कादंबरी (पूर्वभाग): पृष्ठ १११
चन्द्रापीड का सिंहासनारोहण एवं दिग्विजय-दुन्दुभि नाद
१. मूल संस्कृत पाठ (Original Sanskrit Text)
लंस्तत्कालप्रतिपन्नवेत्रदण्डेन पित्रा स्वयं पुर:प्रारब्धसमुत्सारण: सभामाण्डपमुपगम्य काञ्चनमयं शशीव मेरुशृङ्गं चन्द्रापीड: सिंहासनमारुरोह।
आरूढस्य चास्य कृतयथोचितसकलराजलोकसंमानस्य मुहूर्तं स्थित्वा दिग्विजयप्रयाणशंसी प्रलयघनघटाघोषघर्घरध्वनिरुदधिरिव मन्दरपातैर्वसुंधरापीठ इव युगान्तनिर्घातैरुत्पातजलधर इव तडिद्दण्डपातै: पातालकुक्षिरिव महावराहघोणाभिघातै: कनककोणैरभिहन्यमान: प्रस्थानदुन्दुभिरामन्थरं दध्वान। येन ध्वनता समाध्मातानीवोन्मीलितानीव पृथक्कृतानीव विस्तारितानीव गर्भीकृतानीव प्रदक्षिणीकृतानीव बधिरीकृतानीव रवेण भुवनान्तराणि। विश्लेषिता इव दिशामन्योन्यबन्धसंधय:। यस्य च भयवशविवशवलितोत्तानफणासहस्रेणालिङ्ग्यमान इव रसातले शेषेण मुहुर्मुहुरभिमुखदत्तदन्तोर्ध्वघातैराहूयमान इव दिक्षु दिग्कुञ्जरै: संत्रासविचितरेचकमण्डलै: प्रदक्षिणीक्रियमाण इव नभसि दिवसकररथतुरगैपूर्वार्धदृष्टहासशङ्काहर्षहुंकृतेनाभाष्यमाण इव कैलासशिखरिणि त्र्यम्बकवृषेण कृतगम्भीरकण्ठगर्जितेन प्रत्युद्गम्यमान इव विबुधसद्मनायरावतेनाश्रुतपूर्वरवजनितरोषावेशतिर्यग्वनमितविषाणमण्डलेन प्रणम्यमान इव यमसद्मनि कृतान्तमहिषेण संवस्तलोकपालकर्णितो बभ्राम त्रिभुवनमखिलं निनाद:।
आरूढस्य चास्य कृतयथोचितसकलराजलोकसंमानस्य मुहूर्तं स्थित्वा दिग्विजयप्रयाणशंसी प्रलयघनघटाघोषघर्घरध्वनिरुदधिरिव मन्दरपातैर्वसुंधरापीठ इव युगान्तनिर्घातैरुत्पातजलधर इव तडिद्दण्डपातै: पातालकुक्षिरिव महावराहघोणाभिघातै: कनककोणैरभिहन्यमान: प्रस्थानदुन्दुभिरामन्थरं दध्वान। येन ध्वनता समाध्मातानीवोन्मीलितानीव पृथक्कृतानीव विस्तारितानीव गर्भीकृतानीव प्रदक्षिणीकृतानीव बधिरीकृतानीव रवेण भुवनान्तराणि। विश्लेषिता इव दिशामन्योन्यबन्धसंधय:। यस्य च भयवशविवशवलितोत्तानफणासहस्रेणालिङ्ग्यमान इव रसातले शेषेण मुहुर्मुहुरभिमुखदत्तदन्तोर्ध्वघातैराहूयमान इव दिक्षु दिग्कुञ्जरै: संत्रासविचितरेचकमण्डलै: प्रदक्षिणीक्रियमाण इव नभसि दिवसकररथतुरगैपूर्वार्धदृष्टहासशङ्काहर्षहुंकृतेनाभाष्यमाण इव कैलासशिखरिणि त्र्यम्बकवृषेण कृतगम्भीरकण्ठगर्जितेन प्रत्युद्गम्यमान इव विबुधसद्मनायरावतेनाश्रुतपूर्वरवजनितरोषावेशतिर्यग्वनमितविषाणमण्डलेन प्रणम्यमान इव यमसद्मनि कृतान्तमहिषेण संवस्तलोकपालकर्णितो बभ्राम त्रिभुवनमखिलं निनाद:।
२. शास्त्रीय एवं साहित्यिक विश्लेषण (Technical Analysis)
- उपमा एवं उत्प्रेक्षा का बाहुल्य: बाणभट्ट ने दुन्दुभि (नगाड़े) के नाद की तुलना प्रलयकालीन बादलों की गर्जना, मन्दराचल के मन्थन से क्षुब्ध समुद्र और महावराह की फुंकार से की है।
- ब्रह्माण्डीय प्रभाव: दुन्दुभि के शब्द का प्रभाव पाताल में शेषनाग, दिशाओं में दिग्गज, आकाश में सूर्य के घोड़े और कैलास पर नन्दी तक पड़ता दिखाया गया है, जो चन्द्रापीड के चक्रवर्ती प्रभाव का सूचक है।
