प्रेमा हिन्दी उपन्यास मुंशी प्रेम चंद



प्रेमा मुंशी प्रेमचंद

प्रेमा भाग 1

सच्ची उदारता

संध्या का समय है, डूबने वाले सूर्य की सुनहरी किरणें रंगीन शीशो की आड़ से, एक अंग्रेजी ढंग पर सजे हुए कमरे में झॉँक रही हैं जिससे सारा कमरा रंगीन हो रहा है। अंग्रेजी ढ़ंग की मनोहर तसवीरें, जो दीवारों से लटक रहीं है, इस समय रंगीन वस्त्र धारण करके और भी सुंदर मालूम होती है। कमरे के बीचोंबीच एक गोल मेज़ है जिसके चारों तरफ नर्म मखमली गद्दोकी रंगीन कुर्सियॉ बिछी हुई है। इनमें से एक कुर्सी पर एक युवा पुरूष सर नीचा किये हुए बैठा कुछ सोच रहा है। वह अति सुंदर और रूपवान पुरूष है जिस पर अंग्रेजी काट के कपड़े बहुत भले मालूम होते है। उसके सामने मेज पर एक कागज है जिसको वह बार-बार देखता है। उसके चेहरे से ऐसा विदित होता है कि इस समय वह किसी गहरे सोच में डूबा हुआ है। थोड़ी देर तक वह इसी तरह पहलू बदलता रहा, फिर वह एकाएक उठा और कमरे से बाहर निकलकर बरांडे में टहलने लगा, जिसमे मनोहर फूलों और पत्तों के गमले सजाकर धरे हुए थे। वह बरांडे से फिर कमरे में आया और कागज का टुकड़ा उठाकर बड़ी बेचैनी के साथ इधर-उधर टहलने लगा। समय बहुत सुहावना था। माली फूलों की क्यारियों में पानी दे रहा था। एक तरफ साईस घोड़े को टहला रहा था। समय और स्थान दोनो ही बहुत रमणीक थे। परन्तु वह अपने विचार में ऐसा लवलीन हो रहा था कि उसे इन बातों की बिलकुल सुधि न थी। हॉँ, उसकी गर्दन आप ही आप हिलाती थी और हाथ भी आप ही आप इशारे करते थे—जैसे वह किसी से बातें कर रहा हो। इसी बीच में एक बाइसिकिल फाटक के अंदर आती हुई दिखायी दी और एक गोरा-चिटठा आदमी कोट पतलून पहने, ऐनक लगाये, सिगार पीता, जूते चरमर करता, उतर पड़ा और बोला, गुड ईवनिंग, अमृतराय।

 

अमृतराय ने चौंककर सर उठाया और बोले—ओ। आप है मिस्टर दाननाथ। आइए बैठिए। आप आज जलसे में न दिखायी दियें।

दाननाथ—कैसा जलसा। मुझे तो इसकी खबर भी नहीं।

अमृतराय—(आश्चर्य से) ऐं। आपको खबर ही नहीं। आज आगरा के लाला धनुषधारीलाल ने बहुत अच्छा व्याख्यान दिया और विरोधियो के दॉँत खटटे कर दिये।

दाननाथ—ईश्वर जानता है मुझे जरा भी खबर न थी, नहीं तो मैं अवश्य आता। मुझे तो लाला साहब के व्याख्यानों के सुनने का बहुत दिनों से शौंक है। मेरा अभाग्य था कि ऐसा अच्छा समय हाथ से निकल गया। किस बात पर व्याख्यान था?

अमृतराय—जाति की उन्नति के सिवा दूसरी कौन-सी बात हो सकती थी? लाला साहब ने अपना जीवन इसी काम के हेतु अर्पण कर दिया है। आज ऐसा सच्चा देशभक्त और निष्कास जाति-सेवक इस देश में नहीं है। यह दूसरी बात है कि कोई उनके सिद्वांतो को माने या न माने, मगर उनके व्याख्यानों में ऐसा जादू होता है कि लोग आप ही आप खिंचे चले आते है। मैंने लाला साहब के व्याख्यानों के सुनने का आनंद कई बार प्राप्त किया है। मगर आज की स्पीच में तो बात ही और थी। ऐसा जान पड़ता है कि उनकी ज़बान में जादू भरा है। शब्द वही होते है जो हम रोज़ काम में लाया करते है। विचार भी वही होते है जिनकी हमारे यहॉँ प्रतिदिन चर्चा रहती है। मगर उनके बोलने का ढंग कुछ ऐसा अपूर्व है कि दिलों को लुभा लेता है।

दाननाथ को ऐसी उत्तम स्पीच को न सुनने का अत्यंत शोक हुआ। बोले—यार, मैं जंम का अभागा हूँ। क्या अब फिर कोई व्याख्यान न होगा?

अमृतराय—आशा तो नहीं हैं क्योंकि लाला साहब लखनऊ जा रहे है, उधर से आगरा को चले जाएंगे। फिर नहीं मालूम कब दर्शन दें।

दाननाथ—अपने कर्म की हीनता की क्या कहूँ। आपने उसस्पीच कीकोई नकल की हो तो जरा दीजिए। उसी को देखकर जी को ढारस दूँ।

इस पर अमृतराय ने वही कागज का टुकड़ा जिसको वे बार-बार पढ़ रहे थे दाननाथ के हाथ में रख दिया और बोले—स्पीच के बीच-बीच में जो बाते मुझको सवार हो जाती है तो आगा-पीछा कुछ नहीं सोचते, समझाने लगे—मित्र, तुम कैसी लड़कपन की बातें करते हो। तुमको शायद अभी मालूम नहीं कि तुम कैसा भारी बोझ अपने सर पर ले रहे हो। जो रास्ता अभी तुमको साफ दिखायी दे रहा है वह कॉँटो से ऐसा भरा है कि एक-एक पग धरना कठिन है।

अमृतराय—अब तो जो होना हो सो हो। जो बात दिल में जम गयी वह तम गयीं। मैं खूबजानता हूं कि मुझको बड़ी-बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। मगर आज मेरा हिसाब ऐसा बढ़ा हुआ हैं कि मैं बड़े से बड़ा काम कर सकता हूं और ऊँचे से ऊँचे पहाड़ पर चढ़ सकता हूँ।

दाननाथ—ईश्वर आपके उत्साह को सदा बढ़ावे। मैं जानता हूँ कि आप जिस काम के लिए उद्योग करेगें उसे अवश्य पूरा कर दिखायेगें। मैं आपके इरादों में विध्न डालना कदापि नहीं चाहता। मगर मनुष्य का धर्म हैं कि जिस काम में हाथ लगावे पहले उसका ऊँच-नीच खूब विचार ले। अब प्रच्छन बातों से हटकर प्रत्यक्ष बातों की तरफा आइए। आप जानते हैकि इस शहर के लोग, सब के सब,पुरानी लकीर के फकीर है। मुझे भय है कि सामाजिक सुधार का बीज यहॉँ कदापि फल-फुल न सकेगा। और फिर, आपका सहायक भी कोई नजर नहीं आता। अकेले आप क्या बना लेंगे। शायद आपके दोस्त भी इस जोखिम के काम में आपका हाथ न बँटा सके। चाहे आपको बुरा लगे, मगर मैं यह जरूर कहूँगा कि अकेले आप कुछ भी न कर सकेंगे।

अमृतराय ने अपने परम मित्र की बातों को सुनकर सा उठाया और बड़ी गंभीरता से बोले—दाननाथ। यह तुमको क्या हो गया है। क्या मै तुम्हारे मुँह से ऐसी बोदेपन की बातें सुन रहा हूं। तुम कहते हो अकेले क्या बना लोगे? अकेले आदमियों की कारगुजारियों से इतिहास भरे पड़े हैं। गौतम बुद्व कौन था? एक जंगल का बसनेवाला साधु, जिसका सारे देश में कोई मददगार न था। मगर उसके जीवन ही में आधा हिन्दोस्तान उसके पैरों पर सर धर चुका था। आपको कितने प्रमाण दूँ। अकेले आदमियों से कौमों के नाम चल रहे है। कौमें मर गयी है। आज उनका निशान भी बाकी नहीं। मगर अकेले आदमियों के नाम अभी तक जिंदा है। आप जानते हैं कि प्लेटों एक अमर नाम है। मगर आपमें कितने ऐसे हैं जो यह जानते हों कि वह किस देश का रहने वाला है।

दाननाथ समझदार आदमी थे। समझ गये कि अभी जोश नया है और समझाना बुझाना सब व्यर्थ होगा। मगर फिर भी जी न माना। एक बार और उलझना आवश्यक ‘अच्छी जान पड़ी मैने उनको तुरंत नकल कर लिया। ऐसी जल्दी में लिखा है कि मेरे सिवा कोई दूसरा पढ़ भी न सकेगा। देखिए हमारी लापरवाही को कैसा आड़े हाथों लिया है:

सज्जनों ! हमारी इस दुर्दशा का कारण हमारी लापरवाही हैं। हमारी दशा उस रोगी की-सी हो रही है जो औषधि को हाथ में लेकर देखता है मगर मुँह तक नहीं ले जाता। हॉँ भाइयो। हम ऑंखे रचाते है मगर अंधे है, हम कान रखते है मगर बहरें है, हम जबान रखते है मगर गूँगे हैं। परंतु अब वह दिन नहीं रहे कि हमको अपनी जीत की बुराइयाँ न दिखायी देती हो। हम उनको देखते है और मन मे उनसे घृणा भी करते है। मगर जब कोई समय आ जाता है तो हम उसी पुरानी लकीर पर जाते है और नर्अ बातों को असंभव और अनहोनी समझकर छोड़ देते है। हमारे डोंगे का पार लगाना, जब कि मल्लाह ऐसे बाद और कादर है, कठिन ही नहीं प्रत्युत दुस्साध्य है।

अमृतराय ने बड़े ऊँचे स्वरों में उस कागज को पढ़ा। जब वह चुप हुए तो दाननाथ ने कहा—नि:संदेह बहुत ठीक कहा है। हमारी दशा के अनुकूल ही है।

अमृतराय—मुझकों रह-रहकर अपने ऊपर क्रोध आता है कि मैंने सारी स्पीच क्यों न नकल कर ली। अगर कहीं अंग्रेजी स्पीच होती तो सबेरा होते ही सारे समाचारपत्रों में छप जाती। नहीं तो शायद कहीं खुलासा रिपोर्ट छपे तो छपे। (रूककर) तब मैं जलसे से लौटकर आया हूँ तब से बराबर वही शब्द मेरे कान में गूँज रहे है। प्यारे मित्र। तुम मेरे विचारों को पहले से जानते हो, आज की स्पीच ने उनको और भी मजबूत कर दिया है। आज से मेरी प्रतिज्ञा है कि मै अपने को जाति पर न्यौछावर कर दूँगा। तन, मन, धन सब अपनी गिरी हुई जाति की उन्नति के निमित्त अर्पण कर दूँगा। अब तक मेरे विचार मुझ ही तक थे पर अब वे प्रत्यक्ष होंगे। अब तक मेरा हदय दुर्बल था, मगर आज इसमें कई दिलों का बल आ गया है। मैं खूब जानता हूँ कि मै कोई उच्च-पदवी नहीं रखता हूं। मेरी जायदाद भी कुछ अधिक नहीं है। मगर मैं अपनी सारी जमा जथा अपने देश के उद्वार के लिए लगा दूँगा। अब इस प्रतिज्ञा से कोई मुझको डिगा नहीं सकता। (जोश से)ऐ थककर बैठी हुई कौम। ले, तेरी दुर्दशा पर ऑंसू बहानेवालों में एक दुखियारा और बढ़ा। इस बात का न्याय करना कि तुझको इस दुखियारे से कोई लाभ हागा या नहीं, समय पर छोड़ता हूँ।

यह कहकर अमृतराय जमीन की ओर देखने लगे। दाननाथ, जो उनके बचपन के साथी थे और उनके बचपन के साथी थे और उनके स्वभाव से भलीभॉँति परिचित थे कि जब उनको कोई धुन मालूम हुआ। बोले—अच्छा मैंने मान लिया कि अकेले लोगों ने बड़ेबड़े काम किये हैं और आप भी अपनी जाति का कुछ न कुछ भला कर लेंगे मगर यह तो सोचिये कि आप उन लोगों को कितना दुख पहुँचायेंगे जिनका आपसे कोई नाता है। प्रेमा से बहुत जल्द आपका विवाह होनेवाला है। आप जानते है कि उसके मॉँ-बाप परले सिरे के कटटर हिन्दू है। जब उनको आपकी अंग्रेजी पोशाक और खाने-पीने पर शिकायत है तो बतलाइए जब आप सामजिक सुधार पर कमर बांधेगे तब उनका क्या हाल होगा। शायद आपको प्रेमा से हाथ धोना पड़े।

दाननाथ का यह इशारा कलेजे में चुभ गया। दो-तीन मिनट तक वह सन्नाटे में जमीन की तरफ ताकते रहे। जब सर उठाया तो ऑंखे लाल थीं और उनमें ऑंसू डबडबाये थे। बोले—मित्र, कौम की भलाई करना साधारण काम नहीं है। यद्यपि पहले मैने इस विषय पर ध्यान न दिया था, फिर भी मेरा दिल इस वक्त ऐसा मजबूत हो रहा है कि जाति के लिए हर एक दुख भोगने को मै कटिबद्व हूँ। इसमें संदेह नहीं कि प्रेमा से मुझको बहुत ही प्रेम था। मैं उस पर जान देता था और अगर कोई समय ऐसा आता कि मुझको उसका पति बनने का आनंद मिलता तो मैं साबित करता कि प्रेम इसको कहते है। मगर अब प्रेमा की मोहनी मूरत मुझ पर अपना जादू नहीं चला सकती। जो देश और जाति के नाम पर बिक गया उसके दिल मे कोई दूसरी चीज जगह नहीं पा सकती। देखिए यह वह फोटो है जो अब तक बराबर मेरे सीने से लगा रहता था। आज इससे भी अलग होता हूं यह कहते-कहते तसवीर जेब से निकली और उसके पुरजे-पुरजे कर डाले, ‘प्रेमा को जब मालूम होगा कि अमृतराय अब जाति पर जान देने लगा, उसके दिन में अब किसी नवयौवना की जगह नही रही तो वह मुझे क्षमा कर देगी।

दाननाथ ने अपने दोस्त के हाथों से तसवीर छीन लेना चाही। मगर न पा सके। बोले—अमृतराय बड़े शोक की बात है कि तुमने उस सुन्दरी की तसवीर की यह दशा की जिसकी तुम खूब जानते हो कि तुम पर मोहित है। तुम कैसे निठुर हो। यह वही सुंदरी है जिससे शादी करने का तुम्हारे वैकुंठवासी पिता ने आग्रह किया था और तुमने खुद भी कई बार बात हारी। क्या तुम नहीं जानते कि विवाह का समय अब बहुत निकट आ गया है। ऐसे वक्त में तुम्हारा इस तरह मुँह मोड़ लेना उस बेचारी के लिए बहुत ही शोकदायक होगा।

इन बातों को सुनकर अमृतराय का चेहरा बहुत मलिन हो गया। शायद वे इस तरह तस्वीर के फाड़ देने का कुछ पछतावा करने लगे। मगर जिस बात पर अड़ गये थे उस पर अड़े ही रहे। इन्हीं बातों में सूर्य अस्त हो गया। अँधेरा छा गया। दाननाथ उठ खड़े हुए। अपनी बाइसिकिल सँभाली और चलते-चलते यह कहा—मिस्टर राय। खूब सोच लो। अभी कुछ नहीं बिंगड़ा है। आओ आज तुमको गंगा की सैर करा लाये। मैंने एक बजरा किराये पर ले रक्खा है। उस पर चॉँदनी रात में बड़ी बहार रहेगी।

अमृतराय—इस समय आप मुझको क्षमा कीजिए। फिर मिलूँगा।

दाननाथ तो यह बातचीत करके अपने मकान को रवाना हुए और अमृतराय उसी अँधेरे में, बड़ी देर तक चुपचाप खड़े रहे। वह नहीं मालूम क्या सोच रहे थे। जब अँधेरा अधिक हुआ तो वह जमीन पर बैठ गये। उन्होंने उस तसवीर के पुर्जे सब एक-एक करके चुन लिये। उनको बड़े प्यार से सीने में लगा लिया और कुछ सोचते हुए कमरे में चले गए।

बाबू अमृतराय शहर के प्रतिष्ठित रईसों में समझे जाते थे। वकालत का पेशा कई पुश्तों से चला आता था। खुद भी वकालत पास कर चुके थे। और यद्यपि वकालत अभी तक चमकी न थी, मगर बाप-दादे ने नाम ऐसा कमाया था कि शहर के बड़े-बड़े रईस भी उनका दाब मानते थे। अंग्रेजी कालिज मे इनकी शिक्षा हुई थी और यह अंग्रेजी सभ्यता के प्रेमी थे। जब तक बाप जीते थे तब तक कोट-पतलून पहनते तनिक डरते थे। मगर उनका देहांत होते ही खुल पड़े। ठीक नदी के समीप एक सुंदर स्थान पर कोठी बनवायी। उसको बहुत कुछ खर्च करके अंग्रेजी रीति पर सजाया। और अब उसी में रहते थे। ईश्वर की कृपा से किसी चीज कीकमी न थी। धन-द्रव्य, गाड़ी-घोड़े सभी मौजूद थे।

अमृतराय को किताबों से बहुत प्रेम था। मुमकिन न था कि नयी किताब प्रकाशित हो और उनके पास न आवे। उत्तम कलाओं से भी उनकी तबीयत को बहुत लगाव था। गान-विद्या पर तो वे जान देते थे। गो कि वकालत पास कर चुके थे मगर अभी वह विवाह नहीं हुआ था। उन्होने ठान लिया था कि जब वह वकालत खूब न चलने लगेगी तब तक विवाह न करूँगा। उस शहर के रईस लाला बदरीप्रसाद साहब उनको कईसाल से अपनी इकलौती लड़की प्रेमा के वास्ते, चुन बैठे थे। प्रेमा अति सुंदर लड़की थी और पढ़ने लिखने , सीने पिरोने में निपुण थी। अमृतराय के इशारे से उसको थोड़ी सही अंग्रेजी भी पढ़ा दी गयी थी जिसने उसके स्वभाव में थोड़ी-सी स्वतंत्रता पैदा कर दी थी। मुंशी जी ने बहुत कहने-सुनने से दोनो प्रेमियों को चिटठी पत्री लिखने की आज्ञा दे दी थी। और शायद आपस में तसवीरों की भी अदला-बदली हो गये थी।

बाबू दाननाथ अमृतराय के बचपन के साथियों में से थे। कालिज मे भी दोनों का साथ रहा। वकालत भी साथ पास की और दो मित्रों मे जैसी सच्ची प्रीति हो सकती है वह उनमे थी। कोई बात ऐसी न थी जो एक दूसरे के लिए उठा रखे। दाननाथ ने एक बार प्रेमा को महताबी पर खड़े देख लिया था। उसी वक्त से वह दिल में प्रेमा की पूजा किया करता था। मगर यह बात कभी उसकी जबान पर नहीं आयी। वह दिल ही दिल में घुटकर रह जाता। सैकड़ों बार उसकी स्वार्थ दृष्टि ने उसे उभारा था कि तू कोई चाल चलकर बदरीप्रसाद का मन अमृतराय से फेर दे, परंतु उसने हर बार इस कमीनेपन के ख्याल को दबाया था। वह स्वभाव का बहुत निर्मल और आचरण का बहुत शुद्व था। वह मर जाना पसंद करता मगर किसी को हानि पहुँचाकर अपना मनोरथ कदापि पूरा नहीं कर सकता था। यह भी न था कि वह केवल दिखाने के लिए अमृतराय से मेल रखता हो और दिल में उनसे जलता हो। वह उनके साथ सच्चे मित्र भाव का बर्ताव करता था।

आज भी, जब अमृतराय ने उससे अपने इरादे जाहिर किये तब उसेन सच्चे दिल से उनको समझाकर ऊँच नीच सुझाया। मगर इसका जो कुछ असर हुआ हम पहले दिखा चुके है। उसने साफ साफ कह दिया कि अगर तुम रिर्फामरों कीमंडली में मिलोगे तो प्रेमा से हाथ धोना पडेगा। मगर अमृतराय ने एक न सुनी। मित्र का जो धर्म है वह दाननाथ ने पूरा कर दिया। मगर जब उसने देखा कि यह अपने अनुष्ठान पर अड़े ही रहेगें तो उसको कोई वजह न मालूम हुई कि मैं यह सब बातें बदरी प्रसाद से बयान करके क्यों न प्रेमा का पति बनने का उद्योग करूँ। यहां से वह यही सब बातें सोचते विचारते घर पर आये। कोट-पतलून उतार दिया और सीधे सादे कपड़े पहिन मुंशी बदरीप्रसाद के मकान को रवाना हुए। इस वक्त उसके दिन की जो हालत हो रही थी, बयान नही की जा सकती। कभी यह विचार आता कि मेरा इस तरह जाना, लोगों को मुझसे नाराज न कर दे। मुझे लोग स्वार्थी न समझने लगें। फिर सोचता कि कहीं अमृतराय अपना इरादा पलट दें और आश्चर्य नहीं कि ऐसा ही हो, तो मैं कहीं मुँह दिखाने योग्य न रहूँगा। मगर यह सोचते सोचते जब प्रेमा की मोहनी मूरत ऑंख के सामने आ गयी। तब यह सब शंकाए दूर हो गयी। और वह बदरीप्रसाद के मकान पर बातें करते दिखायी दिये।

 

प्रेमा भाग 2

जलन बुरी बला है

लाला बदरीप्रसाद अमृतराय के बाप के दोस्तों में थे और अगर उनसे अधिक प्रतिष्ठित न थे तो बहुत हेठे भी न थे। दोनो में लड़के-लड़की के ब्याह की बातचीत पक्की हो गयी थी। और अगर मुंशी धनपतराय दो बरस भी और जीते तो बेटे का सेहरा देख लेते। मगर कालवश हो गये। और यह अर्मान मन मे लिये वैकुण्ठ को सिधारे। हां, मरते मरते उनकी बेटे हो यह नसीहत थी कि मु० बदरीप्रसाद की लड़की से अवश्य विवाह करना। अमृतराय ने भी लजाते लजाते बात हारी थी। मगर मुंशी धनपतराय को मरे आज पॉंच बरस बीत चुके थे। इस बीच में उन्होने वकालत भी पास कर ली थी और अच्छे खासे अंग्रेज बन बैठे थे। इस परिवर्तन ने पब्लिक की ऑंखो में उनका आदर घटा दिया था। इसके विपरीत बदरीप्रसाद पक्के हिन्दू थे। साल भर, बारहों मास, उनके यहां श्रीमद्भागवत की कथा हुआ करती थी। कोई दिन ऐसा न जाता कि भंडार में सौ पचास साधुओं का प्रसाद न बनता हो। इस उदारता ने उनको सारे शहर मेंसव्रप्रिय बना दिया था। प्रतिदिन भोर होते ही, वह गंगा स्नान को पैदल जाया करते थे ओर रास्ते में जितने आदमी उनको देखते सब आदर से सर झुकाते थे और आपस में कानाफुसी करते कि दुखियारों का यह दाता सदा फलता फूलता रहे।

यद्यपि लाला बदरीप्रसाद अमृतराय की चाल-ढाल को पसंद न करते थे और कई बेर उनको समझा कर हार भी चुके थे, मगर शहर में ऐसा होनहार, विद्यावान, सुंदर और धनिक कोई दूसरा आदमी न था जो उनकी प्राण से अधिक प्रिय लड़की प्रेमा के पति बनने के योग्य हो। इस कारण वे बेबस हो रहे थे। लड़की अकेली थी, इसलिए दूसरे शहर में ब्याह भी न कर सकते थे। इस लड़की के गुण और सुंदरता की इतनी प्रशंसा थी कि उस शहर के सब रईस उसे चाहते थे। जब किसी काम काज के मौके पर प्रेमा सोलहों श्रंगार करके जीती तो जितनी और स्त्रियॉँ वहॉँ होतीं उसके पैरों तले आंखे बिछाती। बडी बूढी औरतें कहा करती थी कि ऐसी सुंदर लड़की कहीं देखने में नहीं आई। और जैसी प्रेमा औरतों में थी वैसे ही अमृतराय मर्दो में थे। ईश्वर ने अपने हाथ से दोनों का जोड़ मिलाया था।

हॉँ, शहर के पुराने हिन्दू लोग इस विवाह के खिलाफ थे। वह कहते कि अमृतराय सब गुण अगर सही, मगर है तो ईसाई। उनसे प्रेमा जैसी लड़की का विवाह करना ठीक नहीं है। मुंशी जी के नातेदार लोग भी इस शादी के विरूद्व थे। इसी खींचातानल में पॉँच बरस बीत चुके थे। अमृतराय भी कुछ बहुत उद्यम न मालूम होते थे। मगर इस साल मुंशी बदरीप्रसाद ने भी हियाब किया, और अमृतराय भी मुस्तैद हुए और विवाह की साइत निश्चय की गयी। अब दोनों तरफ तैयारियां हो रही थी। प्रेमा की मां अमृतराय के नाम पर बिकी हुई थी और लड़की के लिए अभी से गहने पाते बनवाने लगी थी, कि निदान आज यह महाभयानक खबर पहुँची कि अमृतराय ईसाई हो गया है और उसका किसी मेम से विवाह हो रहा है।

इस खबर ने मुंशी जी के दिल पर वही काम किया जो बिजली किसी हरे भरे पेड़ परगिर कर करती है। वे बूढ़े तो थे ही, इसधक्के को न सह सके और पछ़ाड खाकर जमीन पर गिर पड़े। उनका बेसुध होना था कि सारा भीतर बाहर एक हो गया। तमांम नौकर चाकर, अपने पराये इकटठे हो गये और ‘क्या हुआ’। ‘क्या हुआ’। का शोर मचने लगा। अब जिसको देखिये यही कहता फिरता है कि अमृतराय ईसाई हो गया है। कोई कहता है थाने में रपट करो, कोई कहता है चलकर मारपीट करो। बाहर से दम ही दम में अंदर खबर पहुँची। वहा भी कुहराम मच गया। प्रेमा की मां बेचारी बहुत दिनों से बीमार थी। और उन्हीं की जिद थी कि बेटी की शादी जहॉँ तक जल्द हो जाय अच्छा है। यद्यपि वह पुराने विचार की बूढ़ी औरत थी और उनको प्रेमा का अमृतराय के पास प्रेम पत्र भेजना एक ऑंख न भाता था। तथापि जब से उन्होने उनको एक बार अपने आंगन में खड़े देख लिया था तब से उनको यही धुन सवार थी कि मेरी ऑंखों की तारा का विवाह हो तो उन्हीं से हो। वह इस वक्त बैठी हुई बेटी से बातचीत कर रही थी कि बाहर से यह खबर पहूँची। वह अमृतराय को अपना दमाद समझने लगी थी—और कुछ तो न हो सका बेटी को गले लगाकर रोने लगी। प्रेमा ने आसू को रोकना चाहा, मगर न रोक सकी। उसकी बरसों की संचित आशारूपी बेल-क्षण मात्र में कुम्हला गयी। हाय। उससे रोया भी न गया। चित्त व्याकुल हो गया। मॉँ को रोती छोड़ वह अपने कमरे में आयी, चारपाई पर धम से गिर पड़ी। जबान से केवल इतना निकला कि नारायण, अब कैसे जीऊँगी और उसके भी होश जाते रहे। तमाम धर की लौड़ियॉँ उस पर जान देती थी। सब की सब एकत्र हो गयीं। और अमृतराय को ‘हत्यारे’ और ‘पापी’ की पदवियॉँ दी जाने लगी।

अगर घर में कोई ऐसा था कि जिसको अमृतराय के ईसाई होने का विश्वास न आया तो वह प्रेमा केभाई बाबू कमला प्रसाद थे। बाबू सहाब बड़े समझदार आदमी थे। उन्होंने अमृतराय के कई लेख मासिकपत्रों में देखे थे, जिनमें ईसाई मत का खंडन किया गया था। और ‘हिन्दू धर्म की महिमा’ नाम की जो पुस्तक उन्होंने लिखी थी उसकी तो बड़े-बड़े पंडितो ने तारीफ की थी। फिर कैसे मुमकिन था कि एकदम उनके खयाल पलट जाते और वह ईसाई मत धारण कर लेते। कमलाप्रसाद यही सोच रहे थे किदाननाथ आते दिखायी दिये। उनके चेहरे से घबराहट बरस रही थी। कमलाप्रसाद ने उनको बड़े आदर से बैठाया और पूछने लगे—यार, यह खबर कहॉं से उड़ी? मुझे तो विश्वास नहीं आता।

दाननाथ—विश्वास आने की कोई बात भी तो हो। अमृतराय का ईसाई होना असंभव है। हां वह रिफार्म मंडली में जा मिले है, मुझसे भूल हो गयी कि यही बात तुमसे न कही।

कमलाप्रसाद—तो क्या तुमने लाला जी से यह कह दिया?

दाननाथ ने संकोच से सर झुका कर कहा—यही तो भुल हो गई। मेरी अक्ल पर पत्थर पड़ गये थे। आज शाम को जब अमृतराय से मुलाकात करने गया तो उन्होने बात बात में कहा कि अब मैं शादी न करूँगा। मैंने कुछ न सोचा विचारा और यह बात आकर मुंशी जी से कह दी। अगर मुझको यह मालूम होता कि इस बात का यह बतंगड हो जायगा तो मैं कभी न कहता। आप जानते हैं कि अमृतराय मेरे परम मित्र है। मैंने जो यह संदेशा पहुँचाया तो इससे किसी की बुराई करने का आशय न था। मैंने केवल भलाइ की नीयत से यह बात कही थी। क्या कहूँ, मुंशी जी तो यह बात सुनते ही जोर से चिल्ला उठे—‘वह ईसाई हो गया। मैंने बहुतेरा अपना मतलब समझाया मगर कौन सुनता है। वह यही कहते मूर्छा खाकर गिर पड़े।

कमलाप्रसाद यह सुनते ही लपककर अपने पिता के पास पहूंचे। वह अभी तक बेसुध थे। उनको होश में लाये और दाननाथ का मतलब समझाया और फिर घर में पहूंचे। उधर सारे मुहल्ले की स्त्रियाँ प्रेमा के कमरे में एकत्र हो गयी थीं और अपने अपने विचारनुसार उसको सचेत करने की तरकीबें कर रही थी। मगर अब तक किसी से कुछ न बन पड़ा। निदान एक सुंदर नवयौवना दरवाजे से आती दिखायी दी। उसको देखते ही सब औरतो ने शोर मचाया जो पूर्णा आ गयी। अब रानी को चेत आ जायेगी। पूर्णा एक ब्राह्मणी थी। इसकी उम्र केवल बीस वर्ष की होगी। यह अति सुशीला और रूपवती थी। उसके बदन पर सादी साड़ी और सादे गहने बहुत ही भले मालूम होते थे। उसका विवाह पंडित बसंतकुमार से हुआ था जो एक दफ्तर में तीस रूपये महीने के नौकर थे। उनका मकान पड़ोस ही में था। पूर्णा के घर में दूसरा कोई नथा। इसलिए जब दस बजे पंडित जी दफ्तर को चले जाते तो वह प्रेमा के घर चली आती और दोनो सखिया शाम तक अपने अपने मन की बातें सुना करतीं। प्रेमा उसको इतना चाहती थी कि यदि वह कभी किसी कारण से न आ सकती तो स्वयं उसके धर चली जाती। उसे देखे बिना उसको कल न पड़ती थी। पूर्णा का भी यही हाल था।

पूर्णा ने आते ही सब स्त्रियों को वहॉँ से हटा दिया, प्रेमा को इत्र सुघाया केवडे और गुलाब का छींटा मुख पर मारा। धीरे धीरे उसके तलवे सहलाये, सब खिड़कियॉँ खुलवा दीं। इस तरह जब ठंडक पहुँची तो प्रेमा ने ऑंखे खोल दीं और चौंककर उठ बैठी। बूढ़ी मॉँ की जान में जान आई। वह पूर्णा की बलायें लेने लगी। और थोड़ी देर में सब स्त्रियाँ प्रेमा को आशीर्वाद देते हुए सिंधारी। पूर्णा रह गई। जब एकांत हुआ तो उसने कहा—प्यारी प्रेमा। ऑंखे खोलो। यह क्या गत बना रक्खी है।

प्रेमा ने बहुत धीरे से कहा—हाय। सखी मेरी तो सब आशाऍं मिटटी में मिल गयीं।

पूर्णा—प्यारी ऐसी बातें न करों। जरा दिल को सँभालो और बताओ तुमको यह खबर कैसे मिली?

प्रेमा—कुछ न पूछो सखी, मैं बड़ी अभागिनी हूँ (रोकर) हाय, दिल बैठा जाता है। मैं कैसे जीऊँगी।

पूर्णा—प्यारी जरा दिल को ढारस तो दो। मै अभी सब पता लगये देती हूँ। बाबू अमृतराय पर जो दोष लोगों ने लगाया है वह सब झूठ है।

प्रेमा—सखी, तुम्हारे मुँह में घी शक्कर। ईश्वर करें तुम्हारी बातें सच हों। थोड़ी देर चुप रहने के बाद वह फिर बोली—कहीं एक दम के लिए मेरी उस कठकलेजिये से भेट हो जाती तो मैं उनका क्षेम कुशल पूछती। फिर मुझे मरने का रंज न होता।

पूर्णा—यह कैसी बात कहती हो सखी, मरे वह जो तुमको देख न सके। मुझसे कहो मैं तांबे के पत्र पर लिख दूं कि अमृतराय अगर ब्याह करेंगे तो तुम्हीं से करेंगे। तुम्हारे पास उनके बीसियो पत्र पड़े है। मालूम होता है किसी ने कलेजा निकाल के धर दिया है। एक एक शब्द से सच्चा प्रेम टपकता है। ऐसा आदमी कभी दगा नहीं कर सकता। प्रेमा—यही सब सोच सोच कर तो आज चार बरस से दिल को ढारस दे रही हूं। मगर अब उनकी बातों का मुझे विश्वास नहीं रहा। तुम्हीं बताओ, मैं कैसे जानू कि उनको मुझसे प्रेम है? आज चार बरस के दिन बीत गयें । मुझे तो एक एक दिन काटना दूभर हो रहा है और वहॉँ कुछ खबर ही नहीं होती। मुझे कभी कभी उनके इस टालमटोल पर ऐसी झुँझलाहट होती है कि तुमसे क्या कहूं। जी चाहता है उनको भूल जाऊँ। मगर कुछ बस नहीं चलता। दिल बेहया हो गया।

यहॉँ अभी यही बातें हो रही थी कि बाबू कमलाप्रसाद कमरे में दाखिल हुए। उनको देखते ही पूर्णा ने घूघँट निकाल ली और प्रेमा ले भी चट ऑंखो से ऑंसू पोंछ लिए और सँभल बैठी। कमलाप्रसाद—प्रेमा, तुम भी कैसी नादान हो। ऐसी बातों पर तुमको विश्वास क्योंकर आ गया? इतना सुनना था कि प्रेमा का मुखड़ा गुलाब की तरह खिल गया। हर्ष के मारे ऑंखे चमकने लगी। पूर्णा ने आहिस्ता से उसकी एक उँगली दबायी। दोनों के दिल धड़कने लगे कि देखें यह क्या कहते है।

कमलाप्रसाद—बात केवल इतनी हुई कि घंटा भर हुआ, लाला जी के पास बाबू दाननाथ आये हुए थे। शादी ब्याह की चर्चा होने लगी तो बाबू साहब ने कहा कि मुझे तो बाबू अमृतराय के इरादे इस साल भी पक्के नहीं मालू होते। शायद वह रिफार्म मंडली में दाखिल होने वाले है। बस इतनी सी बात लोगों ने कुछ का कुछ समझ लिया। लाला जी अधर बेहोश होकर गिर पड़े। अम्मा उधर बदहवास हो गयी। अब जब तक उनको संभालू कि सारे घर में कोलाहल होने लगा। ईसाई होना क्या कोई दिल्लगी हैं। और फिर उनको इसकी जरूरत ही क्या है। पूजा पाठ तो वह करते नहीं तो उन्हें क्या कुत्ते ने काटा है कि अपना मत छोड़ कर नक्कू बनें। ऐसी बे सर-पैर की बातों पर एतबार नहीं करना चाहिए। लो अब मुँह धो डालो। हँसी-खुशी की बातचीत की। मुझे तुम्हारे रोने-धोने से बहुत रंज हुआ। यह कहकर बाबू कमलाप्रसाद बाहर चले गये और पूर्णा ने हंसकर कहा—सुना कुछ मैं जो कहती थी कि यह सब झूठ हैं। ले अब मुंह मीठा करावो।

प्रेमा ने प्रफुल्लित होकर पूर्णा को छाती से लिपटा लिया और उसके पतले पतले होठों को चूमकर बोली—मुँह मीठा हुआ या और लोगी?

