Agni sukta mantra relayed to Agni Core 4

 

मंत्र
यज्ञेन वर्धत जातवेदसमग्निं यजध्वं हविषा तना गिरा । समिधानं सुप्रयसं सवर्णरं दयुक्षं होतारं व्र्जनेषु धूर्षदम ॥
English Transliteration
Yajñena vardhata jātavedasam agniṁ yajadhvaṁ haviṣā tanā girā । Samidhānaṁ suprayasaṁ svarṇaraṁ dyukṣaṁ hotāraṁ vṛjaneṣu dhūrṣadam ॥
भावार्थ
यज्ञ, कर्म और ज्ञान द्वारा अग्नि का पोषण करो। वह अग्नि जो प्रकाशमान है, श्रेष्ठ प्रेरणा देने वाली है और समाज में चेतना का संवाहक है।
मंत्र
अभि त्वा नक्तीरुषसो ववाशिरे । अग्ने वत्सं न सवसरेषु धेनवः ॥
English Transliteration
Abhi tvā naktīr uṣaso vavāśire । Agne vatsaṁ na savasareṣu dhenavaḥ ॥
भावार्थ
जैसे रात और उषा अग्नि को पुकारती हैं, वैसे ही प्रकृति स्वयं चेतना को जाग्रत करने का आह्वान करती है।
मंत्र
तं देवा बुध्ने रजसः सुदंससं दिवस्पृथिव्योररतिं न्येरिरे ॥
English Transliteration
Taṁ devā budhne rajasaḥ sudaṁsasaṁ Divas pṛthivyor aratiṁ nyerire ॥
भावार्थ
देवत्व उस चेतना को स्वीकार करता है जो आकाश और पृथ्वी के बीच संतुलन बनाए रखती है।
मंत्र
समिद्धो अग्निर्निहितः पृथिव्यां प्रत्यं विश्वानि भुवनान्यस्थात ॥
English Transliteration
Samiddho agnir nihitaḥ pṛthivyāṁ Pratyaṁ viśvāni bhuvanānyasthāt ॥
भावार्थ
अग्नि पृथ्वी में स्थित होकर संपूर्ण जगत को चेतन करता है — यही Agni Core है।

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