- सिंहासनारोहण: चन्द्रापीड का सुवर्ण सिंहासन पर बैठना वैसा ही सुशोभित है जैसे सुमेरु पर्वत के शिखर पर चंद्रमा का उदय होना।
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
उस समय स्वयं पिता (राजा तारापीड) ने हाथ में वेत्रदण्ड (राजदण्ड) लेकर आगे चलते हुए भीड़ को हटाना शुरू किया। चन्द्रापीड ने सभा-मण्डप में पहुँचकर स्वर्णमयी सिंहासन पर वैसे ही आरोहण किया जैसे चंद्रमा सुमेरु पर्वत के शिखर पर विराजमान होता है।
वहाँ बैठकर समस्त राजलोक का यथोचित सम्मान करने के पश्चात, दिग्विजय यात्रा की सूचना देने वाली 'प्रस्थान-दुन्दुभि' (नगाड़ा) स्वर्ण के डंडों की चोट से गंभीर स्वर में गूँज उठी। उसका नाद प्रलयकालीन बादलों की गर्जना के समान घर्घर ध्वनि वाला था। उस शब्द ने मानों समस्त भुवनों को फुला दिया, खोल दिया, विस्तार दे दिया और बहरा कर दिया। ऐसा लगा कि दिशाओं के आपस के जोड़ ढीले पड़ गए हैं।
वह नाद रसातले (पाताल) में भयभीत होकर फण फैलाए हुए शेषनाग द्वारा मानों गले लगाया जा रहा था, दिशाओं में दिग्गजों द्वारा दांतों की चोट से चुनौती दिया जा रहा था, और आकाश में सूर्य के घोड़ों द्वारा चकित होकर प्रदक्षिणा किया जा रहा था। कैलास पर्वत पर भगवान शिव के नन्दी (वृष) ने उसे अपने स्वामी की हँसी समझकर हुंकार भरी, और इन्द्र के ऐरावत हाथी ने क्रोध में आकर अपने दांतों को झुकाकर उसका स्वागत किया। यहाँ तक कि यमलोक में यमराज के भैंसे ने भी उसे प्रणाम किया। वह महानाद समस्त लोकपालों को संत्रस्त करता हुआ पूरे त्रिभुवन में फैल गया।
वहाँ बैठकर समस्त राजलोक का यथोचित सम्मान करने के पश्चात, दिग्विजय यात्रा की सूचना देने वाली 'प्रस्थान-दुन्दुभि' (नगाड़ा) स्वर्ण के डंडों की चोट से गंभीर स्वर में गूँज उठी। उसका नाद प्रलयकालीन बादलों की गर्जना के समान घर्घर ध्वनि वाला था। उस शब्द ने मानों समस्त भुवनों को फुला दिया, खोल दिया, विस्तार दे दिया और बहरा कर दिया। ऐसा लगा कि दिशाओं के आपस के जोड़ ढीले पड़ गए हैं।
वह नाद रसातले (पाताल) में भयभीत होकर फण फैलाए हुए शेषनाग द्वारा मानों गले लगाया जा रहा था, दिशाओं में दिग्गजों द्वारा दांतों की चोट से चुनौती दिया जा रहा था, और आकाश में सूर्य के घोड़ों द्वारा चकित होकर प्रदक्षिणा किया जा रहा था। कैलास पर्वत पर भगवान शिव के नन्दी (वृष) ने उसे अपने स्वामी की हँसी समझकर हुंकार भरी, और इन्द्र के ऐरावत हाथी ने क्रोध में आकर अपने दांतों को झुकाकर उसका स्वागत किया। यहाँ तक कि यमलोक में यमराज के भैंसे ने भी उसे प्रणाम किया। वह महानाद समस्त लोकपालों को संत्रस्त करता हुआ पूरे त्रिभुवन में फैल गया।
४. English Translation
At that moment, King Tarapida himself, taking up the golden staff of office, led the way to clear the path. Chandrapida approached the assembly hall and ascended the golden throne, appearing as majestic as the moon rising upon the peak of Mount Meru.