पूर्णा—यह मिठाइयॉँ रख छोडो उनके वास्ते जिनकी निठुराई पर अभी कुढ़ रही थी। मेरे लिए तो आगरा वाले की दुकान की ताजी-ताजी अमृतियॉँ चाहिए।

प्रेमा—अच्छा अब की उनको चिटठी लिखँगी तो लिख दूँगी कि पूर्णा आपसे अमृतियॉँ मॉँगती है। पूर्णा—तुम क्या लिखोगी, हॉँ, मैं आज का सारा वृतांत लिखूँगी। ऐसा-ऐसा बनाऊँगी कि तुम भी क्या याद करो। सारी कलई खोल दूँगी।

प्रेमा—(लजाकर) अच्छा रहने दीजिए यह सब दिल्लगी। सच मानो पूर्णा, अगर आज की कोई बात तुमने लिखी तो फिर मैं तुमसे कभी न बोलूगी।

पूर्णा—बोलो या न बोलो, मगर मैं लिखूँगी जरूर। इसके लिए तो उनसे जो चाहूँगी ले लूँगी। बस इतना ही लिख दूँगी कि प्रेमा को अब बहुत न तरसाइए।

प्रेमा—(बात काटकर) अच्छा लिखिएगा तो देखूँगी। पंडित जी से कहकर वह दुर्गत कराऊँ कि सारी शरारत भूल जाओ। मालूम होता है उन्होंने तुम्हें बहुत सर चढ़ा रखा है।

अभी दोनों सखियॉँ जी भर कर खुश न होने पायी थीं कि उनको रंज पहुँचाने का फिर सामानहो गया। प्रेमा की भावज अपनी ननद से हरदम जला करती थी। अपने सास-ससुर से यहॉँ तक कि पति से भी, क्रद रहती कि प्रेमा में ऐसे कौन से चॉँद लगे कि सारा घराना उन पर निछावर होने को तैयार रहता है। उनका आदर सब क्यों करते है मेरी बात तक कोइ नहीं पूछता। मैं उनसे किसी बात मे कम नहीं हूँ। गोरेपन में, सुंदरता में, श्रृंगार मे मेरा नंबर उनसे बराबर बढ़ा-चढ़ा रहता है। हॉँ वह पढ़ी-लिखी है। मैं बौरी इस गुण को नहीं जानती। उन्हें तो मर्दो में मिलना है, नौकरी-चाकरी करना है, मुझ बेचारी के भाग में तो घर का काम काज करना ही बदा है। ऐसी निरलज लड़की। अभी शादी नहीं हुई, मगर प्रेम-पत्र आते-जाते है।, तसवीरें भेजी जाती है। अभी आठ-नौ दिन होते है कि फूलों के गहने आये है। ऑंखो का पानी मर गया है। और ऐस कुलवंती पर सारा कुनबा जान देता है। प्रेमा उनके ताने और उनकी बोली-ठोलियो को हँसी में उड़ा दिया करती और अपने भाई के खातिर भावज को खुश रखने की फिक्र में रहती थी। मगर भाभी का मुँह उससे हरदम फूला रहता। आज उन्होंने ज्योही सुना कि अमृतराय ईसाई हो गये है तो मारे खुशी के फूली नहीं समायी। मुसकराते, मचलते, मटकते, प्रेमा के कमरे में पहुँची और बनावट की हँसी हँसकर बोली—क्यों रानी आज तो बात खुल गयी। प्रेमा ने यह सुनकर लाज से सर झुका लिया मगर पूर्णा बोली—सारा भॉँडा फूट गया। ऐसी भी क्या कोई लड़की मर्दो पर फिसले। प्रेमा ने लजाते हुए जवाब दिया—जाओ। तुम लोगों की बला से । मुझसे मत उलझों।

 

भाभी—नहीं-नहीं, दिल्लगी की बात नहीं। मर्द सदा के कठकलेजी होते है। उनके दिल में प्रेम होता ही नहीं। उनका जरा-सा सर धमकें तो हम खाना-पीना त्याग देती है, मगर हम मर ही क्यों न जायँ उनको जरा भी परवा नहीं होती। सच है, मर्द का कलेजा काठ का।

पूर्णा—भाभी। तुम बहुत ठीक कहती हो। मर्दो का कलेजा सचमुच काठ का होता है। अब मेरे ही यहॉँ देखों, महीने में कम-सेकम दस-बारह दिन उस मुये साहब के साथ दोरे पर रहते है। मै तो अकेली सुनसान घर में पड़े-पड़े कराहा करती हूँ। वहॉँ कुछ खबर ही नहीं होती। पूछती हूँ तो कहते है, रोना-गाना औरतों का काम है। हम रोंये-गाये तो संसार का काम कैसे चले।

भाभी—और क्या, जानो संसार अकेले मर्दो ही के थामे तो थमा है। मेरा बस चले तो इनकी तरफ ऑंख उठाकर भी न देखू। अब आज ही देखो, बाबू अमृतराय का करतब खुला तो रानी ने अपनी कैसी गत बना डाली। (मुस्कराकर) इनके प्रेम का तो यह हाल है और वहॉँ चार वर्ष से हीला हवाला करते चले आते है। रानी। नाराज न होना, तुम्हारे खत पर जाते है। मगर सुनती हूँ वहॉँ से विरले ही किसी खत का जवाब आता है। ऐसे निमोहियों से कोई क्या प्रेम करें। मेरा तो ऐसों से जी जलता है। क्या किसी को अपनी लड़की भारी पड़ी है कि कुऍं में डाल दें। बला से कोई बड़ा मालदार है, बड़ा सुंदर है, बड़ी ऊँची पदवी पर है। मगर जब हमसे प्रेम ही न करें तो क्या हम उसकी धन-दौलत को लेकर चाटै? संसार में एक से एक लाल पड़े है। और, प्रेमा जैसी दुलहिन के वास्ते दुलहों का काल।

प्रेमा को यह बातें बहुत बुरी मालूम हुई, मगर मारे संकोच के कुछ बोल न सकी। हॉँ, पूर्णा ने जवाब दिया—नहीं, भाभी, तुम बाबू अमृतराय पर अन्याय कर रही हो। उनको प्रेमा से सच्चा प्रेम है। उनमें और दूसरे मर्दो मे बड़ा भेद है।

भाभी—पूर्ण अब मुंह न खुलवाओ। प्रेम नहीं पत्थर करते है? माना कि वे बड़े विद्यावाले है और छुटपने में ब्याह करना पसंद नहीं करते। मगर अब तो दोनो में कोई भी कमसिन नहीं है। अब क्या बूढे होकर ब्याह करेगे? मै तो बात सच कहूंगी उनकी ब्याह करने की चेष्ठा ही नहीं है। टालमटोल से काम निकालना चाहते है। यही ब्याह के लक्षण है कि प्रेमा ने जो तस्वीर भेजी थी वह टुकड़े-टुकड़े करके पैरों तले कुचल डाली। मैं तो ऐसे आदमी का मुँह भी न देखूँ।

प्रेमा ने अपनी भावज को मुस्कराते हुए आते देखकर ही समझ लिया था कि कुशल नहीं है। जब यह मुस्कराती है, तो अवश्य कोई न कोई आग लगाती है। वह उनकी बातचीत का ढंग देखकर सहमी जाती थी कि देखे यह क्या सुनावनी सुनाती है। भाभी की यह बात तीर की तरह कलेजे के पार हो गई हक्का बक्का होकर उसकी तरफ ताकने लगी, मगर पूणा को विश्वास न आया, बोली यह क्या अनर्थ करती हो, भाभी। भइया अभी आये थे उन्होने इसकी कुछ भी चर्चा नही की। मै। तो जानती हूं कि पहली बात की तरह यह भी झूठी है। यह असंभव है कि वह अपनी प्रेमा की तसवीर की ऐसी दुर्गत करे।

भाभी—तुम्हारे न पतियाने को मै क्या करूं, मगर यह बात तुम्हारे भइया खुद मुझसे कह रहे थे। और फिर इसमें बात ही कौन-सी है, आज ही तसवीर मँगा भेजो। देखो क्या जवाब देते है। अगर यह बात झूठी होगी तो अवश्य तसवीर भेज देगे। या कम से कम इतना तो कहेगे कि यह बात झूठी है। अब पूर्णा को भी कोई जवाब न सूझा। वह चुप हो गयी। प्रेमा कुछ न बोली। उसकी ऑंखो से ऑंसुओ की धारा बह निकली। भावज का चेहरा ननद की इस दशा पर खिल गया। वह अत्यंत हर्षित होकर अपने कमरे में आई, दर्पण में मुहँ देखा और आप ही आप मग्न होकर बोली—‘यह घाव अब कुछ दिनों में भरेगा।'

 

प्रेमा भाग 3

झूठे मददगार

बाबू अमृतराय रात भर करवटें बदलते रहे। ज्यों-ज्यों उन्होने अपने नये इरादों और नई उमंगो पर विचार किया त्यों-त्यों उनका दिल और भी दृढ़ होता गया और भोर होते-होते देशभक्ति का जोश उनके दिल में लहरें मारने लगा। पहले कुछ देर तक प्रेमा से नाता टूट जाने की चिंता इस लहर पर बॉँध का काम करती रही। मगर अंत में लहरे ऐसी उठीं कि वह बॉँध टूट गया।

सुबह होते ही मुँह-हाथ धो, कपड़े पहिन और बाइसिकिल पर सवार होकर अपने दोस्तों की तरफ चले। पहले पहिल मिस्टर गुलजारीलालबी.ए. एल.एल.बी. के यहॉँ पहुँचे। यह वकील साहब बड़े उपकारी मनुष्य थे और सामाजिक सुधार का बड़ा पक्ष करते है। उन्होंने जब अमुतराय के इरादे ओर उनके पूरे होने की कल्पनाए सुनी तो बहुत खुश हुए और बोले—आप मेरी ओर से निश्चिंत रहिए और मुझे अपना सच्चा हितैषी समझिए। मुझे बहुत हर्ष हुआ कि हमारे शहर में आप जैसे योग्य पुरूष ने इस भारी बोझ को अपने सार लिया। आप जो काम चाहें मुझे सौप दीजिए, मै उसको अवश्य पूरा करूगा और उसमें अपनी बड़ाई समझूँगा।

अमृतराय वकील साहब की बातों पर लटू हो गये। उन्होंने सच्चे दिल से उनको धन्यवाद दिया और कहा कि मैं इश शहर में एक सामाजिक सुधार की सभा स्थापित करना चाहता हूँ। वकील साहब इस बात पर उछल पड़े और कहा कि आप मुझे उस सभा का सदस्य और हितचिन्तक समझें। मैं उसकी मदद दिलोजान से करुँगा। उमृतराय इस अच्छे शगुन होते हुए दाननाथ के घर पहूँचे। हम पहले कह चुके हैं कि दाननाथ के घर पहूँचे। हम पहले कह चुके है कि दाननाथ उनके सच्चे दोस्तों में थे। वे दनको देखते ही बड़े आदर से उठ खड़े हुए और पूछा-क्यों भाई, क्या इरादे हैं?

अमृतराय ने बहुत गम्भीरत से जवाब दिया—मैं अपने इरादे आप पर प्रकट कर चका हूँ और आप जानते हैं कि मैं जो कुछ कहता हूँ वह कर दिखाता हूँ। बस आप के पास केवल इतना पूछना के लिए आया हूँ कि आप इस शुभ कार्य में मेरी कुछ मदद करेंगे या नहीं? दाननाथ सामजिक सुधार को पंसद तो करता था मगर उसके लिए हानी या बदनामी लेना नहीं चाहता था। फिर इस वक्त तो, वह लाला बदरी प्रसाद का कृपापात्र भी बनना चाहता था, इसलिए उसने जवाब दिया—अमृतराय तुम जानते हो कि मैं हर काम में तुम्हारा साथ देने को तैयार हूँ। रुपया पैसा समय, सभी से सहायता करुगॉँ, मगर छिपे-छिपे। अभी मैं इस सभा में खुल्लम-खुल्ला सम्मिलित होकर नुकसान उठाना उचित नहीं समझता। विशेष इस कारण से कि मेरे सम्मिलत होने से सभा को कोई बल नहीं पहुँचेगा।

बाबू अमृतराय ने अधिक वादानुवाद करना अनुचित समझा। इसमें सन्देह नहीं कि उनको दाननाथ से बहुत आशा थी। मगर इस समय वह यहॉँ बहुत न ठहरे और विद्या के लिए प्रसिद्ध थे। जब अमृतराय ने उनसे सभा संबंध बातें कीं तो वह बहुत खुश हुए। उन्होंने अमृतराय को गले लगा लिया और बोले—मिस्टर अमृराय, तुमने मुझे सस्ते छोड़ दिया। मैं खुद कई दिन से इन्हीं बातों के सोच-विचार में डूबा हुआ हूँ। आपने मेरे सर से बोझ उतार लिया। जैसी याग्ता इस काम के करने की आपमें है वह मुझे नाम को भी नहीं। मैं इस सभा का मेम्बर हूँ।

बाबू अमृतराय को पंडित जी से इतनी आशा न थी। उन्होंने सोचा था कि अगर पंडित जी इस काम को पसंद करेंगे तो खुल्लमखुल्ला शरीक होते झिझकेंगे। मगर पंडित जी की बातों ने उनका दिल बहुत बढ़ा दिया। यहॉँ से निकले तो वह अपनी ही ऑंखों में दो इंच ऊँचे मालूम होते थे। अपनी अर्थसिद्धि के नशे में झूमते-झामते और मूँछों पर ताव देते एन.बी. अगरवाल साहब की सेवा में पहुँचें मिस्टर अगरावाला अंग्रेजी और संस्कृत के पंडित थे। व्याख्यान देने में भी निपुण थे और शहर में सब उनका आदर करते थे। उन्होंने भी अमृतराय की सहायता करने का वादा किया और इस सभा का ज्वाइण्ट सेक्रटेरी होना स्वीकार किया। खुलासा यह कि नौ बजते-बजते अमृतराय सारे शहर के प्रसिद्ध और नई रोशनीवाले पुरुषों से मिल आये और ऐसा कोई न था जिसने उनके इरादे की पशंसा न की हो, या सहायता करने का वादा न किया हो। जलसे का समय चार बजे शाम को नियत किया गया।

दिन के दो बजे से अमृतराय के बँगले पर लजसे की तैयारियॉँ होने लगीं। पर्श बिछाये गये। छत में झाड़-फानूस, हॉँडियाँ लटकायी गयीं। मेज और कुर्सियॉँ सजाकर धरी गयी और सभासदों के लिए खाने-पीने का भी प्रबंध किया गया। अमृतराय ने सभा के लिए एक लिए एक नियमावली बनायी। एक व्याख्यान लिखा और इन कामों को पूरा करके मेम्बरों की राह देखने लगे। दो बज गये, तीन बज गये, मगर कोई न आया। आखिर चार भी बजे, मगर किसी की सवारी न आयी। हॉँ, इंजीनियर साहब के पास से एक नौकर यह संदेश लेकर आया कि मैं इस समय नहीं आ सकता।

अब तो अमृराय को चिंता होने लगी कि अगर कोई न आया तो मेरी बड़ी बदनामी होगी और सबसे लज्जित होना पड़ेगा निदान इसी तरह पॉँच बज गए और किसी उत्साही पुरुष की सूरत न दिखाई दी। तब ता अमृतराय को विश्वास हो गया कि लोगों ने मुझे धोखा दिया। मुंशी गुलजरीलाल से उनको बहुत कुछ आशा थी। अपना आदमी उनके पास दौड़ाया। मगर उसने लौटकर बयान किया कि वह घर पर नहीं है, पोलो खेलने चले गये। इस समय तक छ: बजे और जब अभी तक कोई आदमी न पधारा तो अमृतराय का मन बहुत मलिन हो गया। ये बेचारें अभी नौजवान आदमी थे और यद्यपि बात के धनी और धुन के पूरे थे मगर अभी तक झूठे देशभक्तों और बने हुए उद्योगियों का उनको अनुभव न हुआ था। उन्हें बहुत दु:ख हुआ। मन मारे हुए चारपाई पर लेट गये और सोचने लगे की अब मैं कहीं मुँह दिखाने योग्य नहीं रहा। मैं इन लोगों को ऐसा कटिल और कपटी नहीं समझता था। अगर न आना था तो मुझसे साफ-साफ कह दिया होता। अब कल तमाम शहर में यह बात फैल जाएगी कि अमृतराय रईसों के घर दौड़ते थे, मगर कोई उनके दरवाजे पर बात पूछने को भी न गया। जब ऐसा सहायक मिलेगे तो मेरे किये क्या हो सकेगा। इन्हीं खयालों ने थोड़ी देर के लिए उनके उत्साह को भी ठंडा कर दिया।

 

मगर इसी समय उनको लाला धनुषधारीलाल की उत्साहवर्धक बातें याद आयीं। वही शब्द उन्होंने लोगो के हौसले बढ़या थे, उनके कानों में गूँजने लगे—मित्रो, अगर जाति की उन्नति चाहते हो तो उस पर सर्वस्व अर्पण कर दो। इन शब्दों ने उनके बैठते हुए दिल पर अंकुश का काम किया। चौंक कर उठ बैठे, सिगार जला लिया और बाग की क्यारियों में टहले लगे। चॉँदनी छिटकी हुई थी। हवा के झोंके धीरे-धीरे आ रहे थे। सुन्दर फूलों के पौधे मन्द-मन्द लहरा रहे थे। उनकी सुगन्ध चारों ओर फैली हुई थी। अमृतराय हरी-हरी दूब पर बैठ गये और सोचने लगे। मगर समय ऐसा सुहावना था और ऐसा अनन्ददायक सन्नाटा छाया हुआ था कि चंचल चित्त प्रेमा की ओर जा पहुँचा। जेब से तसवीर के पुर्जें निकाल लिये और चॉँदनी रात में उसी बड़ी देर तक गौर से देखते रहे। मन कहता था—ओ अभागे अमृतराय तू क्योंकर जियेगा। जिसकी मूरत आठों पहर तेरे सामने रहती थी, जिसके साथ आनन्द भोगने के लिए तू इतने दिनों विराहागिन में जला, उसके बिना तेरी जान कैसी रहेगी? तू तो वैराग्य लिये है। क्या उसको भी वैरागिन बनायेगा? हत्यारे उसको तुझे सच्चा प्रेम हैं। क्या तू देखता नहीं कि उसके पत्र प्रेम में डूबे हुए रहते है। अमृतराय अब भी भला है। अभी कुछ नहीं बिगड़ा। इन बातों को छोड़ो। अपने ऊपर तरस खाओ। अपने अर्मानों के मिट्टी में न मिलाओ। संसार में तुम्हारे जैसे बहुत-से उत्साही पुरुष पड़े हुए है। तुम्हारा होना न होना दोनों बराबर है। लाला बदरीप्रसाद मुँह खोले बैठे है। शादी कर लो और प्रेमा के साथ प्रेम करो। (बेचैन होकर) हा मैं भी कैसा पागल हूँ। भला इस तस्वरी ने मेरा क्या बिगाड़ा था जो मैंने इसे फाड़ा डाला। हे ईश्वर प्रेमा अभी यह बात न जानती हो।

 

अभी इसी उधेड़बुन में पड़े हुए थे कि हाथों में एक ख़त लाकर दिया। घबराकर पूछा—किसका ख़त है?

नौकर ने जवाब दिया—लाला बदरीप्रसाद का आदमी लाया है।

अमृतराय ने कॉँपते हुए हाथों से पत्री ली और पढ़ने लगे। उसमें लिखा था—

‘‘बाबू अमृतराय, आशीर्वाद

हमने सुना है कि अब आप सनात धर्म को त्याग करके ईसाइसायों की उस मंडली में जो मिले हैं जिसको लोग भूल से सामाजिक सुधार सभा कहते है। इसलिए अब हम अति शोक के साथ कहते हैं कि हम आपसे कोई नाता नहीं कर सकते।

आपका शुभचिंतक

बदरीप्रसाद ।’’

 

इस चिट्टी को अमृतराय ने कई बार पढ़ा और उनके दिल में अग खींचातानी होने लगी। आत्मस्वार्थ कहता था कि इस सुन्दरी को अवश्य ब्याहों और जीवन के सुख उठाइओ। देशभक्ति कहती थी जो इरादा किया है उस पर अड़े रहो। अपना स्वार्थ तो सभी चाहते है। तुम दूसरों का स्वार्थ करो। इस अनित्य जीवन को व्यतीत करने का इससे अच्छा कोई ढंग नहीं है। कोई पन्द्रह मिनट तक यह लड़ाई होती रही। इसका निर्णय केवल दो अक्षर लिखने पर था। देशभक्त ने आत्मसवार्थ को परास्त कर दिया था। आखिर वहॉँ से उठकर कमरे मे गये और कई पत्र कागज ख़बर करने के बाद यह पत्र लिखा—

‘‘महाशय, प्रणाम

कृपा पत्र आया। पढ़कर बहुत दु:ख हुआ। आपने मेरी बहुत दिनों की बँधी हुई आशा तोड़ दी। खैर जैसा आप उचित समझे वैसा करें। मैंने जब से होश सँभाला तब से मैं बराबर सामाजिक सुधार का पक्ष कर सकता हूँ। मुझे विश्वास है कि हमारे देश की उन्नती का इसके सिवाय और कोई उपाय नहीं है। आप जिसको सनातन धर्म समझे हुए बैठै है, वह अविद्या और असभ्यता का प्रत्यक्ष सवरुप है।

आपका कृपाकांक्षी

अमृतराय।

 

प्रेमा भाग 4

जवानी की मौत

समय हवा की तरह उड़ता चला जाता है। एक महीना गुजर गया। जाड़े का कूँच हुआ और गर्मी की लैनडोरी होली आ पहुँची। इस बीच में अमृतराय ने दो-तीन जलसे किये और यद्यपि सभासद दस से ज्यादा कभी न हुए मगर उन्होंने हियाव न छोड़ा। उन्होंने प्रतिज्ञा कर ली थी कि चाहे कोई आवे या न आवे, मगर नियत समय पर जलसा जरुर किया करुगॉँ। इसके उपरान्त उन्होंने देहातों में जा-जाकर सरल-सरल भाषाओं में व्याख्यान देना शुरु किया और समाचार पत्रों में सामाजिक सुधार पर अच्छे-अच्छे लेख भी लिखे। इनकों तो इसके सिवाय कोई काम न था। उधर बेचारी प्रेमा का हाल बहुत बेहाल हो रहा था। जिस दिन उसे-उनकी आखिरी चिट्टी पहुँची थी उसी दिन से उसकी रोगियों की-सी दशा हो रही थी। हर घड़ी रोने से काम था। बेचारी पूर्ण सिरहाने बैठे समझाया करती। मगर प्रेमा को जरा भी चैन न आता। वह बहुधा पड़े-पड़े अमृतराय की तस्वीर को घण्टों चुपचाप देखा करती। कभी-कभी जब बहुत व्याकुल हो जाती तो उसके जी मे आता कि मौ भी उनकी तस्वीर की वही गत करुँ जो उन्होंने मेरी तस्वीर की की है। मगर फिर तुरन्त यह ख्याल पलट खा जाता। वह उस तसवी को ऑंखों से लेती, उसको चूमती और उसे छाती से चिपका लेती। रात में अकेले चारपाई पर पड़े-पड़े आप ही आप प्रेम और मुहब्ब्त की बातें किया करती। अमृराय के कुल प्रेम-पत्रों को उसने रंगीन कागज पर, मोटे अक्षरों, में नकल कर लिया था। जब जी बहुत बेचैन होता तो पूर्ण से उन्हें पढ़वाकर सुनती और रोती। भावज के पास तो वह पहले भी बहुत कम बैठती थी, मगर अब मॉँ से भी कुछ खिंची रहती। क्योंकि वह बेटी की दशा देख-देख कुढ़ती और अमृतराय को इसका करण समझकर कोसती। प्रेमा से यह कठोर वचन न सुने जाते। वह खुद अमृतराय का जिक्र बहुत कम करती। हॉँ, अब पूर्णा या कोई और दूसरी सहेली उनकी बात चलाती तो उसको खूब कान लगाकर सुनाती। प्रेमा एक ही मास में गलकर कॉँटा हो गयी। हाय अब उसको अपने जीवन की कोई आशा न थी। घर के लोग उसकी दवा-दारू में रुपया ठीकरी की तरह फूक रहे थे मगर उसको कुछ फयदा न होता। कई बार लाला बदरीप्रसाद जी के जी में यह बात आई कि इसे अमृतराय ही से ब्याह दूँ। मगर फिर भाई-बहन के डर से हियाव न पड़ता। प्रेमा के साथ बेचारी पूर्णा भी रोगिणी बनी हुई थी।

 

आखिर होली का दिन आया। शहर में चारों ओर अबीर और गुलाल उड़ने लगा, चारों तरफ से कबीर और बिरादरीवालों के यहॉँ से जनानी सवारियॉँ आना शुरु हुई और उसे उनकी खातिर से बनाव-सिगार करना, अच्छे-अच्छे कपड़ा पहनना, उनका आदर-सम्मान करना और उनके साथ होली खेलना पड़ा। वह हँसने, बोलने और मन को दूसरी बातों में लगाने के लिए बहुत कोशिश करती रही। मगर कुछ बस न चला। रोज अकेल में बैठकर रोया करती थी, जिससे कुछ तसकीन हो जाती। मगर आज शर्म के मारे रो भी न सकती थी। और दिन पूर्ण दस बजे से शाम तक बैठी अपनी बातों से उसका दिल बहलाया करती थी मगर थी मगर आज वह भी सवेरे ही एक झलक दिखाकर अपने घर पर त्योहार मना रही थी। हाय पूर्णा को देखते ही वह उससे मिलने के लिए ऐसी झपटी जैसे कोई चिड़िया बहुत दिनों के बाद अपने पिंजरे से निकल कर भागो। दोनो सखियॉँ गले मिल गयीं। पूर्णा ने कोई चीज मॉँगी—शायद कुमकुमे होंगे। प्रेमा ने सन्दूक मगाया। मगर इस सन्दूक को देखते ही उसकी ऑंखों में ऑंसू भर आये। क्योंकि यह अमृतराय ने पर साल होली के दिन उसके पास भेजा था। थोड़ी देर में पूर्णा अपने घर चली गयी मगर प्रेमा घंटो तक उस सन्दूक को देख-देख रोया की।

पूर्णा का मकान पड़ोसी ही में था। उसके पति पण्डित बसंतकुमार बहुत सीधे मगर शैकीन और प्रेमी आदमी थे। वे हर बात स्त्री की इच्छानुसार करते। उन्होंने उसे थोड़ा-बहुत पढ़या भी था। अभी ब्याह हुए दो वर्ष भी न होने पाये थे, प्रेम की उमंगे दोनों ही दिलों में उमड़ हुई थी, और ज्यों-ज्यों दिन बीतते थे त्यों-त्यों उनकी मुहब्बत और भी गहरी होती जाती थी। पूर्णा हरदस पति की सेवा प्रसन्न रहती, जब वह दस बजे दिन को दफ्तर जाने लगते तो वह उनके साथ-साथ दरवाजे तक आती और जब तक पण्डित जी दिखायी देते वह दरवाजे पर खड़ी उनको देखा करती। शाम को जब उनके आने का समय हाता तो वह फिर दरवाजे पर आकर राह देखने लगती। और ज्योंही व आ जाते उनकी छाती से लिपट जाती। और अपनी भोली-भाली बातों से उनकी दिन भर की थकन धो देती। पंडित जी की तरख्वाह तीस रुपये से अधिक न थी। मगर पूर्णा ऐसी किफ़यात से काम चलाती कि हर महीने में उसके पास कुछ न कुछ बच रहता था। पंडित जी बेचारे, केवल इसलिए कि बीवी को अच्छे से अच्छेगहने और कपड़े पहनावें, घर पर भी काम किया करते। जब कभी वह पूर्णा को कोई नयी चीज बनवाकर देते वह फूली न समाती। मगर लालची न थी। खुद कभी किसी चीज के लिए मुँह न खोलती। सच तो यह है कि सच्चे प्रेम के आन्नद ने उसके दिल में पहनने-ओढ़ने की लालसा बाकी न रक्खी थी।

 

आखिर आज होली का दिन आ गया। आज के दिन का क्या पूछना जिसने साल भर चाथड़ों पर काटा वह भी आज कहीं न कहीं से उधार ढूँढ़कर लाता है और खुशी मनाता है। आज लोग लँगोटी में फाग खेलते है। आज के दिन रंज करना पाप है। पंडित जी की शादी के बाद यह दूसरी होली पड़ी थी। पहली होली में बेचारे खाली हाथ थे। बीवी की कुछ खातिर न कर सके थे। मगर अब की उन्होंने बड़ी-बड़ी तैयारियाँ की थी। कोई डढ़ सौ, रुपया ऊपर से कमाया था, उसमें बीवी के वास्ते एक सुन्दर कंगन बनवा था, कई उत्तम साड़ियाँ मोल लाये थे और दोस्तों को नेवता भी दे रक्खा था। इसके लिए भॉँति-भॉँति के मुरब्बे, आचार, मिठाइयॉँ मोल लाये थे। और गाने-बजाने के समान भी इकट्टे कर रक्खे थे। पूर्णा आज बनाव-चुनाव किये इधर-उधर छबि दिखाती फिरती थी। उसका मुखड़ा कुन्दा की तरह दमक रहा था उसे आज अपने से सुन्दर संसार में कोई दूसरी औरत न दिखायी देती थी। वह बार-बार पति की ओर प्यार की निगाहों से देखती। पण्डित जी भी उसके श्रृंगार और फबन पर आज ऐसी रीझे हुए थे कि बेर-बेर घर में आते और उसको गले लगाते। कोई दस बजे होंगे कि पण्डित जी घर में आये और मुस्करा कर पूर्णा से बोले—प्यारी, आज तो जी चाहता है तुमको ऑंखों में बैठे लें। पूर्णा ने धीरे से एक ठोका देकर और रसीली निगाहों से देखकर कहा—वह देखों मैं तो वहॉँ पहले ही से बैठी हूँ। इस छबि ने पण्डित जी को लुभा लिया। वह झट बीवी को गले से लगाकर प्यार करने। इन्हीं बातों में दस बजे तो पूर्णा ने कहा—दिन बहुत आ गया है, जरा बैठ जाव तो उबटन मल दूँ। देर हो जायगी तो खाने में अबेर-सबेर होने से सर दर्द होने लेगेगा।

 

पण्डित जी ने कहा—नहीं-नहीं दो। मैं उबटन नहीं मलवाऊँगा। लाओ धोती दो, नहा आऊँ।

पूर्णा—वाह उबटन मलवावैंगे। आज की तो यह रीति ही है। आके बैठ जाव।

पण्डित—नहीं, प्यारी, इसी वक्त जी नहीं चाहता, गर्मी बहुत है।

पूर्णा ने लपककर पति का हाथ पकड़ लिया और चारपाई पर बैठकर उबटन मलने लगी।

पण्डित—मगर ज़रा जल्दी करना, आज मैं गंगा जी नही जाना चाहता हूँ।

पूर्णा-अब दोपहर को कहॉँ जाओगे। महरी पानी लाएगी, यहीं पर नहा लो।

पण्डित—यही प्यारी, आज गंगा में बड़ी बहार रहेगी।

पूर्णा—अच्छा तो ज़रा जल्दी लौट आना। यह नहीं कि इधर-उधर तैरने लगो। नहाते वक्त तुम बहुत तुम बहुत दूर तक तैर जाया करते हो।

 

थोड़ी देर मे पण्डित जी उबटन मलवा चुके और एक रेश्मी धोती, साबुन, तौलिया और एक कमंडल हाथ मे लेकर नहाने चले। उनका कायदा था कि घाट से जरा अलग नहा करते यह तैराक भी बहुत अच्छे थे। कई बार शहर के अच्छे तैराको से बाजी मार चुके थे। यद्यपि आज घर से वादा करके चले थे कि न तैरेगे मगर हवा ऐसी धीमी-धीम चल रही थी और पानी ऐसा निर्मल था कि उसमे मद्धिम-मद्धिम हलकोरे ऐसे भले मालूम होते थे और दिल ऐसी उमंगों पर था कि जी तैरने पर ललचाया। तुरंत पानी में कूद पड़े और इधर-उधर कल्लोंले करने लगे। निदान उनको बीच धारे में कोई लाल चीजे बहती दिखाया दी। गौर से देखा तो कमल के फूल मालूम हुए। सूर्य की किरणों से चमकते हूए वह ऐसे सुन्दर मालम होते थे कि बसंतकुमार का जी उन पर मचल पड़ा। सोचा अगर ये मिल जायें तो प्यारी पूर्णा के कानों के लिए झुमके बनाऊँ। वे मोटे-ताजे आदमी थे। बीच धारे तक तैर जाना उनके लिए कोई बड़ी बात न थी। उनको पूरा विश्वास था कि मैं फूल ला सकता हूँ। जवानी दीवानी होती है। यह न सोचा था कि ज्यों-ज्यों मैं आगे बढूँगा त्यों-त्यों फूल भी बढ़ेंगे। उनकी तरफ चले और कोई पन्द्रह मिनट में बीच धारे में पहूँच गये। मगर वहॉँ जाकर देखा तो फूल इतना ही दूर और आगे था। अब कुछ-कुछ थकान मालूम होने लगी थी। मगर बीच में कोई रेत ऐसा न था जिस पर बैठकर दम लेते। आगे बढ़ते ही गये। कभी हाथों से ज़ोर मारते, कभी पैरों से ज़ोर लगाते, फूलों तक पहूँचे। मगर उस वक्त तक हाथ-पॉँव दोनों बोझल हो गये थे। यहॉँ तक कि फूलों को लेने के लिए जब हाथ लपकाना चाहा तो उठ न सका। आखिर उनको दॉँतों मे दबाया और लौटे। मगर जब वहॉँ से उन्होंने किनारों की तरफ देखा तो ऐसा मालूम हुआ मानों हजार कोस की मंजिल है। बदन में जरा भी शक्ति बाकी न रही थी और पानी भी किनारे से धारें की तरफ बह रहा था। उनका हियाव छूट गया। हाथ उठाया तो वह न उठे। मानो वह अंग में थे ही नहीं। हाय उस वक्त बसंतकुमार के चेहरे पर जो निराशा और बेबसी छायी हुई थी, उसके खयाल करने ही से छाती फटती है। उनको मालूम हुआ कि मैं डूबा जा रहा हूँ। उस वक्त प्यारी पूर्णा की सुधि आयी कि वह मेरी बाट देख रही होगी। उसकी प्यारी-प्यारी मोहनी सूरत ऑंखें के सामने खड़ी हो गयी। एक बार और हाथ फेंका मगर कुछ बस न चला। ऑंखों से ऑंसू बहने लगे और देखते-देखते वह लहरों में लोप हा गये। गंगा माता ने सदा के लिए उनको अपनी गोद मे लिया। काल ने फूल के भेस मे आकर अपना काम किया।

 

उधर हाल का सुलिए। पंडित जी के चले आने के बाद पूर्णा ने थालियॉँ परसीं। एक बर्तन में गुलाल घोली, उसमें मिलाया। पंडित जी के लिए सन्दूक से नये कपड़े निकाले। उनकी आसतीनों में चुन्नटें डाली। टोपी सादी थी, उसमें सितारें टॉँके। आज माथे पर केसर का टीका लगाना शुभ समझा जाता है। उसने अपने कोमल हाथों से केसर और चन्दन रगड़ा, पान लगाये, मेवे सरौते से कतर-कतर कटोरा में रक्खे। रात ही को प्रेमा के बग़ीचे से सुन्दर कलियॉँ लेती आयी थी और उनको तर कपड़े में लपेट कर रख दिया था। इस समय वह खूब खिल गयी थीं। उनको तागे में गुँथकर सुन्दर हार बनाया और यह सब प्रबन्ध करके अपने प्यारे पति की राह देखने लगी। अब पंडित जी को नहाकर आ जाना चाहिए था। मगर नहीं, अभी कुछ देर नहीं हुई। आते ही होगें, यही सोचकर पूर्णा ने दस मिनट और उनका रास्ता देखा। अब कुछ-कुछ चिंता होने लगी। क्या करने लगे? धूप कड़ी हो रही है। लौटने पर नहाया-बेनहाया एक हो जाएगा। कदाचित यार दोस्तों से बातों करने लगे। नहीं-नहीं मैं उनकों खूब जानती हूँ। नदी नहाने जाते हैं तो तैरने की सुझती है। आज भी तैर रहे होंगे। यह सोचकर उसने आधा घंटे और राह देखी। मगर जब वह अब भी न आये तब तो वह बैचैन होने लगी। महरी से कहा—‘बिल्लों जरा लपक तो जावा, देखो क्या करने लगे। बिल्लों बहुत अच्छे स्वाभव की बुढ़िया थी। इसी घर की चाकरी करते-करते उसके बाल पक गये थे। यह इन दोनों प्राणियों को अपने लड़कों के समान समझती थी। वह तुरंत लपकी हुई गंगा जी की तरफ चली। वहॉँ जाकर क्या देखती है कि किनारे पर दो-तीन मल्लाह जमा हैं। पंडित जी की धोती, तौलिया, साबुन कमंडल सब किनारे पर धरे हुए हैं। यह देखते ही उसके पैर मन-मन भर के हो गए। दिल धड़-धड़ करने लगा और कलेजा मुँह को आने लगा। या नारायण यह क्या ग़जब हो गया। बदहवास घबरायी हुई नज़दीक पहूँची तो एक मल्लाह ने कहा—काहे बिल्लों, तुम्हारे पंडित नहाय आवा रहेन।

 

बिल्लो क्या जवाब देती उसका गला रुँध गया, ऑंखों से ऑंसू बहने लगे, सर पीटने लगी। मल्लाहों ने समझाया कि अब रोये-पीटे का होत है। उनकी चीज वस्तु लेव और घर का जाव। बेचारे बड़े भले मनई रहेन। बिल्लो ने पंडित जी की चीजें ली और रोते-पीटती घर की तरफ चली। ज्यों-ज्यों वह मकान के निकट आती त्यों-त्यों उसके कदम पिछे को हटे आते थे। हाय नाराण पूर्णा को यह समाचार कैसे सुनाऊँगी वह बिचारी सोलहो सिंगार किये पति की राह देख रही है। यह खबर सुनकर उसकी क्या गत होगी। इस धक्के से उसकी तो छाती फट जायगी। इन्हीं विचारों में डूबी हुई बिल्लो ने रोते हुए घर में कदम रक्खा। तमाम चीजें जमीन पर पटक दी और छाती पर दोहत्थड़ मार हाय-हाय करने लगी। बेचारी पूर्णा इस वक्त आईना देख रही थी। वह इस समय ऐसी मगन थी और उसका दिल उमंगों और अरमानों से ऐसा भरा हुआ था कि पहले उसको बिल्लो के रोने-पीटने का कारण समझ में न आया। वह हकबका कर ताकने लगी कि यकायक सब मजारा उसकी समझ में आ गया। दिल पर एक बिजली कौंध गयी। कलेजा सन से हो गया। उसको मालूम हो गया कि मेरा सुहाग उठ गया। जिसने मेरी बॉँह पकड़ी थी उससे सदा के लिए बिछड़ गयी। उसके मुँह से केवल इतना निकला—‘हाय नारायण’ और वह पछाड़ खाकर धम से ज़मीन पर गिर पड़ी। बिल्लो ने उसको सँभाला और पंखा झलने लगी। थोड़ी देर में पास-पड़ोस की सैंकड़ों औरते जमा हो गयीं। बाहर भी बहुत आदमी एकत्र हो गये। राय हुई कि जाल डलवाया जाय। बाबू कमलाप्रसाद भी आये थे। उन्होंने पुलिस को खबर की। प्रेमा को ज्योंही इस आपत्ति की खबर मिली उसके पैर तले से मिट्टी निकल गयी। चटपट आढकर घबरायी हुई कोठे से उतरी और गिरती-पड़ती पूर्णा की घर की तरफ चली। मॉँ ने बहुत रोका मगर कौन सुनता है। जिस वक्त वह वहॉँ पहुँची चारों ओर रोना-धोना हो रहा था। घर में ऐसा न था जिसकी ऑंखों से ऑंसू की धारा न बह रही हो। अभगिनी पूर्णा का विलाप सुन-सुनकर लोगों के कलेजे मुँह को आय जाते थे। हाय पूर्णा पर जो पहाड़ टूट पड़ा वह सातवे बैरी पर भी न टूटे। अभी एक घंटा पहले वह अपने को संसार की सबसे भाग्यवान औरतों में समसझती थी। मगर देखते ही देखते क्या का क्या हो गया। अब उसका-सा अभागा कौन होगा। बेचारी समझाने-बूझाने से ज़रा चुप हो जाती, मगर ज्योंही पति की किसी बात की सुधि आती त्यों ही फिर दिल उमड़ आता और नयनों से नीर की झड़ी लग जाती, चित्त व्याकुल हो जाता और रोम-रोम से पसीना बहने लगता। हाय क्या एक-दो बात याद करने की थी। उसने दो वर्ष तक अपने प्रेम का आन्नद लूटा था। उसकी एक-एक बात उसका हँसना, उसका प्यार की निगाहों से देखना उसको याद आता था। आज उसने चलते-चलते कहा था—प्यारी पूर्णा, जी चाहता हैं, तुझे ऑंखों में बिठा लूँ। अफसोस हे अब कौन प्यार करेगा। अब किसकी पुतलियों में बैठूँगी कौन कलेजे में बैठायेगा। उस रेशमी धोती और तोलिया पर दृष्टि पड़ी तो जोर से चीख उठी और दोनों हाथों से छाती पीटने लगी। निदान प्रेमा को देखा तो झपट कर उठी और उसके गले से लिपट कर ऐसी फूट-फूट कर रोयी कि भीतर तो भीतर बाहर मुशी बदरीप्रसाद, बाबू कमलाप्रसाद और दूसरे लोग आँखों से रुमाल दिये बेअख्तियार रो रहे थे। बेचारी प्रेमा के लिए महीने से खाना-पीना दुर्लभ हो रहा था। विराहनल में जलते-जलते वह ऐसी दूर्बल हो गयी थी कि उसके मुँह से रोने की आवाज तक न निकलती थी। हिचकियॉँ बँधी हुई थीं और ऑंखों से मोती के दाने टपक रहे थे। पहले व समझती थी कि सारे संसार में मैं ही एक अभागिन हूँ। मगर इस समय वह अपना दु:ख भूल गयी। और बड़ी मुश्किल से दिल को थाम कर बोली—प्यारी सखी यह क्या ग़ज़ब हो गया? प्यारी सखी इ़सके जवाब में अपना माथा ठोंका और आसमान की ओर देखा। मगर मुँह से कुछ न बोल सकी।

