अस्मिन् वसु वसवो - श्लोक 1
इस यज्ञ में वसु और वसवः, इन्द्र, पूषा, वरुण, मित्र और अग्नि इस यज्ञ को धारण करें। साथ ही, आदित्य और सभी देवता उत्तर की ज्योति में इसे स्थिर करें।
English:
In this sacrifice, Vasus, Vasava, Indra, Pusha, Varuna, Mitra, and Agni uphold it. Likewise, Adityas and all gods establish it in the northern light.
अस्मिन् = इस | वसु = वसु | वसवो = वसव | धारयन्तु = धारण करें | इन्द्रः = इन्द्र | पूषा = पूषा | वरुणो = वरुण | मित्रः = मित्र | अग्निः = अग्नि | इमम् = यह | आदित्या = आदित्य | उत = और | विश्वे = सभी | च = तथा | देवा = देवता | उत्तरस्मिन् = उत्तर दिशा में | ज्योतिषि = ज्योति | धारयन्तु = स्थिर करें
इस देवता के द्वारा क्षेत्र में सूर्य, अग्नि या हिरण्य की ज्योति हो। हम इसे नाक के मध्य स्थित उत्तम स्थान पर स्थिर करें।
English:
By this deity, let there be the light of the Sun, Agni, or Hiranya in the region. Let us establish it at the supreme place in the center of the nose.
अस्य = इसका | देवाः = देवता | प्रदिशि = क्षेत्र में | ज्योति = ज्योति | रस्तु = हो | सूर्यो = सूर्य | अग्निः = अग्नि | वा = या | हिरण्यम् = हिरण्य | सपत्ना = उत्तम स्थान | अस्मदधरे = हमारे बीच | भवन्तु = हों | उत्तमं = श्रेष्ठ | नाकमधि = नाक के मध्य | रोहयेमम् = स्थापित करें
इस बल के माध्यम से, जनक आग्नेय तत्वों के लिए उत्तम बल प्रदान करें। हे अग्नि, इस यज्ञ में समान जाति के श्रेष्ठ लोगों को वृद्धि प्रदान करें।
English:
Through this power, let the creator provide the highest energy for Agneya elements. O Agni, in this sacrifice, nurture the excellence of all alike.
येनेन्द्राय = इसके माध्यम से | समभरः = समान बल | पयांस्युत्तमेन = उत्तम बल | ब्रह्मणा = ब्रह्म द्वारा | जातवेदः = जातवेद / अग्नि | तेन = इसके द्वारा | त्वम् = तुम | अग्नि = अग्नि | इह = यहां | वर्धयेमं = वृद्धि करो | सजातानां = समान जाति के | श्रैष्ठ्य = श्रेष्ठता | आ धेह्येनम् = प्रदान करें
मैं इस यज्ञ की शक्ति, समृद्धि और मन की वृद्धि अग्नि को देता हूँ। हम इसे अपने बीच नाक के उत्तम स्थान पर स्थिर करें।
English:
I give the power, prosperity, and growth of mind of this sacrifice to Agni. Let us establish it at the supreme place in the center of our midst.
ऐषां = इसका | यज्ञम् = यज्ञ | उ = की | वर्चः = शक्ति | ददे = देता | अहम् = मैं | रायस्पोषम् = समृद्धि | चित्तानि = मन | अग्ने = हे अग्नि | सपत्ना = उत्तम स्थान | अस्मदधरे = हमारे बीच | भवन्तु = हों | नाकमधि = नाक के मध्य | रोहयेमम् = स्थापित करें