Having seated himself and honored the assembled kings appropriately, the 'Prasthana-Dundubhi' (the drum of departure) was struck with golden rods. Its sound, announcing the start of the conquest of the quarters (Digvijaya), echoed like the thunder of clouds at the end of an aeon. That deep, rumbling resonance seemed to fill, expand, and deafen the entire universe, as if loosening the very joints that held the cardinal directions together.
The sound was so profound that in the netherworld, the serpent Shesha seemed to embrace it with his thousand upturned hoods in fear. In the quarters, the celestial elephants challenged it with the upward thrust of their tusks. In the heavens, the horses of the Sun's chariot circled it in wonder. Upon Mount Kailasa, Nandi (the bull of Shiva) let out a roar, mistaking it for the laughter of his Lord, while Indra’s elephant, Airavata, tilted his tusks in a gesture of greeting. Even the buffalo of Yama in the land of the dead bowed to it. This great resonance, terrifying the guardians of the world, vibrated throughout the entire three realms.
Having seated himself and honored the assembled kings appropriately, the 'Prasthana-Dundubhi' (the drum of departure) was struck with golden rods. Its sound, announcing the start of the conquest of the quarters (Digvijaya), echoed like the thunder of clouds at the end of an aeon. That deep, rumbling resonance seemed to fill, expand, and deafen the entire universe, as if loosening the very joints that held the cardinal directions together.
The sound was so profound that in the netherworld, the serpent Shesha seemed to embrace it with his thousand upturned hoods in fear. In the quarters, the celestial elephants challenged it with the upward thrust of their tusks. In the heavens, the horses of the Sun's chariot circled it in wonder. Upon Mount Kailasa, Nandi (the bull of Shiva) let out a roar, mistaking it for the laughter of his Lord, while Indra’s elephant, Airavata, tilted his tusks in a gesture of greeting. Even the buffalo of Yama in the land of the dead bowed to it. This great resonance, terrifying the guardians of the world, vibrated throughout the entire three realms.