 

इस दुखियारी अबला का दु:ख बहुत ही करुणायोग्य था। उसकी जिन्दगी का बेड़ा लगानेवाला कोई न था दु:ख बहुत ही करुणयोग्या था उसकी जिन्दगी का बेड़ा पार लगानेवाला कोई न था। उसके मैके में सिर्फ एक बूढ़े बाप से नाता था और वह बेचारा भी आजकल का मेहमान हो रहा था। ससुराल में जिससे अपनापा था वह परलोक सिधारा, न सास न ससुर न अपने न पराये। काई चुल्लू भर पानी देने वाला दिखाई न देता था। घर में इतनी जथा-जुगती भी न थी कि साल-दो साल के गुजारे भर को गुजारे भर हो जाती। बेचारी पंडित जी को अभी-नौकरी ही करते कितने दिन हुए थे कि रुपया जमा कर लेते। जो कमाया वह खाया। पूर्णा को वह अभी वह बातें नहीं सुझी थी। अभी उसको सोचने का अवकाश ही न मीला था। हॉँ, बाहर मरदाने में लोग आपस में इस विषय पर बातचीत कर रहे थे।

 

दो-ढ़ाई घण्टे तक उस मकान में स्त्रियों का ठट्टा लगा रहा। मगर शाम होते-होते सब अपने घरों को सिधारी। त्योहार का दिन था। ज्यादा कैसे ठहरती। प्रेमा कुछ देर से मूर्छा पर मूर्छा आने लगी थी। लोग उसे पालकी पर उठाकर वहाँ से ले गये और दिया में बत्ती पड़ते-पड़ते उस घर में सिवाय पूर्णा और बिल्ली के और कोई न था। हाय यही वक्त था कि पंडित जी दफ्तर से आया करते। पूर्णा उस वक्त द्वारे पर खड़ी उनकी राह देखा करती और ज्योंही वह ड्योढ़ी में कदम रखते वह लपक कर उनके हाथों से छतरी ले लेती और उनके हाथ-मुँह धोने और जलपान की सामग्री इकट्टी करती। जब तक वह मिष्टान्न इत्यादि खाते वह पान के बीड़े लगा रखती। वह प्रेम रस का भूख, दिन भर का थका-मॉँदा, स्त्री की दन खातिरदारियों से गदगद हो जाता। कहाँ वह प्रीति बढ़ानेवाले व्यवहार और कहॉँ आज का सन्नटा? सारा घर भॉँय-भॉँय कर रहा था। दीवारें काटने को दौड़ती थीं। ऐसा मालूम होता कि इसके बसनेवालो उजड़ गये। बेचारी पूर्णा ऑंगन में बैठी हुई। उसके कलेजे में अब रोने का दम नहीं है और न ऑंखों से ऑंसू बहते हैं। हॉँ, कोई दिल में बैठा खून चूस रहा है। वह शोक से मतवाली हो गयी है। नहीं मालूम इस वक्त वह क्या सोच रही है। शायद अपने सिधारनेवाले पिया से प्रेम की बातें कर रही है या उससे कर जोड़ के बिनती कर रही है कि मुझे भी अपने पास बुला लो। हमको उस शोकातुरा का हाल लिखते ग्लानि होती है। हाय, वह उस समय पहचानी नहीं जाती। उसका चेहरा पीला पड़ गया है। होठों पर पपड़ी छायी हुई हैं, ऑंखें सूरज आयी हैं, सिर के बाल खुलकर माथे पर बिखर गये है, रेशमी साड़ी फटकार तार-तार हो गयी है, बदन पर गहने का नाम भी नहीं है चूड़िया टूटकर चकनाचूर हो गयी है, लम्बी-लम्बी सॉँसें आ रही हैं। व चिन्ता उदासी और शोक का प्रत्यक्ष स्वरुप मालूम होती है। इस वक्त कोई ऐसा नहीं है जो उसको तसल्ली दे। यह सब कुछ हो गया मगर पूर्णा की आस अभी तक कुछ-कुछ बँधी हुई है। उसके कान दरवाजे की तरफ लगे हुए हुए है कि कहीं कोई उनके जीवित निकल आने की खबर लाता हो। सच है वियोगियों की आस टूट जाने पर भी बँधी रहती है।

 

शाम होते-होते इस शोकदायक घटना की ख़बर सारे शहर में गूँज उठी। जो सुनता सिर धुनता। बाबू अमृतराय हवा खाकर वापस आ रहे थे कि रासते में पुलिस के आदमियों को एक लाश के साथ जाते देखा। बहुत-से आदमियों की भीड़ लगी हुई थी। पहले तो वह समझे कि कोई खून का मुकदमा होगा। मगर जब दरियाफ्त किया तो सब हाल मालूम हो गया। पण्डित जी की अचानक मृत्यु पर उनको बहुत रोज हुआ। वह बसंतकुमार को भली भॉँति जानते थे। उन्हीं की सिफारिश से पंडित जी दफ्तर में वह जग मिली थी। बाबू साहब लाश के साथ-साथ थाने पर पहुँचे। डाक्टर पहले से ही आया हुआ था। जब उसकी जॉँच के निमित्त लाश खोली गयी तो जितने लोग खड़े थे सबके रोंगेटे खड़े हो गये और कई आदमियों की ऑंखों से ऑंसू निकल आये। लाश फूल गयी थी। मगर मुखड़ा ज्यों का त्यों था और कमल के सुन्दर फूल होंठों के बीच दॉँतों तले दबे हुए थे। हाय, यह वही फूल थे जिन्होंने काल बनकर उसको डसा था। जब लाश की जॉँच हो चुकी तब अमृतराय ने डाक्टर साहब से लाश के जलाने की आज्ञा मॉँगी जो उनको सहज ही में मिल गयी। इसके बाद वह अपने मकान पर आये। कपड़े बदले और बाईसिकिल पर सवार होकर पूर्णा के मकान पर पहुँचे। देखा तो चौतरफासन्नाटा छाया हुआ है। हर तरफ से सियापा बरस रहा है। यही समय पंडित जी के दफ्तर से आने का था। पूर्णा रोज इसी वक्त उनके जूते की आवजे सुनने की आदी हो रही थी। इस वक्त ज्योंही उसने पैरों की चाप सुनी वह बिजली की तरह दरवाजे की तरफ दौड़ी। मगर ज्योंही दरवाजे पर आयी और अपने पति की जगी पर बाबू अमृतराय को खड़े पाया तो ठिठक गयी। शर्म से सर झुका लिया और निराश होकर उलटे पॉँव वापास हुई। मुसीबत के समय पर किसी दु:ख पूछनेवालो की सूरत ऑंखों के लिए बहाना हो जाती है। बाबू अमृतराय एक महीने में दो-तीन बार अवश्य आया करते थे और पंडित जी पर बहुत विश्वास रखते थे। इस वक्त उनके आने से पूर्णा के दिल पर एक ताज़ा सदमा पहुँचा। दिल फिर उमड़ आया और ऐसा फूट-फूट कर रोयी कि बाबू अमृतराय, जो मोम की तरह नर्म दिल रखते थे, बड़ी देर तक चुपचाप खड़े बिसुरा किये। जब ज़रा जी ठिकाने हुआ तो उन्होंने महीर को बुलाकर बहुत कुछ दिलासा दिया और देहलीज़ में खड़े होकर पूर्णा को भी समझया और उसको हर तरहा की मदद देने का वादा करके, चिराग जलते-जलते अपने घर की तरफ रवाना हुए। उसी वक्त प्रेमा अपनी महताबी पर हवा खाने निकली थी। सकी ऑंखें पूर्णा के दरवाजे की तरफ लगी हुई थीं। निदान उसने किसी को बाइसिकिल पर सवार उधार से निकलते दखा। गौर से देखा तो पहिचान गई और चौंककर बोली—'अरे, यह तो अमृतराय है।'

 

प्रेमा मुंशी प्रेमचंद

प्रेमा भाग 5

अँय ! यह गजरा क्या हो गया?

पंडित बंसतकुमार का दुनिया से उठ जाना केवल पूर्णा ही के लिए जानलेवा न था, प्रेमा की हालत भी उसी की-सी थी। पहले वह अपने भाग्य पर रोया करती थी। अब विधाता ने उसकी प्यारी सखी पूर्णा पर विपत्ति डालकर उसे और भी शोकातुर बना दिया था। अब उसका दुख हटानेवाला, उसका गम गलत करनेवाला काई न था। वह आजकल रात-दिन मुँह लपेटे चारपाई पर पड़ी रहती। न वह किसी से हँसती न बोलती। कई-कई दिन बिना दाना-पानी के बीत जाते। बनाव-सिगार उसको जरा भी न भाता। सर के बल दो-दो हफ्ते न गूँथे जाते। सुर्मादानी अलग पड़ी रोया करती। कँघी अलग हाय-हाय करती। गहने बिल्कुल उतार फेंके थे। सुबह से शाम तक अपने कमरे में पड़ी रहती। कभी ज़मीन पर करवटें बदलती, कभी इधर-उधर बौखलायी हुई घूमती, बहुधा बाबू अमृतराय की तस्वीर को देखा करती। और जब उनके प्रेमपत्र याद आते तो रोती। उसे अनुभव होता था कि अब मैं थोड़े दिनों की मेहमान हूँ।

पहले दो महीने तक तो पूर्णा का ब्रह्मणों के खिलाने-पिलाने और पति के मृतक-संस्कार से सॉँस लेने का अवकाश न मिला कि प्रेमा के घर जाती। इसके बाद भी दो-तीन महीने तक वह घर से बाहर न निकली। उसका जी ऐसा बुझ गया था कि कोई काम अच्छा न लगता। हाँ, प्रेमा मॉँ के मना करने पर भी दो-तीन बार उसके घर गयी थी। मगर वहॉँ जाकर आप रोती और पूर्णा को भी रुलाती। इसलिए अब उधर जाना छोड़ दिया था। किन्तु एक बात वह नित्य करती। वह सन्ध्या समय महताबी पर जाकर जरुर बैठती। इसलिए नहीं कि उसको समय सुहाना मालूम होता या हवा खाने को जी चाहता था, नहीं प्रत्युत केवल इसलिए कि वह कभी- कभी बाबू अमृतराय को उधर से आते-जाते देखती। हाय लिज वक्त वह उनको देखते उसका कलेजा बॉँसों उछालने लगता। जी चाहता कि कूद पडूँ और उनके कदमों पर अपनी जान निछावर कर दूँ। जब तक वह दिखायी देते अकटकी बॉँधे उनको देखा करती। जब वह ऑंखों से आझला हो जाते तब उसके कलेजे में एक हूक उठती, आपे की कुछ सुधि न रहती। इसी तरह कई महीने बीत गये।

एक दिन वह सदा की भॉँति अपने कमरे में लेटी हुई बदल रही थी कि पूर्णा आयी। इस समय उसको देखकर ऐसा ज्ञात होता था कि वह किसी प्रबल रोग से उठी है। चेहरा पीला पड़ गया था, जैसे कोई फूल मुरझा गया हो। उसके कपोल जो कभी गुलाब की तरह खिले हुए थे अब कुम्हला गये थे। वे मृगी की-सी ऑंखें जिनमें किसी समय समय जवानी का मतवालापन और प्रेमी का रस भरा हुआ था अन्दर घुसी हुई थी, सिर के बाल कंधों पर इधर-उधर बिखरे हुए थे, गहने-पाते का नाम न था। केवल एक नैन सुख की साड़ी बदन पर पड़ी हुई थी। उसको देखते ही प्रेमा दौड़कर उसके गले से चिपट गयी और लाकर अपनी चारपाई पर बिठा दिया।

कई मिनट तक दोनों सखियॉँ एक-दूसरे के मुँह को ताकती रहीं। दोनो के दिल में ख्यालों का दरिया उमड़ा हुआ था। मगर जबान किसी की न खुलती थी। आखिर पूर्णा ने कहा—आजकल जी अच्छा नहीं है क्या? गलकर कॉँटा गयी हो

प्रेमा ने मुसकराने की चेष्टा करके कहा—नहीं सखी, मैं बहुत अच्छी तरह हूँ। तुम तो कुशल से रही?

पूर्णा की ऑंखों में आँसू डबडबा आये। बोली—मेरा कुशल-आनन्द क्या पूछती हो, सखी आनन्द तो मेरे लिए सपना हो गया। पॉँच महीने से अधिक हो गये मगर अब तक मेरी आँखें नहीं झपकीं। जान पड़ता है कि नींद ऑंसू होकर बह गयी।

प्रेमा—ईश्वर जानता है सखी, मेरा भी तो यही हाल है। हमारी-तुम्हारी एक ही गत है। अगर तुम ब्याही विधवा हो तो मैं कुँवारी विधवा हूँ। सच कहती हूँ सखी, मैने ठान लिया है कि अब परमार्थ के कामों में ही जीवन व्यतीत करुँगा।

पूर्णा—कैसी बातें करती हो, प्यारी मेरा और तुम्हारा क्या जोड़ा? जितना सुख भोगना मेरे भाग में बदा था भोग चुकी। मगर तुम अपने को क्यों घुलाये डालती हो? सच मानो, सखी, बाबू अमृतराय की दशा भी तुम्हारी ही-सी है। वे आजकल बहुत मलिन दिखायी देते है। जब कभी इधर की बात चलती हूँ तो जाने का नाम ही नहीं लेते। मैंने एक दिन देखा, वह तुम्हारा काढ़ा हुआ रुमाला लिये हुए थे।

यह बातें सुनकर प्रेमा का चेहरा खिल गया। मारे हर्ष के ऑंखें जगमगाने लगी। पूर्णा का हाथ अपने हाथों में लेकर और उसकी ऑंखों से ऑंखें मिलाकर बोली-सखी, इधर की और क्या-क्या बातें आयी थीं?

पूर्णा-(मुस्कराकर) अब क्या सब आज ही सुन लोगी। अभी तो कल ही मैंने पूछा कि आप ब्याह कब करेंगे, तो बोले-‘जब तुम चाहो।’ मैं बहुत लजा गई।

प्रेमा—सखी, तुम बड़ी ढीठ हो। क्या तुमको उनके सामने निकलते-पैठते लाज नहीं आती?

 

पूर्णा—लाज क्यों आती मगर बिना सामने आये काम तो नहीं चलता और सखी, उनसे क्या परदा करूँ उन्होंने मुझ पर जो-जो अनुग्रह किये हैं उनसे मैं कभी उऋण नहीं हो सकती। पहिले ही दिन, जब कि मुझ पर वह विपत्ति पड़ी रात को मेरे यहाँ चोरी हो गयी। जो कुछ असबाबा था पापियों ने मूस लिया। उस समय मेरे पास एक कौड़ी भी न थी। मैं बड़े फेर में पड़ी हुई थी कि अब क्या करुँ। जिधर ऑंख उठाती, अँधेरा दिखायी देता। उसके तीसरे दिन बाबू अमृतराय आये। ईश्वर करे वह युग-युग जिये: उन्होंने बिल्लो की तनख़ाह बॉँध दी और मेरे साथ भी बहुत सलूक किया। अगर वह उस वक्त आड़े न आते तो गहने-पाते अब तक कभी के बिक गये होते। सोचती हूँ कि वह इतने बड़े आदमी हाकर मुझ भिखारिनी के दरवाजे पर आते है तो उनसे क्या परदा करुँ। और दूनिया ऐसी है कि इतना भी नहीं देख सकती। वह जो पड़ोसा में पंडाइन रहती है, कई बार आई और बोली कि सर के बाल मुड़ा लो। विधवाओं का बाल न रखना चाहिए। मगर मैंने अब तक उनका कहना नहीं माना। इस पर सारे मुहल्ले में मेरे बारे में तरह-तरह की बातें की जाती हैं। कोई कुछ कहता हैं, कोई कुछ। जितने मुँह उतनी बातें। बिल्लो आकर सब वृत्तान्त मुझसे कहती है।सब सुना लेती हूँ और रो-धोकर चुप हो रहती हूँ। मेरे भाग्य में दुख भोगना, लोगों की जली-कटी सुनना न लिखा होता तो यह विपत्ति ही काहे को पड़ती। मगर चाहे कुछ हो मैं इन बालों को मुँड़वाकर मुण्डी नहीं बनना चाहती। ईश्वर ने सब कुछ तो हर लिया, अब क्या इन बालों से भी हाथ धोऊँ।

 

यह कहकर पूर्णा ने कंधो पर बिखरे हुए लम्बे-लम्बे बालों पर ऐसी दृष्टि से देखा मानो वे कोई धन हैं। प्रेमा ने भी उन्हें हाथ से सँभाला कर कहा—नहीं सखी खबरदार, बालों को मुँड़वाओगी तो हमसे-तुमसे न बनगी। पंडाइन को बकने दो। वह पगला गई है। यह देखो नीचे की तरफ जो ऐठन पड़ गयी हैं, कैसी सुन्दर मालूम होती है यही कहकर प्रेमा उठी। बक्स में सुगन्धित तेल निकाला और जब तक पूर्णा हाय-हाय करे कि उसके सर की चादर खिसका कर तेल डाल दिया और उसका सर जाँघ पर रखकर धीरे-धीरे मलने लगी। बेचारी पूर्णा इन प्यार की बातों को न सह सकी। आँखों में आँसू भरकर बोली—प्यारी प्रेमा यह क्या गजब करती हो। अभी क्या काम उपहास हो रहा है? जब बाल सँवारे निकलूँगी तो क्या गत होगी। अब तुमसे दिल की बात क्या छिपाऊँ। सखी, ईश्वर जानता हैं, मुझे यह बाल खुद बोझ मालूम होते हैं। जब इस सूरत का देखनेवाला ही संसार से उठ गया तो यह बाल किस काम के। मगर मैं इनके पीछे पड़ोसियों के ताने सहती हूँ तो केवल इसलिए कि सर मुड़ाकर मुझसे बाबू अमृतराय के सामने न निकला जाएगा। यह कह कर पूर्णा जमीन की तरफ ताकने लगी। मानो वह लजा गयी है। प्रेमा भी कुछ सोचने लगी। अपनसखी के सर में तेल मला, कंघी की बाल गूँथे और तब धीरे से आईना लाकर उसके सामने रख दिया। पूर्णा ने इधर पॉँच महीने से आईने का मुँह नहीं देखा था। वह सझती थी कि मेरी सूरत बिलकूल उतर गयी होगी मगर अब जो देखा तो सिवया इसके कि मुँह पीला पड़ गया था और कोई भेद न मालूम हुआ। मध्यम स्वर में बोली—प्रेमा, ईश्वर के लिए अब बस करो, भाग से यह सिंगार बदा नहीं हैं। पड़ोसिन देखेंगी तो न जाने क्या अपराध लगा दें।

प्रेम उसकी सूरत को टकटकी लगाकर देख रही थी। यकायक मुस्कराकर बोली—सखी, तुम जानती हो मैंने तुम्हारा सिंगार क्यों किया?

पूर्णा—मैं क्या जानूँ। तुम्हारा जी चाहत होगा।

प्रेमा-इसलिए कि तुम उनके सामने इसी तरह जाओ।

पूर्णा—तुम बड़ी खोटी हो। भला मैं उनके सामने इस तरह कैसे जाऊँगी। वह देखकर दिल में क्या में क्या कहेंगे। देखनेवाले यों ही बेसिर-पैर की बातें उड़ाया करते है, तब तो और भी नह मालूम क्या कहेंगे।

थोड़ी देर तक ऐसे ही हंसी-दिल्ली की बातो-बातो में प्रेमा ने कहा-सखी, अब तो अकेले नहीं रहा जाता। क्या हर्ज है तुम भी यहीं उठ आओ। हम तुम दोनों साथ-साथ रहें।

पूर्णा—सखी, मेरे लिए इससे अधिक हर्ष की कौन-सी बात होगी कि तुम्हारे साथ रहूँ। मगर अब तो पैर फूक-फूक कर धरना होती है। लोग तुम्हारे घर ही में राजी न होंगे। और अगर यह मान भी गये तो बिना बाबू अमृतराय की मर्जी के कैसे आ सकती हूँ। संसार के लोग भी कैसे अंधे है। ऐसे दयालू पुरुष कहते हैं कि ईसाई हो गया हैं कहनेवालों के मुँह से न मालूम कैसे ऐसी झूठी बात निकालती है। मुझसे वह कहते थे कि मैं शीघ्र ही एक ऐसा स्थान बनवानेवाला हूँ जहाँ अनाथ जहॉँ अनाथ विधवाऍं आकर रहेंगी। वहॉँ उनके पालन-पोषण और वस्त्र का प्रबन्ध किया जाएगा और उनके पढ़ना-लिखाना और पूजा-पाठ करना सिखाया जायगा। जिस आदमी के विचार ऐसे शुद्ध हों उसको वह लोग ईसाई और अधर्मी बनाते है, जो भूलकर भी भिखमंगे को भीख नहीं देते। ऐसा अंधेर है।

प्रेमा- बहिन, संसार का यही है। हाय अगर वह मुझे अपनी लौंडी बना लेते तो भी मेरा जीवन सफल हो जाता। ऐसे उदारचित्त दाता चेरी बनना भी कोई बड़ाई की बात है।

पूर्णा—तुम उनकी चेरी काहे को बनेगी। काहे को बनेगी। वह तो आप तुम्हारे सेवक बनने के लिए तैयार बैठे है। तुम्हारे लाला जी ही नहीं मानते। विश्वास मानो यदि तुमसे उनका ब्याह न हुआ तो कवारे ही रहेंगे।

प्रेमा—यहॉँ यही ठान ली है कि चेरी बनूँगी तो उन्हीं की।

कुछ देरे तक तो यही बातें हुआ की। जब सूर्य अस्त होने लगा तो प्रेमा ने कहा—चलो सखी, तुमको बगीचे की सैर करा लावें। जब से तुम्हारा आना-जाना छूटा तब से मैं उधर भूलकर भी नहीं गयी।

पूर्णा—मेरे बाल खोल दो तो चलूँ। तुम्हारी भावज देखेगी तो ताना मारेगी।

प्रेमा—उनके ताने का क्या डर, वह तो हवा, से उलझा करती हैं। दोनों सखियां उठी औरहाथ दिये कोठे से उतार कर फुलवारी में आयी। यह एक छोटी-सी बगिया थी जिसमें भॉँति-भॉंति के फूल खिल रहे थे। प्रेमा को फूलों से बहुत प्रम था। उसी ने अपनी दिलबलावा के लिए बगीचा था। एक माली इसी की देख-भाल के लिए नौकर था। बाग़ के बीचो-बीच एक गोल चबूतरा बना हुआ था। दोनों सखियॉँ इस चबूतेरे पर बैठ गयी। इनको देखते ही माली बहुत-सी कलियॉँ एक साफ तरह कपड़े में लपेट कर लाया। प्रेमा ने उनको पूर्णा को देना चाहा। मगर उसने बहुत उदास होकर कहा—बहिन, मुझे क्षमा करो,इनकी बू बास तुमको मुबारक हो। सोहाग के साथ मैंने फूल भी त्याग दिये। हाय जिस दिन वह कालरुपी नदी में नहाने गये हैं उस दिन ऐसे ही कलियों का हार बनाया था। (रोकर) वह हार धरा का धरा का गया। तब से मैंने फूलों को हाथ नहीं लगाया। यह कहते-कहते वह यकयक चौंक पड़ी और बोली—सखी अब मैं जाउँगी। आज इतवार का दिन है। बाबू साहब आते होंगे।

प्रेमा ने रोनी हँसकर कहा-‘नही’ सखी, अभी उनके आने में आध घण्टे की देर है। मुझे इस समय का ऐसा ठीक परिचय मिल गया है कि अगर कोठरी में बन्द कर दो तो भी शायद गलती न करुँ। सखी कहते लाज आती है। मैं घण्टों बैठकर झरोखे से उनकी राह देखा करती हूँ। चंचल चित्त को बहुत समझती हूँ। पर मानता ही नहीं।

पूर्णा ने उसको ढारस दिया और अपनी सखी से गले मिल, शर्माती हुई घूंघट से चेहरे को छिपाये अपने घर की तरफ़ चली और प्रेमी किसी के दर्शन की अभिलाषा कर महताबी पर जाकर टहलने लगी।

पूर्णा के मकान पर पहुँचे ठीक आधी घड़ी हुई थी कि बाबू अमृतराय बाइसिकिल पर फर-फर करते आ पहुँचे। आज उन्होंने अंग्रेजी बाने की जगह बंगाली बाना धारण किया था, जो उन पर खूब सजता था। उनको देखकर कोई यह नहीं कह सकता था कि यह राजकुमार नहीं हैं बाजारो में जब निकलाते तो सब की ऑंखे उन्हीं की तरफ उठती थीं। रीति के विरुद्ध आज उनकी दाहिनी कलाई पर एक बहुत ही सुगन्धित मनोहर बेल का हार लिपटा हुआ था, जिससे सुगन्ध उड़ रही थी और इस सुगन्ध से लेवेण्डर की खुशबू मिलकर मानों सोने में सोहागा हो गया था। संदली रेशमी के बेलदार कुरते पर धानी रंग की रेशमी चादर हवा के मन्द-मन्द झोंकों से लहरा-लहरा कर एक अनोखी छवि दिखाती थी। उनकी आहट पाते ही बिल्लो घर में से निकल आई और उनको ले जाकर कमरे में बैठा दिया।

अमृतराय—क्यों बिल्लो, सग कुशल है?

बिल्लो—हॉँ, सरकार सब कुशल है।

अमृतराय—कोई तकलीफ़ तो नहीं है?

बिल्लो—नहीं, सरकार कोई तकलीफ़ नहीं है।

इतने में बैठके का भीतरवाला दरवाजा खुला और पूर्णा निकली। अमृतराय ने उसकी तरफ़ देखा तो अचम्भे में आ गये और उनकी निगाह आप ही आप उसके चेहरे पर जम गई। पूर्णा मारे लज्जा के गड़ी जाती थी कि आज क्यों यह मेरी ओर ऐसे ताक रहे हैं। वह भूल गयी थी कि आज मैंने बालों में तेल डाला है, कंघी की है और माथे पर लाल बिन्दी भी लगायी है। अमृतराय ने उसको इस बनाव-चुनाव के साथ कभी नहीं देखा था और न वह समझे थे कि वह ऐसी रुपवती होगी।

कुछ देर तक तो पूर्णा सर नीचा किये खड़ी रही। यकायक उसको अपने गुँथे केश की सुधि आ गयी और उसने झट लजाकर सर और भी निहुरा लिया, घूँघट को बढ़ाकर चेहरा छिपा लिया। और यह खयाल करके कि शायद बाबू साहब इस बनाव सिंगार से नाराज हों वह बहुत ही भोलेपन के साथ बोली—मैं क्या करु, मैं तो प्रेमा के घर गयी थी। उन्होंने हठ करके सर में मे तेल डालकर बाल गूँथ दिये। मैं कल सब बाल कटवा डालूँगी। यह कहते-कहते उसकी ऑंखों में ऑंसू भर आये।

उसके बनाव सिंगार ने अमृतराय पर पहले ही जादू चलाया था। अब इस भोलेपन ने और लुभा लिया। जवाब दिया—नहीं—नहीं, तुम्हें कसम है, ऐसा हरगिज न करना। मैं बहुत खुश हूँ कि तुम्हारी सखी ने तुम्हारे ऊपर यह कृपा की। अगर वह यहॉँ इस समय होती तो इसके निहोरे में मैं उनको धन्यवाद देता।

पूर्णा पढ़ी-लिखी औरत थी। इस इशारे को समझ गयी और झेपेर गर्दन नीचे कर ली। बाबू अमृतराय दिल में डर रहे थे कि कहीं इस छेड़ पर यह देवी रुष्ट न हो जाए। नहीं तो फिर मनाना कठिन हो जाएगा। मगर जब उसे मुसकराकर गर्दन नीची करते देखा तो और भी ढिठाई करने का साहस हुआ। बोले—मैं तो समझता था प्रेमा मुझे भूल होगी। मगर मालूम होता है कि अभी तक मुझ पर कुछ-कुछ स्नेह बाक़ी है।

अब की पूर्णा ने गर्दन उठायी और अमृतराय के चेहरे पर ऑंखें जमाकर बोली, जैसे कोई वकील किसी दुखीयारे के लिए न्याधीश से अपील करता हो-बाबू साहब, आपका केवल इतना समझना कि प्रेमा आपको भूल गयी होगी, उन पर बड़ा भारी आपेक्ष है। प्रेमा का प्रेम आपके निमित्त सच्चा है। आज उनकी दशा देखकर मैं अपनी विपत्ति भूल गयी। वह गल कर आधी हो गयी हैं। महीनों से खाना-पीना नामात्र है। सारे दिन आनी कोठरी में पड़े-पड़े रोय करती हैं। घरवाले लाख-लाख समझाते हैं मगर नहीं मानतीं। आज तो उन्होंने आपका नाम लेकर कहा-सखी अगर चेरी बनूँगी तो उन्हीं की।

यह समाचार सुनकर अमृतराय कुछ उदास हो गये। यह अग्नि जो कलेजे में सुलग रही थी और जिसको उन्होंने सामाजिक सुधार के राख तले दबा रक्खा था इस समय क्षण भर के लिए धधक उठी, जी बेचैन होने लगा, दिल उकसाने लगा कि मुंशी बदरीप्रसाद का घर दूर नहीं है। दम भर के लिए चलो। अभी सब काम हुआ जाता है। मगर फिर देशहित के उत्साह ने दिल को रोका। बोले—पूर्णा, तुम जानती हो कि मुझे प्रेमा से कितनी मुहब्बत थी। चार वर्ष तक मैं दिल में उनकी पूजा करता रहा। मगर मुंशी बदरप्रसाद ने मेरी दिनों की बँधी हुई आस केवल इस बात पर तोड़ दी कि मैं सामाजिक सुधार का पक्षपाती हो गया। आखिर मैंने भी रो-रोकर उस आग को बुझाया और अब तो दिल एक दूसरी ही देवी की उपासना करने लगा है। अगर यह आशा भी यों ही टूट गयी तो सत्य मानो, बिना ब्याह ही रहूँगा।

पूर्णा का अब तक यह ख़याल था कि बाबू अमृतराय प्रेमा से ब्याह करेंगे। मगर अब तो उसको मालूम हुआ कि उनका ब्याह कहीं और लग रहा है तब उसको कुछ आश्चर्य हुआ। दिल से बातें करने लगी। प्यारी प्रेमा, क्या तेरी प्रीति का ऐसा दुखदायी परिणाम होगा। तेरो मॉँ-बाप, भाई-बंद तेरी जान के ग्राह हो रहे हैं। यह बेचारा तो अभी तक तुझ पर जान देता हैं। चाहे वह अपने मुँह से कुछ भी न कहे, मगर मेरा दिल गवाही देता है कि तेरी मुहब्बत उसके रोम-रोम में व्याप रही है। मगर जब तेरे मिलने की कोई आशा ही न हो तो बेचारी क्या करे मजबूर होकर कहीं और ब्याह करेगा। इसमें सका क्या दोष है। मन में इस तरह विचार कर बोली-बाबू साहब, आपको अधिकार है जहॉँ चाहो संबंध करो। मगर मैं मो यही कहूँगी कि अगर इस शहर में आपके जोड़ की कोई है तो वही प्रमा है।

अमृत०—यह क्यों नहीं कहतीं कि यहॉँ उनके योग्य कोई वर नहीं, इसीलिए तो मुंशी बदरीप्रसाद ने मुझे छुटकार किया।

पूर्णा—यह आप कैसी बात कहते है। प्रेमा और आपका जोड़ ईश्वर ने अपने हाथ से बनाया है।

अमृत०—जब उनके योग्य मैं था। अब नहीं हूँ। पूर्णा—अच्छा आजकल किसके यहॉँ बातचीत हो रही है?

अमृत०—(मुस्कराकर) नाम अभी नहीं बताऊँगा। बातचीत तो हो रही है। मगर अभी कोई पक्की उम्मेदे नहीं हैं।

पूर्णा—वाह ऐसा भी कहीं हो सकता है? यहॉँ ऐसा कौन रईस है जो आपसे नाता करने में अपनी बड़ाई न समझता हो।

अमृत०—नहीं कुछ बात ही ऐसी आ पड़ी है।

पूर्णा—अगर मुझसे कोई काम हो सके तो मैं करने को तैयार हूँ। जो काम मेरे योग्य हो बता दीजिए।

अमृत—(मुस्कराकर)तुम्हारी मरजी बिना तो वह काम कभी पूरा हो ही नही सकता। तुम चाहो तो बहुत जल्द मेरा घर बस सकता है।

पूर्णा बहुत प्रसन्न हुई कि मैं भी अब इनके कुछ काम आ सकूँगी। उसकी समझ में इस वाक्य के अर्थ नहीं आये कि ‘तुम्हारी मर्जी बिना तो वह काम पूरा हो ही नहीं सकता। उसने समझा कि शायद मुझसे यही कहेंगे कि जा के लड़की को देख आवे। छ: महीने के अन्दर ही अन्दर वह इसका अभिप्राय भली भॉँति समझ गयी समझ गयी।

बाबू अमृतराय कुछ देर तक यहॉँ और बैठे। उनकी ऑंखें आज इधर-उधार से घूम कर आतीं और पूर्णा के चेहरे पर गड़ जाती। वह कनख्यि से उनकी ओर ताकती तो उन्हें अपनी तरफ़ ताकते पाती। आखिर वह उठे और चलते समय बोले—पूर्णा, यह गजरा आज तुम्हारे वास्ते लाया हूँ। देखो इसमें से कैसे सुगन्ध उड़ रही है।

पूर्णा भौयचक हो गयी। यह आज अनोखी बात कैसी एक मिनट तक तो वह इस सोच विचार में थी कि लूँ या न लूँ या न लूँ। उन गजरों का ध्यान आया जो उसने अपने पति के लिए होली के दिन बनये थे। फिर की कलियों का खयाल आया। उसने इरादा किया मैं न लूँगी। जबान ने कहा—मैं इसे लेकर क्या करूँगी, मगर हाथ आप ही आप बढ़ गया। बाबू साहब ने खुश होकर गजरा उसके हाथ में पिन्हाया, उसको खूब नजर भरकर देखा। फिर बाहर निकल आये और पैरगाड़ी पर सवार हो रवाना हो गये। पूर्णा कई मिनट तक सन्नाटे में खड़ी रही। वह सोचती थी कि मैंने तो गजरा लेने से इनकार किया था। फिर यह मेरे हाथ में कैसे आ गया। जी चाह कि फेंक दे। मगर फिर यह ख्याल पलट गया और उसने गज़रे को हाथ में पहिन लिया। हाय उस समय भी भोली-भाली पूर्णा के समझ में न आया कि इस जुमले का क्या मतलब है कि तुम चाहो तो बहुत जल्द मेरा घर बस सकता है।

उधर प्रेमा महताबी पर टहल रही थी। उसने बाबू साहब को आते देखा था।उनकी सज-धज उसकी ऑंखों में खुब गयी थी। उसने उन्हें कभी इस बनाव के साथ नहीं देखा था। वह सोच रही थी कि आज इनके हाथ में गजरा क्यों है । उसकी ऑंखें पूर्णा के घर की तरफ़ लगी हुई थीं। उसका जी झुँझलाता था कि वह आज इतनी देर क्यों लगा रहे है? एकाएक पैरगाड़ी दिखाई दी। उसने फिर बाबू साहब को देखा। चेहरा खिला हुआ था। कलाइयों पर नज़र पड़ी गयी, हँय वह गजरा क्या हो गया?

 

प्रेमा भाग 6

पूर्णा ने गजरा पहिन तो लिया। मगेर रात भर उसकी ऑंखों में नींद नहीं आयी। उसकी समझ में यह बात न आती थी। कि अमृतराय ने उसे गज़रा क्यों दिया। उसे ऐसा मालूम होता था कि पंडित बसंतकुमार उसकी तरफ बहुत क्रोध से देख रहे है। उसने चाहा कि गजरा उतार कर फेंक दूँ मगर नहीं मालूम क्यों उसके हाथ कॉंपने लगे। सारी रात उसने ऑंखों में काटी। प्रभात हुआ। अभी सूर्य भगवान ने,भी कृपा न की थी कि पंडाइन और चौबाइन और बाबू कमलाप्रसाद की बृद्ध महराजिन और पड़ोस की सेठानी जी कई दूसरी औरतों के साथ पूर्णा के मकान में आ उपस्थित हुई। उसने बड़े आदर से सबको बिठाया, सबके पैर छुएं उसके बाद यह पंचायत होने लगी।

पंडाइन (जो बुढ़ापे की बजह से सूखकर छोहारे की तरह हो गयी थी)-क्यों दुलहिन, पंडित जी को गंगालाभ हुए कितने दिन बीते?

