वीरांगना कर्मादेवी

 



महिला जगत् 
वीरांगना कर्मादेवी -
विनोदकुमार भारद्वाज 

         आज से लगभग 750 वर्ष पूर्व की बात है । मुहम्मद गौरी ने भारत पर आक्रमण किया और अपनी विशाल सेना के बल पर लूट - मार मचाता हुआ जब वह गौर वापस चला गया , तब अपने पीछे कुतुबुद्दीन ऐबक नाम के एक गुलाम को अपने जीते हुए राज्यों का सूबेदार नियुक्त कर गया। कुतुबुद्दीन चाहता था कि मुहम्मद गौरी द्वारा विजयी राज्यों को सम्मिलित शक्ति से अन्य छोटे - छोटे राज्यों को अपने अधिकार में कर लिया जाये। उन दिनों मेवाड़ का शासन - भार एक नारी कर्मादेवी के कन्धों पर था। मेवाड़ के महाराणा समर सिंह एक युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए थे और उनके पुत्र कर्णसिंह के बहुत छोटे होने के कारण शासन की बागडोर विधवा महारानी कर्मादेवी ने संभाली थी। कुतुबुद्दीन ऐबक ने जब देखा कि मेवाड़ का राज्य एक अबला नारी के अधिकार में है , तब उसने एक विशाल सेना लेकर वहाँ आक्रमण करने की सोची । इस आक्रमण की योजना की सूचना महारानी कर्मादेवी के पास पहुंची , तो वह चिन्ता में पड़ गई। फिर भी ऐसी कठिन परिस्थिति में उन्होंने धैर्य से काम लिया। व्यर्थ के रक्तपात से बचने के लिए उन्होंने ऐबक को अपने दूत द्वारा यह सूचना भिजवाई- " आप एक योग्य पुरुष हैं। इस समय मेवाड़ पर एक स्त्री शासन कर रही है। अतः आप जैसे वीर पुरुषों का एक स्त्री से युद्ध करना उचित नहीं है। 

        मेरा पुत्र कर्णसिंह जब युवा हो जायेगा , तब हम आपका सामना वीरता के साथ कर सकते हैं। " ऐबक ने जब यह संदेश सुना , तब वह खिलखिला कर हंस पड़ा। उसने सोचा - ' हो न हो , महारानी कर्मादेवी उसकी ताकत से भयभीत हो गई है। ' त मी तो युद्ध न करने की भीख माँग रही है। ' अत : उसने महारानी के नाम एक सन्देश भिजवाया , जिसका आशय था कि या तो तुम इस्लामी मजहब स्वीकार करके मेरी बेगम बन जाओ अथवा तुम्हें युद्ध की आग में कूदना होगा। 

       महारानी कर्मादेवी ने यह संदेश सुना तो उन्होंने रणचण्डी का रूप धारण कर लिया। एक भारतीय वीरांगना भला अपना अपमान कैसे सहन कर सकती थी ? तत्काल ही उन्होंने मेवाड़ की सेना को युद्ध के लिए संगठित करना आरम्भ कर दिया। सम्पूर्ण मेवाड़ में युद्ध का बिगुल बजने लगा। ऐबक की सेना जब आगे बढ़ी , तब मेवाड़ के सैनिक भी रण - भूमि में सिर पर कफन बांध कर कूद पड़े भला ऐसी कठिन परीक्षा की घड़ी में महारानी कहाँ चुप रह सकती थीं ? उन्होंने मर्दाना वेश धारण किया और एक बढ़िया नस्ल के घोड़े पर सवार होकर वह युद्ध - स्थल में आ पहुंचीं। राजपूतों ने जब अपनी रानी को स्वयं आगे बढ़ कर युद्ध करते देखा , तब उनका उत्साह पहले से दुगुना हो गया। 

        भंयकर युद्ध हुआ। महारानी ने कुतुबुद्दीन के छक्के छुड़ा दिये। कुतुबुद्दीन ऐबक को एकाएक विश्वास न हुआ कि महारानी के सम्मुख उसकी सेना को झुकना पड़ रहा है। आखिर उसकी विशाल सेना युद्ध - भूमि से भाग खड़ी हुई । इस प्रकार महारानी कर्मादेवी ने मेवाड़ की लाज रख ली अपने जीवनकाल में फिर कभी ऐबक का साहस न हुआ कि वह मेवाड़ को जीतने की सोचता। जब तक भारत में महारानी कर्मादेवी जैसी वीर स्त्रियाँ जन्म लेती रहेंगी , तब तक निःसन्देह कोई भी देश हमें पराजित नहीं कर सकता। भारतीय इतिहास इस बात का साक्षी है कि आवश्यकता पड़ने पर भारतीय नारियाँ भी चूड़ियां उतार कर हाथों में तलवार लिए रणचण्डी का रूप धारण कर लेती हैं।

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