कादंबरी (पूर्वभाग): पृष्ठ ११४
सैन्य कोलाहल एवं महाप्रलय जैसा दृश्य
१. मूल संस्कृत पाठ (Original Sanskrit Text)
जयशब्दमयमिव त्रिभुवनमभवत्। सर्वतश्च कुलपर्वताकारै: प्रचलद्भिर्मत्तवारणैरुत्पातचन्द्रमण्डलनिभैश्च प्रेङ्खद्भुिरातपत्रै: संवर्तकाम्भोदगम्भीरभीमनादेन च ध्वनता दुन्दुभिना... मदजलधारादुर्दिनने कलकलेन च भुवनान्तरव्यापिना महाप्रलयकाल इव संजज्ञे।
वलबहलकोलाहलभीता इव धवलध्वजनिवहनिन्तरवृता ययु: कापि दश दिश:। मलिनावनीरज: संस्पर्शशङ्कितमिव समदगजघटाचूडसहस्रसंरुद्धमतिदूरमम्बरतलमपससार। प्रबलवेत्रिवेत्रलतासमुत्सार्यमाणा इव तुरंगखुररजोदूसरताभीता इवार्ककिरणा मुमुचु: पुरोभागम्। इभकरसीकरनिर्वापणत्रस्त इवातपत्रसंछादितातपो दिवसो ननाश।
वलबहलकोलाहलभीता इव धवलध्वजनिवहनिन्तरवृता ययु: कापि दश दिश:। मलिनावनीरज: संस्पर्शशङ्कितमिव समदगजघटाचूडसहस्रसंरुद्धमतिदूरमम्बरतलमपससार। प्रबलवेत्रिवेत्रलतासमुत्सार्यमाणा इव तुरंगखुररजोदूसरताभीता इवार्ककिरणा मुमुचु: पुरोभागम्। इभकरसीकरनिर्वापणत्रस्त इवातपत्रसंछादितातपो दिवसो ननाश।
२. शास्त्रीय एवं साहित्यिक विश्लेषण (Technical Analysis)
- अतिशयोक्ति एवं उत्प्रेक्षा: बाणभट्ट वर्णन करते हैं कि सेना की धूल से डरकर सूर्य की किरणें मानों रास्ता छोड़कर भाग गईं (शङ्कितमिव अम्बरतलमपससार)। यह चन्द्रापीड के सैन्य बल की विशालता को सिद्ध करने वाली उत्कृष्ट काव्य प्रतिभा है।
- ध्वन्यात्मक वर्णन: दुन्दुभि (नगाड़ों) की आवाज़ को 'संवर्तक' (प्रलयकालीन) बादलों जैसी भीषण बताया गया है, जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि तीनों लोक केवल 'जय-जय' के शब्दों से ही निर्मित हैं।
- प्रलय का रूपक: हाथियों के मदजल की वर्षा और धूल के अंधकार ने दिन को महाप्रलय की रात जैसा बना दिया।
कादंबरी (पूर्वभाग): पृष्ठ ११२
चन्द्रापीड का दिग्विजय प्रस्थान एवं राजसी वैभव
१. मूल संस्कृत पाठ (Original Sanskrit Text)
जात इव सितकुसुममुकुलपातिभि: कल्पपादपैरैरावत इव विमुक्तकरसीकरैराशागजैर्गगनाभोग इव तारागणवर्षिभिर्दिगन्तरैर्जलदकाल इव स्थूलजललवसारस्यन्दिभिर्जलधरैरनुगम्यमानो नरपतिसहस्रैरास्थानमण्डपान्निर्गत।
निर्गत्य च पूर्वारूढया पत्रलेखया समध्यासितान्तरासनामुपपादितप्रस्थानसमुचितमङ्गल्यालङ्कारां ससंभ्रमाधोरणोपनीतां करेणुकामधिरुह्याचलरचकवक्रीकृतक्षीरोदावर्तपाण्डुरेण दशवदनबाहुदण्डावस्थितकैलासकान्तिना मुक्ताफलजालिना शतशलाकेनातपत्रेण निवार्यमाणातपो निर्गन्तुमारेभे। निर्गच्छंश्चाभ्यन्तरास्थित एव प्राकारान्तरितदर्शनानां द्वारावस्थितानां प्रतिपालयतां राज्ञामुन्मयूखानां चूडामणीनामलक्तकद्रवद्युतिमुषा बहलेनालोकबालातपेन राज्याभिषेकानन्तरप्रसृतेन स्वप्रतापवहिनेवेत्यर्थं पिञ्जरीक्रियमाणा दश दिशो, यौवराज्याभिषेकजन्मना निजानुरागेणैव रज्यमानमवनितलमासंभरिपुविनाशपिशुनेन दिग्दाहेनेव पाटलीक्रियमाणमम्बरतलमभिमुखागतभुवनतललक्ष्मीचरणालक्तकरसेनेव लोहितायमानातपं दिवस ददर्श।
निर्गत्य च पूर्वारूढया पत्रलेखया समध्यासितान्तरासनामुपपादितप्रस्थानसमुचितमङ्गल्यालङ्कारां ससंभ्रमाधोरणोपनीतां करेणुकामधिरुह्याचलरचकवक्रीकृतक्षीरोदावर्तपाण्डुरेण दशवदनबाहुदण्डावस्थितकैलासकान्तिना मुक्ताफलजालिना शतशलाकेनातपत्रेण निवार्यमाणातपो निर्गन्तुमारेभे। निर्गच्छंश्चाभ्यन्तरास्थित एव प्राकारान्तरितदर्शनानां द्वारावस्थितानां प्रतिपालयतां राज्ञामुन्मयूखानां चूडामणीनामलक्तकद्रवद्युतिमुषा बहलेनालोकबालातपेन राज्याभिषेकानन्तरप्रसृतेन स्वप्रतापवहिनेवेत्यर्थं पिञ्जरीक्रियमाणा दश दिशो, यौवराज्याभिषेकजन्मना निजानुरागेणैव रज्यमानमवनितलमासंभरिपुविनाशपिशुनेन दिग्दाहेनेव पाटलीक्रियमाणमम्बरतलमभिमुखागतभुवनतललक्ष्मीचरणालक्तकरसेनेव लोहितायमानातपं दिवस ददर्श।