पूर्णा-(डरते-डरते) पॉच महीने से कुछ अधिक हुआ होगा।

पंडाइन-और अभी से तुम सबके घर आने-जाने लगीं। क्या नाम कि कल तुम सरकार के घर चली गयी थीं। उनक क्वारी कन्या के पास दिन भर बैठी रहीं। भला सोचो ओ तुमने कोई अच्छा काम किया। क्या नाम कि तुम्हारा और उनका अब क्या साथ। जब वह तुम्हारी सखी थीं, तब थीं। अब तो तुम विधवा हो गयीं। तुमको कम से कम साल भर तक घर से बाहर पॉव न निकालना चाहिए। तुम्हारे लिए साल भर तक हॅसना-बोलना मना हैं हम यह नहीं कहते कि तुम दर्शन को न जाव या स्नान को न जाव। स्नान-पूजा तो तुम्हारा धर्म ही है। हॉ, किसी सोहागिन या किसी क्वारी कन्या पर तुमको अपनी छाया नही डालनी चाहिए।

पंडाइन चुप हुई तो महाराजिन टुइयॉ की तरह चहकने लगीं-क्या बतलाऊँ, बड़ी सरकार और दुलाहिन दोनों लहू का धूंट पीकर रह गई। ईश्वर जाने बड़ी सरकार तो बिलख-बिलख रो रही थीं कि एक तो बेचारी लड़की के यों हर जान के लाले पड़े है। दूसरी अब रॉँड बेवा के साथ उठना-बैठना है। नहीं मालूम नारायण क्या करनेवाले है। छोटी सर्कार मारे क्रोध के कॉप रही थी। ऑखों से ज्वाला निकल रही थी। बारे मैनें उनको समझाया कि आज जाने दीजिए वह बेचारी तो अभी बच्चा है। खोटे-खरे का मर्म क्या जाने। सरकार का बेटा जिये, जब बहुत समझाया तब जाके मानीं। नहीं तो कहती थीं मैं अभी जाकर खड़े-खड़े निकाल देती हूँ। सो बेटा, अब तुम सोहागिनो के साथ बैठने योग्य नहीं रहीं। अरे ईश्वर ने तो तुम पर विपत्ति डाल दी। जब अपना प्राणप्रिय ही न रहा तो अब कैसा हँसना-बोलना। अब तो तुम्हारा धर्म यही है कि चुपचाप अपने घर मे पड़ी रहो। जो कुछ रुखा-सूखा मिले खावो पियो। और सर्कार का बेटा जिये, जाँह तक हो सके, धर्म के काम करो।

महाराजिन के चुप होते ही चौबाइन गरजने लगीं। यह एक मोटी भदेसिल और अधेड़ औरत थी—भला इनसे पूछा कि अभी तुम्हारे दुलहे को उठे पॉँच महीने भी न बीते, अभी से तुम कंधी-चोटी करने लगीं। क्या कि तुम अब विधवा हो गई। तुमको अब सिंगार-पेटार से क्या सरोकार ठहरा। क्या नाम कि मैंने हजारों औरतों को देखा है जो पति के मरने के बाद गहना-पाता नहीं पहनती। हँसना-बोलना तक छोड़ देती है। यह न कि आज तो सुहाग उठा और कल सिंगार-पटार होने लगा। मैं लल्लो-पत्तों की बात नहीं जानती। कहूँगी सच। चाहे किसी को तीता लगे या मीठा। बाबू अमृतराय का रोज-रोज आना ठीक नहीं है। है कि नही, सेठानी जी?

सेठानी जी बहुत मोटी थीं और भारी-भारी गहनों से लदी थी। मांस के लोथडे हडिडरयों से अलग होकर नीचे लटक रहे थे। इसकी भी एक बहू रॉँड़ हो गयी थी जिसका जीवन इसने व्यर्थ कर रखा था। इसका स्वभाव था कि बात करते समय हाथों को मटकाया करती थी। महाराजिन की बात सुनकर—‘जो सच बात होगी सब कोई कहेगा। इसमें किसी का क्या डर। भला किसी ने कभी रॉँड़ बेवा को भी माथे पर बिंदी देते देखा है। जब सोहाग उठ गया तो फिर सिंदूर कैसा। मेरी भी तो एक बहू विधवा है। मगर आज तक कभी मैंने उसको लाल साड़ी नहीं पहिनने दी। न जाने इन छोकरियों का जी कैसा है कि विधवा हो जाने पर भी सिंगार पर जी ललचाया करता है। अरे इनको चाहिए कि बाबा अब रॉँड हो गई। हमको निगोड़े सिंगार से क्या लेना।

महाराजिन—सरकार का बेटा जिये तुम बहुत ठीक कहती हो सेठानी जी। कल छोटी सरकार ने जो इनको मॉँग में सेंदूर लगाये देखा तो खड़ी ठक रह गयी। दॉँतों तले उंगली दबायी कि अभी तीन दिन की विधवा और यह सिगार। सो बेटा, अब तुमको समझ-बूझकर काम करना चाहिए। तुम अब बच्चा नहीं हो।

सेठानी—और क्या, चाहे बच्चा हो या बूढ़ी। जब बेराह चलेगी तो सब ही कहेंगे। चुप क्यों हो पंडाइन, इनके लिए अब कोई राह-बाट निकाल दो।

डाइन—जब यह अपने मन की होगयीं तो कोई क्या राह-बाट निकाले। इनको चाहिए कि ये अपने लंबेलंबे केश कटवा डाले। क्या नाम कि दूसरों के घर आना-जाना छोड़ दे। कंधी-चोटी कभी न करें पान न खाये। रंगीन साड़ी न पहनें और जैसे संसार की विधवायें रहती है वैसे रहें।

चौबाइन—और बाबू अमृतराय से कह दें कि यहॉँ न आया करें। इस पर एक औरत ने जो गहने कपड़े से बहुत मालदार न जान पड़ती थी, कहा—चौबाइन यह सब तो तुम कह गयी मगर जो कहीं बाबू अमृतराय चिढ़ गये तो क्या तुम इस बेचारी का रोटी-कपड़ा चला दोगी? कोई विधवा हो गयी तो क्या अब अपना मुँह सी लें।

महराजिन—(हाथ चमकाकर) यह कौन बोला? ठसों। क्या ममता फड़कने लगी?

सेठानी—(हाथ मटकाकर) तुझे किसने बुलाया जो आ के बीच में बोल उठी। रॉँड़ तो हो गयी हो, काहे नहीं जा के बाजर में बैठती हो।

चौबाइन—जाने भी दो सेठानी जी, इस बौरी के मुँह क्या लगती हो।

सेठानी—(कड़ककर) इस मुई को यहॉँ किसने बुलाया। यह तो चाहती है जैसी मैं बेहयास हूँ वैसा हीसंसार हो जाय।

महराजिन—हम तो सीख दे रही थीं तो इसे क्यों बुरा लगा? यह कौन होती है बीच में बोलनेवाली?

चौबाइन—बहिन, उस कुटनी से नाहक बोलती हो। उसको तो अब कुटनापा करना है।

इस भांति कटूक्तियों द्वारा सीख देकर यह सब स्त्रियाँ यहा से पधारी। महराजिन भी मुंशी बदरीप्रदान के यहॉँ खाना पकाने गयीं। इनसे और छोटी सर्कार से बहुत बनती थी। वह इन पर बहुत विश्वास रखती थी। महराजिन ने जाते ही सारी कथा खूब नमक-मिर्च लगाकर बयान की और छोटी सरकार ने भी इस बात को गॉँठ बॉँध लिया और प्रेमा को जलाने और सुलगाने के लिए उसे उत्तम समझकर उसके कमरे की तरफ चली।

यों तो प्रेमा प्रतिदिन सारी रात जगा करती थी। मगर कभी-कभी घंटे आध घंटे के लिए नींद आ जाती थी। नींद क्या आ जाती थी, एक ऊंघ सी आ जाती थी, मगर जब से उसने बाबू अमृतराय को बंगालियों के भेस में देखा था और पूणा के घर से लौटते वक्त उसको उनकी कलाई परगजरा न नजर आया था तब से उसके पेट में खलबली पड़ी हुई थी कि कब पूर्णा आवे और कब सारा हाल मालूम हो। रात को बेचैनी के मारे उठ-उठ घड़ी पर ऑंखे दौड़ाती कि कब भोर हो। इस वक्त जो भावज के पैरां की चाल सुनी तो यह समझकर कि पूर्णा आ रही है, लपकी हुई दरवाजे तक आयी। मगर ज्योंही भावज को देखा ठिठक गई और बोली—कैसे चलीं, भाभी?

भाभी तो यह चाहती ही थीं कि छेड़-छाड़ के लिए कोई मौका मिले। यह प्रश्न सुनते ही तिनक का बोली—क्या बताऊ कैसे चली? अब से जब तुम्हारे पास आया करूँगी तो इस सवाल का जवाब सोचकर आया करूँगी। तुम्हारी तरह सबका लोहू थोड़े ही सफेद हो गया है कि चाहे किसी की जान निकल, जाय, घी का घड़ा ढलक जाए, मगर अपने कमरे से पॉँव बाहर न निकाले।

प्रेमा ने वह सवाल यों ही पूछ लिया था। उसके जब यह अर्थ लगाये गये तो उसको बहुत बुरा मालूम हुआ। बोली—भाभी, तुम्हारे तो नाक पर गुस्सा रहता है। तुम जरा-सी बात का बतगंढ बना देती हो। भला मैंने कौन सी बात बुरा मानने की कही थी?

भाभी—कुछ नहीं, तुम तो जो कुछ कहती हो मानो मुँह से फूल झाड़ती हो। तुम्हारे मुँह में मिसरी घोली हुई न। और सबके तो नाक पर गुससा रहता है, सबसे लड़ा ही करते है।

प्रेमा—(झल्लाकर) भावज, इस समय मेरा तो चित्त बिगड़ा हुआ है। ईश्वर के लिए मुझसे मत उलझो। मै तो यों ही अपनी जान को रो रही हूं। उस पर से तुम और भी नमक छिड़कने आयीं।

भाभी—(मटककर) हां रानी, मेरा तो चित्त बिड़ा हुआ है, सर फिरा हुआ है। जरा सीधी-सादी हूँ न। मुझको देखकर भागा करो। मै। कटही कुतिया हूं, सबको काटती चलती हूं। मैं भी यारों को चुपके-चुपके चिटठी-पत्री लिखा करती, तसवीरें बदला करती तो मैं भी सीता कहलाती और मुझ पर भी घर भर जान देने लगता। मगर मान न मान मैं तेरा मेहमान। तुम लाख जतन करों, लाख चिटिठयॉँ लिखो मगर वह सोने की चिड़िया हाथ आनेवाली नहीं। यह जली-कटी सुनकर प्रेमा से जब्त न हो सका। बेचारी सीधे स्वभाव की औरत थी। उसका वर्षो से विरह की बग्नि में जलते-जलते कलेजा और भी पक गया था। वह रोने लगी।

भावज ने जब उसको रोते देखा तो मारे हर्ष के ऑंखे जगमगा गयीं। हत्तेरे की। कैसा रूला दिया। बोली—बिलखने क्या लगीं, क्या अम्मा को सुनाकर देशनिकाला करा दोगी? कुछ झूठ थोड़ी ही कहती हूँ। वही अमृतराय जिनके पास आप चुपके-चुपके प्रेम-पत्र भेजा करती थी अब दिन-दहाड़े उस रॉँड़ पूर्णा के घर आता है और घंटो वहीं बैठा रहता है। सुनती हूँ फूल के गजरे ला लाकर पहनाता है। शायद दो एक गहने भी दिये है।

प्रेमा इससे ज्यादा न सुन सकी। गिड़गि कर बोली—भाभी, मैं तुम्हारे पैरों पड़ती हूं मुझ पर दया करो। मुझे जो चाहो कह लो। (रोकर) बड़ी हो, जी चाहे मार लो। मगर किसी का नाम लेकर और उस पर छ़ठे रखाकर मेरे कदल को मत जलाओ। आखिर किसी के सर पर झूठ-मूठ अपराध क्यों लगाती हो।

 

प्रेमा ने तो यह बात बड़ी दीनता से कही। मगर छोटी सरकार ‘छुद्दे रखकर’ पर बिगड़ गयीं। चमक कर बोलीं—हॉँ, हॉँ रानी, मैं दूसरों पर छुद्दे रखकर तुमको जलाने आती हूंन। मैं तो झूठ का व्यवहार करती हूँ। मुझे तुम्हारे सामने झूठ बोनले से मिठाई मिलती होगी। आज मुहल्ले भर में घर घर यही चर्चा हो रही है। तुम तो पढ़ी लिखी हो, भला तुम्हीं सोचो एक तीस वर्ष के संडे मर्दवे का पूर्णा से क्या काम? माना कि वह उसका रोटी-कपड़ा चलाते है मगर यह तो दुनिया है। जब एक पर आ पड़ती है तो दूसरा उसके आड़ आता है। भले मनुष्यों का यह ढंग नहीं है कि दूसरें को बहकाया करें, और उस छोकरी को क्या को ई बहकायेगा वह तो आप मर्दो पर डोरे डाला करती है। मैंने तो जिस दिन उसकी सूरत देखी रथी उसी दिन ताड़ गयी थी कि यह एक ही विष की गांठ हैं। अभी तीन दिन भी दूल्हे को मरे हुए नहीं बीते कि सबको झमकड़ा दिखाने लगी। दूल्हा क्या मरा मानो एक बला दूर हुई। कल जब वह यहॉँ आई थी तो मै बाल बुंधा रही थी। नहीं तो डेउढ़ी के भीतर तो पैर धरने ही नहीं देती। चुड़ैल कहीं की, यहॉँ आकर तुम्हारी सहेली बनती है। इसी से अमृतराय को अपना यौवन दिखाकर अपना लिया। कल कैसा लचक-लचक कर ठुमुक-ठुमुक् चलती थी। देख-देख कर ऑंखे फूटती थीं। खबरदार, जो अब कभी, तुमने उस चुडैल को अपने यहॉँ बिठाया। मै उसकी सूरत नहीं देखना चाहती। जबान वह बला है कि झूठ बात का भी विश्वास दिला देती है। छोटी सरकार ने जो कुछ कहा वह तो सब सच था। भला उसका असर क्यों न होता। अगर उसने गजरा लिये हुए जाते न देखा होता तो भावज की बातों को अवश्य बनावट समझती। फिर भी वह ऐसी ओछी नहीं थी कि उसी वक्त अमृतराय और पूर्णा को कोसने लगती और यह समझ लेती कि उन दोनों में कुछ सॉँठ-गॉँठ है। हॉँ, वह अपनी चारपाइ पर जाकर लेट गयी और मुँह लपेट कर कुछ सोचने लगी।

 

प्रेमा को तो पंलंग पर लेटकर भावज की बातों को तौलने दीजिए और हम मर्दाने में चले। यह एक बहुत सजा हुआ लंबा चौड़ा दीवानखाना है। जमीन पर मिर्जापुर खुबसूरत कालीनें बिछी हुई है। भॉँति-भॉँति की गद्देदार कुर्सियॉँ लगी हुई है। दीवारें उत्तम चित्रों से भूक्षित है। पंखा झला जा रहा है। मुंशी बदरीप्रसाद एक आरामकुर्सी पर बैठे ऐनक लगाये एक अखबार पढ़ रहे है। उनके दायें-बायें की कुर्सियों पर कोई और महाशय रईस बैठे हुए है। वह सामने की तरफ मुंशी गुलजारीलाल हैं और उनके बगल में बाबू दाननाथ है। दाहिनी तरफ बाबू कमलाप्रसाद मुंशी झंम्मनलाल से कुछ कानाफूसी कर रहे है। बायीं और दो तीन और आदमी है जिनको हम नहीं पहचानते। कई मिनट तक मुँशी बदरीप्रसाद अखबार पढ़ते रहे। आखिर सर उठाया और सभा की तरफ देखकर बड़ी गंभीरता से बोले—बाबू अमुतराय के लेख अब बड़े ही निंदनीय होते जाते है।

गुलजारीलाल—क्या आज फिर कुछ जहर उगला?

बदरीप्रसाद—कुछ न पूछिए, आज तो उन्होंने खुली-खुली गालियॉँ दी है। हमसे तो अब यह बर्दाश्त नहीं होता।

गुलजारी—आखिर कोइ कहॉँ तक बर्दाश्त करे। मैने तो इस अखबार का पढ़ना तक छोड दिया।

झम्मनलाल—गोया अपने अपनी समझ में बड़ा भारी काम किया। अजी आपकाधर्म यह है कि उन लेखों को काटिए, उनका उत्तर दीजिए। मै आजकल एक कवित्त रच रहा हूँ, उसमे मैंने इनकों ऐसा बनाया है कि यह भी क्या याद करेंगे।

कमलाप्रसाद—बाबू अमृतराय ऐसे अधजीवे आदमी नहीं है कि आपके कवित, चौपाई से डर जाऍं। वह जिस काम में लिपटते है सारे जी से लिपटते है।

झम्मन०—हम भी सारे जी से उनके पीछे पड़ जाऍंगे। फिर देखे वह कैसे शहर मे मुँह दिखाते है। कहो तो चुटकी बजाते उनको सारे शहर में बदनाम कर दूँ।

कमला०—(जोर देकर) यह कौन-सी बहादुरी है। अगर आप लोग उनसे विरोध मोल लिया चाहते है। तो सोच-समझ कर लीजिए। उनके लेखों को पढिए, उनको मन में विचारिए, उनका जवाब लिखिए, उनकी तरह देहातो मे जा-जाकर व्याख्यान दीजिए तब जा के काम चलेगा। कई दिन हुए मै अपने इलाके पर से आ रहा था कि एक गॉँव में मैने दस-बारह हजार आदमियों की भीड़ देखी। मैंने समझा पैठ है। मगर जब एक आदमी से पूछा तो मालूम हुआ। कि बाबू अमृतराय का व्याख्यान था। और यह काम अकेले वही नहीं करते, कालिज के कई होनहार लड़के उनके सहायक हो गये है और यह तो आप लोग सभी जानते हैं कि इधर कई महीने से उनकी वकालत अंधाधुंध बढ़ रही है।

गुलजारीलाल—आप तो सलाह इस तरह देते है गोया आप खुद कुछ न करेंगे।

कमलाप्रसाद—न, मैं इस काम में। आपका शरीक नहीं हो सकता। मुझे अमृतराय के सब सिद्वांतो से मेल है, सिवाय विधवा-विवाह के।

बदरीप्रसाद—(डपटकर) बच्च, कभी तुमको समझ न आयेगी। ऐसी बातें मुहँ से मत निकाला करों।

झमनलाल—(कमलाप्रसाद से) क्या आप विलायत जाने के लिए तैयार है?

कमलाप्रसाद—मैं इसमे कोई हानि नहीं समझता।

गुलाजरीलाल—(हंसकर) यह नये बिगडे हैं। इनको अभी अस्पताल की हवा खिलाइए।

बदरीप्रसाद—(झल्लाकर) बच्चा, तुम मेरे सामने से हट जाओ। मुझे रोज होता है।

कमलाप्रसाद को भी गुस्सा आ गया। वह उठकर जाने लगे कि दो-तीन आदमियों ने मनाया और फिर कुर्सी पर लाकर बिठा दिया। इसी बीच में मिस्टर शर्मा की सवारी आयी। आप वही उत्साही पुरूष हैं जिन्होंने अमृतराय को पक्की सहायता का वादा किया था। इनको देखते ही लोगो ने बड़े आदर से कुर्सी पर बिठा दिया। मिटर शर्मा उस शहर में म्यूनिसिपैलिटी के सेक्रेटरी थे।

गुलाजारीलाल—कहिए पंडित जी क्या खबर है?

मिस्टर शर्मा—(मूँछो पर हाथ फेरकर) वह ताजा खबर लाया हूँ कि आप लोग सुनकर फड़क जायँगे। बाबू अमृतराय ने दरिया के किनारे वाली हरी भरी जमीन के लिए दरखास्त है। सुनता हूँ वहॉँ एक अनाथालय बनवायेगे।

बदरीप्रसाद—ऐसा कदापि नहीं हो सकता। कमलाप्रसाद। तुम आज उसी जमीन के लिए हमारी तरफ से कमेटी में दरखास्त पेश कर दो। हम वहॉँ ठाकुरद्वारा और धर्मशाला बनावायेंगे।

मिस्टर शर्मा—आज अमृतराय साहब के बँगले पर गये थे। वहॉँ बहुत देर तक बातचीत होती रही। साहब ने मेरे सामने मुसकराकर कहा—अमृतराय, मैं देखूँगा कि जमीन तुमको मिले।

गुलजारीलाल ने सर हिलाकर कहा—अमृतराय बड़े चाल के आदमी है। मालूम होता है, साहब को पहले ही से उन्होंने अपने ढंग पर लगा लिया है।

मिस्टर शर्मा—जनाब, आपको मालूम नहीं अंग्रेजों से उनका कितना मेलजोल है। हमको अंग्रेज मेम्बरों से कोई आशा नहीं रखना चाहिए। वह सब के सब अमृतराय का पक्ष करेंगे।

बदरीप्रसाद—(जोर देकर) जहॉँ तक मेरा बस चलेगा मै यह जमीन अमृतराय को न लेने दूँगा। क्या डर है, अगर और ईसाई मेम्बर उनके तरफदार है। यह लोग पॉँच से अधिक नहीं। बाकी बाईस मेबर अपने हैं। क्या हमको उनकी वोट भी न मिलेगी? यह भी न होगा तो मै उस जमीन को दाम देकर लेने पर तैयार हूँ।

झम्मनलाल—जनाब, मुझको पक्का विश्वास है कि हमको आधे से जियादा वोट अवश्य मिल जायँगे।

 

एक बहुत ही उत्तम रीति से सजा हुआ कमरा है। उसमें मिस्टर वालटर साहब बाबू अमृतराय के साथ बैठे हुए कुछ बातें कर रहे है। वालटर साहब यहॉँ के कमिश्नर है और साधारण अंग्रेजों के अतिरिक्त प्रजा के बड़े हितैषी और बड़े उत्साही प्रजापालक है। आपका स्वभाव ऐसा निर्मल है कि छोटा-बड़ा कोई हो, सबसे हँसकर क्षेम-कुशल पूछते और बात करते है। वह प्रजा की अवस्था को उन्नत दशा में ले जाने का उद्योग किया करते है और यह उनका नियम है कि किसी हिन्दुस्तानी से अंग्रेजी में नहीं बोलेगे। अभी पिछली साल जब प्लेग का डंका चारों ओर घेनघोर बज रहा था, वालटर साहब, गरीब किसानों के घर जाकर उनका हाल-चाल देखते थे और अपने पास से उनको कंबल बॉँटते फिरते थे। और अकाल के दिनों मेंतो वह सदा प्रजा की ओर से सरकार के दरबार में वादानुवाद करने के लिए तत्पर रहते है। साहब अमृतराय की सच्ची देशभक्ति की बड़ी बड़ाई किया करते है और बहुधा प्रजा की रक्षा करने में दोनों आदमी एक-दूसरे की सहायता किया करते है।

वालटर—(मुसकराकर) बाबू साहब। आप बड़ा चालाक है आप चाहता है कि मुंशी बदरी प्रसाद से थैली-भर, रूपया ले। मगर आपका बात वह नहीं मानने सकता।

अमृतराय—मैंने तो आपसे कह दिया कि मै अनाथालय अवश्य बनवाउँगा और इस काम में बीस हजार से कम न लगेगा। अगर आप मेरी सहायता करेंगे तो आशा है कि यह काम भी सफल हो जाए और मै भी बना रहूँ। और अगर आप कतरा गये तो ईश्वर की कृपा से मेरे पास अभी इतनी जायदाद है कि अकेले दो अनाथालय बनवा सकता हूँ। मगर हॉँ, तब मैं और कामों में कुछ भी उत्साह न दिखा सकूँगा।

वालटर—(हंसकर) बाबू साहब। आप तो जरा से बात में नाराज हो गया। हम तो बोलता है कि हम तुम्हारा मदद दो हजार से कर सकता है। मगर बदरीप्रसाद से हम कुछ नहीं कहने सकता। उसने अभी अकाल में सरकार को पॉँच हजार दिया है।

अमृतराय—तो यह दो हजार में लेकर क्या करूँगा? मुझे तो आपसे पंद्रह हजार की पूरी आशा थी। मुंशी बदरीप्रसाद के लिए पॉँच हजार क्या बड़ी बात है? तब से इसका दुगना तो वह एक मंदिर बनवाने में लगा चुके है। और केवल इस आशा पर कि उनको सी आई.ई की पदवी मिल जाएगी, वह इसका दस गुना आज दे सकते है।

वालटर—(अमृतराय से हाथ मिलाकर) वेल, अमृतराय। तुम बड़ा चालाक है। तुम बड़ा चालाक है तुम मुंशी बदरीप्रसाद को लूटना मॉँगता है।

यह कहकर साहब उठ खड़े हुए। अमृतराय भी उठे। बाहर फिटन खड़ी थी दोनों उस पर बैठ गये। साईस ने घोड़े को चाबुक लगाया और देखते देखते मुंशी बदरीप्रसाद के मकान पर जा पहूंचे। ठीक उसी वक्त जब वहॉँ अमृतराय से रार बढ़ाने की बातें सोची जा रही थीं।

प्यारे पाठकगण। हम यह वर्णन करके कि इन दोनों आदमियों के पहुँचते ही वहॉँ कैसी खलबली पड़ गयी, मुंशी बदरीप्रसाद ने इनका कैसा आदर किया, गुलजारीलाल, दाननाथ और मिस्टर शर्मा कैसी ऑंखे चुराने लगे, या साहब ने कैसे काट-छांट की बाते की और मुंशी जी को सी.आई.ई की पदवी की किन शब्दों में आशा दिलाइ आपका समय नहीं गँवाया चाहते। खुलासा यह कि अमॄतराय को यहॉँ से सत्तरह हजार रूपया मिला। मुंशी बदरीप्रसाद ने अकेले बारह हजार दिया जो उनकी उम्मीद से बहुत ज्यादा था। वह जब यहॉँ से चले तो ऐसा मालूम होता था कि मानों कोई गढ़ी जीते चले आ रहे है। वह जमीन भी जिसके लिए उन्होने कमेटी मे दरखस्त की थी मिल गयी और आज ही इंजीनियर ने उसको नाप कर अनाथालय का नकशा बनाना आरंभ कर दिया।

साहब और अमृतराय के चले जाने पर यहॉँ यो बाते होने लगी।

झम्मनलाल—यार, हमको तो इस लौंडे ने आज पांच सौ के रूप में डाल दिया।

गुलजारी लाल—जनाब, आप पॉँच सौ को रो रही है यहॉँ तो एक हजार पर पानी फिर गया। मुंशी जी तो सी.आई.ई की पदवी पावेगें।यहॉँ तो कोई रायबहादुरी को भी नहीं पूछता।

कमलाप्रसाद—बडे शोक की बात है कि आप लोग ऐसे शुभ कार्य मे सहायता देकर पछताते है। अमृतराय को देखिए कि उन्होंने अपना एक गॉँव बेचकर दस हजार रूपया भी दिया और उस पर दौड़-धूप अलग कर रहे है।

मुंशी बदरीप्रसाद—अमृतराय बड़ा उत्साही आदमी है। मैने आज इसको जाना। बच्चा कमलाप्रसाद। तुम आज शाम को उनके यहॉँ जाकर हमारी ओर से धन्यवाद दे देना।

झम्मनलाल—(मुंह फेरकर) आप क्यों न प्रसन्न होंगे, आपको तो पदवी मिलेगी न?

कमलाप्रसाद—(हंसकर) अगर आपका वह कवित्त तैयार हो तो जरा सुनाइए।

दाननाथ जो अब तक चुपचाप बैठे हुए थे बोले—अब आप उनकी निंदा करने की जगह उनकी प्रंशसा कीजिए।

मिस्टर शर्मा—अच्छा, जो हुआ सो हुआ, अब सभा विसर्जन कीजिए, आज यह मालूम हो गया कि अमृतराय अकेले हम सब पर भारी है।

कमलाप्रसाद—आपने नहीं सुना, सत्य की सदा जय होती है।

 

प्रेमा भाग 7

आज से कभी मन्दिर न जाऊँगी

बेचारी पूर्णा, पंडाइन, चौबाइन, मिसराइन आदि के चले जाने के बाद रोने लगी। वह सोचती थी कि हाय। अब मैं ऐसी मनहूस समझी जाती हूं कि किसी के साथ बैठ नहीं सकती। अब लोगों को मेरी सूरत काटने दौड़ती हैं। अभी नहीं मालूम क्या-क्या भोगना बदा है। या नारायण। तू ही मुझ दुखिया का बेड़ा पार लगा। मुझ पर न जाने क्या कुमति सवार थी कि सिर में एक तेल डलवा लियौ। यह निगोड़े बाल न होते तो काहे को आज इतनी फ़जीहत होती। इन्हीं बातों की सुधि करते करते जब पंडाइन की यह बात याद आ गयी कि बाबू अमृतराय का रोज रोज आना ठीक नहीं तब उसने सिर पर हाथ मारकर कहा—वह जब आप ही आप आते है तो मै कैसे मना कर दूँ। मै। तो उनका दिया खाती हूँ। उनके सिवाय अब मेरी सुधि लेने वाला कौन है। उनसे कैसे कह दूँ कि तुम मत आओ। और फिर उनके आने में हरज ही क्या है। बेचारे सीधे सादे भले मनुष्य है। कुछ नंगे नहीं, शोहदे नहीं। फिर उनके आने में क्या हरज है। जब वह और बड़े आदमियों के घर जाते है। तब तो लोग उनको ऑंखो पर बिठाते है। मुझ भिखारिन के दरवाजे पर आवें तो मै कौन मुँह लेकर उनको भगा दूँ। नहीं नहीं, मुझसे ऐसा कभी न होगा। अब तो मुझ पर विपत्ति आ ही पड़ी है। जिसके जी में जो आवै कहै।

इन विचारों से छुटटी पाकर वह अपने नियमानुसार गंगा स्नान को चली। जब से पंडित जी का देहांत हुआ था तब से वह प्रतिदिन गंगा नहाने जाया करती थी। मगर मुँह अंधेरे जाती और सूर्य निकलते लौट आती। आज इन बिन बुलाये मेहमानों के आने से देर हो गई। थोड़ी दूर चली होगी कि रास्ते में सेठानी की बहू से भेट हो गई। इसका नाम रामकली था। यह बेचारी दो साल से रँडापा भोग रही थी। आयु १६ अथवा १७ साल से अधिक न होगी। वह अति सुंदरी नख-शिख से दुरूस्त थी। गात ऐसा कोमल था कि देखने वाले देखते ही रह जाते थे। जवानी की उमर मुखडे से झलक रही थी। अगर पूर्णा पके हुए आम के समान पीली हो रही थी, तो वह गुलाब के फूल की भाति खिली हुई थी। न बाल में तेल था, न ऑंखो में काजल, न मॉँग में संदूर, न दॉँतो पर मिससी। मगर ऑंखो मे वह चंचलता थी, चाल मे वह लचक और होठों पर वह मनभवानी लाली थी कि जिससे बनावटी श्रृंगार की जरूरत न रही थी। वह मटकती इधर-उधर ताकती, मुसकराती चली जा रही थी कि पूर्णा को देखते ही ठिठक गयी और बड़े मनोहर भाव से हंसकर बोली—आओ बहिन, आओ। तुम तो जानों बताशे पर पैर धर रही हो।

पूर्णा को यह छेड़-छाड़ की बात बुरी मालूम हुई। मगर उसने बड़ी नर्मी से जवाब दिया—क्या करूं बहिन। मुझसे तो और तेज नहीं चला जाता।

 

रामकली—सुनती हूं कल हमारी डाइन कई चुड़ैलो के साथ तुमको जलाने गयी थी। जानों मुझे सताने से अभी तक जी नहीं भरा। तुमसे क्या कहू बहिन, यह सब ऐसा दुख देती है कि जी चाहता है माहुर खा लूँ। अगर यही हाल रहा तो एक दिन अवश्य यही होना है। नहीं मालूम ईश्वर का क्या बिगाड़ा था कि स्वप्न में भी जीवन का सुख न प्राप्त हुआ। भला तुम तो अपने पति के साथ दो वर्ष तक रहीं भी। मैंने तो उसका मुँह भी नहीं देखा। जब तमाम औरतों को बनाव-सिंगार किये हँसी-खुशी चलते-फिरते देखती हूँ तो छाती पर सापँ लोटने लगता है। विधवा क्या हो गई घर भर की लौंडी बना दी गयी। जो काम कोई न करे वह मै करुं। उस पर रोज उठते जूते, बैठते लात। काजर मत लगाओ। किस्सी मत लगाओ। बाल मत गुँथाओ। रंगीन साड़ियॉँ मत पहनों। पान मत खाओ। एक दिन एक गुलाबी साड़ी पहन ली तो चुड़ैल मारने उठी थी। जी में तो आया कि सर के बाल नोच लूँ मगर विष का घूँट पी के रह गयी और वह तो वह, उसकी बेटियॉँ और दूसरी बहुऍं मुझसे कन्नी काटती फिरती है। भोर के समय कोई मेरा मुँह नहीं देखता। अभी पड़ोस मे एक ब्याह पड़ा था। सब की सब गहने से लद लद गाती बजाती गयी। एक मै ही अभागिनी घर मे पडी रोती रही। भला बहिन, अब कहॉँ तक कोई छाती पर पत्थर रख ले। आखिर हम भी तो आदमी है। हमारी भी तो जवानी है। दूसरों का राग-रंग, हँसी, चुहल देख अपने मन मे भी भावना होती है। जब भूख लगे और खाना न मिले तो हार कर चोरी करनी पड़ती है।

 

यह कहकर रामकली ने पूर्णा का हाथ अपने हाथ में ले लिया और मुस्कराकर धीरे धीरे एक गीत गुनगुनाने लगी। बेचारी पूर्णा दिल में कुढ़ रही थी कि इसके साथ क्यों लगी। रास्ते में हजारों आदमी मिले। कोई इनकी ओर ऑंखे फाड़ फाड़ घूरता था, कोई इन पर बोलिया बोलता था। मगर पूर्णा सर को ऊपर न उठाती थी। हॉँ, रामकली मुसकरा मुसकरा कर बड़ी चपलता से इधर उधर ताकती, ऑंखे मिलाती और छेड़ छाड़ का जवाब देती जाती थी। पूर्णा जब रास्ते में मर्दो को खडे देखती तो कतरा के निकल जाती मगर रामकली बरबस उनके बीच में से घुसकर निकलती थी। इसी तरह चलते चलते दोनो नदी के तट पर पहुँची। आठ बज गया था। हजारों मर्द स्त्रियॉँ, बच्चे नहा रहे थे। कोई पूजा कर रहा था। कोई सूर्य देवता को पानी दे रहा था। माली छोटी-छोटी डालियों में गुलाब, बेला, चमेली के फूल लिये नहानेवालों को दे रहे थे। चारों और जै गंगा। जै गंगा। का शब्द हो रहा था। नदी बाढ़ पर थी। उस मटमैले पानी में तैरते हुए फूल अति सुंदर मालूम होते थे। रामकली को देखते ही एक पंडे ने कही—‘इधर सेठानी जी, इधर।‘ पंडा जी महाराज पीताम्बर पहने, तिलक मुद्रा लगाये, आसन मारे, चंदन रगड़ने में जुटे थे। रामकली ने उसके स्थान पर जाकर धोती और कमंउल रख दिया।

 

पंडा—(घूरकर) यह तुम्हारे साथ कौन है?

राम०—(ऑंखे मटकाकर) कोई होंगी तुमसे मतलब। तुम कौन होते हो पूछने वाले?

पंडा—जरा नाम सुन के कान खुश कर लें।

राम०—यह मेरी सखी हैं। इनका नाम पूर्णा है।

पंडा—(हँसकर) ओहो हो। कैसा अच्छा नाम है। है भी तो पूर्ण चंद्रमा के समान। धन्य भाग्य है कि ऐसे जजमान का दर्शन हुआ।

इतने में एक दूसरा पंडा लाल लाल ऑंखे निकाले, कंधे पर लठ रखे, नशे में चूर, झूमता-झामता आ पहुँचा और इन दोनो ललनाओं की ओर घूर कर बोला, ‘अरे रामभरोसे, आज तेरे चंदन का रंग बहुत चोखा है।

रामभरोसे—तेरी ऑंखे काहे को फूटे है। प्रेम की बूटी डाली है जब जा के ऐसा चोखा रंग भया।

पंडा—तेरे भाग्य को धन्य हैं यह रक्त चंदन (रामकली की तरफ देखकर) तो तूने पहले ही रगड़ा रक्खा था। परंतु इस मलयागिर (पूर्णा की तरफ इशारा करके) के सामने तो उसकी शोभा ही जाती रही।

पूर्णा तो यह नोक-झोंक समझ-समझ कर झेंपी जाती थी। मगर रामकली कब चूकनेवाली थे। हाथ मटका कर बोली—ऐसे करमठँढ़ियों को थोड़े ही मलयागिर मिला करता है।

रामभरोसे—(पंडा से) अरे बौरे, तू इन बातों का मर्म क्या जाने। दोनो ही अपने-अपने गुण मे चोखे है। एक में सुगंध है तो दूसरे में रंग है।

पूर्णा मन में बहुत लज्जित थी कि इसके साथ कहॉँ फँस गयी। अब तक वो नहा-धोके घर पहुँची होती। रामकली से बोली—बहिन, नहाना हो तो नहाओ, मुझको देर होती है। अगर तुमको देर हो तो मैं अकेले जाऊँ।

रामभरोसे—नहीं, जजमान। अभी तो बहुत सबेरा है। आनंदपूर्वक स्नान करो।

पूर्णा ने चादर उतार कर धर दी और साड़ी लेकर नहाने के लिए उतरना चाहती थी कि यकायक बाबू अमृतराय एक सादा कुर्ता पहने, सादी टोपी सर पर रक्खे , हाथ में नापने का फीता लिये चंद ठेकेदारों के साथ अति दिखायी दिये। उनको देखते ही पूर्णा ने एक लंगी घूघंट निकाल ली और चाहा कि सीढ़ियों पर लंबाई-चौड़ाइ नापना था क्योकि वह एक जनाना घाट बनवा रहे थे। वह पूर्णा के निकट ही खड़े हो गये। और कागज पेसिंल पर कुछ लिखने लगे। लिखते-लिखते जब उन्होंने कदम बढ़ाया तो पैर सीढ़ी के नीचे जा पड़ा। करीब था कि वह औधै मुँह गिरे और चोट-चपेट आ जाय कि पूर्णा ने झपट कर उनको सँभाला लिया। बाबू साहब ने चौंककर देखा तो दहिना हाथ एक सुंदरी के कोमल हाथों में है। जब तक पूर्णा अपना घूँघट बढ़ावे वह उसको पहचान गये और बोले—प्यारी, आज तुमने मेरी जान बचा ली।

पूर्णा ने इसका कुछ जवाब न दिया। इस समय न जाने क्यों उसका दिल जोर जोर से धड़क रहा था और आखो में ऑंसू भरा आता था। ‘हाय। नारायण, जोकहीं वह आज गिर पड़ते तो क्या होता...यही उसका मन बेर बेर कहता। ‘मैं भले संयोग से आ गयी थी। वह सिर नीचा किये गंगा की लहरों पर टकटकी लगाये यही बातें गुनती रही। जब तक बाबू साहब खड़े रहे, उसने उनकी ओर एक बेर भी न ताका। जब वह चले गए तो रामकली मुसकराती हुई आयी और बोली—बहिन, आज तुमने बाबू साहब को गिरते गिरते बचा लिया आज से तो वह और भी तुम्हारे पैरों पर सिर रकखेगे।

पूर्णा—(कड़ी निगाहों से देखकर) रामकली ऐसी बातें न करो। आदमी आदमी के काम आता है। अगर मैंने उनको सँभाल लिया तो इसमे क्या बात अनोखी हो गयी।

रामकली—ए लो। तुम तो जरा सी बात पर तिनिक गयीं।

पूर्णा—अपनी अपनी रूचि है। मुझको ऐसी बातें नहीं भाती।

रामकली—अच्छा अपराध क्षमा करो। अब सर्कर से दिल्लगी न करूँगी। चलो तुलसीदल ले लो।

पूर्णा—नहीं, अब मै यहॉँ न ठहरूँगी। सूरज माथें पसर आ गया।

रामकली—जब तक इधर उधर जी बहले अच्छा है। घर पर तो जलते अंगारों के सिवाय और कुछ नहीं।

जब दोनो नहाकर निकली तो फिर पंडो ने छेड़नाप चाहा, मगर पूर्णा एकदम भी न रूकी। आखिर रामकली ने भी उसका साथ छोड़ना उचित न समझा। दोनो थोड़ी दूर चली होगी। कि रामकली ने कहा—क्यों बहिन, पूजा करने न चलोगी?

