नया मनुुष्य ओशो
आनंदित हों कि पुराना मर रहा है... नया मनुष्य कोई युद्धक्षेत्र नहीं है, विभाजित व्यक्तित्व नहीं है बल्कि एक अविभाज्य मानव की प्रतिमा है, अद्वितीय, जीवन के साथ समग्रता से सहक्रियाशील। नया मनुष्य मूर्तरूप है अधिक सक्षम, रूपांतरित व्यक्तित्व का, ब्रह्मांड में नये ढंग से होने का, सत्य को एक गुणात्मक भेद से देखने और अनुभव करने का। तो कृपा करें और अतीत के बीत जाने का शोक न मनाएं। आनंदित हों कि पुराना मर रहा है, रात्रि विदा हो रही है और क्षितिज पर पौ फटने लगी है।
मैं प्रसन्न हूं, अत्यंत प्रसन्न हूं कि पारंपरिक मनुष्य विदा हो रहा है... कि पुराने चर्च खंडहर बन रहे हैं, कि पुराने मंदिर सूने पड़े हैं। मुझे असीम प्रसन्नता है कि पुरानी नैतिकता धरती पर चारों खाने चित्त पड़ी है। यह एक महान संकट की घड़ी है। यदि हम चुनौती स्वीकार कर लें तो यह एक अवसर है नये को निर्मित करने का। अतीत में इतना उपयुक्त समय कभी भी नहीं था। तुम अत्यंत सुंदरतम युग में रह रहे हो, क्योंकि पुराना विदा हो रहा है, या विदा हो गया है, और एक अराजकता पैदा हो गयी है। और अराजकता में से ही महान सितारों का जन्म होता है। तुम्हारे पास एक सुअवसर है पुनः नये ब्रह्मांड को निर्मित करने का। यह एक अवसर है जो दुर्लभ है, कभी-कभी आता है। तुम सौभाग्यशाली हो कि ऐसे संकट के समय मौजूद हो। इस अवसर को नये मनुष्य के निर्माण करने में प्रयोग कर लो। और अभिनव मनुष्य को निर्मित करने के लिए तुम्हें स्वयं से शुरू करना होगा।
नया मनुष्य सब कुछ एक साथ होगा: रहस्यदर्शी, कवि और वैज्ञानिक। वह जीवन को पुराने, सड़े-गले विभाजनों से नहीं देखेगा। वह एक रहस्यदर्शी होगा, क्योंकि उसे परमात्मा की उपस्थिति महसूस होगी। वह एक कवि होगा क्योंकि वह परमात्मा की उपस्थिति का महोत्सव मनाएगा। और वह वैज्ञानिक होगा क्योंकि इस उपस्थिति की जांच वह वैज्ञानिक कार्यप्रणाली से करेगा। जब मनुष्य एक साथ यह तीनों है तो वह पूर्ण है।
पुण्यात्मा की मेरी यही धारणा है। पुराना व्यक्ति दमनकारी था, आक्रामक था। पुराने व्यक्ति का आक्रामक होना स्वाभाविक था क्योंकि दमन हमेशा आक्रमण लाता है। अभिनव मनुष्य सहज होगा, सृजनात्मक होगा। पुराना व्यक्ति सिद्धांतों में जीया। नया मनुष्य सिद्धांतों में नहीं जीएगा, नैतिकताओं में नहीं जीएगा, वह सचेतनता से जीएगा। अभिनव मनुष्य बोधपूर्वक जीएगा। नया मनुष्य उत्तरदायी होगा... उत्तरदायी स्वयं को और अस्तित्व को। अभिनव मनुष्य पुराने अर्थों में नैतिक नहीं होगा, वह नीतिनिरपेक्ष होगा।
नया मनुष्य अपने साथ एक नया जगत लेकर आएगा। अभी नया मनुष्य एक अल्पसंख्यक रूपांतरित वर्ग ही है। लेकिन वह नयी सभ्यता का संवाहक है, बीज है। उसे सहयोग दो। छत पर चढ़कर उसके आगमन की घोषणा करो: यही मेरा संदेश है तुम्हें।
नया मनुष्य मुक्त है और ईमानदार है। उसका सत्य दर्पण जैसा है, प्रामाणिक है, स्वयं को प्रकट करने वाला है। वह पाखंडी नहीं होगा। वह उद्देश्यों के लिए नहीं जीएगा; वह जीएगा अभी, यहीं। वह केवल एक ही समय से परिचित होगा, अभी, और एक ही स्थान, यहां। और उस उपस्थिति में जान पाएगा कि परमात्मा क्या है।
आनंदित होओ। अभिनव मानव आ रहा है, पुराना विदा हो रहा है। पुराना पहले ही सलीब पर लटका है, और नये का क्षितिज पर पदार्पण हो चुका है। आनंदित होओ! मैं बार-बार कहता हूं; आनंदित होओ!