२. शास्त्रीय एवं साहित्यिक विश्लेषण (Technical Analysis)
- छत्र का वर्णन: चन्द्रापीड के ऊपर जो छत्र (आतपत्र) लगा है, उसकी सफेदी की तुलना 'क्षीर सागर के भंवर' और 'रावण की भुजाओं के बीच स्थित कैलास पर्वत' से की गई है।
- पिञ्जरीक्रियमाणा दिशो: दिशाओं का पीला (स्वर्ण जैसा) होना चन्द्रापीड के अभिषेक के बाद फैले उसके 'प्रताप रूपी अग्नि' का प्रतीक बताया गया है।
- पत्रलेखा का साथ: प्रस्थान के समय हथिनी (करेणुका) पर पत्रलेखा पहले से विराजमान है, जो चन्द्रापीड के प्रति उसकी अटूट सेवा और समीपता को दर्शाती है।
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
हजारों राजाओं के साथ चन्द्रापीड सभा-मण्डप से बाहर निकले। उनके प्रस्थान के समय ऐसा लग रहा था मानो सफेद फूलों की वर्षा करते कल्पवृक्ष, सूँढ से फुहार छोड़ते ऐरावत आदि दिग्गज, या तारों की वर्षा करता आकाश उनके पीछे चल रहा हो।
बाहर आकर वे उस हथिनी (करेणुका) पर सवार हुए जिस पर पत्रलेखा पहले से ही बैठी थी। वह हथिनी मांगलिक अलंकारों से सजी हुई थी। उनके ऊपर मोतियों की जालियों वाला विशाल सफेद छत्र लगाया गया, जो क्षीर सागर के भंवर जैसा श्वेत और रावण की भुजाओं के बीच स्थित कैलास पर्वत जैसी कांति वाला था।
जब वे बाहर निकल रहे थे, तो महल के भीतर खड़े होकर उन्होंने देखा कि द्वारों पर प्रतीक्षा कर रहे हजारों राजाओं के मुकुटों की मणियों की किरणों से दसों दिशाएं पीली (सुनहरी) हो गई हैं, मानो राजकुमार का 'प्रताप-अग्नि' चारों ओर फैल गया हो। धरती उनके प्रति अनुराग (प्रेम) से लाल दिखाई दे रही थी, और आकाश का लाल रंग शत्रुओं के विनाश की सूचना देने वाले दिग्दाह जैसा लग रहा था। ऐसा प्रतीत होता था मानो साक्षात् लक्ष्मी के चरणों का लाक्षा-रस (महावर) पूरे दिन के उजाले में फैल गया हो।
बाहर आकर वे उस हथिनी (करेणुका) पर सवार हुए जिस पर पत्रलेखा पहले से ही बैठी थी। वह हथिनी मांगलिक अलंकारों से सजी हुई थी। उनके ऊपर मोतियों की जालियों वाला विशाल सफेद छत्र लगाया गया, जो क्षीर सागर के भंवर जैसा श्वेत और रावण की भुजाओं के बीच स्थित कैलास पर्वत जैसी कांति वाला था।
जब वे बाहर निकल रहे थे, तो महल के भीतर खड़े होकर उन्होंने देखा कि द्वारों पर प्रतीक्षा कर रहे हजारों राजाओं के मुकुटों की मणियों की किरणों से दसों दिशाएं पीली (सुनहरी) हो गई हैं, मानो राजकुमार का 'प्रताप-अग्नि' चारों ओर फैल गया हो। धरती उनके प्रति अनुराग (प्रेम) से लाल दिखाई दे रही थी, और आकाश का लाल रंग शत्रुओं के विनाश की सूचना देने वाले दिग्दाह जैसा लग रहा था। ऐसा प्रतीत होता था मानो साक्षात् लक्ष्मी के चरणों का लाक्षा-रस (महावर) पूरे दिन के उजाले में फैल गया हो।
४. English Translation
Accompanied by thousands of kings, Chandrapida emerged from the assembly hall. His departure felt as though celestial Kalpa-trees were showering white blossoms, or as if the cosmic elephants were spraying water from their trunks in his honor.