पूर्णा—नहीं सखी, मुझे बहुत देर हो जायगी।

राम०—आज तुमको चलना पड़ेगा। तनिक देखो तो कैसे विहार की जगह है। अगर दो चार दिन भी जाओ तो फिर बिना नित्य गये जी न माने।

पूर्णा–तुम जाव, मैं न जाऊँगी। जी नहीं चाहता।

राम०—चलों चलो, बहुत इतराओ मत। दम की दम में तो लौटे आते है।

रास्ते में एक तंबोली की दूकान पड़ी। काठ के पटरों पर सुफेद भीगे हुए कपड़े बिछे थे। उस पर भॉँति-भॉँति के पान मसालों की खूबसूरत डिबियॉँ, सुगंध की शीशियॉँ, दो-तीन हरे-हरे गुलदस्ते सजा कर धरे हुए थे। सामने ही दो बड़े-बड़े चौखटेदार आईने लगे हुए थे। पनवाड़ी एक सजीया जवान था। सर पर दोपल्ली टोपी चुनकर टेडी दे रक्खी थी। बदन में तंजेब का फँसा हुआ कुर्ता था। गले में सोने की तावीजे। ऑंखो में सुर्मा, माथे पर रोरी, ओठो पर पान की गहरी लीली। इन दोनोंस्त्रियों को देखते ही बोला—सेठानी जी, पान खाती जाव।

रामकली ने चठ सर से चादर खसका दी और फिर उसको एक अनुपम भाव से ओढकर हंसते हुए नयनो से बोली—‘अभी प्रसाद नहीं पाया’।

पनवाड़ी—आवो। आवो। यह भी तो प्रसाद ही है। संतों के हाथ की चीज प्रसाद से बढ़कर होती है। यह आज तुम्हारे साथ कौन शक्ति है?

राम—यह हमारी सखी है।

तम्बोली—बहुत अच्छा जोड़ा है। धन्य् भाग्य जो दर्शन हुआ।

रामकली दुकान पर ठमक गयी और शीशे में देख देख अपने बाल सँवारने लगी। उधर पनवाड़ी ने चाँदी के वरक लपेटे हुए बीडे फुरती से बनाये और रामकली की तरफ हाथ बढ़ाया। जब वह लेने को झुकी तो उसने अपना हाथ खींच लिया और हँसकर बोला—तुम्हारी सखी लें तो दें।

राम०—मुँह बनवा आओ, मुँह। (पान लेकर) लो, सखी, पान खाव।

पूर्णा—मैं न खाऊँगी।

राम—तुम्हारी क्या कोई सास बैठी है जो कोसेगी। मेरी तो सास मना करती है। मगर मैं उस पर भी प्रतिदिन खाती हूँ।

पूर्णा—तुम्हारी आदत होगी मैं पान नहीं खाती।

राम—आज मेरी खातिर से खाव। तुम्हें कसम है।

रामकली ने बहुत हठ की मगर पूर्णा ने गिलौरियॉँ न लीं। पान खाना उसने सदा के लिए त्याग दिया था। इस समय तक धूप बहुत तेज़ हो गयी थी। रामकली से बोली—किधर है तुम्हारा मंदिर? वहाँ चलते-चलते तो सांझ हो जायगी।

राम—अगर ऐसे दिन कटा जाता तो फिर रोना काहे का था।

पूर्णा चुप हो गयी। उसको फिर बाबू अमृतराय के पैर फिसलने का ध्यान आ गया और फिर मन में यह प्रश्न किया कि कहीं आज वह गिर पड़ते तो क्या होता। इसी सोच मे थी कि निदान रामकली ने कहा—लो सखी, आ गया मंदिर।

पूर्णा ने चौंककर दाहिनी ओर जो देखा तो एक बहुत ऊँचा मंदिर दिखायी दिया। दरवाजे पर दो बड़े-बड़े पत्थर के शेर बने हुए थे। और सैकड़ो आदमी भीतर जाने के लिए धक्कम-धक्का कर रहे थे। रामकली पूर्णा को इस मंदिर में ले गयी। अंदर जाकर क्या देखती है कि पक्का चौड़ा ऑंगन है जिसके सामने से एक अँधेरी और सँकरी गली देवी जी के धाम को गयी है। दाहिनी ओर एक बारादरी है जो अति उत्तम रीति पर सजी हुई है। यहॉँ एक युवा पुरूष पीला रेशमी कोट पहने, सर पर खूबसूरत गुलाबी रंग की पगड़ी बॉँधे, तकिया-मसनद लगाये बैठा है।पेचवान लगा हुआ है। उगालदान, पानदान और नाना प्रकार की सुंदर वस्तुओं से सारा कमरा भूषित हो रहा है। उस युवा पूरूष के सामने एक सुधर कामिनी सिंगार किये विराज रही है। उसके इधर-उधर सपरदाये बैठे हुए स्वर मिला रहे है। सैकड़ो आदमी बैठे और सैकड़ो खड़े है। पूर्णा ने यह रंग देखा तो चौंककर बोली—सखी, यह तो नाचघर सा मालूम होता है। तुम कहीं भूल तो नहीं गयीं?

राम—(मुस्कराकर) चुप। ऐसा भी कोई कहता है। यही तो देवी जी का मदिर है। वह बरादरी में महंत जी बैठे है। देखती हो कैसा रँगीला जवान है। आज शुक्रवार है, हर शुक्र को यहॉँ रामजनी का नाच होता है।

इस बीच मे एक ऊँचा आदमी आता दिखायी दिया। कोई छ: फुट का कद था। गोरा-चिटठा, बालों में कंधी कह हुई, मुँह पान से भरे, माथे पर विभूति रमाये, गले में बड़े-बड़े दानों की रूद्राक्ष की माला पहने कंधे पर एक रेशमी दोपटटा रक्खे, बड़ी-बड़ी और लाल ऑंखों से इधर उधर ताकता इन दोनों स्त्रियों के समीप आकर खड़ा हो गया। रामकली ने उसकी तरफ कटाक्ष से देखकर कहा—क्यों बाबा इन्द्रवत कुछ परशाद वरशाद नहीं बनाया?

इन्द्र—तुम्हारी खातिर सब हाजिर है। पहले चलकर नाच तो देखो। यह कंचनी काश्मीर से बुलायी गयी है। महंत जी बेढब रीझे हैं, एक हजार रूपया इनाम दे चुके हैं।

रामकली ने यह सुनते ही पूर्णा का हाथ पकड़ा और बारादरी की ओर चली। बेचारी पूर्णा जाना न चाहती थी। मगर वहॉँ सबके सामने इनकार करते भी बन न पड़ता था। जाकर एक किनारे खड़ी हो गयी। सैकड़ों औरतें जमा थीं। एक से एक सुन्दर गहने लदी हुई । सैकड़ो मर्द थे, एक से एक गबरू ,उत्तम कपड़े पहले हुए। सब के सब एक ही में मिले जुले खड़े थे। आपस में बीलियॉँ बोली जाती थीं, ऑंखे मिलायी जाती थी, औरतें मर्दो में। यह मेलजोल पूर्णा को न भाया। उसका हियाव न हुआ कि भीड़ में घुसे। वह एक कोने में बाहर ही दबक गयी। मगर रामकली अन्दर घुसी और वहॉँ कोई आध घण्टे तक उसने खूब गुलछर्रे उड़ाये। जब वह निकली तो पसीने में डूबी हुई थी।तमाम कपड़े मसल गये थे।

पूर्णा ने उसे देखते ही कहा—क्यों बहिन, पूजा कर चुकीं? अब भी घर चलोगी या नहीं?

राम0—(मुस्कराकर) अरे, तुम बाहर खडी रह गयीं क्या?

जरा अन्दर चलके देखो क्या बहार है? ईश्वर जाने कंचनी गाती क्या है दिल मसोस लेती है।

पूर्णा—दर्शन भी किया या इतनी देर केवल गाना ही सुनती रहीं?

राम0—दर्शन करने आती है मेरी बला। यहॉँ तो दिल बहलाने से काम है। दस आदमी देखें दस आदमियों से हँसी दिल्लगी की, चलों मन आन हो गया। आज इन्द्रदत्त ने ऐसा उत्तम प्रसाद बनाया है कि तुमसे क्या बखान करूँ।

पूर्णा –क्या है ,चरणामृत?

राम0—(हॅसकर) हॉँ, चरणामृत में बूटी मिला दी गयी है।

पूर्णा—बूटी कैसी?

राम0—इतना भी नहीं जानती हो, बूटी भंग को कहते हैं।

पूर्णा—ऐहै तुमने भंग पी ली।

राम—यही तो प्रसाद है देवी जी का। इसके पीने में क्या हर्ज है। सभी पीते है। कहो तो तुमको भी पिलाऊँ।

पूर्णा—नहीं बहिन, मुझे क्षमा करो।

इधर यही बातें हो रही थी कि दस-पंद्रह आदमी बारादरी से आकर इनके आसपास खड़े हो गये।

एक—(पूर्णा की तरफ घूरकर) अरे यारो, यह तो कोई नया स्वरूप है।

दूसरा—जरा बच के चलो, बचकर।

इतने में किसी ने पूर्णा के कंधे से धीरे से एक ठोका दिया। अब वह बेचारी बड़े फेर में पड़ी। जिधर देखती है आदमी ही आदमी दिखायी देती है। कोई इधर से हंसता है कोइ उधर से आवाजें कसता है। रामकली हँस रही है। कभी चादर को खिसकाती है। कभी दोपटटे को सँभालती है। एक आदमी ने उससे पूछा—सेठानी जी, यह कौन है?

रामकली—यह मेरी सखी है, जरा दर्शन कराने को लायी थी।

दूसरा—इन्हें अवश्य लाया करों। ओ हो। कैसा खुलता हुआ रंग है।

बारे किसी तरह इन आदमियों से छुटकारा हुआ। पूर्णा घर की ओर भागी और कान पकड़े कि आज से कभी मंदिर न जाउँगी।

 

प्रेमा भाग 8

कुछ और बातचीत

पूर्णा ने कान पकड़े कि अब मंदिर कभी न जाऊगी। ऐसे मंदिरों पर दई का कोप भी नहीं पड़ता। उस दिन से वह सारे घर ही पर बैठी रहती। समय काटना पहाड़ हो जाता। न किसी के यहॉँ आना न जाना। न किसी से भेट न मुलाकात। न कोई काम न धंधा। दिन कैसे कटे। पढ़ी-लिखी तो अवश्य थी, मगर पढे क्या। दो-चार किस्से-कहानी की पुरानी किताबें पंडित जी की संदूक में पड़ी हुई थी, मगर उनकी तरफ देखने को अब जी नहीं चाहता था। कोई ऐसा न था जो बाजार से लाती मगर वह किताबों का मोल कया जाने। दो-एक बार जी में आया कि कोई पुस्तक प्रेमा के घर में मँगवाये। मगर फिर कुछ समझकर चुप हो रही। बेल-बूटे बनाना उसको आते ही न थें। कि उससे जी बहलाये, हॉँ सीना आता था। मगर सीये किसके कपड़े। नित्य इस तरह बेकाम बैठे रहने से वह हरदम कुछ उदास सी रहा करती। हॉँ, कभी-कभी पंडाइन और चौबाइन अपने चेले-चापड़ों के साथ आकर कुछ सिखावन की बातें सुना जाती थीं। मगर जब कभी वह कहतीं कि बाबू अमृतराय का आना ठीक नहीं तो पूर्णा साफ-साफ कह देती कि मैं उनको आने से नहीं रोक सकती और न कोई ऐसा बर्ताव कर सकती हूँ जिससे वह समझें कि मेरा आना इसको बुरा लगता है। सच तो यह है कि पूर्णा के हदय में अब अमृतराय के लिए प्रेम का अंकुर जमने लगा था। यद्यपि वह अभी तक यही समझती थी कि अमृतराय यहॉँ दया की राह से आया करते है। मगर नहीं मालूम क्यों वह उनके आने का एक-एक दिन गिना करती। और जब इतवार आता तो सबेरे ही से उनके शुभगमन की तैयारियॉँ होने लगती। बिल्लो बड़े प्रेम से सारा मकान साफ करती। कुर्सियां और तस्वीरों पर से सात दिन की जमी हुई धूल-मिटटी दूर करती। पूर्णा खुद भी अच्छे और साफ कपड़े पहनती। अब उसके दिल मे आप ही आप बनाव-सिंगार करने की इच्छा होती थी। मगर दिल को रोकती। जब बाबू अमृतराय आ जाते तो उसका मलिन मुख कुंदन की तरह दमकने लगता। उसकी प्यारी सूरत और भी अधिक प्यारी मालूम होने लगती। जब तक बाबू साहब रहते उसे अपना घर भरा मालूम होता। वह इसी कोशिश मे रहती कि ऐसी क्या बात करू जिसमें वह प्रसन्न होकर घर को जावें। बाबू साहब ऐसे हँसमुख थे कि रोते को भी एक बार हँसा देते। यहॉँ वह खूब बुलबुल की तरह चहकते। कोई ऐसी बात न कहते जिससे पूर्णा दुखित हो। जब उनके चलने का समय आता तो वह कुछ उदास हो जाती। बाबू साहब इसे ताड़ जाते और पूर्णा की खातिर से कुछ देर और बैठते। इसी तरह कभी-कभी घंटों बीत जाते। जब दिया में बत्ती पड़ने की बेला आती तो बाबू साहब चले जाते। पूर्णा कुछ देर तक इधर-उधर बौखलाई हुई धूमती। जो जो बाते हुई होती, उनको मन में दोहराती। यह समय उस आनंददायक स्वप्न-सा जान पड़ता था जो ऑंख के खुलते ही बिलाय जाता है।

 

इसी तरह कई मास और बीत गये और आखिर जो बात अमृतराय के मन में थी वह पूरी हो गयी। अर्थात पूर्णा को अब मालूम होने लगा कि मेरे दिल में उनकी मुहब्बम समाती जाती है। और उनका दिल भी मेरी मुहब्बत से खाली नहीं। अब पूर्णा पहले से ज्यादा उदास रहने लगी। हाय। ओ बौरे मन। क्या एक बार प्रीति लगाने से तेरा जी नहीं भरा जो तू फिर यह रोग पाल रहा है। तुझे कुछ मालूम है कि इस रोग की औषधि क्या है? जब तू यह जानता है तो फिर क्यो, किस आशा पर यह स्नेह बढ़ा रहा है और बाबू साहब। तुमको क्या कहना मंजूर है? तुम क्या करने पर आये हो? तुम्हारे जी में क्या है? क्या तुम नहीं जानते कि यह अग्नि धधकेगी तो फिर बुझाये न बुझेगी? मुझसे ऐसा कौन-सा गुण है? कहॉँ की बड़ी सुंदरी हूँ जो तुम प्रेमा, प्यारी प्रेमा, तो त्यागे देते हो? वह बेर बेर मुझको बुलाती है। तुम्हीं बताओ, कौन मुँह लेकर उसके पास जाऊँ और तुम तो आग लगाकर दूर से तमाशा देखोगे। इसे बुझायेगा कौन?बेचारी पूर्णा इन्हीं विचारों में डूबी रहती। बहुत चाहती कि अम़तराय का ख्याल न आने पावे, मगर कुछ बस न चलता।

 

अपने दिल का परिचय उसको एक दिन यों मिला कि बाबू अमृतराय नियत समय पर नहीं आये। थोड़ी देर तक तो वह उनकी राह देखती रही मगर जब वह अब भी न आये तब तो उसका दिल कुछ मसोसने लगा। बड़ी व्याकुलता से दौड़ी हुई दीवाजे पर आयी और आध घंटे तक कान लगाये खड़ी रही, फिर भीतर आयी और मन मारकर बैठ गयी। चित्त की कुछ वही अवस्था होने लगी जो पंडित जी के दौरे पर जाने के वक्त हुआ करती। शंका हुई कि कहीं बीमार तो नहीं हो गये। महरी से कहा—बिल्लो, जरा देखो तो बाबू साहब का जी कैसा? नहीं मालूम क्यों मेरा दिल बैठा जाता है। बिल्लो लपकी हुई बाबू साहब के बँगले पर पहुँची तो ज्ञात हुआ कि वह आज दो तीन नौकरों को साथ लेकर बाजार गये हुए है। अभी तक नहीं आये। पुराना बूढ़ा कहार आधी टॉँगों तक धोती बॉँधे सर हिलाता हुआ आया और कहने लगा—‘बेटा बड़ा खराब जमाना आवा है। हजार का सउदा होय तो, दुइ हजार का सउदा होय तो हमही लै आवत रहेन। आज खुद आप गये है। भला इतने बड़े आदमी का उस चाहत रहा। बाकी फिर सब अंग्रेजी जमाना आया है। अँग्रेजी पढ़-पढ़ के जउन न हो जाय तउन अचरज नहीं। बिल्लो बूढे कहर केसर हिलाने पर हँसती हुई घर को लौटी। इधर जब से वह आयी थी पूर्णा की विचित्र दशा हो रही थी। विकल हो होकर कभी भीतर जाती, कभी बाहर आती। किसी तरह चैन ही न आता। जान पड़ता कि बिल्लो के आने में देर हो रही है। कि इतने में जूते ही आवाज सुनायी दी। वह दौड़ कर द्वार पर आयी और बाबू साहब को टहलते हुए पाया तो मानो उसको कोई धन मिल गया। झटपट भीतर से किवाढ खोल दिया। कुर्सी रख दी और चौखट पर सर नीचा करके खड़ी हो गयी।

 

अमृतराय—बिल्लो कहीं गयी है क्या?

पूर्णा—(लजाते हुए) हॉँ, आप ही के यहॉँ तो गयी है।

अमृत०—मेरे यहॉँ कब गयी? क्यो कुछ जरूरत थी?

पूर्णा—आपके आने में विलंब हुआ तो मैने शायद जी न अच्छा हो। उसको देखने के लिए भेजा।

अमृत०—(प्यार से देखकर) बीमारी चाहे कैसी ही हो, वहमुझे यहॉँ आने से नहीं रोक सकती। जरा बाजार चला गया था। वहॉँ देर हो गयी।

यह कहकर उन्होंने एक दफे जोर से पुकारा, ‘सुखई, अंदर आओ’ और दो आदमी कमरे में दाखिल हुए। एक के हाथ मे ऐक संदूक था और दूसरे के हाथ में तह किये हुए कपड़े। सब सामान चौकी पर रख दिया गया। बाबू साहब बोले—पूणा, मुझे पूरी आशा है कि तुम दो चार मामूली चीजें लेकर मुझे कृतार्थ करोगी।(हंसकर) यह देर मे आने का जुर्माना है।

पूर्णा अचम्भे में आ गई। यह क्या। यह तो फिर वही स्नेह बढ़ाने वाली बातें है। और इनको खरीदने के लिए आप ही बाजार गये थे। अमृतराय। तुम्हारे दिल में जो है वह मै जानती हूं। मेरे दिल में जो है वह तुम भी जानते हो। मगर इसका नतीजा? इसमें संदेह नहीं कि इन चीजों की पूर्णा को बहुत जरूरत थी। पंडित जी की मोल ली हुई सारिया अब तक लंगे तंगे चली थी। मगर अब पहनने को कोई कपड़े न थे। उसने सोचा था कि अब की जब बाबू साहब के यहा से मासिक तनख्वाह मिलेगी तो मामूली सारियॉँ मगा लूँगी। उसे यह क्या मालूम था कि बीच में बनारसी और रेशमी सारियों का ढेर लग जायगा। पहिले तो वह स्त्रियों की स्वाभाविक अत्यभिलाषा से इन चीजों को देखने लगी मगर फिर यह चेत कर कि मेरा इस तरह चीजो पर गिरना उचित नहीं है वह अलग हट गयी और बोली—बाबू साहब। इस अनुग्रह के लिए मै आपको धन्यवाद देती हूँ, मगर यह भारी-भारी जोड़े मेरे किस काम के। मेरे लिए मोटी-झोरी सारियॉँ चाहिए। मैं इन्हे पहनूगी तो कोई क्या कहेगा।

अमृतराय—तुमने ले लिया। मेरी मेहनत ठिकाने लगी, और मै कुछ नहीं जानता।

इतने में बिल्लो पहुँची और कमरे में बाबू साहब को देखते ही निहाल हो गयी। जब चौकी पर दृष्ठि पड़ी और इन चीजों को देखा तो बोली—क्या इनके लिए आप बाजार गये थे। बूढा कहर रो रहा था कि मेरी दस्तूरी मारी गयी।

अमृतराय—(दबी जबान से) वह सब कहार मेरे नौकर हैं। मेरे लिए बाजार से चीजें लाते है। तुम्हारे सर्कार का मै चाकर हूँ।

बिल्लो यह सुनकर मुसकराती हुई भीतर चली गई। पूर्णा के कान में भी भनक पड़ गयी थी। बोली—उलटी बात न कहिए। मैं तो खुद आपकी चेरियो कीचेरी हूँ। इसके बाद इधर-उधर की कुछ बातें हुई। माघ-पूस के दिन थे, सरदी खूब पड़ रही थी। बाबू साहब देर तक न बैठ सके और आठ बजते बजते वह अपने घर को सिधारे। उनके चले जाने के बाद पूर्णा ने जो संदूक खोला तो दंग रह गयी। स्त्रियो के सिंगार की सब सामग्रियॉँ मौजूद थीं और जो चीज थी सुंदर और उत्तम थी। आइना, कंघी, सुगंधित तेलों की शीशियॉँ, भॉँति’भाति के इत्र, हाथों के कंगन, गले का चंद्रहार, जड़ाऊ, एक रूपहला पानदान, लिखने पढने के सामान से भरी एक संदूकची, किस्से-कहानी की कितबों, इनके अतिरिक्त और भी बहुत-सी चीजें बड़ी उत्तम रीति से सजाकर धरी हुइ थी। कपड़ो का बेठन खोला तो अच्छी से अच्छी सारिया दिखायी दी। शर्बती, धानी, गुलाबी, उन पर रेशम के बेल बूट बने हुए। चादरे भारी सुनहरे काम की। बिल्लो इन चीजो को देख-देख फूली न समाती थी। बोली—बहू। यह सब चीजें तुम पहनोगी तो रानी हो जाओगी—रानी।

पूर्णा—(गिरी हुई आवाज में) कुछ भंग खा गयी हो क्या बिल्लों। मै यह चीजें पहनूँगी तो जीती बचूँगी। चौबाइन और सेठानी ताने दे देकर जान ले लेगी।

बिल्लो—ताने क्या देंगी, कोई दिल्ल्गी है। इसमें उनके बाप का क्या इजारा। कोई उनसे मांगने जाता है।

पूर्णा ने महरी को आश्चर्य की ऑंखो से देखा। यही बिल्लो है जो अभी दो घंटे पहले चौआइन और पडाइन से सम्मति करती थी और मुझे बेर-बेर पहनने-ओढ़ने से बर्जा करती थी। यकायक यह क्या कायापलट हो गयी। बोली—कुछ संसार के कहने की भी तो लाज है।

बिल्लो—मै यह थोड़ा ही कहती हूँ कि हरदम यह चीजें पहना करों। जब बाबू साहब आवें थोड़ी देर के लिए पहन लिया।,

पूर्णा(लजाकर)—यह सिंगार करके मुझसे उनके सामने क्योंकर निकला जायगा। तुम्हें याद है एक बेर प्रेमा ने मेरे बाल गूँध दिये थे। तुमसे क्या कहूँ। उस दिन वह मेरी तरफ ऐसा ताकते थे जैसे कोई किसी पर जादू करे। नहीं मालूम क्या बात है कि उसी दिन से वह जब कभी मेरी ओर देखते है तो मेरी छाती-धड़ धड करने लगती है। मुझसे जान-बूझकर फिर ऐसी भूल न होगी।

बिल्लो—बहू, उनकी मरजी ऐसी ही है तो क्या करोगी, इन्हीं चीजों के लिए कल वह बाजार गये थे। सैकड़ो नौकर-चाकर है मगर इन्हें आप जाकर जाये। तुम इनको न पहनोगी तो वह अपने दिल में क्या कहेंगे।

पूर्णा—(ऑंखो में ऑंसू भरकर) बिल्लो। बाबू अमृतराय नहीं मालूम क्या करने वाले है। मेरी समझ में नहीं आता कि क्या करूँ। वह मुझसे दिन-दिन अधिक प्रेम बढ़ाते जाते है और मैं अपने दिल को क्या कहूँ, तुमसे कहते लज्जा आती है। वह अब मेरे कहने में नहीं रहा। मोहल्ले वाले अलग बदनाम कर रहे है। न जाने ईश्वर को क्या करना मंजूर है।

बिल्लो ने इसका कुछ जवाब न दिया। पूर्णा ने भी उस दिन खाना न बनाया। सॉंझ ही से जाकर चारपाई पर लेट रही। दूसरे दिन सुबह को उठकर उसने वह किताबें पढ़ना शुरू की, जो बाबू सहाब जाये थे। ज्यों-ज्यों वह पढ़ती उसको ऐसा मालूम होता कि कोई मेरी ही दुख की कहानी कह रहा है। इनके पढ़ने में जो जी लगा तो इतवार का दिन आया। दिन निकलते ही बिल्लो ने हँसकर कहा—आज बाबू साहब के आने का दिन है।

पूर्णा—(अनजान बनकर) फिर?

बिल्लो—आज तुमको जरूर गहने पहनने पड़ेगे।

पूर्णा—(दबी आवाज से) आज तो मेरे सर में पीड़ा हो रही है।

बिल्लो—नौज, तुम्हारे बैरी का सर दर्द करे। इस बहाने से पीछा न छूटेगा।

पूर्णा—और जो किसी ने मुझे ताना दिया तो तु जानना।

बिल्लो—ताना कौन रॉँड देगी।

सबेरे ही से बिल्लो ने पूर्णा का बनाव-सिंगार करना शुरू किया। महीनों से सर न मला गया था। आज सुगंधित मसाले से मला गया, तेल डाला गया, कंघी की गयी, बाल गूँथे गये और जब तीसरे पहर को पूर्णा ने गुलाबी कुर्ती पहनकर उस रेशमी काम की शर्बती सारी पहनी, गले मे हार और हाथों में कंगन सजाये तो सुंदरता की मूर्ति मालूम होने लगी। आज तक कभी उसने ऐसे रत्न जड़ित गहने और बहुमूल्य कपड़े न पहने थे। और न कभी ऐसी सुघर मालूम हुई थी। वह अपने मुखारविंद को आप देख देख कुछ प्रसन्न भी होती थी, कुछ लजाती भी थी और कुछ शोच भी करती थी। जब सॉँझ हुई तो पूर्णा कुछ उदास हो गयी। जिस पर भी उसकी ऑंखे दरवाजे पर लगी हुई थीं और वह चौंक कर ताकती थी कि कहीं अमृतराय तो नहीं आ गये। पॉँच बजते बजते और दिनों से सबेरे बाबू अमृतराय आये। कमरे में बैठे, बिल्लो से कुशलानंद पूछा और ललचायी हुई ऑंखो से अंदर के दरवाजे की तरफ ताकने लगे। मगर वहॉँ पूर्णा न थीं, कोई दस मिनट तक तो उन्होंने चुपचाप उसकी राह देखी, मगर जब अब भी न दिखायी दी तो बिल्लो से पूछा—क्यो महरी, आज तुम्हारी सर्कार कहॉँ है?

बिल्लो—(मुस्कराकर) घर ही में तो है।

अमृत०—तो आयी क्यों नहीं। क्या आज कुछ नाराज है क्या?

बिल्लो—(हूंसकर) उनका मन जाने।

अमृत०—जरा जाकर लिवा जाओ। अगर नाराज हों तो चलकर मनाऊँ।

यह सुनकर बिल्लो हँसती हुई अंदर गई और पूर्णा से बोली—बहू, उठोगी या वह आप ही मनाने आते है।

पूर्णा—बिल्लो, तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ, जाकर कह दो, बीमार है।

बिल्लो—बीमारी का बहाना करोगी तो वह डाक्टर को लेने चले जायॅगे।

पूर्णा—अच्छा, कह दो, सो रही है।

बिल्लो—तो क्या वह जगाने न आऍंगे?

पूर्णा—अच्छा बिल्लो, तुम ही केई बहाना कर दो जिससे मुझे जाना न पड़े।

बिल्लो—मैं जाकर कहे देती हूँ कि वह आपको बुलाती है।

पूर्णा को कोई बहाना न मिला। वह उठी और शर्म से सर झुकाये, घूँघट निकाले, बदन को चुराती, लजाती, बल खाती, एक गिलौरीदान लिये दरवाजे परआकर खड़ी हो गइ अमृतराय ने देखा तो अचम्भे में आ गये। ऑंखे चौधिया गयीं। एक मिनट तक तो वह इस तरह ताकते रहे जैसे कोई लड़के खिलौने को देखे। इसके बाद मुस्कराकर बोले—ईश्वर, तू धन्य है।

पूर्णा—(लजाती हुई) आप कुशल से थे?

अमृत०—(तिर्छी निगाहों से देखकर) अब तक तो कुशल से था, मगर अब खैरियत नहीं नजर आती।

पूर्णा समझ गयी, अमृतराय की रंगीली बातों का आनंद लेते लेते वह बोलने मे निपुण हो गयी थी। बोली—अपने किये का क्या इलाज?

अमृत०—क्या किसी को अपनी जान से बैर है।

पूर्णा ने लजाकर मुँह फेर लिया। बाबू साहब हँसने लगे और पूर्णा की तरफ प्यार की निगाहों से देखा। उसकी रसिक बातें उनको बहुत भाइ, कुछ काल तक और ऐसी ही रस भरी बाते होती रहीं। पूर्णा को इस बात की सुधि भी न थी कि मेरा इस तरह बोलना चालना मेरे लिए उचित नहीं है। उसको इस वक्त न पंडाइन का डर था, न पडोसियों का भय। बातों ही बातों में उसने मुसकराकर अमृतराय से पूछा—आपको आजकल प्रेमा का कुछ समाचार मिला है?

अमृत०—नहीं पूर्णा, मुझे इधर उनकी कुछ खबर नहीं मिली। हॉँ, इतना जानता हूँ कि बाबू दाननाथ से ब्याह की बातचीत हो रही है।

पूर्णा—बाबू दाननाथ तो आपके मित्र है?

अमृत०—मित्र भी है और प्रेमा के योगय भी है।

पूर्णा—यह तो मै न मानूगी। उनका जोड़ है तो आप ही से है। हॉ, आपका ब्याह भीतो कहीं ठहरा था?

अमृत०—हॉँ, कुछ बातचीत हो रही थी।

पूर्णा—कब तक होने की आशा है?

अमृत०—देखे अब कब भाग्य जागता है। मैं तो बहुत जल्दी मचा रहा हूं।

पूर्णा—तो क्या उधर ही से खिंचाव है। आश्चर्य की बात है।

अमृत०—नहीं पूर्णा, मै जरा भाग्यहीन हूँ। अभी तक सिवाय बातचीत होने के और कोई बात तय नहीं हुई।

पूर्णा—(मुसकराकर) मुझे अवश्य नवता दीजिएगा।

अमृत०—तुम्हारे ही हाथों में तो सब कु है। अगर तुम चाहो तो मेरे सर सेहरा बहुत जल्द बँध जाए।

पूर्णा भौचक होकर अमृतराय की ओर देखने लगी। उनका आशय अब की बार भी वह न समझी। बोली—मेरी तरफ से आप निश्चित रहिए। मुझसे जहॉँ तक हो सकेगा उठा न रखूँगी।

अमृत०—इन बातों को याद रखना, पूर्णा, ऐसा न हो भूल जाओ तो मेरे सब अरमान मिटटी में मिल जाऍं।

यह कहकर बाबू अमृतराय उठे और चलते समय पूर्णा की ओर देखा। उसकी ऑंखे डबडबायी हुई थी, मानो विनय कर रही थी कि जरा देर और बैठिए। मगर अमृतराय को कोइ जरूरी काम था धीरे से उठ खड़े हुए और बोले—जी तो नही चाहता कि यहॉँ से जाऊँ। मगर आज कुछ काम ही ऐसा आ पड़ा। यह कहा और चल दिये। पूर्णा खड़ी रोती रह गई।

 

 

Prema Munshi Premchand

प्रेमा मुंशी प्रेमचंद

प्रेमा भाग 9

तुम सचमुच जादूगर हो

नौ बजे रात का समय था। पूर्णा अँधेरे कमरे में चारपाई पर लेटी हुई करवटें बदल रही है और सोच रही है आखिर वह मुझेस क्या चाहते है? मै तो उनसे कह चुकी कि जहॉँ तक मुझसे हो सकेगा आपका कार्य सिद्व करने में कोई बात उठा न रखूँगी। फिर वह मुझसे कितना प्रेम बढ़ाते है। क्यों मेरे सर पर पाप की गठरी लादते है मै उनकी इस मोहनी सूरत को देखकर बेबस हुई जाती हूँ।

मैं कैसे दिल को समझाऊ? वह तो प्रेम रस पीकर मतवाला हो रहा है। ऐसा कौन होगा जो उनकी जादूभरी बातें सुनकर रीझ न जाय? हाय कैसा कोमल स्वभाव है। ऑंखे कैसी रस से भरी है। मानो हदय में चुभी जाती है।

आज वह और दिनों से अधिक प्रसन्न थे। कैसा रह रहकर मेरी और ताकते थे। आज उन्होने मुझे दो-तीन बार ‘प्यारी पूर्णा’ कहा। कुछ समझ में नहीं आता कि क्या करनेवाले है? नारायण। वह मुझसे क्या चाहते है। इस मोहब्बत का अंत क्या होगा।

यही सोचते-सोचते जब उसका ध्यान परिणाम की ओर गया तो मारे शर्म के पसीना आ गया। आप ही आप बोल उठी।

न......न। मुझसे ऐसा न होगा। अगर यह व्यवहार उनका बढ़ता गया तो मेरे लिए सिवाय जान दे देने के और कोई उपाय नहीं है। मैं जरूर जहर खा लूँगी। नही-नहीं, मै भी कैसी पागल हो गयी हूँ। क्या वह कोई ऐसे वैसे आदमी है। ऐसा सज्जन पुरूष तो संसार में न होगा। मगर फिर यह प्रेम मुझसे क्यों लगाते है। क्या मेरी परीक्षा लेना चाहती है। बाबू साहब। ईश्चर के लिए ऐसा न करना। मै तुम्हारी परीक्षा में पूरी न उतरूँगी।

पूर्णा इसी उधेड़-बुन मे पड़ी थी कि नींद आ गयी। सबेरा हुआ। अभी नहाने जाने की तैयारी कर रही थी कि बाबू अमुतराय के आदमी ने आकर बिल्लो को जोर से पुकारा और उसे एक बंद लिफाफा और एक छोटी सी संदूकची देकर अपनी राह लगा। बिल्लो ने तुरंत आकर पूर्णा को यह चीजें दिखायी।

पूर्णा ने कॉँपते हुए हाथों से खत लिया। खोला तो यह लिखा था—

‘प्राणप्यारी से अधिक प्यारी पूर्णा।

जिस दिन से मैंने तुमको पहले पहल देखा था, उसी दिन से तुम्हारे रसीले नैनों के तीर का घायल हो रहा हूँ और अब घाव ऐसा दुखदायी हो गया है कि सहा नहीं जाता। मैंने इस प्रेम की आग को बहुत दबाया। मगर अब वह जलन असहय हो गयी है। पूर्णा। विश्वास मानो, मै तुमको सच्चे दिल से प्यार करता हूं। तुम मेरे हदय कमल के कोष की मालिक हो। उठते बैठते तुम्हारा मुसकराता हुआ चित्र आखों के सामने फिरा करता है। क्या तुम मुझ पर दया न करोगी? मुझ पर तरस न खाओगी? प्यारी पूर्णा। मेरी विनय मान जाओ। मुझको अपना दास, अपना सेवक बना लो। मै तुमसे कोई अनुचित बात नहीं चाहता। नारायण। कदापि नहीं, मै तुमसे शास्त्रीय रीति पर विवाह करना चाहता हूँ। ऐसा विवाह तुमको अनोखा मालूम होगा। तुम समझोगी, यह धोखे की बात है। मगर सत्य मानो, अब इस देश में ऐसे विवाह कहीं कहीं होने लगे है। मै तुम्हारे विरह में मर जाना पसंद करूँगा, मगर तुमको धोखा न दूंगा।

‘पूर्णा। नही मत करो। मेरी पिछली बातों को याद करो। अभी कल ही जब मैंने कहा कि ‘तुम चाहो तो मेरे सर बहुत जल्द सेहरा बँध सकता है।‘ तब तुमने कहा था कि ‘मै भर शक्ति कोई बात उठा न रखूँगी। अब अपना वादा पूरा करो। देखो मुकर मत जाना।

‘इस पत्र के साथ मैं एक जहाऊ कंगन भेजता हू। शाम को मैं तुम्हारे दर्शन को आऊँगा। अगर यह कंगन तुम्हारी कलाई पर दिखाइ दिया तो समझ जाऊँगा कि मेरी विनय मान ली गयी। अगर नहीं तो फिर तुम्हें मुँह न दिखाऊँगा।

तुम्हारी सेवा का अभिलाषी

अमृतराय।

 

पूर्णा ने बड़े गौर से इस खत को पढ़ा और शोच के अथाह समुद्र में गोते खाने लगी। अब यह गुल खिला। महापुरूष ने वहॉँ बैठकर यह पाखंड रचा। इस धूर्मपन को देखो कि मुझसे बेर बेर कहते थे कि तुम्हारे ही ऊपर मेरा विवाह ठीक करने का बोझ है, मै बौरी क्या जानूँ कि इनके मन में क्या बात समायी है। मुझसे विवाह का नाम लेते उनको लाज नहीं होती। अगर सुहागिन बनना भाग में बादा होता तो विधवा काहे िो होती। मै अब इनको क्या जवाब दूँ। अगर किसी दूसरे आदमी ने यह गाली लिखी होती तो उसका कभी मुहँ न देखती। मैं क्या सखी प्रेमा से अच्छी हूँ? क्या उनसे सुंदर हूँ?क्या उनसे गुणवती हूँ? फिर यह क्या समझकर ऐसी बाते लिखते है? विवाह करेगे। मै समझ गयी जैसा विवाह होगा। क्या मुझे इतनी भी समझ नहीं? यह सब उनकी धूर्तपन है। वह मुझे अपने घर रक्खा चाहते हैं। मगर ऐसा मुझसे कदापि न होगा। मै तो इतना ही चाहती हूँ कि कभी-कभी उनकी मोहनी मूरत का दर्शन पाया करूँ। कभी-कभी उनकी रसीली बतियॉँ सुना करूँ और उनका कुशल आनंद, सुख समाचार पाया करूँ। बस। उनकी पत्नी बनने के योग्य मै नहीं हूँ। क्या हुआ अगर हदय में उनकी सूरत जम गयी है। मै इसी घर में उनका ध्यान करते करते जान दे दूँगी। पर मोह के बस के आकर मुझसे ऐसा भारी पाप न किया जाएगा। मगर इसमें उन बेचारे का दोष नहीं है। वह भी अपने दिल से हारे हुए है। नहीं मालूम क्यों मुझ अभागिनी में उनका प्रेम लग गया। इस शहर में ऐसा कौन रईस है जो उनको लड़की देने में अपनी बड़ाई न समझे। मगर ईश्वर को न जाने क्या मंजूर था कि उनकी प्रीति मुझसे लगा दी। हाय। आज की सॉँझ को वह आएगे। मेरी कलाई पर कंगन न देखेगे तो दिल मे क्या कहेंगे? कहीं आना-जाना त्याग दें तो मै बिन मारे मर जाऊँ। अगर उनका चित्त जरा भी मेरी ओर से मोटा हुआ, तो अवश्य जहर खा लूगीँ। अगर उनके मन में जरा भी माख आया, जरा भी निगाह बदली, तो मेरा जीना कठिन है।

 

बिल्लो पूर्णा के मुखड़े का चढ़ाव-उतार बड़े गौर से देख रही थी। जब वह खत पढ़ चुकी तो उसने पूछा—क्या लिखा है बहू?

