोषण करने वाला परमात्मा।
  • नः — हमारा।
  • वेद — जानता है।
  • वृधे — उन्नति के लिए।
  • रक्षिता — रक्षक।
  • पायुः — संरक्षक।
  • अदब्धः — जिसे कोई छल या पराजित नहीं कर सकता।
  • स्वस्तये — कल्याण के लिए।

भावार्थ

हम उस परमेश्वर का आह्वान करते हैं जो समस्त चर और अचर जगत का स्वामी है, जो हमारी बुद्धि को सत्य और धर्म के मार्ग पर प्रेरित करता है। वह हमारा पोषण करने वाला, हमारी उन्नति का मार्ग जानने वाला, अचूक रक्षक और हमारे कल्याण का आधार बने।

वैदिक विवेचन

यह मंत्र परमात्मा के सार्वभौमिक स्वरूप का वर्णन करता है।

  • "ईशानं जगतस्तस्थुषस्पतिम्" से स्पष्ट होता है कि परमात्मा केवल मनुष्यों का ही नहीं, बल्कि समस्त चर (गतिशील) और अचर (स्थिर) सृष्टि का स्वामी है।
  • "धियं जिन्वम्" बताता है कि मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसकी बुद्धि है, और परमात्मा से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमारी बुद्धि को सत्य, विवेक और धर्म में प्रेरित करे।
  • "पूषा" परमात्मा का वह स्वरूप है जो सभी प्राणियों का पोषण करता है—अन्न, जल, वायु, सूर्य और प्रकृति के माध्यम से।
  • "रक्षिता पायुः अदब्धः" का अर्थ है कि परमात्मा ऐसा रक्षक है जिसे कोई धोखा नहीं दे सकता और जिसकी रक्षा अचूक होती है।

जीवनोपयोगी शिक्षा

  • परमात्मा को समस्त सृष्टि का स्वामी मानकर सभी प्राणियों के प्रति करुणा और सम्मान रखें।
  • बुद्धि का उपयोग सत्य, न्याय और लोककल्याण के लिए करें।
  • जीवन की उन्नति के लिए ईश्वर पर विश्वास रखते हुए पुरुषार्थ करें।
  • सच्चा संरक्षण धन या बल से नहीं, बल्कि धर्म और ईश्वर के मार्ग पर चलने से प्राप्त होता है।

निष्कर्ष

यह मंत्र मनुष्य को सिखाता है कि वह सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और सर्वपालक परमात्मा की शरण ग्रहण करे। वही हमारी बुद्धि को प्रकाशित करता है, जीवन का पोषण करता है, हमारी रक्षा करता है और हमें वास्तविक कल्याण के मार्ग पर ले जाता है। जब मनुष्य ईश्वर-प्रदत्त विवेक के अनुसार जीवन जीता है, तभी उसका व्यक्तिगत, सामाजिक और आध्यात्मिक विकास संभव होता है।


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