He mounted a female elephant (Karenu) where Patralekha was already seated. A magnificent white parasol, adorned with strings of pearls, was held over him. Its whiteness was compared to the swirling waves of the Ocean of Milk and the brilliance of Mount Kailasa held in Ravana's arms.
As he moved out, he noticed that the rays from the crest-jewels of the waiting kings had turned all ten directions golden-yellow, as if the fire of his own majesty (Pratapa) had spread everywhere after his coronation. The earth appeared reddened by the people's affection for him, and the sky's crimson hue seemed like an omen of the destruction of his enemies. It was as if the red lacquer from the feet of the Goddess of Fortune had stained the light of the entire day.
He mounted a female elephant (Karenu) where Patralekha was already seated. A magnificent white parasol, adorned with strings of pearls, was held over him. Its whiteness was compared to the swirling waves of the Ocean of Milk and the brilliance of Mount Kailasa held in Ravana's arms.
As he moved out, he noticed that the rays from the crest-jewels of the waiting kings had turned all ten directions golden-yellow, as if the fire of his own majesty (Pratapa) had spread everywhere after his coronation. The earth appeared reddened by the people's affection for him, and the sky's crimson hue seemed like an omen of the destruction of his enemies. It was as if the red lacquer from the feet of the Goddess of Fortune had stained the light of the entire day.
कादंबरी (पूर्वभाग): पृष्ठ ११३
सैन्य प्रस्थान, वैशम्पायन मिलन एवं ब्रह्माण्डीय दृश्य
१. मूल संस्कृत पाठ (Original Sanskrit Text)
कनकालंकारप्रभाकल्पातितायवेन च दत्तकुङ्कुमस्थासकेनेवाकृष्यमाणे-नेन्द्रायुधेन सनाथीकृतपुरोभाग: शनै: शनै: प्रथममेव ज्ञातक्रतवी-मांशमभिप्रतस्थे।
चलितगजघटाकम्पितधवलातपत्रमनेककल्लोलपरंपरापतितचन्द्रमण्डलप्रतिबिम्बसहस्रं महाप्रलयजलधिजलमिव प्लावितमहीतलमद्भुतोद्धूतक-लकलमखिलं संचचाल बलम्।
उच्चलितस्य चास्य स्वभवनादुपपादितप्रस्थानमङ्गलो धवलदुकूलवासा: सितकुसुमाङ्गरागो महता बलसमूहेन नगेन्द्रवृन्दैश्वानुगम्यमानो धृतधवलातपत्रो द्वितीय इव युवगजस्त्वरितपदसंचारिण्या करिण्या वैशम्पायन: समीपमाजगाम। आगत्य च रजनीकर इव रवेरासन्नवर्ती बभूव।
चलितगजघटाकम्पितधवलातपत्रमनेककल्लोलपरंपरापतितचन्द्रमण्डलप्रतिबिम्बसहस्रं महाप्रलयजलधिजलमिव प्लावितमहीतलमद्भुतोद्धूतक-लकलमखिलं संचचाल बलम्।
उच्चलितस्य चास्य स्वभवनादुपपादितप्रस्थानमङ्गलो धवलदुकूलवासा: सितकुसुमाङ्गरागो महता बलसमूहेन नगेन्द्रवृन्दैश्वानुगम्यमानो धृतधवलातपत्रो द्वितीय इव युवगजस्त्वरितपदसंचारिण्या करिण्या वैशम्पायन: समीपमाजगाम। आगत्य च रजनीकर इव रवेरासन्नवर्ती बभूव।