पूर्णा—(मलिन स्वर में) क्या बताऊँ क्या लिखा है?

बिल्लो—क्यो कुशल तो है?

पूर्णा—हॉँ, सब कुशल ही है। बाबू साहब ने आज नया स्वॉँग रचा।

बिल्लो—(अचंभे से) वह क्या?

पूर्णा—लिखते है कि मुझसे......

उससे और कुछ न कहा गया। बिल्लो समझ गयी। मगर वहीं तक पहुची जहॉँ तक उसकी बुद्वि ने मदद की। वह अमृतराय की बढ़ती हुई मुहब्बत को देख-देखकर दिल में समझे बैठी हुई थी कि वह एक न एक दिन पूर्णा को अपने घर अवश्य डालेगे। पूर्णा उनको प्यार करती है, उन पर जान देती है। वह पहले बहुत हिचकिचायगी मगर अंत मे मान ही जायगी। उसने सैकडो रईसों को देखा था कि नाइनों कहारियो, महराजिनों को घर डाल लिया था। अब की भी ऐसा ही होगा। उसे इसमें कोई बात अनोखी नहीं मालूम होती थी कि बाबू साहब का प्रेम सच्च है मगर बेचारे सिवाय इसके और कर ही क्या सकते है कि पूर्णा को घर डाल लें। देखा चाहिए कि बहू मानती है या नहीं। अगर मान गयीं तो जब तक जियेगे, सुख भोगेगी। मै भी उनकी सेवा में एक टुकड़ा रोटी पाया करूँगी और जो कहीं इनकार किया तो किसी का निबाह न होगा। बाबू साहब ही का सहारा ठहरा। जब वही मुँह मोड़ लेंगे तो फिर कौन किसको पूछता है।

इस तरह ऊँच-नीच सोचकर उसने पूर्णा से पूछा-तुम क्या जवाब दो दोगी?

पूर्णा-जवाब ऐसी बातों का भी भल कहीं जवाब होता है। भला विधवाओं का कहीं ब्याह हुआ है और वही भी ब्रह्ममण का क्षत्रिय से। इस तरह की चन्द कहानियां मैंने उन किताबो में पढ़ी जो वह मुझे दे गये है। मगर ऐसी बात कहीं सैतुक नहीं देखने आयी।

बिल्लो समझी थी कि बाबू साहब उसको घर डरानेवाले है। जब ब्याह का नाम सुना तो चकरा कर बोली-क्या ब्याह करने को कहते है?

पूर्णा-हॉँ।

बिल्लों—तुमसे?

पूर्णा-यही तो आर्श्च है।

बिल्लो—अचराज सा अचरज हैं भला ऐसी कहीं भया है। बालक पक गये मगर ऐसा ब्याह नहीं देखा।

पूर्णा-बिल्लो, यह सब बहाना है। उनका मतलब मैं समझ गयी।

बिल्लो-वह तो खुली बात है।

पूर्णा—ऐसा मुझसे न होगा। मैं जान दे दूँगी पर ऐसा न करुँगी।

बिल्लो—बहू उनका इसमें कुछ दोष नहीं है। वह बेचारे भी अपने दिल से हारे हुए हैं। क्या करें।

पूर्णा—हाँ बिल्लो, उनको नहीं मालूम क्यों मुझसे कुछ मुहब्बत हो गयी है और मेरे दिल का हाल तो तुमसे छिपा नहीं। अगर वह मेरी जान मॉँगते तो मैं अभी दे देती। ईश्वर जानता है, उनके ज़रा से इशारे पर मैं अपने को निछावर कर सकती हूँ।

मगर जो बात व चाहते है मुझसे न होगी। उसके सोचती हूँ तो मेरा कलेजा काँपने लगता है।

बिल्लो—हॉँ, बात तो ऐसा ही है मुदा...

पूर्णा-मगर क्या, भलेमानुसो में ऐसा कभी होता ही नहीं। हॉँ, नीच जातियों में सगाई, डोला सब कुछ आता है।

बिल्लो—बहू यह तो सच है। मगर तुम इनकार करोगी तो उनका दिल टूट जायेगा।

पूर्णा—यही डर मारे डालता है। मगर इनकार न करुँ तो क्या करुँ। यह तो मैं भी जानती हूँ कि वह झूठ-सच ब्याह कर लेंगे। ब्याह क्या कर लेंगे। ब्याह क्या करेंगे, ब्याह का नाम करेंगे। मगर सोचो तो दूनिया क्या कहेगी। लोग अभी से बदनाम कर रहे है, तो न जाने और क्या-क्या आक्षेप लगायेंगे। मैं सखी प्रेमा को मुँह दिखाने योग्स नहीं रहूँगी। बस यही एक उपाय है कि जान दे दूँ, न रह बॉँस न बजें बॉँसुरी। उनको दो-चार दिन तक रंज रहेगा, आखिर भूल जाऐंगे। मेरी तो इज्ज़त बच जायगी।

बिल्लो—(बात पलट कर) इस सन्दूकचे मे’ क्या है?

पूर्णा-खोल कर देखो।

बिल्लो ने जो उसे खोला तो एक क़ीमती कंगन हरी मखमल में लपेटकर धरा था और सन्दूक में संदल की सुगंध आ रही थी। बिल्लो ने उसको निकाल लिया और चाहा की पूर्णा के हथ खींच लिया और ऑंखों में ऑंसू भर कर बोली—मत बिल्लो, इसे मत पहनाओ। सन्दूक में बंद करके रख दो।

बिल्लो—ज़रा पहनो तो देखो कैसा अच्छा मालूम होता है।

पूर्णा—कैसे पहनूँ। यह तो इस बात का सूचक हो जाएगा कि उनकी बात मंजूर है।

बिल्लो-क्या यह भी इस चीठी में लिखा है?

पूर्णा—हॉँ, लिखा है कि मैं आज शाम को आऊँगा और अगर कलाई पर कंगन देखूँगा तो समझ जाऊँगा कि मेरी बात मंजूर है।

बिल्लो—क्या आज ही शाम को आऍंगे?

पूर्णा—हॉँ।

 

यह कहकर पूर्णा ने सिर नीचा कर लिया। नहाने कौन जाता है। खाने पीने की किसको सुध है। दोपहर तक चुपचाप बैठी सोचा की। मगर दिल ने कोई बात निर्णय न की हॉँ, -ज्यों-ज्यों सॉँझ का समय निकट आया था त्यों-त्यों उसका दिल धड़कता जाता था कि उनके सामने कैसे जाऊँगी। वह मेरी कलाई पर कंगन न देखगें तो क्या कहेंगे? कहीं रुठ कर चले न जायँ? वह कहीं रिसा गये तो उनको कैसे मनाऊँगी?मगर तबिय ता क़ायदा है कि जब कोई बात उसको अति लौलीन करनेवाली होती है तो थोड़ी देर के बाद वह उसे भागने लगती है। पूर्णा से अब सोचा भी न जाता था। माथे पर हाथ घरे मौन साधे चिन्ता की चित्र बनी दीवार की ओर ताक रही थी। बिल्लो भी मान मारे बैठी हुई थी। तीन बजे होंगे कि यकायक बाबू अमृतराय की मानूस आवाज़ दरवाजे पर बिल्लो पुकराते सुनायी दी। बिल्लो चट बाहर दौड़ी और पूर्णा जल्दी से अपनी कोठरी में घुस गयी कि दवाज़ा भेड़ लिया। उसका दिल भर आया और वह किवाड़ से चिमट कर फूट-फूट रोने लगी। उधर बाबू साहब बहुत बेचैन थे। बिल्लो ज्योंही बाहर निकली कि उन्होंने उसकी तरफ़ आस-भरी ऑंखों से देखा। मगर जब उसके चेहरे पर खुशी का कोई चिह्न न दिखायी दिया तो वह उदास हो गये और दबी आवाज़ में बोली—महरी, तुम्हारी उदासी देखकर मेरा दिल बैठा जाता है।

 

बिल्लो ने इसका उत्तर कुछ न दिया।

अमृतराय का माथा ठनका कि जरुर कुछ गड़बड़ हो गयी। शायद बिगड़ गयी। डरते-डरते बिल्लो से पूछा—आज हमार आदमी आया था?

बिल्लो हा आया था।

अमृत—कुछ दे गया?

बिल्लो—दे क्यों नहीं गया।

अमृत तो क्या हुआ? उसको पहना?

बिल्लो—हॉँ, पहना अरे ऑंख भर के देखा तो हूई नहीं। तब से बैठी रो रही है। न खाने उठी, न गंगा जी गयी।

अमृत—कुछ कहा भी। क्या बहुत खफ़ा है?

बिल्लो—कहतीं क्या? तभी से ऑंसू का तार नहीं टूटा।

 

अमृतराय समझ गये कि मेरी चाल बुरी पड़ी। अभी मुझे कुछ दिन और धीरज रखना चाहिए था। वह जरुर बिगड़ गयीं। अब क्या करुँ? क्या अपना-सा मुँह ले के लौट जाऊँ? या एक दफा फिर मुलाकात कर लूँ तब लौट जाऊँ कैसे लौटूँ। लौटा जायगा? हाय अब न लौटा जायगा। पूर्णा तू देखने में बहुत सीधी और भोली है, परन्तु तेरा हृदय बहुत कठोर है। तूने मेरी बातों का विश्वास नहीं माना तू समझती है मैं तुझसे कपट कर रहा हूँ। ईश्वर के लिए अपने मन से यह शंका निकाल डाल। मैं धीरे-धीरे तेरे मोह में कैसा जकड़ गया हूँ कि अब तेरे बिना जीना कठिन है। प्यारी जब मैंने तुझसे पहल बातचीत की थी तो मुझे इसकी कोई आशा न थी कि तुम्हारी मीठी बातों और तुम्हारी मन्द मुस्कान का ज़ादू मुझ पर ऐसा चल जायगा मगर वह जादू चल गया। और अब सिवाय तुम्हारे उसे और कौन अतार सकता है। नहीं, मैं इस दरवाज़े से कदापि नहीं हिलूँगा। तुम नाराज़ होगी। झल्लाओगी। मगर कभी न कभी मुझ पर तरस आ ही जायगा। बस अब यही करना उचित है । मगर देखी प्यारी, ऐसा न करना कि मुझसे बात करना छोड़ दो। नहीं तो मेरा कहीं ठिकाना नहीं। क्या तुम हमसे सचमुच नाराज़ हो। हाय क्या तुम पहरों से इसलिए रो रही हो कि मेरी बातों ने तुमको दुख दिया।

 

यह बातें सोचते-सोचते बाबू साहब की ऑंखों में ऑंसू भर आये और उन्होंने गदगद स्वर में बिल्लो से कहा—महरी, हो सके तो ज़रा उनसे मेरी मुलाक़ात करा दो। कह दो एक दम के लिए मिल जायें। मुझ पर इतनी कृपा करो।

महरी ने जो उनकी ऑंखें लाल देखीं तो दौड़ हुई घर में आयी पूर्णा के कमरे में किवाड़ खटखटाकर बोली---बहू, क्या ग़ज़ब करती हो, बाहर निकलो, बेचारे खड़े रो रहे हैं।

पूर्णा ने इरादा कर लिया था कि मैं उनके सामने कदापि न जाऊँगी। वह महरी से बातचीत करके आप ही चले जायँगे। मगर जब सुना कि रो रहे है तो प्रतिज्ञा टूट गयी। बोली—तुमन जा के क्या कह दिया?

महरी—मैंन तो कुछ भी नहीं कहा।

पूर्णा से अब न रहा गया। चट किवाड़ खोल दिये। और कॉँपती हुई आवाज़ से बोली-सच बतलाओ बिल्लो, क्या बहुत रो रहे है?

महरी-नारायण जाने, दोनों ऑंखें लाल टेसू हो गयी हैं। बेचारे बैठे तक नहीं। उनको रोते देखकर मेरा भी दिल भर आया।

इतने में बाबू अमृतराय ने पुकार कर कहा—बिल्लो, मैं जाता हूँ। अपनी सर्कार से कह दो अपराध क्षमा करें।

पूर्णा ने आवाज़ सुनी। वह एक ऐसे आदमी की आवाज़ थी जो निराशा के समुद्र में डूबता हो। पूर्णा को ऐसा मालूम हुआ जैसे उसके हृदय को किसी ने छेद दिया। ऑंखों से ऑंसू की झड़ी लग गयी। बिल्लों ने कहा—बहू, हाथ जोड़ती हूँ, चली चलो जिसमें उनकी भी खातिरी हो जाए।

यह कहकर उसने आप से उठती हुई पूर्णा का हाथ पकड़ कर उठाया और वह घूँघट निकाल कर, ऑंसू पोंछती हुई, मर्दाने कमरे की तरफ चली। बिल्लो ने देखा कि उसके हाथों में कंगन नहीं है। चट सन्दूकची उठा लायी और पूर्णा का हाथ पकड़ कर चाहती थी कि कंगन पिन्हा दे। मगर पूर्णा ने हाथ झटक कर छुड़ा लिया और दम की दम में बैठक के भीतर दरवाज़े पर आके खड़ी रो रही थी। उसकी दोनों ऑंखें लाल थी और ताजे ऑंसुओ की रेखाऍं गालों पर बनी हुई थी। पूर्णा ने घूँघट उठाकर प्रेम-रस से भरी हुई ऑंखों से उनकी ओर ताका। दोनों की ऑंखें चार हुई। अमृतराय बेबस होकर बढ़े। सिसकती हुई पूर्णा का हाथ पकड़ लिया और बड़ी दीनता से बोले—पूर्णा, ईश्वर के लिए मुझ पर दया करो।

उनके मुँह से और कुछ न निकला। करुणा से गला बँध गया और वह सर नीचा किये हुए जवाब के इन्तिजार में खड़ा हो गये। बेचारी पूर्णा का धैर्य उसके हाथ से छूट गया। उसने रोते-रोते अपना सर अमृतराय के कंधे पर रख दिया। कुछ कहना चाहा मगर मुँह से आवाज़ न निकली। अमृतराय ताड़ गये कि अब देवी प्रसन्न हो गयी। उन्होंने ऑंखों के इशारे से बिल्लो से कंगन मँगवाया। पूर्णा को धीरेस कुर्सी पर बिठा दिया। वह जरा भी न झिझकी। उसके हाथों में कंगन पिन्हाये, पूर्णा ने ज़रा भी हाथ न खींचा। तब अमृतराय न साहसा करके उसके हाथों को चूम लिया और उनकी ऑंखें प्रेम से मग्न होकर जगमगाने लगीं। रोती हुई पूर्णा ने मोहब्बत-भरी निगाहों से उनकी ओर देखा और बोली—प्यार अमृतराय तुम सचमुच जादूगर हो।

 

प्रेमा भाग 10

विवाह हो गया

यह ऑंखों देखी बात है कि बहुत करके झुठी और बे-सिर पैर की बातें आप ही आप फैल जाया करती है। तो भला जिस बात में सच्चाई नाममात्र भी मिली हो उसको फैलते कितनी देर लगती है। चारों ओर यही चर्चा थी कि अमृतराय उस विधवा ब्राह्मणी के घर बहुत आया जाया करता है। सारे शहर के लोग कसम खाने पर उद्यत थे कि इन दोनों में कुछ सॉँठ-गॉँठ जरुर है। कुछ दिनों से पंडाइन औरचौबाइन आदि ने भी पूर्णा के बनाव-चुनाव पर नाक-भौं चढ़ाना छोड़ दिया था। क्योंकि उनके विचार में अब वह ऐसे बन्धनों की भागी थी। जो लोग विद्वान थे और हिन्दुस्तान के दूसरे देशों के हाल जानते थे उनको इस बात की बड़ी चिन्ता थी कि कहीं यह दोनों नियोग न करे लें। हज़ारों आदमी इस घात मे थे कि अगर कभी रात को अमृतराय पूर्णा की ओर जाते पकड़े जायँ तो फिर लौट कर घर न जाने पावें। अगर कोई अभी तक अमृतराय की नीयत की सफाई पर विश्वास रखता था तो वह प्रेमा थी। वह बेचारी विराहग्नि में जलते-जलते कॉँटा हो गई थी, मगर अभी तक उनकी मुहब्बत उसके दिल में वैसी ही बनी हुई थी। उसके दिल में कोई बैठा हुआ कह रहा था कि तेरा विवाह उनसे अवश्य होगौ। इसी आशा पर उसके जीवन का आधार था। वह उन लोगों में थी जो एक ही बार दिल का सौदा चुकाते है।

आज पूर्णा से वचन लेकर बाबू साहब बँगले पर पहुँचने भी न पाये थे कि यह ख़बर एक कान से दूसरे कान फैलने लगी और शाम होते-होते सारे शहर में यही बात गूँजने लगी। जो कोई सुनता उसे पहले तो विश्वास न आता। क्या इतने मान-मर्यादा के ईसाई हो गये हैं, बस उसकी शंका मिट जाती। वह उनको गालियॉँ देता, कोसता। रात तो किसी तरह कटी। सवेरा होते ही मुंशी बदरीप्रसाद के मकान पर सारे नगर के पंडित, विद्वान ध्नाढ़य और प्रतिष्ठित लोग एकत्र हुए और इसका विचार होने लगा कि यह शादी कैसे रोकी जाय।

पंडित भृगुदत्त—विधवा विवाह वर्जित हैं कोई हमसे शास्त्रर्थ कर ले। वेदपुराण में कहीं ऐसा अधिकार कोई दिखा दे तो हम आज पंडिताई करना छोड़ दें।

इस पर बहुत से आदमी चिल्लाये, हॉँ, हॉँ, जरुर शास्त्रार्थ हो।

शास्त्रर्थ का नाम सुनते ही इधर-उधर से सैकड़ों पंडित विद्यार्थी बग़लों में पोथियां दबाये, सिर घुटाये, अँगोछा कँधे पर रक्खे, मुँह में तमाकू भरे, इकट्टे हो गये और झक-झक होने लगी कि ज़रुर शास्त्रर्थ हो। पहले यह श्लोक पूछा जाय। उसका यह उत्तर दें तो फिर यह प्रश्न किया जावे। अगर उत्तर देने में वह लोग साहित्य या व्याकरण में ज़रा भी चूके तो जीत हमारे हाथ हो जाय। सैंकड़ों कठमुल्ले गँवार भी इसी मण्डली में मिलकर कोलाहल मचा रहे थे। मुँशी बदरीप्रसाद ने जब इनको शास्त्रर्थ करने पर उतारु देखा तो बोले—किस से करोगे शास्त्रार्थ? मान लो वह शास्त्रार्थ न करें तब?

सेठ धूनीमल—बिना शास्त्रार्थ किये विवाह कर लेगें (धोती सम्हाल कर) थाने में रपट कर दूँगा।

ठंकुर जोरावर सिंह—(मोछों पर ताव देकर) कोई ठट्ठा है ब्याह करना, सिर काट डालूँगा। लोहू की नदी बह जायगी।

राव साहब—बारता की बारात काट डाली जायगी।

इतने में सैकड़ों आदमी और आ डटे। और आग में ईधन लगाने लगे।

एक—ज़रुर से ज़रुर सिर गंजा कर दिया जाए।

दूसरा—घर में आग लगा देंगे। सब बारात जल-भुन जायगी।

तीसरा—पहले उस यात्री का गला घोंट देंगे।

इधर तो यह हरबोंग मचा हुआ था, उधर दीवानखाने में बहुत से वकील और मुखतार रमझल्ला मचा रहे थे। इस विवाह को न्याय विरुद्ध साबित करने के लिए बड़ा उद्योग किया जा रहा था। बड़ी तेज़ी से मोटी-मोटी पुस्तकों के वरक उलटे जा रहे थे। बरसों की पुरानी-धुरानी नज़ीरे पढ़ी जा रही थी कि कहीं से कोई दाँव-पकड़ निकल आवे। मगर कई घण्टे तक सर ख़पाने पर कुछ न हो सका। आखिर यह सम्मति हुई कि पहले ठाकुर ज़ोरावर सिंह अमृतराय का धमकावें। अगर इस पर भी वह न मानें तो जिस दिन बारात निकले सड़क पर मारपीट की जाय। इस प्रस्ताव के बाद न मानों तो विसर्जन हुई। बाबू अमृतराय बयाह की तैयारियों में लगे हुए थे कि ठाकुर ज़ोरावर सिंह का पत्र पहुँचा। उसमें लिखा था—

‘बाबू अमृतराय को ठाकुर ज़ोरावर सिंह का सलाम-बंदगी बहुत-बहुत तरह से पहुँचे। आगे हमने सुना है कि आप किसी विधवा ब्राह्मणी से विवाह करने वाले है। हम आपसे कहे देते हैं कि भूल कर भी ऐसा न कीजिएगा। नहीं तो आप जाने और आपका काम।’

 

ज़ोरावर सिंह एक धनाढ़य और प्रतिष्ठित आदमी होने के उपरान्त उस शहर के लठैंतों और बॉँके आदमियों का सरदार था और कई बेर बड़े-बड़ों को नीचा दिखा चुका था। असकी धमकी ऐसी न थी कि अमृतराय पर उसका कुछ असर न पड़ता। चिट्ठी को देखते ही उनके चेहरे का रंग उड़ गया। सोचना लगे कि ऐसी कौन-सी चाल चलूँ कि इसको अपना आदमी बना लूँ कि इतने में दूसरी चिट्ठी पहुँची। यह गुमनाम थी और सका आशा भी पहली चिट्ठी से मिलता था। इसके बाद शाम होते-होते सैंकड़ो गुमनाम चिट्टियॉँ आयीं। कोई की कहता था कि अगर फिर ब्याह का नाम लिया तो घर में आग लगा देंगे। कोई सर काटने की धमकी देता था। कोई पेट में छुरी भोंकने के लिए तैयार था। ओर कोई मूँछ के बात उखाड़ने के लिए चुटकियॉँ गर्म कर रहा था। अमृतराय यह तो जानते कि शहरवाले विरोध अवश्य करेंगे मगर उनको इस तरह की राड़ का गुमान भी न था। इन धमकियों ने ज़रा देर के लिए उन्हें भय में डाल दिया। अपने से अधिक खटका उनको पूर्णा के बारे में था कि कहीं यही सब दुष्ट उसे न कोई हानि पहुँचावें। उसी दम कपड़े पहिन, पैरगाड़ी पर सवांर होकर चटपट मजिस्ट्रेट की सेवा में उपस्थित हुए और उनसे पूरा-पूरा वृत्तान्त कहा। बाबू साहब का अंग्रेंजों में बहुत मान था। इसलिए नहीं कि वह खुशामदी थे या अफसरों की पूजा किया करते थे किन्तु इसलिए कि वह अपनी मर्यादा रखना आप जानते थे। साहब ने उनका बड़ा आदर किया। उनकी बातें बड़े ध्यान से सुनी। सामाजिक सुधार की आवश्कता को माना और पुलिस के सुपरिण्टेण्डेट को लिखा कि आप अमृतराय की रक्षा के वास्ते एक गारद रवाना कीजिए और ख़बर लेते रहिए कि मारपीट, खूनखराब न हो जाय। सॉँझ होते—होते तीस सिपाहियों का एक गारद बाबू साहब के मकान पर पहुँच गया, जिनमें से पॉँच बलवान आदमी पूर्णा के मकान की हिफ़ाजत करने के लिए भेज गये।

 

शहरवालों ने जब देखा कि बाबू साहब ऐसा प्रबन्ध कर रहे है तो और भी झल्लाये। मुंशी बदरीप्रसाद अपने सहायकों को लेकर मजिस्ट्रेट के पास पहुँचे और दुहाई मचाई कि अगर वह विवाह रोक न दिया गया तो शहर में बड़ा उपद्रव होगा और बलवा हो जाने का डर हैं। मगर साहब समझ गये कि यह लोग मिलजुल कर अमृतराय को हानि पहुँचाया चाहते हैं। मुंशी जी से कहा कि सर्कार किसी आदमी की शादी-विवाह में विघ्न डालना नियम के विरुद्ध है। जब तक कि उस काम से किसी दूसरे मनुष्य को कोई दुख न हो। यह टका-सा जवाब पाकर मुंशी जी बहुत लज्जित हुए। वहॉँ से जल-भुनकर मकान पर आये और अपने सहायकों के साथ बैठकर फैसला किया कि ज्यों ही बारात निकले, उसी दम पचास आदमी उस पर टूट पड़ें। पुलिसवालों की भी खबर लें और अमृतराय की भी हड्डी-पसली तोड़कर धर दें।

बाबू अमृतराय के लिए यह समय बहुत नाजु क था। मगर वह देश का हितैषी तन-मन-धन से इस सुधार के काम में लगा हुआ था। विवाह का दिन आज से एक सप्ताह पीछे नियत किया गया। क्योंकि ज्यादा विलम्ब करना उचित न था और यह सात दिन बाबू साहब ने ऐसी हैरानी में काटे कि जिसक वर्णन नहीं किया जासकात। प्रतिदिन वह दो कांस्टेबिलों के साथ पिस्तौलों की जोड़ी लगयो दो बेर पूर्णा के मकान पर आते। वह बेचारी मारे डर के मरी जाती थी। वह अपने को बार-बार कोसती कि मैंने क्यों उनको आशा दिलाकर यह जोखिम मोल ली। अगर इन दुष्टों ने कहीं उन्हें कोई हानि पहुँचाई तो वह मेरी ही नादानी का फल होगा। यद्यपि उसकी रक्षा के लिए कई सिपाही नियत थे मगर रात-रात भर उसकी ऑंखों में नींद न आती। पत्ता भी खड़कता तो चौंककर उठ बैठती। जब बाबू साहब सबेरे आकर उसको ढारस देते तो जाकर उसके जान में जान आती।

 

अमृतराय ने चिट्टियॉँ तो इधर-उधर भेज ही दी थीं। विवाह के तीन-चार दिन पहले से मेहमान आने लगे। कोई मुम्बई से आता था, कोई मदरास से, कोई पंजाब से और कोई बंगाल से । बनारस में सामाजिक सुधार के विराधियों का बड़ा ज़ोर था और सारे भारतवर्ष के रिफ़र्मरों के जी में लगी हुई थी कि चाहे जो हो, बनारस में सुधार के चमत्कार फैलाने का ऐसा अपूर्व समय हाथ से न जाने देना चाहिए, वह इतनी दूर-दूर से इसलिए आते थे कि सब काशी की भूमि में रिफार्म की पताका अवश्य गाड़ दें। वह जानते थे कि अगर इस शहर में यह विवाह हो तो फिर इस सूबें के दूसरे शहरों के रिफार्मरों के लिए रास्ता खुल जायगा। अमृताराय मेहमानों की आवभगत में लगे हुए थे। और उनके उत्साही चेले साफ-सुथरे कपड़े पहने स्टेशन पर जा-जाकर मेहमानों को आदरपूर्वक लाते और उन्हें सजे हुए कमरों में ठहराते थे। विवाह के दिन तक यहॉँ कोई डेढ़ सौ मेहमान जमा हो गये। अगर कोई मनुष्य सारे आर्यावर्त की सभ्यता, स्वतंत्रता, उदारता और देशभक्ति को एकत्रित देखना चाहता था तो इस समय बाबू अमृतराय के मकान पर देख सकता था। बनारस के पुरानी लकीर पीटने वाले लोग इन तैयारियों और ऐसे प्रतिष्ठित मेहमानों को देख-देख दॉँतों उँगली दबाते। मुंशी बदरीप्रसाद और उनके सहायकों ने कई बेर धूम-धाम से जनसे किये हरबेर यही बात तय हुई कि चाहे जो मारपीट ज़रुर की जाय। विवाह क पहले शाम को बाबू अमृतराय अपने साथियों को लेकर पूर्णा के मकान पर पहुँचे और वहॉँ उनको बरातियों के आदर-सम्मान का प्रबंध करने के लिए ठहरा दिया। इसके बाद पूर्णा के पास गये। इनको देखते ही उसकी ऑंखें में ऑंसू भर आये।

 

अमृत—(गले से लगाकर) प्यारी पूर्णा, डरो मत। ईश्वर चाहेगा तो बैरी हमारा बाल भी बॉंका न करा सकें। कल जो बरात यहॉँ आयेगी वैसी आज तक इस शहर मे किसी के दरवाज़े पर न आयी होगी।

पूर्णा—मगर मैं क्या करुँ। मुझे मो मालूम होता है कि कल जरुर मारपीट होगी। चारों ओ से यह खबर सुन-सुन मेरा जी आधा हो रहा है। इस वक्त भी मुंशी जी के यहॉँ लाग जमा हैं।

अमृत—प्यारी तुम इन बातों को ज़रा भी ध्यान में न लाओं। मुंशी जी के यहॉँ तो ऐसे जलसे महीनों से हो रहे हैं और सदा हुआ करेंगे। इसका क्या डर। दिल को मजबूत रक्खो। बस, यह रात और बीच है। कल प्यारी पूर्णा मेरे घर पर होगी। आह वह मेरे लिए कैसे आन्नद का समय होगा।

पूर्णा यह सुनकर अपना डर भूल गयी। बाबू साहब को प्यारी की निगाहों से देखा और जब चलने लगे तो उनके गले से लिपट कर बोली—तुमको मेरी कसम, इन दुष्टों से बचे रहाना।

अमृतराय ने उसे छाती से लगा लिया और समझा-बुझाकर अपने मकान को रवाना हुए।

पहर रात गये, पूर्णा के मकान पर, कई पंडित रेश्मी बाना सजे, गले में फूलों का हार डाले आये विधिपूर्वक लक्ष्मी की पूजा करने लगे। पूर्णा सोलहों सिंगार किये बैठी हुई थी। चारों तरफ गैस की रोशनी से दिन के समान प्रकाश हो रहा था। कांस्टेबिल दरवाज़े पर टहल रहे थे। दरवाजे का मैदान साफ किया जा रहा था और शामियाना खड़ा किया जा रहा था। कुर्सियॉँ लगायी जा रही थीं, फर्श बिछाया गया, गमले सजसये गये। सारी रात इन्हीं तैयारियों में कटी और सबेरा होते ही बारात अमृतराय के घर से चली।

बारात क्या थी सभ्यता और स्वाधीनता की चलती-फिरती तस्वीर थी। न बाजे का धड़-धड़ पड़-पड़, न बिगुलों की धों धों पों पों, न पालकियों का झुर्मट, न सजे हुए घोड़ों की चिल्लापों, न मस्त हाथियों का रेलपेल, न सोंटे बल्लमवालों की कतारा, न फुलवाड़ी, न बगीचे, बल्कि भले मानुषों की एक मंडली थी जो धीरे-धीरे कदम बढ़ाती चली जा रही थी। दोनों तरफ जंगी पुलिस के आदमी वर्दियॉँ डॉँटे सोंटे लिये खड़े थे। सड़क के इधर-उधर झुंड के झुंड आदमी लम्बी-लम्बी लाठियॉँ लिये एकत्र और थे बारात की ओर देख-देख दॉँत पीसते थे। मगर पुलिस का वह रोब था कि किसी को चूँ करने का भी साहस नहीं होता था। बारातियों से पचास कदम की दूरी पर रिजर्व पुलिस के सवार हथियारों से लैंस, घोड़ों पर रान पटरी जामये, भाले चमकाते ओर घोड़ों को उछालते चले जाते थे। तिस पर भी सबको यह खटका लग हुआ था कि कहीं पुलिस के भय का यह तिलिस्म टूट न जाय। यद्यपि बारातियों के चेहरे से घबराहट लेशमात्र भी न पाई जाती थी तथापि दिल सबके धड़क रहे थे। ज़रा भी सटपट होती तो सबके कान खड़े हो जाते। एक बेर दुष्टों ने सचमुच धावा कर ही दिया। चारों ओर हलचल मचगी। मगर उसी दम पुलिस ने भी डबल मार्च किया और दम की दम मे कई फ़सादियों की मुशके कस लीं। फिर किसी को उपद्रव मचाने का साहस न हुआ। बारे किसी तरह घंटे भर में बारात पूर्णा के मकान पर पहुँची। यहॉँ पहले से ही बारातियों के शुभागमन का सामान किया गया था। ऑंगन में फर्श लगा हुआ था। कुर्सियॉँ धरी हुई थीं ओर बीचोंबीच में कई पूज्य ब्रह्मण हवनकुण्ड के किनारे बैठकर आहुति दे रहे थे। हवन की सुगन्ध चारों ओर उड़ रही थी। उस पर मंत्रों के मीठे-मीठे मध्यम और मनोहर स्वर जब कान में आते तो दिल आप ही उछलने लगता। जब सब बारती बैठ गये तब उनके माथे पर केसर और चन्दन मला गया। उनके गलों में हार डाले गये और बाबू अमृतराय पर सब आदमीयों ने पुष्पों की वर्षा की। इसके पीछे घर मकान के भीतर गया और वहॉँ विधिपूर्वक विवाह हुआ। न गीत गाये गये, न गाली-गलौज की नौबत आयी, न नेगचार का उधम मचा।

 

भीतर तो शादी हो रही थी, बाहर हज़ारों आदमी लाठियॉँ और सोंटे लिए गुल मचा रहे थे। पुलिसवाले उनको रोके हुए मकान के चौगिर्द खड़े थे। इसी बची में पुलिस का कप्तान भ आ पहुँचा।उसने आते ही हुक्म दिया कि भीड़ हटा दी जाय। और उसी दम पुलिसवालों ने सोंटों से मारमार कर इस भीड़ को हटाना शुरु किया। जंगी पुलिस ने डराने के लिए बन्दूकों की दो-चार बाढ़े हवा में सर कर दी। अब क्या था, चारो ओर भगदड़ मच गयी। लोग एक पर एक गिरने लगे। मगर ठीक उसी समय ठाकुर जोरावर सिंह बाँकी पगिया बॉँधें, रजपूती बाना सजे, दोहरी पिस्तौल लगाये दिखायी, दिया। उसकी मूँछें खड़ी थी। ऑंखों से अंगारे उड़ रहे थे। उसको देखते ही वह लोब जो छितिर-बिति हो रहे थे फिर इकट्ठा होने लगो। जैसे सरदार को देखकर भागती हुई सेना दम पकड़ ले। देखते ही देखते हज़ार आदमी से अधिक एकत्र हो गये। और तलवार के धनी ठाकुर ने एक बार कड़क कर कहा—‘जै दुर्गा जी की वहीं सारे दिलों में मानों बिजली कौंध गयी, जोश भड़क उठा। तेवरियों पर बल पड़ गये और सब के सब नद की तरह उमड़ते हुए आगे को बढ़े। जंगी पुलिसवाले भी संगीने चढ़ाये, साफ़ बॉँधे, डटे खड़े थे। चारों ओर भयानक सन्नाटा छाया हुआ था। धड़का लगा हुआ था कि अब कोई दम में लोहू की नदी बहा चाहती है। कप्तान ने जब इस बाढ़ को अपने ऊपर आते देखा तो अपने सिपाहियों को ललकारा और बड़े जीवट से मैदान में आकर सवारों को उभारने लगा कि यकायक पिस्तौल की आवाज़ आयी और कप्तान की टोपी ज़मीन पर गिर पड़ी मगर घाव ओछा लगा। कप्तान ने देख लिया था। कि यह पिस्तौल जोरावर सिंह ने सर की है। उसने भी चट अपनी बन्दूक सँभाली ओर निशाने का लगाना था कि धॉँय से आवाज़ हुई ओर जोरावर सिंह चारों खाने चित्त जमीन पर आ रहा। उसके गिरते ही सबके हियाव छूट गये। वे भेड़ों की भॉँति भगाने लगे। जिसकी जिधर सींग समाई चल निकला। कोई आधा घण्टे में वहॉँ चिड़िया का पूत भी न दिखायी दिया।

 

बाहर तो यह उपद्रव मचा था, भीतर दुलहा-दुलहिन मारे डर के सूखे जाते थे। बाबू अमृतराय जी दम-दम की खबर मँगाते और थर-थर कॉँपती हुई पूर्णा को ढारस देते। वह बेचारी रो रही थी कि मुझ अभागिनी के लिए माथा पिटौवल हो रही है कि इतने में बन्दूक छूटी। या नारायण अब की किसकी जान गई। अमृतराय घबराकर उठे कि ज़रा बाहर जाकर देखें। मगर पूर्णा से हाथ न छुड़ा सके। इतने मेंएक आदमी ने फिर आकर कहा—बाबू साहब ठाकूर ढेर हो गये। कप्तान ने गोली मार दी।