इसकी पूरी संभावना है कि जहां तक जीवन का संबंध है, कोई भविष्य नहीं होगा। हम ऐसे रास्ते के करीब आ रहे हैं जिसके अंत में एक बंद गली है। इस तथ्य को स्वीकार करना दुखद है, लेकिन अच्छा होगा कि हम इसे स्वीकार करें; क्योंकि तब फिर एक नया मोड़ लेने की संभावना बनती है। आज घटनाएं जिस दिशा में गतिमान हैं, उनकी तार्किक निष्पत्ति एक ही है: सार्वभौमिक आत्मघात।
और सर्वाधिक चौंका देने वाली बात यह है कि संसार का बुद्धिजीवी वर्ग, संसार के वैज्ञानिक, संसार के दार्शनिक इन सब तथ्यों की उपेक्षा कर रहे हैं।
प्रत्येक बुद्धिमान व्यक्ति में यह संकल्प होना चाहिए कि हम किन्हीं निहित स्वार्थों को इस ग्रह को नष्ट करने नहीं देगें। मनुष्य को बचाना अस्तित्व के महानतम सृजन को बचाना है। इस पृथ्वी को मनुष्य का सृजन करने में चालीस लाख वर्ष लगे। वह इतना मूल्यवान है! और भविष्य कहीं अधिक मूल्यवान है।
यदि भविष्य के लिए कुछ करना हो तो यही समय है; अन्यथा अस्तित्व का यह चेतना का सर्वश्रेष्ठ विकास खो जाएगा। यह न केवल पृथ्वी की हानि होगी बल्कि पूरे अस्तित्व की हानि होगी।
इन लाखों वर्षों में हम चेतना की थोड़ी संभावना पैदा कर सके हैं, लेकिन हमारे पास इतना समय नहीं है कि हम प्रतीक्षा करें कि प्रकृति अपनी धीमी गति से विकसित होती रहे। प्रकृति के लिए अनंत काल उपलब्ध है, हमारे लिए नहीं है। हमारे पास सिर्फ बारह साल हैं - बीसवीं सदी के अंत तक।
उदाहरण के लिए, संयुक्त राष्ट्रसंघ ने वातावरण और विकास पर विश्व आयोग की एक रिपोर्ट प्रस्तुत की है: "हमारा सामूहिक भविष्य" - इस रिपोर्ट में अपील की गई है कि इस ग्रह को बचाने के लिए एक अविच्छिन्न (सस्टेनेबल)विकास की जरूरत है। इसकी व्यवस्था उन्होंने इस तरह की है: भविष्य के साधनों को नष्ट किए बगैर वर्तमान की बुनियादी जरूरतों को पूरा करना। यह रिपोर्ट इसे भी स्वीकार करती है कि अगर कुछ करना है तो अभी, इसी समय करना चाहिए, अन्यथा भविष्य होगा ही नहीं।
यह निष्कर्ष सही है। लेकिन रिपोर्ट चालाकी से भरी है - इस अर्थ में कि वह इस संबंध में चर्चा नहीं करती कि वर्तमान समस्याएं किसने पैदा की हैं।
यदि हमें भविष्य की समस्याओं को हल करके उन्हें विसर्जित करना है तो हमें उनकी जड़ों को अतीत में खोजना होगा। यह हमारा समूचा अतीत है, उसके सभी आयामों में, जिसने इस खतरनाक स्थिति को पैदा किया है। लेकिन इस संबंध में कोई बात ही नहीं करता क्योंकि इससे पहले किसी भी पीढ़ी ने भविष्य की फिकर ही नहीं की थी। हजारों वर्षों तक मनुष्य मनमाने ढंग से जीता रहा है। और उसने अगली पीढ़ी को उसके मनचाहे ढंग से जीने के लिए बाध्य किया। अब यह और आगे संभव नहीं है।
हमें एक आमूल छलांग(क्वांटम लीप) लेनी है और नई पीढ़ी को सिखाना है कि हम जिस भांति जीए हैं उस भांति वह न जीए। केवल तभी भविष्य बदल सकता है।
ओशो, फ़िलॉसफिया पैरेनिस, भाग 2, प्र #2