२. शास्त्रीय एवं साहित्यिक विश्लेषण (Technical Analysis)
- प्रलय जलधि उपमा: चन्द्रापीड की विशाल सेना के चलने को 'महाप्रलय के समुद्र' के समान बताया गया है। सेना के ऊपर हिलते हुए सफेद छत्रों की तुलना समुद्र की लहरों में गिरते हुए हजारों चंद्रमाओं के प्रतिबिंब से की गई है।
- वैशम्पायन का आगमन: वैशम्पायन सफेद वस्त्र (धवलदुकूल) और श्वेत फूलों के अंगराग में सुसज्जित हैं। उनका चन्द्रापीड के पास आना वैसा ही है जैसे चंद्रमा सूर्य के निकट आता है।
- ब्रह्माण्डीय रूपक: बाणभट्ट वर्णन करते हैं कि उस समय पूरा दिन 'किरीटमय' (मुकुटों से भरा) और पूरी पृथ्वी 'कुञ्जरमयी' (हाथियों से भरी) प्रतीत हो रही थी।
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
चन्द्रापीड के स्वर्ण आभूषणों की चमक और घोड़ों के शरीर पर लगे कुंकुम (केसर) के थापों से युक्त सेना धीरे-धीरे पूर्व दिशा की ओर बढ़ने लगी। हाथियों के चलने से हिलते हुए सफेद छत्रों वाली वह सेना ऐसी लग रही थी मानो महाप्रलय का समुद्र उमड़ पड़ा हो, जिसमें लहरों पर हजारों चंद्रमा नाच रहे हों। उस विशाल सेना के शोर (कलकल) से पूरी पृथ्वी भर गई।
उसी समय, अपने भवन से मांगलिक विधानों को पूरा कर, सफेद रेशमी वस्त्र पहने और श्वेत पुष्पों का लेप लगाए हुए वैशम्पायन एक युवा हाथी की भांति तीव्र गति वाली हथिनी पर सवार होकर चन्द्रापीड के पास आए। उनका आना वैसा ही था जैसे चंद्रमा सूर्य के समीप आता है।
उस क्षण सेना के मुकुटों और आभूषणों की चमक से दसों दिशाएं इंद्रधनुषी आभा से भर गईं। ऐसा लगने लगा मानो पृथ्वी हाथियों से बनी हो, आकाश छत्रों से ढका हो, और पूरा दिन ही मुकुटों की चमक से निर्मित हुआ हो। चारों ओर केवल राजसी वैभव और पराक्रम की ही दृष्टि थी।
उसी समय, अपने भवन से मांगलिक विधानों को पूरा कर, सफेद रेशमी वस्त्र पहने और श्वेत पुष्पों का लेप लगाए हुए वैशम्पायन एक युवा हाथी की भांति तीव्र गति वाली हथिनी पर सवार होकर चन्द्रापीड के पास आए। उनका आना वैसा ही था जैसे चंद्रमा सूर्य के समीप आता है।
उस क्षण सेना के मुकुटों और आभूषणों की चमक से दसों दिशाएं इंद्रधनुषी आभा से भर गईं। ऐसा लगने लगा मानो पृथ्वी हाथियों से बनी हो, आकाश छत्रों से ढका हो, और पूरा दिन ही मुकुटों की चमक से निर्मित हुआ हो। चारों ओर केवल राजसी वैभव और पराक्रम की ही दृष्टि थी।
४. English Translation
Chandrapida began his march toward the East, his path illuminated by the golden glint of ornaments and the saffron markings on the steeds. The movement of the massive army, with its white parasols swaying atop the elephants, resembled the cosmic ocean at the time of final dissolution, where thousands of moons are reflected upon the turbulent waves.