आधा घण्टे में मैदान साफ़ हो गया और अब यहॉँ से बरात की बिदाई की ठहरी। पूर्णा और बिल्लो एक सेजगाड़ी में बिठाई गई और जिस सज-धज से बरात आयी थी असी तरह वापस हुई। अब की किसी को सर उठाने का साहस नहीं हुआ। इसमें सन्देह नहीं कि इधर-उधर झुंड आदमी जमा थे और इस मंडली को क्रोध की निगाहों से देख रहे थे। कभी-कभी मनचला जवान एकाध पत्थर भी चला देता था। कभी तालियॉँ बजायी जाती थीं। मुँह चिढ़ाया जाता था। मगर इन शरारतो से ऐसे दिल के पोढ़े आदमियों की गम्भीरता में क्या विध्न पड़ सकता था। कोई आधा घण्टे में बरात ठिकाने पर पहुँची। दुल्हिन उतारी गयी ओर बरातियां की जान में जान अयी। अमृतराय की खुशी का क्या पूछना। वह दौड़-दौड़ सबसे हाथ मिलाते फिरते थे। बॉँछें खिली जाती थीं। ज्योंही दुल्हिन उस कमरे में पहुँची जो स्वयं आप ही दुल्हिन की तरह सजा हुआ था तो अमृतराय ने आकर कहा—प्यारी, लोहम कुशल से पहुँच गये। ऐं, तुम तो रो रही हो...यह कहते हुए उन्होंने रुमाल से उसके ऑंसू पोछे और उसे गलेसे लगाया।

प्रेम रस की माती पूर्णा ने अमृतराय का हाथ पकड़ लिया और बोली—आप तो आज ऐसे प्रसन्नचित्त हैं, मानो कोई राज मिल गया है।

अमृत—(लिपटाकर) कोई झूठ है जिसे ऐसी रानी मिले उसे राज की क्या परवाह

आज का दिन आनन्द में कटा। दूसरे दिन बरातियों ने बिदा होने की आज्ञा मॉँगी। मगर अमृतराय की यह सलाह हुई कि लाला धनुषधारीलाल कम से कम एक बार सबको अपने व्याख्यान से कृतज्ञ करें यह सलाह सबो पसंद आयी। अमृतराय ने अपने बगीचे में एक बड़ा शामियान खड़ा करवाया और बड़े उत्सव से सभा हुई। वह धुऑंधर व्याख्यान हुए कि सामाजिक सुधार का गौरव सबके दिलों में बैठे गया। फिर तो दो जलसे और भी हुए और दूने धूमधाम के साथ। सारा शहर टूटा पड़ता था। सैंकड़ों आदमियों का जनेऊ टूट गया। इस उत्सव के बाद दो विधवा विवाह और हुए। दोनों दूल्हे अमृतराय के उत्साही सहायकों में थे और दुल्हिनों में से एक पूर्णा के साथ गंगा नहानेवाली रामकली थी। चौथे दिन सब नेवतहरी बिदा हुए। पूर्णा बहुत कन्नी काटती फिरी, मगर बरातियों के आग्रह से मज़बूर होकर उनसे मुलाकात करनी ही पड़ी। और लाला धनुषधारीलाल ने तो तीन दिन उसे बराबर स्त्री-धर्म की शिक्षा दी।

शादी के चौथे दिन बाद पूर्णा बैठी हुई थी कि एक औरत ने आकर उसके एक बंद लिफ़ाफा दिया। पढ़ा तो प्रेमा का प्रेम-पत्र था। उसने उसे मुबारकबादी दी थी और बाबू अमृतराय की वह तसवीर जो बरसों से उसके गले का हार हो रही थी, पूर्णा के लिए भेज दी थी। उस ख़त की आखिरी सतरें यह थीं---

‘सखी, तुम बड़ी भाग्यवती हो। ईश्वर सदा तुम्हारा सोहाग कायम रखें। तुम्हारे पति की तसवीर तुम्हारे पास भेजती हूँ। इसे मेरी यादगार समझाना। तुम जानती हो कि मैं इसको जान से ज्यादा प्यारी समझती रही। मगर अब मैं इस योग्य नही कि इसे अपने पास रख सकूँ। अब यह तुमको मुबारक हो। प्यारी, मुझे भूलना मत । अपने प्यारे पति को मेरी ओर से धन्यवाद देना।

तुम्हारी अभागिनी सखी—

'प्रेमा'

 

अफसोस आज के पन्द्रवे दिन बेचारी प्रेमा बाबू दाननाथ के गले बॉँधी दी गयी। बड़े धूमधम से बरात निकली। हज़ारों रुपया लुटा दिया गया। कई दिन तक सारा शहर मुंशी बदरीप्रसाद के दरवाज़े पर नाच देखता रहा। लाखों का वार-न्यारा हो गया। ब्याह के तीसरे ही दिन मुंशी जी परलोक को सिधारे। ईश्वर उनको स्वर्गवास दे।

 

प्रेमा भाग 11

विरोधियों का विरोध

मेहमानों के बिदा हो जाने के बाउ यह आशा की जाती थी कि विरोधी लोग अब सिर न उठायेंगे। विशेष इसलिए कि ठाकुर जोरावार सिंह और मुंशी बदरीप्रसाद के मर जाने से उनका बल बहुत कम हो गया था। मगर यह आशा पूरी न हुई। एक सप्ताह भी न गुज़रने पाया था कि और अभी सुचित से बैठने भी न पाये थे कि फिर यही दॉँतकिलकिल शुरु हो गयी।

अमृतराय कमरे में बैठे हुए एक पत्र पढ़ रहे थे कि महराज चुपके से आया और हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। अमृतराय ने सर उठाकर उसको देखा तो मुसकराकर बोले—कैसे चले महाराज?

महराज—हजूर, जान बकसी होय तो कहूँ।

अमृत—शौक से कहो।

महराज—ऐसा न हो कि आप रिसहे हो जायँ।

अमृत—बात तो कहो।

महराज—हजूर, डर लगती है।

अमृत—क्या तनख्वाह बढ़वाना चाहते हो?

महराज—नाहीं सरकार

अमृत—फिर क्या चाहते हो?

महराज—हजूर,हमारा इस्तीफा ले लिया जाय।

अमृत—क्या नौकरी छोड़ोगे?

महराज—हॉँ सरकार। अब हमसे काम नहीं होता।

अमृत—क्यों, अभी तो मजबूत हो। जी चाहे तो कुछ दिन आराम कर लो। मगर नौकरी क्यों छोड़ों

महराज—नाहीं सरकार, अब हम घर को जाइब।

अमृत—अगर तुमको यहॉँ कोई तकलीफ़ हा तो ठीक-ठीक कह दो। अगर तनख्वाह कहीं और इसके ज्यादा मिलने की आशा हो तो वैसा कहो।

महराज—हजूर, तनख्यावह जो आप देते हैं कोई क्या माई का लाल देगा।

अमृतराय—फिर समझ में नहीं आता कि क्यों नौकरी छोड़ना चहाते हो?

महराज—अब सरकार, मैं आपसे क्या कहूँ। यहॉँ तो यह बातें हो रही थीं उधर चम्मन व रम्मन कहार और भगेलू व दुक्खी बारी आपस में बातें कर रहे थे।

भगेलू—चलो, चलो जल्दी। नहीं तो कचहरी की बेला आ जैहै।

चम्मन—आगे-आगे तुम चलो।

भगेलू—हमसे आगूँ न चला जैहै।

चम्मन—तब कौन आगूँ चलै?

भगेलू—हम केका बताई।

रम्मन—कोई न चलै आगूँ तो हम चलित है।

दुक्खी—तैं आगे एक बात कहित है। नह कोई आगूँ चले न कोई पीछूँ।

चम्मन---फिर कैसे चला जाय।

भगेलू—सब साथ-साथ चलैं।

चम्मन—तुम्हार क़पार

भगेलू—साथ चले माँ कौन हरज है?

मम्मन—तब सरकार से बतियाये कौन?

भगेलू—दुक्खी का खूब बितियाब आवत है।

दुक्खी—अरे राम रे मैं उनके ताई न जैहूँ। उनका देख के मोका मुतास हो आवत है।

भगेलू---अच्छा, कोऊ न चलै तो हम आगूँ चलित हैं

सब के सब चले। जब बरामदे में पहुँचे तो भगेलू रुक गया।

मम्मन—ठाढ़े काहे हो गयो? चले चलौ।

भगेलू---अब हम न जाबै। हमारा तो छाती धड़त है।

अमृतराय ने जो बरामदे में इनको सॉँय-साँय बातें करते सुना तो कमरे से बाहर निकल आये और हँस कर पूछा—कैसे चले, भगेलू?

भगेलू का हियाव छूट गया। सिर नीचा करके बोला—हजूर, यह सब कहार आपसे कुछ कहने आये है।

अमृतराय—क्या कहते है? यह सब तो बोलते ही नहीं

भगेलू—(कहारों से) तुमको जौन कुछ कहना होय सरकार से कहो।

कहार भगेलू के इस तरह निकल जाने पर दिल में बहुत झल्लये। चम्मन ने जरा तीखे होकर कहा—तुम काहे नाहीं कहत हौ? तुम्हार मुँह में जीभ नहीं है?

अमृतराय—हम समझ गये। शायद तुम लोग इनाम मॉँगने आये हो। कहारों से अब सिवाय हॉँ कहने के और कुछ न बन पड़ा। अमृतराय ने उसी दम पॉँच रुपया भगेलू के हाथ पर रख दिया। जब यह सब फिर अपनी काठरी में आये तो यों बातें करने लगे—

चम्मन—भगेलुआ बड़ा बोदा है।

रम्मन—अस रीस लागत रहा कि खाय भरे का देई।

दुक्खी—वहॉँ जाय के ठकुरासोहाती करै लागा।

भगेलू—हमासे तो उनके सामने कुछ कहै न गवा।

दुक्खी---तब काहे को यहॉँसे आगे-आगे गया रह्यो।

इतने में सुखई कहार लकडी टेकता खॉसता हुआ आ पहुँचा। और इनको जमा देखकर बोला—का भवा? सरकार का कहेन?

दुक्खी—सरकार के सामने जाय कै सब गूँगे हो गये। कोई के मुँह से बात न लिकली।

भगेलू—सुखई दादा तुम नियाव करो, जब सरकार हँसकर इनाम दे लागे तब कैसे कहा जात कि हम नौकरी छोड़न आये हैं।

सुखई—हम तो तुमसे पहले कह दीन कि यहॉँ नौकरी छोड़ी के सब जने पछतैहो। अस भलामानुष कहूँ न मिले।

भगेलू—दादा, तुम बात लाख रुपया की कहत हो।

चम्मन—एमॉँ कौन झूठ हैं। अस मनई काहॉँ मिले।

रम्मन आज दस बरस रहत भये मुदा आधी बात कबहूँ नाहीं कहेन।

भगेलू—रीस तो उनके देह में छू नहीं गै। जब बात करत है हँसकर।

मम्मन—भैया, हमसे कोऊ कहत कि तुम बीस कलदार लेव और हमारे यहॉँ चल के काम करो तो हम सराकर का छोड़ के कहूँ न जाइत। मुद्रा बिरादरी की बात ठहरी। हुक्का-पानी बन्द होई गवा तो फिर केह के द्वारे जैब।

रम्मन—यही डर तो जान मारे डालते है।

चम्मन—चौधरी कह गये हैं किआज इनकेर काम न छोड़ देहों तो टाट बाहर कर दीन जैही।

सुखई—हम एक बेर कह दीन कि पछतौहो। जस मन मे आवे करो।

कहार भगेलू के इस तरह निकल जाने पर दिल में बहुत झल्लये। चम्मन ने जरा तीखे होकर कहा—तुम काहे नाहीं कहत हौ? तुम्हार मुँह में जीभ नहीं है?

अमृतराय—हम समझ गये। शायद तुम लोग इनाम मॉँगने आये हो।

कहारों से अब सिवाय हॉँ कहने के और कुछ न बन पड़ा। अमृतराय ने उसी दम पॉँच रुपया भगेलू के हाथ पर रख दिया। जब यह सब फिर अपनी काठरी में आये तो यों बातें करने लगे—

चम्मन—भगेलुआ बड़ा बोदा है।

रम्मन—अस रीस लागत रहा कि खाय भरे का देई।

दुक्खी—वहॉँ जाय के ठकुरासोहाती करै लागा।

भगेलू—हमासे तो उनके सामने कुछ कहै न गवा।

दुक्खी---तब काहे को यहॉँसे आगे-आगे गया रह्यो।

इतने में सुखई कहार लकडी टेकता खॉसता हुआ आ पहुँचा। और इनको जमा देखकर बोला—का भवा? सरकार का कहेन?

दुक्खी—सरकार के सामने जाय कै सब गूँगे हो गये। कोई के मुँह से बात न लिकली।

भगेलू—सुखई दादा तुम नियाव करो, जब सरकार हँसकर इनाम दे लागे तब कैसे कहा जात कि हम नौकरी छोड़न आये हैं।

सुखई—हम तो तुमसे पहले कह दीन कि यहॉँ नौकरी छोड़ी के सब जने पछतैहो। अस भलामानुष कहूँ न मिले।

भगेलू—दादा, तुम बात लाख रुपया की कहत हो।

चम्मन—एमॉँ कौन झूठ हैं। अस मनई काहॉँ मिले।

रम्मन आज दस बरस रहत भये मुदा आधी बात कबहूँ नाहीं कहेन।

भगेलू—रीस तो उनके देह में छू नहीं गै। जब बात करत है हँसकर।

मम्मन—भैया, हमसे कोऊ कहत कि तुम बीस कलदार लेव और हमारे यहॉँ चल के काम करो तो हम सराकर का छोड़ के कहूँ न जाइत। मुद्रा बिरादरी की बात ठहरी। हुक्का-पानी बन्द होई गवा तो फिर केह के द्वारे जैब।

रम्मन—यही डर तो जान मारे डालते है।

चम्मन—चौधरी कह गये हैं किआज इनकेर काम न छोड़ देहों तो टाट बाहर कर दीन जैही।

सुखई—हम एक बेर कह दीन कि पछतौहो। जस मन मे आवे करो।

आठ बजे रात को जब बाबू अमृतराय सैर रिके आये तो कोई टमटम थानेवाला न था। चारों ओर घूम-घूम कर पुकारा। मगर किसी आहट न पायी। महाराज, कहार, साईस सभी चल दिये। यहाँ तक कि जो साईस उनके साथ था वह भी न जाने कहॉँ लोप हो गया। समझ गये कि दुष्टों ने छल किया। घोड़े को आप ही खोलने लगे कि सुखई कहार आता दिखाई दिया। उससे पूछा—यह सब के सब कहॉँ चले गये?

सुखई—(खॉँसकर) सब छोड़ गये। अब काम न करैगे।

अमृतराय—तुम्हें कुछ मालूम है इन सभों ने क्यों छोड़ दिया?

सुखई—मालूम काहे नाहीं, उनके बिरादरीवाले कहते हैं इनके यहॉँ काम मत करो। अमृतराय राय की समझ में पूरी बात आ गयी कि विराधियों ने अपना कोई और बस न चलते देखकर अब यह ढंग रचा है। अन्दर गये तो क्या देखते हैं कि पूर्णा बैठी खाना पका रही है। और बिल्लो इधर-उधर दौड़ रही है। नौकरों पर दॉँत पीसकर रह गये। पूर्णासे बोले---आज तुमको बड़ा कष्ट उठाना पड़ा।

पूर्णा—(हँसकर) इसे आप कष्ट कहते है। यह तो मेरा सौभाग्य है।

 

पत्नी के अधरों पर मन्द मुसकान और ऑंखों में प्रेम देखकर बाबू साहब के चढ़े हुए तेवर बदल गये। भड़कता हुआ क्रोध ठंडा पड़ गया और जैसे नाग सूँबी बाजे का शब्द सुनकर थिरकने लगता है और मतवाला हो जाता उसी भॉँति उस घड़ी अमृतराय का चित्त भी किलोलें करने लगा। आव देखा न ताव। कोट पतलून, जूते पहने हुए रसोई में बेधड़क घुस गये। पूर्णा हॉँ,हॉँ करती रही। मगर कौन सुनता है। और उसे गले से लगाकर बोले—मै तुमको यह न करने दूगॉँ।

 

पूर्णा भी प्रति के नशे में बसुध होकर बोली-मैं न मानूँगी।

अमृत०—अगर हाथों में छाले पड़े तो मैं जुरमाना ले लूँगा।

पूर्णा—मैं उन छालों को फूल समझूँगी, जुरामान क्यों देने लगी।

अमृत०—और जो सिर में धमक-अमक हुई तो तुम जानना।

पूर्णा-वाह ऐसे सस्ते न छूटोगे। चन्दन रगड़ना पड़ेगा।

अमृत—चन्दन की रगड़ाई क्या मिलेगी।

पूर्णा—वाह (हंसकर) भरपेट भोजन करा दूँगी।

अमृत—कुछ और न मिलेगा?

पूर्णा—ठंडा पानी भी पी लेना।

अमृत—(रिसियाकर) कुछ और मिलना चाहिए।

पूर्णा—बस,अब कुछ न मिलेगा।

यहॉँ अभी यही बातें हो रही थीं कि बाबू प्राणनाथ और बाबू जीवननाथ आये। यह दोनों काश्मीरी थे और कालिज में शिक्षा पाते थे। अमृतराय क पक्षपातियों में ऐसा उत्साही और कोई न था जैसे यह दोनों युवक थे। बाबू साहब का अब तक जो अर्थ सिद्ध हुआ था, वह इन्हीं परोपकारियों के परिश्रम का फल था। और वे दोनों केवल ज़बानी बकवास लगानेवाली नहीं थे। वरन बाबू साहब की तरह वह दोनों भी सुधार का कुछ-कुछ कर्तव्य कर चुके थे। यही दोनों वीर थे जिन्होंने सहस्रों रुकावटों और आधाओं को हटाकर विधवाओं से ब्याह किया था। पूर्णा की सखी रामकली न अपनी मरजी से प्राणनाथ के साथ विवाह करना स्वीकार किया था। और लक्ष्मी के मॉँ-बॉँप जो आगरे के बड़े प्रतिष्ठत रईस थे, जीवननाथ से उसका विवाह करने के लिए बनारस आये थे। ये दोनों अलग-अलग मकान में रहते थे।

बाबू अमृतराय उनके आने की खबर पाते ही बाहर निकल आये और मुसकराकर पूछा—क्यों, क्या खबर है?

जीवननाथ—यह आपके यहॉँ सन्नाटा कैसा?

अमृत०—कुछ न पूछो, भाई।

जीवन०—आखिर वे दरजन-भर नौकरी कहाँ समा गये?

अमृत०—सब जहन्नुम चले गये। ज़ालिमों ने उन पर बिरादरी का दबाव डालकर यहॉँ से निकलवा दिया।

प्राणनाथ ने ठट्ठा लगाकर काह---लीजिए यहॉँ भी वह ढंग है।

अमृतराय—क्या तुम लोगों के यहॉँ भी यही हाल है।

प्राणनाथ---जनाब, इससे भी बदतर। कहारी सब छोड़ भागो। जिस कुएसे पानी आता था वहॉँ कई बदमाश लठ लिए बैठे है कि कोई पानी भरने आये तो उसकी गर्दन झाड़ें।

जीवननाथ—अजी, वह तो कहो कुशल होयी कि पहले से पुलिस का प्रबन्ध कर लिया नहीं तो इस वक्त शायद अस्पताल में होते।

अमृतराय—आखिर अब क्या किया जाए। नौकरों बिना कैसे काम चलेगा?

प्राणनाथ—मेरी तो राय है कि आप ही ठाकुर बनिए और आप ही चाकर।

ज़ीवनाथ—तुम तो मोटे-ताजे हो। कुएं से दस-बीस कलसे पानी खींच ला सकते हो।

प्राणनाथ—और कौन कहे कि आप बर्तन-भॉँडे नहीं मॉँज सकते।

अमृत-अजी अब ऐसे कंगाल भी नहीं हो गये हैं। दो नौकर अभी हैं, जब तक इनसे थोड़ा-बहुत काम लेंगे। आज इलाके पर लिख भेजता हूँ वहॉँ दो-चार नौकर आ जायँगे।

जीवन—यह तो आपने अपना इन्तिज़ाम किया। हमारा काम कैसे चले।

अमृत.—बस आज ही यहॉँ उठ आओ, चटपट।

जीवन.—यह तो ठीक नहीं। और फिर यहॉँ इतनी जगह कहॉँ है?

अमृत.—वह दिल से राज़ी हैं। कई बेर कह चुकी हैं कि अकेले जी घबराता है। यह ख़बर सुनकर फूली न समायेंगी।

जीवन—अच्छा अपने यहॉँ तो टोह लूँ।

प्राण—आप भी आदमी हैं या घनचक्कर। यहॉँ टोह लूँ वहॉँ टोह लूँ। भलमानसी चाहो तो बग्घी जोतकर ले चलों। दोनों प्राणियों को यहॉँ लाकर बैठा दो। नहीं तो जाव टोह लिया करो।

अमृत—और क्या, ठीक तो कहते हैं। रात ज्यादा जायगी तो फिर कुछ बनाये न बनेगी।

जीवन—अच्छा जैसी आपकी मरज़ी।

दोनों युवक अस्तबल में गये। घोड़ा खोला और गाड़ी जोतकर ले गये। इधर अमृतराय ने आकर पूर्णा से यह समाचार कहा। वह सुनते ही प्रसन्न हो गई और इन मेहमानों के लिए खाना बनाने लगी। बाबू साहब ने सुखई की मदद से दो कमरे साफ़ कराये। उनमें मेज, कुर्सियाँ और दूसरी जरुरत की चीज़ें रखवा दीं। कोई नौ बजे होंगे कि सवारियॉँ आ पहुँचीं। पूर्णा उनसे बड़े प्यार से गले मिली और थोड़ी ही देर में तीनों सखियॉँ बुलबुल की तरह चहकने लगीं। रामकली पहले ज़रा झेंपी। मगर पूर्णा की दो-चार बातों न उसका हियाव भी खोल दिया।

थोड़ी देर में भोजन तैयार हा गया। ओर तीनों आदमी रसोई पर गये। इधर चार-पॉँच बरस से अमृतराय दाल-भात खाना भूल गये थे। कश्मीरी बावरची तरह तरह क सालना, अनेक प्रकार के मांस खिलाया करता था और यद्यपि जल्दी में पूर्णा सिवाय सादे खानों के और कुछ न बना सकी थी, मगर सबने इसकी बड़ी प्रशंसा की। जीवननाथ और प्राणनाथ दोनों काशमीरी ही थे, मगर वह भी कहते थे कि रोटी-दाल ऐसी स्वादिष्ट हमने कभी नहीं खाई।

रात तो इस तरह कटी। दूसर दिन पूर्णा ने बिल्लो से कहा कि ज़रा बाज़ार से सौदा लाओ तो आज मेहानों को अच्छी-अच्छी चीज़े खिलाऊँ। बिल्लो ने आकर सुखई से हुक्म लगाया। और सुखई एक टोकरा लेकर बाज़ार चले। वह आज कोई तीस बरस से एक ही बनिये से सौदा करते थे। बनिया एक ही चालाक था। बुढ़ऊ को खूब दस्तूरी देता मगर सौदा रुपये में बारह आने से कभी अधिक न देता। इसी तरह इस घूरे साहु ने सब रईसों को फॉँसा रक्खा था। सुखई ने उसकी दूकान पर पहुँचते है टाकरा पटक दिया और तिपाई पर बैठकर बोला—लाव घूरे, कुछ सौदा सुलुफ तो दो मगर देरी न लगे।

और हर बेर तो घूरे हँसकर सुखई को तमाखू पिलाता और तुरन्त उसके हुक्म की तामील करने लगता। मगर आज उसने उसको और बड़ी रुखाई से देखकर कहा—आगे जाव। हमारे यहॉँ सौदा नहीं है।

सुखई—ज़रा आदमी देख के बात करो। हमें पहचानते नहीं क्या?

घूरे—आगे जाव। बहुत टें-टें न करो।

सुखई-कुछ मॉँग-वॉँग तो नहीं खा गये क्या? अरे हम सुखई हैं।

घूरे—अजी तुम लाट हो तो क्या? चलो अपना रास्ता देखो।

सुखई—क्या तुम जानते हो हमें दूसरी दुकान पर दस्तूरी न मिलेगी? अभी तुम्हरे सामने दो आने रूपया लेकर दिखा देता हूँ।

घूरे—तूम सीधे से जाओगे कि नहीं? दुकान से हटकर बात करो। बेचारा सुखई साहु की सइ रुखाई पर आर्श्चय करता हुआ दूसरी दुकान पर गया। वहॉँ भी यही जवाब मिला। तीसरी दूकान पर पहुँचा। यहॉँ भी वही धुतकार मिली। फिर तो उसने सारा-बाज़ार छान डाला। मगर कहीं सौदा न मिला। किसी ने उसे दुकान पर खड़ा तक होने न दिया। आखिर झक मारकर-सा मुँह लिये लौट आया और सब समाचार कह। मगर नमक-मसाले बिना कैसे काम चले। बिल्लो ने वहा, अब् की मैं जाती हूँ। देखूँ कैसे कोई सौदा नहीं देता। मगर वह हाते ज्यों ही बाहर निकली कि एक आदमी उसे इधर-उधर टहलता दिखायी दिया। बिल्लो को देखते ही वह उसके साथ हो लिया और जिस जिस दुकान पर बिल्लो गई वह भी परछाई की तरह साथ लगा रहा। आखिर बिल्लो भी बहुत दौड़-धूप कर हाथ झुलाते लौट आयी। बेचरी पूर्णा ने हार कर सादे पकवान बनाकर धर दिये।

बाबू अमृतराय ने जब देखा कि द्रोही लोग इसी तरह पीछे पड़े तो उसी दम लाला धनुषधारीलाल को तार दिया कि आप हमारे याहॉँ पॉँच होशियार खिदमतगार भेज दीजिए। लाला साहब पहले ही समझे हुए थे कि बनारस में दुष्ट लोग जितना ऊधम मचायें थोड़ा हैं। तार पाते ही उन्होंने अपने अपने होटल के पॉँच नौकरों को बनारस रवाना किया। जिनमें एक काश्मीरी महराज भी थी। दूसरे दिन यह सब आ पहुँचे। सब के सब पंजाबी थे, जो न तो बिरादरी के गुलाम थे और न जिनको टाट बाहर किये जाने का खटका था। विरोधियों ने उसके भी कान भरने चाहे। मगर कुछ दॉँव चला। सौदा भी लखनऊ से इतना मॉँगा लिया जो कई महीनों को काफ़ी था।

 

जब लोगों ने देखा इन शरारतों से अमृतराय को कुछ हानि पहुँची तो और ही चाल चले। उनके मुवक्किलों को बहकाना शुरु किया कि वह तो ईसाई हो गये हैं। साहबों के संग बैठकर खाते हैं। उनको किसी जानवर के मांस से विचार नहीं है। एक विधवा ब्रह्माणी से विवाह कर लिया है। उनका मुँह देखना, उनसे बातचीत करना भी शास्त्र के विरुद्ध है। मुवक्किलों को बहकाना शुरु कि याह कि वह तो ईसाई हो गये है। विधवा ब्रह्मणी से विवाह कर लिया है। उनका मुँह देखना, उनसे बातचीत करना भी शास्त्र के विरुद्ध है। मुवक्किलों में बहुधा करके देहातों के राजपूत ठाकुर और भुंइहार थे जो यहाता अविद्या की कालकोठरी में पड़े हुए थे या नये ज़माने क चमत्कार ने उन्हें चौंधिया दिया था। उन्होंने जब यह सब ऊटपटाँग बातें सुनी तब वे बहुत बिगड़े, बहुत झल्लाये और उसी दम कसम खाई की अब चाहे जो हो इस अधर्मी को कभी मुकदमा न देंगे। राम राम इसको वेदशास्त्र का तनिक विचार नहीं भया कि चट एक रॉँड़ को घर में बैठाल लिया। छी छी अपना लोक-परलोक दोनों बिगाड़ दिया। ऐसा ही था तो हिन्दू के घर में काहे को जन्म लिया था। किसी चोर-चंडाल के घर जनमे होते। बाप-दादे का नाम मिटा दिया। ऐसी ही बातें कोई दो सप्ताह तक उने मुवक्किलों में फैली। जिसका परिणाम यह हुआ कि बाबू अमृतराय का रंग फीका पड़ने लगा। जहॉँ मारे मुकदमों के सॉँस लेने का अवकाश न मिलता था। वहॉँ अब दिन-भर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने की नौबत आ गयी। यहॉँ तक कि तीसरा सप्ताह कोरा बीत गया और उनको एक भी अच्छा मुकदमा न मिला।

 

जज साहब एक बंगाली बाबू थे। अमृतराय के परिश्रम और तीव्रता, उत्साह और चपलता ने जज साहब की ऑंखों में उन्होंने बड़ी प्रशंसा दे रक्खी थी। वह अमृतराय की बढ़ती हुई वकालत को देख-देख समझ गये थे कि थोड़ी ही दिनों मे यह सब वकीलों का सभापति हा जाएगा। मगर जब तीन हफ्ते से उनकी सूरत न दिखायी दी तब उनको आश्चर्य हुआ। सरिश्तेदार से पूछा कि आजकल बाबू अमृतराय कहॉँ हैं। सरिश्तेदार साहब जाति के मुसलमान और बड़े सच्चे, साफ आदमी थे। उन्होंने सारा ब्योरा जो सुना था कह सुनाया। जज साहब सुनते ही समझ गये कि बेचारे अमृतराय सामाजिक कामों में अग्रण्य बनने का फल भोग रहे हैं। दूसरे दिन उन्होंने खुद अमृतराय को इजलास पर बुलवाया और देहाती ज़मींदारी के सामने उनसे बहुत देर तक इधर-उधर की बातें की। अमृतराय भी हँस-हँस उनकी बातों का जवाब दिया किये। इस बीच में कई वकीलों और बैरिस्टर जज साहब को दिखाने कि लिए कागज पत्र - लाये मगर साहब ने किसी के ओर ध्यान नहीं दिया। जब वह चले तो साहब ने कुसी उठकर हाथ मिलाया और जरा जोर से बोलो – बहुत अच्छा, बाबू साहब जैसा आप बोलता है, इस मुकदमे मे वैसा ही होगा।

आज जब कचहरी बरखास्त हुई तो उन जमीदारों में जिनके मुकदमे आज पेश थे, यों गलेचौर होने लगी।

ठाकुर साहब- ( पगडी बॉंधे, मूछें खडी. किये, मोटासा लद्व हाथ में लिये) आज जज साहब अमृतराय से खुब- खुब बतियात रहे।

मिश्र जी- (सिर घुटाये,टीका लगाये, मुह में तम्बाकु दाबाये और कन्घे पर अगोछा रक्खे) खूब ब बतियावत रहा मानो कोउ अपने मित्र से बतियावै।

ठाकुर- अमृतराय कस हँस- हँस मुडी हिलावत रहा।

मिश्र जी- बडे. आदमियन का सबजगह आदर होत है।

ठाकुर- जब लो दोनो बतियात रहे तब तलुक कउ वकील आये बाकी साहेब कोउ की ओर तनिक नाहीं ताकिन।

मिश्र जी- हम कहे देइत है तुमार मुकदमा उनहीं के राय से चले। सुनत रहयो कि नाहीं जब अमृतराय चले लागे तो जज साहब कहेन कि इस मुकदमे में वैसा ही होगा

ठाकुर- सुना काहे नहीं, बाकी फिर काव करी।

मिश्र जी- इतना तो हम कहित है कि अस वकिल पिरथी भर में नाहीं ना।

ठाकुर- कसबहस करत हैं मानो जिहवा पर सरस्वती बैठी होय। उनकर बराबरी करैया आज कोई नाहीं है।

मिश्र जी- मुदा इसाई होइ गया। रॉंड.से ब्याह किहेसि।

ठाकुर- एतनै तो बीच परा है। अगर उनका वकील किहे होईत तो बाजी बद के जीत जाईत।

इसी तरह दोनो में बातें हुई और दिया में बती पडतें- पडतें दोनो अमृतराय के पास गये और उनसे मुकदमें की कुल रुयदाद बयान कि। बाबू साहब ने पहले ही समझ लिया था कि इस मुकदमें में कुछ जान नहीं है। तिस पर उन्होंने मूकदमा ले लिया और दुसरे दिन एसी योग्यता से बहस की कि दूसरी ओर के वकिल- मुखतियार खडे.मुह ताकते रह गये। आख्रिर जीत का सेहरा भी उन्हीं के सिर रहा। जज साहब उनकी बकतृया पर एसे प्रसन्न हुए कि उन्होंने हँसकर घन्यबाद दिया और हाथ मिलया। बस अब क्या था । एक तो अमृतराय यों ही प्रसिद्व थे, उस पर जज साहब का यह वताव और भी सोने पर सुहागा हो गया । वह बँगले पर पहुँच कर चैन से बैठने भी न पाये थे, कि मुवक्किलो के दल के दल आने लगे और दस बजे रात तक यही ताता लगा रहा। दूसरे दिन से उनकी वकालत पहले से भी अधिक चमक उठी ।

द्रोहियों जब देखा कि हमारी चाल भी उलटी पडी. तो और भी दॉत पीसने लगे। अब मुंशी बदरीप्रसाद तो थे हि नहीं कि उन्हें सीधी चालें बताते। और न ठाकुर थे कि कुछ बाहुबल का चमत्कार दिखाते । बाबू कमलाप्रसाद अपने पिता के सामने ही से इन बातो से अलग हो गये थे। इसलिये दोहियों को अपना और कुछ बस न देख कर पंडित भगुदत का द्वार खटखटाया उनसें कर जोड कर कहा कि महाराज! कृपा-सिन्धु! अब भारत वर्ष में महा उत्पात और घोर पाप हो रहा है। अब आप ही चाहो तो उसका उद्वार हो सकता है । सिवाय आप के इस नौका को पार लगाने वाला इस संसार में कोई नहीं है। महाराज ! अगर इस समय पूरा बल न लगाया तो फिर इस नगर के वासी कहीं मुह दिखाने के योग्य नहीं रहेंगे। कृपा के परनाले और धर्म के पोखरा ने जब अपने जजमानों को ऐसी दीनता से स्तुति करते देखा तो दॉत निकालकर बोले आप लोग जौन है तैन घबरायें मत। आप देखा करें कि भृगुदत क्या करते है।

सेठ धूनीमल- महाराज! कुछ ऐसा यतन कीजिये कि इस दुष्ट का सत्यानाश् हो जाय ! कोई नाम लेवा न बचे।

कई आदमी- हॉ महाराज! इस घडी तो यही चाहिये।

भृगुदत- यही चाहिये तो यही लेना। सर्वथा नाश न कर दू तो ब्राहमण नहीं। आज के सातवें दिन उसका नाश हो जायेगा।

सेठ जी- द्वव्य जो लगे बेखटके कोठी से मॅगा लेना ।

भृगुदत- इसके कहने की कोइ आवश्यकता नहीं। केवल पॉच सौ ब्राहमण का प्रतिदिन भोजन होगा।

बाबू दीनानाथ-तो कहिये तो कोई हलवाई लगा दिया जाए। राघो हलवाई पेड़े और लडू बहुत अच्छे बनाता है।

भृगुदत- जो पूजा मैं कराउगा उसमें पेड़ा खाना वर्जित है। अधिक इमरती का सेवन हो उतना ही कार्य सिद्व हो जाता है।

इस पर पंड़ित जी के एक चेले ने कहा- गरू जी! आज तो आप ने न्याय का पाठ देते समय कहा था कि पेड़े के साथ दही मिला दिया जाए तो उसमें कोइ दोष नहीं रहता।

भृगुदत- (हॅसकर) हॉ- हॉ अब स्मरण हुआ। मनु जी ने इस शलोक में इस बात का प्रमाण दिया है।

दीनानाथ-(मुसकराकर) महाराज! चेला तो बड़ा तिब्र है।

सेठ जी- यह अपने गरूजी से बाजी ले जायेगा।

भृगुदत- अब कि इसने एक यज्ञ में दो सेर पूरियॉ खायी। उस दिन से मैने इसका नाम अंतिम परीक्षा में लिख दिया।

चेला- मैं अपने मन से थोड़ा ही उठा । अगर जजमान हाथ जोड़कर उठा न देते तो अभी सेर भर और खा के उठता।

दीनानाथ-क्यो न हो पटे ! जैसे गुरू वैसे चेला!

सेठ जी- महाराज, अब हमको आज्ञा दीजिए। आज हलवाई आ जाएगा। मुनीम जी भी उसके साथ लगे रहेगें। जो सौ दो सौ का काम लगे मुनीम जी से फरमा देना। मगर बात तब है कि आप भी इस बिषय में जान लड़ा दे।

पंड़ित जी ने सिर का कद्दू हिलाकर कहा- इसमें आप कोई खटका न समझिये। एक सप्ताह में अगर दुष्ट का न नाश हो जाए तो भृगुदत नहीं। अब आपको पूजन की बिधि भी बता ही दू। सुनिए तांत्रिक बिद्या में एक मंत्र एसा भी है जिसके जगाने से बैरी की आयु क्षीण होती है। अगर दस आदमी प्रतिदिवस उसका पाठ करे तो आयु में दोपहर की हानि होगी। अगर सौ आदमी पाठ करे तो दस दिन की हानि होगी।

यदि पाच सौ पाठ नित्य हों तो हर दिन पाच वष आयु घटती हैं।

सेठ जी- महाराज, आप ने इस घड़ी एसी बात कही कि हमारा चोला मस्त हो गया, मस्त हो गया ,

दीनानाथ- कृपासिन्घु, आप घन्य हो ! आप घन्य हो !

बहुत से आदमी- एक बार बोलो- पंड़ित भृगुदत जय !

बहुत से आदमी- एक बार बोलो- दुष्ठों की छै ! छै ! !

इस तरह कोलाहल मचाते हुए लोग अपने- अपने घरो को लौटे। उसी दिन राघो हलवाई पंड़ित जी के मकान पर जा डटा। पूजा-पाठ होने लगे । पाच सौ भुक्खड़ एकत्र हो गये और दोनों जून माल उडानें लगे। धीरे- धीरे पाच सौ से एक हजार नम्बर पहुचा पूजा-पाठ कौन करता है। सबेरे से भोजन का प्रबन्ध करते – करते दोपहर हो जाता था। और दोपहर से भंग- बूटी छानते रात हो जाती थी। हॉ पंडित भृगुदत दास का नाम पुरे शहर में उजागर हो रहा था। चारो ओर उनकी बड़ाई गाई जा रही थ। सात दिन यही अधाधुंध मचा रहा। यह सब कुछ हुआ । मगर बाबू अमृतराय का बाल बाँका न हो सका। कही चमार के सरापे डागर मिलते है। एसे ऑंख् के अंधे और गँठ के पुरे न फँसे तो भृगुदत जैसे गुगो को चखौतिया कौन करायें। सेठ जी के आदमी तिल- तिल पर अमृतराय के मकान पर दौड़ते थे कि देखें कुछ जंत्र –मत्र का फल हुआ कि नहीं। मगर सात दिन के बीतने पर कुछ फल हुआ तो यही कि अमृतराय की वकालत सदा से बढकर चमकी हुई थी।

 

प्रेमा भाग 12

एक स्त्री के दो पुरूष नहीं हो सकते

प्रेमा का ब्याह हुए दो महीने से अधिक बीत चुके हैं मगर अभी तक उसकी अवस्था वही है जो कुँवारापन में थी। वह हरदम उदास और मलिन रहती हैं। उसका मुख पीला पड़ गया। ऑंखें बैठे हुई, सर के बाल बिखरे, उसके दिल में अभी तक बाबू अमृतराय की मुहब्बत बनी हुई हैं। उनकी मूर्ति हरदम उसकी ऑंखों के सामने नाचा करती है। वह बहुत चाहती है कि उनकी सूरत ह्दय से निकाल दे मगर उसका कुछ बस नहीं चलता। यद्यपि बाबू दाननाथ उससे सच्चा प्रेम रखते हैं और बड़े सुन्दर हँसमुख, मिलनसार मनुष्य हैं। मगर प्रेमा का दिल उनसे नहीं मिलता। वह उनसे प्रेम-भाव दिखाने में कोई बात उठा नहीं रखती। जब वह मौजूद होते हैं तो वह हँसती भी हैं। बातचीत भी करती है। प्रेम भी जताती है। मगर जब वह चले जाते हैं तब उसके मुख पर फिर उदासी छा जाती है। उसकी सूरत फिर वियोगिन की-सी हो जाती है। अपने मैके में उसे रोने की कोई रोक-टोक न थी। जब चाहती और जब तक चाहती, रोया करती थी। मगर यहॉँ रा भी नहीं सकती। या रोती भी तो छिपकर। उसकी बूढ़ी सास उसे पान की तरह फेरा करती है। केवल इसलिए नहीं कि वह उसका पास और दबाव मानती है बल्कि इसलिए कि वह अपने साथ बहुत-सा दहेज लायी है। उसने सारी गृहस्थी पतोहू के ऊपर छोड़ रक्खी है और हरदम ईश्वर से विनय किया करती है कि पोता खेलाने के दिन जल्द आयें।

 

बेचारी प्रेमा की अवस्था बहुत ही शोचनीय और करुणा के योग्य है। वह हँसती है तो उसकी हँसी में रोना मिला होता है। वह बातचीत करती है तो ऐसा जान पड़ता है कि अपने दुख की कहानी कह रही है। बनाव-सिंगार से उसकी तनिक भी रुचि नहीं है। अगर कभी सास के कहने-सुनने से कुछ सजावट करती भी है तो उस पर नहीं खुलता। ऐसा मालूम होता है कि इसकी कोमल गात में जो मोहिन थी वह रुठ कर कहीं और चली गयी। वह बहुधा अपने ही कमरे में बैठी रहती है। हॉँ, कभी-कभी गाकर दिल बहलाती है। मगर उसका गाना इसलिए नहीं होता कि उससे चित्त को आनन्द प्राप्त हो। बल्कि वह मधुर स्वरों में विलाप और विषाद के राग गाया करती है।

बाबू दाननाथ इतना तो शादी करने के पहले ही जानते थे कि प्रेमा अमृतराय पर जान देती है। मगर उन्होंने समझा था कि उसकी प्रीति साधारण होगी। जब मैं उसको ब्याह कर लाऊँगा, उससे स्नहे, बढ़ाऊँगा, उस पर अपने के निछावर करुँगा तो उसके दिल से पिछली बातें मिट जायँगी और फिर हमारी बड़े आनन्द से कटेगी। इसलिए उन्होंने एक महीने के लगभग प्रेमा के उदास और मलिन रहने की कुछ परवाह न की। मगर उनको क्या मालूम था कि स्नहे का वह पौधा जो प्रेम-रस से सींच-सींच कर परवान चढ़ाया गया है महीने-दो महीने में कदापि नहीं मुरझा सकता। उन्होंने दूसरे महीने भर भी इस बात पर ध्यान न दिया। मगर जब अब भी प्रेमा के मुख से उदासी की घटा फटते न दिखायी दी तब उनको दुख होने लगा। प्रेम और ईर्ष्या का चोली-दामन का साथ है। दाननाथ सच्चा प्रेम देखते थे। मगर सच्चे प्रेम के बदले में सच्चा प्रेम चाहते भी थे। एक दिन वह मालूम से सबेर मकान पर आये और प्रेमा के कमरे में गये तो देखा कि वह सर झुकाये हुए बैठी है। इनको देखते ही उसने सर उठाया और चोट ऑंचल से ऑंसू पोंछ उठ खड़ी हुई और बोली—मुझे आज न मालूम क्यों लाला जी की याद आ गयी थी। मैं बड़ी से रो रही हूँ।

दाननाथ ने उसको देखते ही समझ लिया था कि अमृतराय के वियोग में ऑंसू बाहये जा रहे हैं। इस पर प्रेमा ने जो यों हवा बतलायी तो उनके बदन में आग लग गयी। तीखी चितवनों से देखकर बोले—तुम्हारी ऑंखें हैं और तुम्हारे ऑंसू, जितना रोया जाय रो लो। मगर मेरी ऑंखों में धूल मत झोंको।

प्रेमा इस कठोर वचन को सुनकर चौंक पड़ी और बिना कुछ उत्तर दिये पति की ओर डबडबाई हुई ऑंखों से ताकने लगी। दाननाथ ने फिर कहा—

क्या ताकती हो, प्रेमा? मैं ऐसा मूर्ख नहीं हूँ, जैसा तुम समझती हो। मैंने भी आदमी देखे हैं और मैं भी आदमी पहचानता हूँ। मैं तुम्हारी एक-एक बात की गौर से देखता हूँ मगर जितना ही देखता हूँ उतना ही चित्त को दुख होता है। क्योंकि तुम्हारा बर्ताव मेरे साथ फीका है। यद्यपि तुमको यह सुनना अच्छा न मालूम होगा मगर हार कर कहना पड़ता है कि तुमको मुझसे लेश-मात्र भी प्रेम नहीं है। मैने अब तक इस विषय में ज़बान खोलने का साहस नहीं किया था और ईश्वर जानता है कि तुमसे किस क़दर मुहब्बत करता हूँ। मगर मुहब्बत सब कुछ सह सकती है, रुखाई नहीं सह सकती और वह भी कैसी रुखाई जो किसी दूसरे पुरुष के वियोग में उत्पन्न हुई हो। ऐसा कौन बेहाय, निर्लज्ज आदमी होगा जो यह देखे कि उसकी पत्नी किसी दूसरे के लिए वियोगिन बनी हुई है और उसका लहू उबलने न लगे और उसके ह्दय में क्रोध कि ज्वाला धधक न उठे। क्या तुम नहीं जानती हो कि धर्मशास्त्र के अनुसार स्त्री अपने पति के सिवाय किसी दुसरे मनुष्य की ओर कुदृष्टि से देखने से भी पाप की भीगी हो जाती है और उसका पतिव्रत भंग हो जाता है।

प्रेमा तुम एक बहुत ऊँचे घराने की बेटी हो और जिस घराने की तुम बहू हो वह भी इस शहरमें किसी से हेठा नहीं। क्या तुम्हारे लिए यह शर्म की बात नहीं है कि तुम एक बाज़ारों की घूमनेवाली रॉँड़ ब्राह्मणीं के तुल्य भी न समझी जाओ और वह कौन है जिसने तुम्हारा ऐसा निरादर किया? वही अमृतराय, जिसके लिए तुम ओठों पहर मोती पिरोया करती हो। अगर उस दुष्ट के ह्दय में तुम्हारा कुछ भी प्रेम होता तो वह तुम्हारे पिता के बार-बार कहने पर भी तुमको इस तरह धता न बताता। कैसे खेद की बात हैं। इन्हीं ऑंखों ने उसे तुम्हारी तस्वीर को पैरो से रौंदते हुए देखा है। क्या तुमको मेरी बातों का विश्वास नहीं आता? क्या अमृतराय के कर्तव्य से नहीं विदित होता है की उनको तुम्हारी रत्ती-भर भी परवाह नहीं हैं क्या उन्होंने डंके की चोट पर नहीं साबित कर दिया कि वह तुमको तुच्छा समझते है? माना कि कोई दिन ऐसा था कि वह विवाह करने की अभिलाषा रखते थे। पर अब तो वह बात नहीं रही। अब वह अमृतराय है जिसकी बदचलनी की सारे शहर में धूम मची हुई। मगर शोक और अति शोक की बात है कि तुम उसके लिए ऑंसू बहा-बहाकर अपने मेरे खानदान के माथे कालिख का टीका लगाती हो।

दाननाथ मारे क्रोध के काँप रहे थे। चेहरा तमतमाया हुआ था। ऑंखों से चिनगारी निकल रही थी। बेचारी प्रेमा सिर नीचा किये हुए खड़ी रो रही थी। पति की एक-एक बात उसके कलेजे के पार हुई जाती थी। आखिर न रहा गया। दाननाथ के पैरों पर गिर पड़ी और उन्हें गर्म-गर्म ऑंसू की बूँदों से भिगो दिया। दाननाथ ने पैर खसका लिया। प्रेमा को चारपाई पर बैठा दिया ओर बोले—प्रेमा, रोओ मत। तुम्हारे रोने से मेरे दिल पर चोट लगती है। मैं तुमको रुलाना नहीं चाहता। परन्तु उन बातों को कहें बिना रह भी नहीं सकता। अगर यह दिल में रह गई तो नतीजा बुरा पैदा करेगी। कान खोलकर सुनो। मैं तुमको प्राण से अधिक प्यार करता हूँ। तुमको आराम पहुँचाने के लिए हाज़िर हूँ। मगर तुमको सिवाय अपने किसी दूसरे का ख्याल करते नहीं देख सकता। अब तक न जाने कैसे-कैसे मैंने दिल को समझाया। मगर अब वह मेरे बस का नहीं। अब वह यह जलन नहीं सह सकता। मैं तुमको चेताये देता हूँ कि यह रोना-धोना छोड़ा। यदि इस चेताने पर भी तुम मेरी बात न मानो तो फिर मुझे दोष मत देना। बस इतना कहे देता हूँ। कि स्त्री के दो पति कदापि जीते नहीं रह सकते।

यह कहते हुए बाबू दाननाथ क्रोध में भरे बाहर चले आये। बेचारी प्रेमा को ऐसा मालूम हुआ कि मानो किसी ने कलेजे में छुरी मार दी। उसको आज तक किसी ने भूलकर भी कड़ी बात नहीं सुनायी थी। उसकी भावज कभी-कभी ताने दिया करती थी मगर वह ऐसा न होते थे। वह घंटों रोती रही। इसके बाद उसने पति की सारी बातों पर विचार करना शुरु किया और उसके कानों में यह शब्द गूँजने लगे-एक स्त्री के दो पति कदापि जीते नहीं रह सकते।

इनका क्या मतलब है?

 

प्रेमा भाग 13

शोकदायक घटना

पूर्णा, रामकली और लक्ष्मी तीनों बड़े आनन्द से हित-मिलकर रहने लगी। उनका समय अब बातचीत, हँसी-दिल्लगी में कट जात। चिन्ता की परछाई भी न दिखायी देती। पूर्णा दो-तीन महीने में निखर कर ऐसी कोमलागी हो गयी थी कि पहिचान न जाती थी। रामकली भी खूब रंग-रूप निकाले थी। उसका निखार और यौवन पूर्णा को भी मात करता था। उसकी ऑंखों में अब चंचलता और मुख पर वह चपलता न थी जो पहले दिखायी देती थी। बल्कि अब वह अति सुकुमार कामिनी हो गयी थी। अच्छे संग में बैठते-बैठते उसकी चाल-ढाल में गम्भीरता और धैर्य आ गया था। अब वह गंगा स्नान और मन्दिर का नाम भी लेती। अगर कभी-कभी पूर्णा उसको छोड़ने के लिए पिछली बातें याद दिलाती तो वह नाक-भौं चढ़ा लेती, रुठ जाती। मगर इन तीनों में लक्ष्मी का रुप निराला था। वह बड़े घर में पैदा हुई थी। उसके मॉँ-बाप ने उसे बड़े लाड़-प्यार से पाला था और उसका बड़ी उत्तम रीति पर शिक्षा दी थी। उसका कोमल गत, उसकी मनोहर वाणी, उसे अपनी सखियॉँ में रानी की पदावी देती थी। वह गाने-बजाने में निपुण थी और अपनी सखियों को यह गुण सिखाया करती थी। इसी तरह पूर्णा को अनेक प्रकार के व्यंजन बनाने का व्यसन था। बेचारी रामकली के हाथों में यह सब गुण न थे। हॉँ, वह हँसोड़ी थी और अपनी रसीली बातों से सखियों को हँसाया करती थी।

 

एक दिन शाम को तीनों सखियाँ बैठी बातचित कर रही थी कि पूर्णा ने मुसकराकर रामकली से पूछा—क्यों रम्मन, आजकल मन्दिर पूजा करने नहीं जाती हो।

रामकली ने झेंपकर जवाब दिया—अब वहॉँ जाने को जी नहीं चाहता। लक्ष्मी रामकली का सब वृत्तान्त सुन चुकी थी। वह बोली—हॉँ बुआ, अब तो हँसने-बोलने का सामान घर ही पर ही मौजूद है।

रामकली—(तिनककर) तुमसे कौन बोलता है, जो लगी जहर उगलने। बहिन, इनको मना कर दो, यह हमारी बातों में न बोला करें। नहीं तो अभी कुछ कह बैठूँगी तो रोती फिरेंगी।

पूर्णा—मत लछिमी (लक्ष्मी) सखी को मत छोड़ो।

लक्ष्मी—(मुसकराकर) मैंने कुछ झूठ थोड़े ही कहा था जो इनको ऐसा कडुआ मालूम हुआ।

रामकली—जैसी आप है वैसी सबको समझती है।

पूर्णा— लछिमी, तुम हमारी सखी को बहुत दिक किया करती हो। तुम्हरी बाल से वह मन्दिर में जाती थी।

लक्ष्मी—जब मैं कहती हूँ तो रोती काहे को है।

पूर्णा—अब यह बात उनको अच्छी नहीं लगती तो तुम काहे को कहती हो। खबरदार, अब फिर मन्दिर का नाम मत लेना।

लक्ष्मी—अच्छा रम्मन, हमें एक बात दो तो, हम फिर तुम्हें कभी न छेड़े—महन्त जी ने मंत्र देते समय तुम्हरे कान में क्या कहा? हमारा माथा छुए जो झूठ बोले।

रामकली—(चिटक कर) सुना लछिमी, हमसे शरारत करोगी तो ठीक न होगा। मैं जितना ही तरह देती हूँ, तुम उतनी ही सर चढ़ी जाती हो।

पूर्णा—ऐ तो बतला क्यों नहीं देती, इसमें क्या हर्ज है?

रामकली—कुछ कहा होगा, तुम कौन होती हो पूछनेवाली? बड़ी आयीं वहॉँ से सीता बन के

पूर्णा—अच्छा भाई, मत बताओ, बिगड़ती काहे को हो?

लक्ष्मी—बताने की बात ही नहीं बतला कैसे दें।

रामकली—कोई बात भी हो कि यों ही बतला दूँ।

पूर्णा—अच्छा यह बात जाने दो। बताओ उस तंबोली ने तुम्हें पान खिलाते समय क्या कहा था।

रामकली—फिर छेड़खानी की सूझी। मैं भी पते की बात कह दूँगी तो लजा जाओगी।

लक्ष्मी—तुम्हे हमार कसम सखी, जरुर कहो। यह हम लोगों की बातों तो पूछ लेती है, अपनी बातें एक नहीं कहतीं।

रामकली—क्यों सखी, कहूँ? कहती हूँ, बिगड़ना मत।

पूर्णा- कहो, सॉँच को ऑंच क्या।

रामकली—उस दिन घाट पर तुमने किस छाती से लिपटा लिया था।

पूर्णा— तुम्हारा सर

लक्ष्मी— समझ गयी। बाबू अमृतराय होंगे। क्यों है न?

यह तीनों सखियॉँ इसी तरह हँस-बोल रहीं थीं कि एक बूढ़ी औरत ने आकर पूर्णा को आशीर्वाद दिया और उसके हाथ में एक खत रख दिया। पूर्णा ने अक्षर पहिचाने, प्रेमा का पत्र था। उसमें यह लिखा था—

‘‘प्यारी पूर्णा तुमसे भेंट करने को बहुत जी चाहता है। मगर यहॉँ घर से बाहर पॉँव निकालने की मजाल नहीं। इसलिए यह ख़त लिखती हूँ। मुझे तुमसे एक अति आवश्यक बात करनी है। जो पत्र में नहीं लिख सकती हूँ। अगर तुम बिल्लो को इस पत्र का जवाब देकर भेजो तो जबानी कह दूँगी। देखा देर मत करना। नहीं तो अनर्थ हो जाएगा। आठ बजे के पहले बिल्लो यहॉँ अवश्य आ जाए।

तुम्हारी सखी

"प्रेमा"

 

पत्र पढ़ते ही पूर्णा का चित्त व्याकुल हो गया। चेहरे का रंग उड़ गया और अनेक प्रकार की शंकाएँ लगी। या नारायण अब क्या होनेवाला है। लिखती है देखो देर मत करना। नहीं तो अनर्थ हो जाएगा। क्या बात है।

अभी तक वह कचहरी से नहीं लौटे। रोज तो अब तक आ जाया करते थे। इनकी यही बात तो हम को अच्छी नहीं लगती।

लक्ष्मी और रामकली ने जब उसको ऐसा व्याकुल देखा तो घबराकर बोलीं—क्या बहिन, कुशल तो है? इस पत्र में क्या लिखा है?

पूर्णा—क्या बताऊँ क्या लिखा है। रामकली, तुम जरा कमरे में जा के झॉँको तो आये या नहीं अभी।

रामकली ने आकर कहा—अभी नहीं आये।

लक्ष्मी—अभी कैसे आयेंगे? आज तो तीन आदमी व्याख्यान देने गये है।

इसी घबराहट में आठ बजा। पूर्णा ने प्रेमा के पत्र का जवाब लिखा और बिल्लो को देकर प्रेमा को घर भेज दिया। आधा घंटा भी न बीता था कि बिल्लो लौट आयी। रंग उड़ा हुआ। बदहवास और घबरायी हुई। पूर्णा ने उसे देखते ही घबराकर पूछा—कहो बिल्लो, कुशल कहो।

बिल्लो (माथा ठोंककर) क्या कहूँ, बहू कहते नहीं बनता। न जाने अभी क्या होने वाला है।

पूर्णा—क्या कहा? कुछ चिट्ठी-पत्री तो नहीं दिया?

बिल्लो—चिट्ठी कहॉँ से देती? हमको अन्दर बुलाते डरती थीं। देखते ही रोने लगी और कहा—बिल्लो, मैं क्या करुँ, मेरा जी यहॉँ बिलकुल नहीं लगता। मैं पिछली बातें याद करके रोया करती हूँ। वह (दाननाथ) कभी जब मुझे रोते देख लेते हैं तो बहुत झल्लाते हैं। एक दिन मुझे बहुत जली-कटी सुनायी और चलते-समय धमका कर कहा—एक औरत के दो चाहनेवाले कदापि जीते नहीं रह सकते। यह कहकर बिल्लो चुप हो गयी। पूर्णा के समझ में पूरी बात न आयी। उसने कहा—चुप क्यों हो गयी? जल्दी कहो, मेरा दम रुका हुआ है।

बिल्लो—इतना कहकर वह रोने लगी। फिर मुझको नजदीक बुला के कान में कहा—बिल्लो, उसी दिन से मैं उनके तेवर बदले हुए देखती हूँ। वह तीन आदमियों के साथ लेकर रोज शाम को न जाने कहॉँ जाते हैं। आज मैंने छिपकर उनकी बातचीत सुन ली। बारह बजे रात को जब अमृतराय पर चोट करने की सलाह हुई है। जब से मैंने यह सुना है, हाथों के तोते उड़े हुए हैं। मुझ अभागिनी के कारण न जाने कौन-कौन दुख उठायेगा।

बिल्लो की ज़बानी यह बातें सुनकर पूर्णा के पैर तले से मिट्टी निकल गयी। दनानाथ की तसवीर भयानक रुप धारण किये उसकी ऑंखों के सामने आकर खड़ी हो गयी।

वह उसी दम दौड़ती हुई बैठक में पहुँची। बाबु अमृतराय का वहॉँ पता न था। उसने अपना माथा ठोंक बिल्लो से कहॉँ—तुम जाकर आदमियों कह दो। फाटक पर खड़े हो जाए। और खुद उसी जगह एक कुर्सी पर बैठकर गुनने लगी कि अब उनको कैसे खबर करुँ कि इतने में गाड़ी की खड़खड़ाहट सुनायी दी। पूर्णा का दिल बड़े जोर से धड़-धड़ करने लगा। वह लपक कर दरवाज़े पर आयी और कॉँपती हुई आवाज़ से पुकार बोली—इतनी देर कहॉँ लगायी? जल्दी आते क्यों नहीं?

अमृतराय जल्दी से उतरे और कमरे के अन्दर कदम रखते ही पूर्णा ऐसे लिपट गयी मानो उन्हें किसी के वार से बचा रही है और बोली—इतनी जल्दी क्यों आये, अभी तो बहुत सवेरा है।

अमृतराय—प्यारी, क्षमा करो। आज जरा देर हो गयी।

पूर्णा—चलिए रहने दीजिए। आप तो जाकर सैर-सपाटे करते हैं। यहॉँ दूसरों की जान हलकान होती हैं

अमृतराय—क्या बतायें, आज बात ऐसी आ पड़ी कि रुकना पड़ा। आज माफ करो। फिर ऐसी देर न होगी।

यह कहकर वह कपड़े उतारने लगे। मगर पूर्णा वही खड़ी रही जैसे कोई चौंकी हुई हरिणी। उसकी ऑंखें दरवाज़े की तरफ लगी थीं। अचानक उसको किसी मनुष्य की परछाई दरवाज़े के सामने दिखायी पड़ी। और वह बिजली की राह चमककर दरवाजा रोककर खड़ी हो गयी। देखा तो कहार था। जूता खोलने आ रहा था। बाबू साहब न ध्यान से देखा तो पूर्णा कुछ घबरायी हुई दिखायी दी। बोले---प्यारी, आज तुम कुछ घबरायी हुई हो।

पूर्णा—सामनेवाला दरवाजा बन्द करा दो।

अमृतराय—गरमी हो रही हैं। हवा रुक जाएगी।

पूर्णा—यहॉँ न बैठने दूँगी। ऊपर चलो।

अमृतराय—क्यों बात क्या है? डरने की कोई वजह नहीं।

पूर्णा—मेरा जी यहॉँ नहीं लगता। ऊपर चलो। वहॉँ चॉँदनी में खूब ठंडी हवा आ रही होगी।

अमृतराय मन में बहुत सी बातें सोचते-सोचते पूर्णा के साथ कोठे पर गये। खुली हुई छत थी। कुर्सियॉँ धरी हुई थी। नौ बजे रात का समय, चैत्र के दिन, चॉँदनी खूब छिटकी हुई, मन्द-मन्द शीतल वायु चल रही थी। बगीचे के हरे-भरे वृक्ष धीरे-धीरे झूम-झूम कर अति शोभायमान हो रहे थे। जान पड़ता था कि आकाश ने ओस की पतली हलकी चादर सब चीजों पर डाल दी है। दूर-दूर के धुँधले-धुँधले पेड़ ऐसे मनोहर मालूम होते है मानो वह देवताओं के रमण करने के स्थान हैं। या वह उस तपोवन के वृक्ष हैं जिनकी छाया में शकुन्तला और उसकी सखियॉँ भ्रमण किया करती थीं और जहॉँ उस सुन्दरी ने अपने जान के अधार राजा दुष्यन्त को कमल के पत्ते पर प्रेम-पाती लिखी थी।

पूर्णा और अमृतराय कुर्सिया पर बैठ गये। ऐसे सुखदाय एकांत में चन्द्रमा की किरणों ने उनके दिलों पर आक्रमण करना शुरु किया। अमृतराय ने पूर्णा के रसीले अधर चूमकर कहा—आज कैसी सुहावनी चाँदनी है।

पूर्णा—मेरी जी इस घड़ी चाहत है कि मैं चिड़िया होती।

अमृतराय—तो क्या करतीं।

पूर्णा—तो उड़कर उन दूरवाले पेड़ों पर जा बैठती।

अमृतराय—अहा हा देखा लक्ष्मी कैसा अलाप रही है।

पूर्णा—लक्ष्मी का-सा गाना मैंने कहीं नहीं सुना। कोयला की तरह कूकती है। सुनो कौन गीत है। सुना

मोरी सुधि जनि बिसरैहो, महराज।

अमृतराय—जी चाहता है, उसे यहीं बुला लूँ।

पूर्णा- नहीं। यहॉँ गाते लजायेगी। सुनो।

इतनी विनय मैं तुमसे करत हौं

दिन-दिन स्नेह बढ़ैयो महराज।

अमृतराय—हाय जी बेचैन हुआ जाता है।

पूर्णा---जैसे कोई कलेजे में बैठा चुटकियॉँ ले रहा हो। कान लगाओ, कुछ सुना, कहती है।

मैं मधुमाती अरज करत हूँ

नित दिन पत्तिया पठैयो, महराज

अमृतराय—कोई प्रेम—रस की माती अपने सजन से कह रही है।

पूर्णा—कहती है नित दिन पत्तिया पठैयो, महराज हाय बेचारी प्रेम में डूबी हुई है।

अमृतराय---चुप हो गयी। अब वह सन्नटा कैसा मनोहर मालूम होता है।

पूर्णा---प्रेमा भी बहुत अच्छा गाती थी। मगर नहीं।

प्रेमा का नाम जबान पर आते ही पूर्णा यक़ायक चौंक पड़ी और अमृतराय के गले में हाथ डालकर बोली—क्यों प्यारे तुम उन गड़बड़ी के दिनों में हमारे घर जाते थे तो अपने साथ क्या ले जाया करते थे।

अमृतराय—(आश्चर्य से) क्यों? किसलिए पूछती हो?

पूर्णा—यों ही ध्यान आ गया।

अमृतराय—अंग्रेजी तमंचा था। उसे पिस्तौला कहते है।

पूर्णा—भला किसी आदमी के पिस्तौल की गोली लगे तो क्या हो।

अमृतराय—तुरंत मर जाए।

पूर्णा—मैं चलाना सीखूँ तो आ जाए।

अमृतराय—तुम पिस्तौल चलाना सीखकर क्या करोगी? (मुसकराकर) क्या नैनों की कटारी कुछ कम है? इस दम यही जी चाहता है कि तुमको कलेजा में रख लूँ।

पूर्णा—(हाथ जोड़कर) मेरी तुमसे यही विनय है—

मेरा सुधि जनि बिसरैहो, महाराज

यह कहते-कहते पूर्णा की ऑंखों में नीर भर आया। अमृतराय। अमृतराय भी गदगद स्वर हो गये और उसको खूब भेंच-भेंच प्यार किया, इतने में बिल्लो ने आकर कहा—चलिए रसोई तैयार है।

अमृतराय तो उधर भोजन पाने गये और पूर्णा ने इनकी अलमारी खोलकर पिस्तौल निकाल ली और उसे उलट-पुलट कर गौर से देखने लगी। जब अमृतराय अपने दोनों मित्रों के साथ भोजन पाकर लौटे और पूर्णा को पिस्तौल लिये देखा तो जीवननाथ ने मुसकराकर पूछा—क्यों भाभी, आज किसका शिकार होगा?

पूर्णा-इसे कैसे छोड़ते है, मेरे तो समझ ही में नहीं आत।

ज़ीवननाथ—लाओ मैं बता दूँ।

यह कहकर ज़ीवननाथ ने पिस्तौल हाथ में लीं। उसमें गोली भरी और बरामदे में आये और एक पेड़ के तने में निशान लगा कर दो-तीन फ़ायर किये। अब पूर्णा ने पिस्तैल हाथ में ली। गोली भरी और निशाना लगाकर दागा, मगर ठीक न पड़ा। दूसरा फ़ायर फिर किया। अब की निशाना ठीक बैठा। तीसरा फ़ायर किया। वह भी ठीक। पिस्तौल रख दी और मुसकराते हुए अन्दर चली गयी। अमृतराय ने पिस्तौल उठा लिया और जीवननाथ से बोले—कुछ समझ में नहीं आता कि आज इनको पिस्तौल की धुन क्यों सवार है।

जीवननाथ—पिस्तौल रक्ख देख के छोड़ने की जी चाहा होगा।

अमृतराय—नहीं,आज जब से मैं आया हूँ,कुछ घबरया हुआ देख रहा हूँ।

जीवननाथ—आपने कुछ पूछा नहीं।

अमृतराय—पूछा तो बहूत मगर जब कुछ बतलायें भी, हूँ-हॉँ कर के टाल गई।

जीवननाथ—किसी किताब में पिस्तौल की लड़ाई पढ़ी होगी। और क्या?

प्राणनाथ—यही मैं भी समझता हूँ।

जीवननाथ—सिवाय इसके और हों ही क्या सकता है?

 

कुछ देर तक तीनों आदमी बैठे गप-शप करते रहे। जब दस बजने को आये तो लोग अपने-अपने कमरों में विश्राम करने चले गये। बाबू साहब भी लेटे। दिन-भर के थके थे। अखबार पढ़ते-पढ़ते सो गये। मगर बेचारी पूर्णा की ऑंखों में नींद कहॉँ? वह बार बजे तक एक कहानी पढ़ती रही। जब तमाम सोता पड़ गया और चारो तरफ सन्नाटा छा गया तो उसे अकेले डर मालूम होने लगा। डरते ही डरते उठी और चारों तरफ के दरवाजे बन्द कर लिये। मगर जवनी की नींद, बहुत रोकने पर भी एक झपकी आ ही गयी। आधी घड़ी भी न बीती थी कि भय में सोने के कारण उसे एक अति भंयकर स्वप्न दिखायी दिया। चौंककर उठ बैठी, हाथ-पॉँव थर-थर कॉँपने लगे। दिल में धड़कन होने लगी। पति का हाथ पकड़कर चाहती थी कि जगा दें। मगर फिर यह समझकर कि इनकी प्यारी नींद उचट जाएगी तो तकलीफ होगी, उनका हाथ छोड़ दिया। अब इस समय उसकी जो अवस्था है वर्णन नहीं की जा सकती। चेहरा पीला हो रहा है, डरी हुई निगाहों से इधर-उधर ताक रही है, पत्ता भी खड़खड़ाता है ता चौंक पड़ती हैं। कभी अमृतराय के सिरहाने खड़ी होती है, कभी पैताने। लैम्प की धुंधली रोशनी में वह सन्नाटा और भी भयानक मालूम हो रहा है। तसवीरे जो दीवारों से लटक रही है, इस समय उसको घूरते हुए मालूम होती है। उसके सब रोंगटे खड़े हैं। पिस्तौल हाथ में लिये घबरा-घबरा कर घड़ी की तरफ देख रही हैं। यकायक उसको ऐसा मालूम हुआ कि कमरे की छत दबी जाती है। फिर घड़ी की सुइयों को देखा। एक बज गया था इतने ही में उसको कई आदमियों के पॉँव की आहट मालूम हुई। कलेजा बॉंसों उछालने लगा। उसने पिस्तौल सम्हाली। यह समझ गयी कि जिन लोगों के आने का खटका था वह आ गये। तब भी उसको विश्वास था कि इस बन्द कमरे में कोई न आ सकेगा। वह कान लगाये पैरों की आहट ले रही थी कि अकस्मात दरवाजे पर बड़े जोर से धक्का लगा और जब तक वह बाबू अमृतराय को जगाये कि मजबूत किवाड़ आप ही आप खुल गये और कई आदमी धड़धड़ाते हुए अन्दा घुस आये। पूर्णा ने पिस्तौल सर की। तड़ाके की आवाज हुई। कोई धम्म से गिर पड़ा, फिर कुछ खट-खट होने लगा। दो आवाजे पिस्तौल के छुटने की और हुई। फिर धमाका हुआ। इतने में बाबू अमृतराय चिल्लाये। दौड़ो-दौड़ो, चोर, चोर। इस आवाज के सुनते ही दो आदमी उनकी तरफ लपके। मगर इतने में दरवाजे पर लालटेन की रोशनी नजर आयी और प्राणानाथ और जीवननाथ हाथों में सोटे लिए आ पहुँचे। चोर भागने लगे, मगर दो के दोनों पकड़ लिए गये। जब लालटेने लेकर जमीन पर देखा तो दो लाशे दिखायी दीं। एक तो पूर्णा की लाश थी और दूसरी एक मर्द की। यकायक प्राणनाथ ने चिल्ला कर कहा—अरे यह तो बाबू दाननाथ हैं।

 

बाबू अमृतराय ने एक ठंडी साँस भरकर कहा—आज जब मैंने उसके हाथ में पिस्तौल देखा तभी से दिल में एक खटका-सा लगा हुआ था। मगर, हाय क्या जानता था कि ऐसी आपत्ति आनेवाली है।

प्राणनाथ—दाननाथ तो आपके मित्रों में थे।

अमृतराय---मित्रों में जब थे तब थे। अब तो शत्रु है।

 

× × × × ×

पूर्णा को दुनिया से उठे दो वर्ष बीत गया हैं। सॉँझ का समय हैं। शीतल-सुगंधित चित्त को हर्ष देनेवाली हवा चल रही हैं। सूर्य की विदा होनेवाली किरणें खिड़की से बाबू अमृतराय के सजे हुए कमेरे में जाती हैं और पूर्णा के पूरे कद की तसवीर के पैरों को चूम-चूम कर चली जाती हैं। उनकी लाली से सारा कमरा सुनहरा हो रहा हैं। रामकली और लक्ष्मी के मुखड़े इस समय मारे आनन्द के गुलाब की तरह खिले हुए है। दोनों गहने-पाते से लौस हैं और जब वह खिड़की से भर निकालती हैं और सुनहरी किरणें उनके गुलाब-से मुखड़ों पर पड़ती है तो जान पड़ता है कि सूर्य आप बलैया ले रहा है। वह रह-रहकर ऐसी चितवनों से ताकती हैं से ताकती हैं जैसी किसी की रही हैं। यकायक रामकली ने खुश होकर कहा—सुखी वह देखों आ गये। उनके कपड़े कैसे सुन्दर मालूम देते है।

एक अति सुन्दर फिटन चम-चम करती हुई फाटक के अंदर दाखिल होती है और बँगले के बरामदे में आकर रुकती है। बाबू अमृतराय उसमें से उतरते हैं। मगर अकेले नहीं। उनका एक हाथ प्रेमा के हाथ में है। यद्यपि बाबू साहब का सुन्दर चेहरा कुछ पीला हो रहा है। मगर होंठों पर हलकी-सी मुसकराहट झलक रही है और माथे पर केशर का टीका और गले में खूबसूरत हार और शोभा बढ़ा रहे हैं।

प्रेमा सुन्दरता की मूरत और जवानी की तस्वीर हो रही है। जब हमने उसको पिछली बार देखा था तो चिन्ता और दुर्बलता के चिह्न मुखड़े से पाये जाते थे। मगर कुछ और ही यौवन है। मुखड़ा कुन्दन के समान दमक रहा है। बदन गदराय हुआ है। बोटी—बोटी नाच रही है। उसकी चंचलता देखकर आश्चर्य होता है कि क्या वही पीली मुँह और उलझे बाल वाली रोगिन है। उसकी ऑंखों में इस समय एक घड़े का नशा समाया हुआ है। गुलाबी जमीन की हरे किनारेवाली साड़ी और ऊदे रंग की कलोइयों पर चुनी हुई जाकेट उस पर खिल रही है। उस पर गोरी-गारी कलाइयों में जड़ाऊ कड़े बालों में गुँथे हुए गुलाब के फूल, माथे पर लाल रोरी की गोल-बिंदी और पॉँव में जरदोज के काम के सुन्दर में सुहागा हो रहे हैं। इस ढ़ग के सिंगार से बाबू साहब को विशेष करके लगाव है क्योंकि पूर्णा देवी की तसवीर भी ऐसी ही कपड़े पहिने दिखायी देती है और उसे देखकर कोई मुश्किल से कह सकता हैं कि प्रेमा ही की सुरत आइने में उत्तर कर ऐसा यौवन नहीं दिखा रही हैं।

अमृतराय ने प्रेमा को एक मखमली कुर्सी पर बिठा दिया और मुसकरा कर बोले—प्यारी प्रेमा आज मेरी जिन्दगी का सबसे मुबारक दिन है।

प्रेमा ने पूर्णा की तसवीर की तरफ मलिन चितवनों से देखकर कहा—हमारी ज़िन्गी का क्यों नही कहते?

प्रेमा ने यह कहा था कि उसकी नजर एक लाल चीज पर जा पड़ी जो पूर्णा की तसवीर के नीचे एक खूबसूरत दीवारगीर पर धरी हुई थी। उसने लपककर उसे उठा लिया। और ऊपर का रेशमी गिलाफ हटाकर देखा तो पिस्तौल था।

बाबू अमृतराय ने गिरी हुई आवाज में कहा—यह प्यारी पूर्णा की निशानी है, इसी से उसने मेरी जान बचायी थी।

यह कहते—कहते उनकी आवाज कॉँपने लगी।

प्रेमा ने यह सुनकर उस पिस्तौला को चूम लिया और फिर बड़ी लिहाज के साथ उसी जगह पर रख दिया।

इतने में दूसरी फ़िटन दाखिल होती है। और उसमें से तीन युवक हँसते हुए उतरते हैं। तीनों का हम पहचानते है।

एक तो बाबू जीवन नाथ हैं, दूसरे बाबू प्राणनाथ और तीसरे प्रेमा के भाई बाबू कमला प्रसाद हैं।

कमला प्रसाद को देखते ही प्रेमा कुर्सी से उठ खड़ी हुई, जल्दी से घूघँट निकाल कर सिर झुका लिया।

कमला प्रसाद ने बहिन को मुसकराकर छाती से लगा लिया और बोले—मैं तुमको सच्चे दिल से मुबारकबाद देता हूँ।

दोनों युवकों ने गुल मचाकर कहा—जलसा कराइये जलसा, यों पीछा न छूटेगा।