At that moment, Vaishampayana, having completed his own auspicious departure rituals, arrived. Dressed in white silk and adorned with white floral pastes, he rode a swift female elephant like a young celestial tusker. His approach toward Chandrapida was likened to the Moon drawing near the Sun.
The brilliance radiating from the jeweled crowns and armlets of the soldiers transformed the ten directions into a kaleidoscope of colors. It appeared as if the entire earth was made of elephants, the sky composed of parasols, and the day itself forged from the luster of royal crowns.
At that moment, Vaishampayana, having completed his own auspicious departure rituals, arrived. Dressed in white silk and adorned with white floral pastes, he rode a swift female elephant like a young celestial tusker. His approach toward Chandrapida was likened to the Moon drawing near the Sun.
The brilliance radiating from the jeweled crowns and armlets of the soldiers transformed the ten directions into a kaleidoscope of colors. It appeared as if the entire earth was made of elephants, the sky composed of parasols, and the day itself forged from the luster of royal crowns.
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
पूरा त्रिभुवन मानों 'जय-जयकार' के शब्दों से भर गया। चारों ओर कुलपर्वतों के समान विशाल मतवाले हाथी चल रहे थे और उनके ऊपर हिलते हुए सफेद छत्र प्रलयकाल के चंद्रमाओं के समान प्रतीत हो रहे थे। प्रलयकालीन बादलों जैसी गंभीर गर्जना करने वाले नगाड़ों के नाद, हाथियों के मद की वर्षा और सेना के भयंकर कोलाहल से ऐसा लगने लगा मानो महाप्रलय का समय आ गया हो।
सेना के उस कोलाहल से डरकर दसों दिशाएं मानों सफेद झंडों के पीछे छिप गईं। पृथ्वी की धूल के स्पर्श से बचने के लिए आकाश मानों हाथियों के सिरों से भी बहुत ऊपर हट गया। घोड़ों के खुरों से उड़ने वाली धूल से डरकर सूर्य की किरणें रास्ता छोड़कर भागने लगीं। हाथियों की सूँढ से निकलने वाली फुहारों और छत्रों की सघन छाया के कारण दिन मानों कहीं लुप्त हो गया। भारी बोझ से दबी हुई पृथ्वी नगाड़े की आवाज़ के साथ स्वयं भी कराहने लगी।
सेना के उस कोलाहल से डरकर दसों दिशाएं मानों सफेद झंडों के पीछे छिप गईं। पृथ्वी की धूल के स्पर्श से बचने के लिए आकाश मानों हाथियों के सिरों से भी बहुत ऊपर हट गया। घोड़ों के खुरों से उड़ने वाली धूल से डरकर सूर्य की किरणें रास्ता छोड़कर भागने लगीं। हाथियों की सूँढ से निकलने वाली फुहारों और छत्रों की सघन छाया के कारण दिन मानों कहीं लुप्त हो गया। भारी बोझ से दबी हुई पृथ्वी नगाड़े की आवाज़ के साथ स्वयं भी कराहने लगी।
४. English Translation
The entire universe seemed to be composed of nothing but the cries of "Victory!" All around, intoxicated elephants as massive as the primal mountains moved, and the swaying white parasols above them looked like the moons of doomsday. With the terrifying roar of drums like the clouds of the final dissolution and the rain-like mist of the elephants' rut, the atmosphere became indistinguishable from the time of the Great Pralaya.
Terrified by the immense clamor, the ten directions seemed to hide behind the forest of white banners. The very sky retreated far above the thousands of elephant heads, as if fearing the touch of the dust rising from the earth. The sunbeams fled from the path, seemingly afraid of being soiled by the dust kicked up by the horses' hooves. Under the combined spray from elephant trunks and the dense shadows of parasols, the daylight itself seemed to perish and vanish.
Terrified by the immense clamor, the ten directions seemed to hide behind the forest of white banners. The very sky retreated far above the thousands of elephant heads, as if fearing the touch of the dust rising from the earth. The sunbeams fled from the path, seemingly afraid of being soiled by the dust kicked up by the horses' hooves. Under the combined spray from elephant trunks and the dense shadows of parasols, the daylight itself seemed to perish and vanish.
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